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उत्तर प्रदेश के उत्तरी छोर पर बसा सहारनपुर जिला महज़ एक औद्योगिक शहर नहीं है, बल्कि इसकी गलियों में सदियों पुराना इतिहास और शानदार वास्तुकला के कई अनसुलझे रहस्य छिपे हैं। 2000 ईसा पूर्व (BCE) की सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर मुग़ल हुकूमत और ब्रिटिश काल तक, इस शहर ने कई ऐतिहासिक बदलाव देखे हैं। आज यह शहर अपनी बेजोड़ लकड़ी की नक्काशी के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन, विकास और आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में सहारनपुर की ऐतिहासिक हवेलियां, प्राचीन दरवाज़े और मुग़ल कालीन वास्तुकला अपनी असली पहचान खोते जा रहे हैं।
सहारनपुर शहर का नामकरण और इसके ऐतिहासिक पुराने शहर की नींव कैसे रखी गई थी?
सहारनपुर का इतिहास बेहद प्राचीन और दिलचस्प है। साल 1340 में मुहम्मद तुगलक ने एक प्रसिद्ध सूफी संत शाह हारून चिश्ती के नाम पर इस जगह का नाम 'शाह-हारूनपुर' रखा था, जो समय के साथ बदलकर सहारनपुर हो गया। इसके बाद, इस क्षेत्र को एक व्यवस्थित शहर का रूप देने का श्रेय मुग़ल गवर्नर राजा शाह रणबीर सिंह को जाता है। उन्होंने एक चारदीवारी वाले सुरक्षित शहर (Walled city) की नींव रखी थी।
राजा शाह रणबीर सिंह ने शहर को बाहरी आक्रमणों से बचाने और व्यापार को बढ़ावा देने के लिए चार प्रमुख दरवाज़ों का निर्माण कराया था। इन ऐतिहासिक दरवाज़ों और प्रमुख स्थलों का विवरण इस प्रकार है:
सहारनपुर में जैन व्यापारियों द्वारा बनाई गई मुग़ल कालीन हवेलियों का क्या महत्व है?
राजा शाह रणबीर सिंह के शासनकाल में सहारनपुर एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन चुका था। इसी दौरान, अमीर जैन व्यापारी परिवारों ने शहर में कई भव्य हवेलियों का निर्माण कराया। इन हवेलियों की वास्तुकला अपने आप में बेहद अनूठी थी, क्योंकि इनमें हिंदू और इस्लामी कला का बेहतरीन संगम देखने को मिलता था।
इन ऐतिहासिक इमारतों में पत्थरों के मजबूत ब्रैकेट और लकड़ी के भारी दरवाज़े लगाए गए थे। इन दरवाज़ों पर उकेरे गए जटिल ज्यामितीय पैटर्न (Geometric patterns) इतने खास थे कि उस समय आसपास के किसी भी अन्य क्षेत्र में ऐसी नक्काशी नहीं पाई जाती थी। छत्ता जम्बूदास और छत्ता बड़ूमल के इलाकों में बनी ये हवेलियां उस दौर की आर्थिक समृद्धि और वास्तुकला की शानदार मिसाल हुआ करती थीं।
वास्तुकला की दृष्टि से इन हवेलियों और 'छत्तों' में ऐसा क्या खास था?
सहारनपुर की इन हवेलियों की सबसे बड़ी पहचान उनके 'छत्ते' हुआ करते थे। दरअसल, "छत्ता" उन ढके हुए लकड़ी के ऊपरी पुल (Overbridges) को कहा जाता था, जो सड़क के एक पार से दूसरी पार स्थित हवेलियों को आपस में जोड़ते थे। इन लकड़ी के पुलों के ज़रिए व्यापारी परिवार बिना सड़क पर उतरे एक हवेली से दूसरी हवेली में आ-जा सकते थे।
वास्तुकला की इस बेजोड़ कलाकारी के अलावा, इन हवेलियों में शानदार भित्तिचित्र भी बनाए गए थे। दीना नाथ बाज़ार में स्थित आत्मा राम की हवेली और छत्ता जम्बूदास की हवेली की दीवारों पर उकेरे गए ये भित्तिचित्र उस दौर की उन्नत चित्रकला को दर्शाते हैं। इसके अलावा, ग्रामीण सहारनपुर की बात करें, तो घाना खंडी (या घुन्ना) गांव में अली बख्श द्वारा बनवाई गई हवेली भी एक ऐतिहासिक अजूबा है, जिसके निर्माण में 15 साल से ज़्यादा का वक्त लगा था।
आज इन नायाब ऐतिहासिक हवेलियों और धरोहरों की दुर्दशा के मुख्य कारण क्या हैं?
एक समय में शहर की शान रहीं ये हवेलियां आज अपनी बदहाली पर आँसू बहाने को मजबूर हैं। रखरखाव के अभाव और सरकारी अनदेखी के कारण ये नायाब इमारतें या तो खंडहर में तब्दील हो गई हैं या फिर इनका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर दिया गया है।
इन ऐतिहासिक धरोहरों के पतन के कई मुख्य कारण सामने आए हैं:
जामा मस्जिद, कंपनी बाग और शहर के अन्य ऐतिहासिक स्थलों की वर्तमान स्थिति क्या है?
हवेलियों के अलावा, सहारनपुर में कई अन्य प्राचीन स्थल भी मौजूद हैं, जो शहर के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास को बयां करते हैं।
शहर की सबसे बड़ी शाही जामा मस्जिद का निर्माण 1534 में मुग़ल सम्राट हुमायूं के शासनकाल में हुआ था, हालांकि इसकी वास्तुकला की जड़ें तुगलक और लोदी काल से भी जुड़ी हुई हैं। वहीं, 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) के दौरान जॉर्ज गोवन (George Govan) द्वारा स्थापित 'कंपनी बाग' (Company Garden) भारत के सबसे पुराने वनस्पति उद्यानों में से एक है।

धार्मिक स्थलों की बात करें, तो शिवालिक की पहाड़ियों में स्थित माता शाकुंभरी देवी मंदिर और बाबा भूरा देव मंदिर में हर साल लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। इसके अलावा शहर का प्राचीन भूतेश्वर मंदिर और घंटाघर आज भी स्थानीय लोगों की आस्था और दिनचर्या का अहम हिस्सा बने हुए हैं, लेकिन बढ़ती आबादी के कारण इन ऐतिहासिक स्थलों के आसपास भारी अतिक्रमण हो चुका है।
सहारनपुर का 400 साल पुराना लकड़ी की नक्काशी का उद्योग आज किस हाल में है?
सहारनपुर का ज़िक्र उसकी विश्व प्रसिद्ध लकड़ी की नक्काशी के बिना अधूरा है। शीशम और आम की लकड़ी पर हाथ से किए गए बारीक काम का यह उद्योग 400 साल से भी ज़्यादा पुराना है। मुग़ल काल में शुरू हुई यह कला आज भी शहर की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बनी हुई है।
आंकड़ों के अनुसार, यह कुटीर उद्योग हर साल करीब 400 करोड़ रुपये का व्यापार करता है और इससे लगभग 1,50,000 कारीगर जुड़े हुए हैं। यहां का फर्नीचर और सजावटी सामान अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों में निर्यात किया जाता है। हालांकि, आधुनिक मशीनों से बनने वाले सस्ते विकल्पों और कच्चे माल की कमी के कारण यह पारंपरिक कला आज भारी चुनौतियों का सामना कर रही है। 'एक जिला एक उत्पाद' जैसी सरकारी योजनाओं से उम्मीद बंधी है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर कारीगरों को अभी भी बेहतर बाज़ार और सुविधाओं की सख्त ज़रूरत है।
संदर्भ
1. https://tinyurl.com/2y4buyvt
2. https://tinyurl.com/26vdp6n3
3. https://tinyurl.com/2a2aycpf
4. https://tinyurl.com/26arnc2r
5. https://tinyurl.com/y4mxfk75
6. https://tinyurl.com/2xur5jag
7. https://tinyurl.com/2a2klhar