भूसे से ‘सफेद सोना’ कैसे उगा रहीं शाहजहांपुर की महिलाएं?

फफूंदी और मशरूम
10-01-2026 09:12 AM
भूसे से ‘सफेद सोना’ कैसे उगा रहीं शाहजहांपुर की महिलाएं?

हम अक्सर फफूंद (Fungi) को केवल खाने के नज़रिए से देखते हैं, लेकिन इसका महत्व इससे कहीं ज्यादा है। अगर हम विज्ञान की दृष्टि से देखें, तो फफूंद प्रकृति की सबसे कुशल "सफाई मशीन" है। इनका असली काम सड़े-गले पेड़-पौधों और भूसे जैसे कार्बनिक पदार्थों को तोड़ना और उनके पोषक तत्वों को वापस मिट्टी में मिलाना है। जरा सोचिए, अगर फफूंद न होते, तो हमारी यह धरती कचरे के ढेर में बदल जाती!

खेती-किसानी में मशरूम (जो कि एक प्रकार की फफूंद ही है) इसी वैज्ञानिक सिद्धांत का फायदा उठाते हैं। ये खेत के बेकार पड़े भूसे से अपना भोजन लेते हैं और उसे एक उच्च-प्रोटीन वाले शानदार आहार में बदल देते हैं।

शाहजहांपुर के लिए यह क्यों जरूरी है?
शाहजहांपुर जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में, जहां खेती के लिए जमीन लगातार कम होती जा रही है, वहां मशरूम की खेती एक वरदान की तरह है। इसके लिए आपको एक-दो एकड़ खेत की जरूरत नहीं है! कमाल की बात यह है कि इसे आप घर के किसी छोटे से कोने या फूस की झोपड़ी में भी आसानी से उगा सकते हैं। बिना खेत बढ़ाए, अपनी आमदनी और परिवार का पोषण बढ़ाने का इससे सशक्त माध्यम शायद ही कोई और हो।

यह कोई कल्पना या मात्र दावा नहीं, बल्कि शाहजहांपुर के निगोही ब्लॉक के गांव जिंदपुरा ने इसे धरातल पर उतारकर सच साबित कर दिया है। वहां की सफलता की कहानी आज पूरे जिले के लिए प्रेरणा बन चुकी है। 'मिशन शक्ति' अभियान के तहत, वहां के स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाओं ने पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने की ठानी। उन्होंने बहुत ही कम लागत में ओएस्टर मशरूम (oyster mushroom) की खेती शुरू की और यह साबित कर दिया कि इस काम के लिए बड़े-बड़े गोदामों की जरूरत नहीं होती। उन्होंने अपने घर के खाली कमरों का सही इस्तेमाल किया और उसे कमाई का जरिया बना लिया।
इस मॉडल (model) की सबसे बड़ी खूबी है इसकी 'कम लागत'। इसमें लगने वाला मुख्य कच्चा माल 'गेहूं का भूसा' है, जो हमारे गांवों में बहुत आसानी से मिल जाता है। जिंदपुरा की इन महिलाओं ने न केवल अपनी नियमित कमाई पक्की की, बल्कि आत्मनिर्भरता की एक ऐसी मिसाल कायम की है जिसे अब शाहजहांपुर के दूसरे गांव भी अपनाना चाहते हैं।

कैसे करें शुरुआत? 
अगर आप भी शाहजहांपुर में ओएस्टर मशरूम उगाना चाहते हैं, तो राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) द्वारा बताए गए तरीके सबसे भरोसेमंद साबित होते हैं। यह प्रक्रिया सरल तो है, लेकिन इसमें थोड़ी सावधानी बरतनी जरूरी है:

  1. कच्चा माल (Substrate): ओएस्टर मशरूम मुख्य रूप से खेती के अवशेषों पर उगता है। इसके लिए नया गेहूं या धान का भूसा (Straw) सबसे अच्छा रहता है। बस ध्यान रहे कि भूसा भीगा या सड़ा हुआ न हो।
  2. भूसे की तैयारी: सबसे पहले भूसे को छोटे-छोटे टुकड़ों (2-3 सेमी) में काट लें। इसके बाद इसे कीटाणुमुक्त करना बेहद जरूरी है ताकि इसमें कोई हानिकारक फंगस न लगे। इसके लिए गांव में सबसे आसान तरीका है- भूसे को गर्म पानी में उबालना या फिर रासायनिक विधि से साफ करना।
  3. बीजाई (Spawning): जब उपचारित भूसे की नमी थोड़ी कम हो जाए, तो उसमें मशरूम का बीज (Spawn) मिलाया जाता है और इसे पॉलीथिन (polythene) की थैलियों में भर दिया जाता है।
  4. सही वातावरण: इन थैलियों को एक बंद कमरे में रखा जाता है। ओएस्टर मशरूम के लिए 20 डिग्री सेल्सियस से 30 डिग्री सेल्सियस का तापमान और हवा में 80-85% नमी (Humidity) सबसे अच्छी मानी जाती है। शाहजहांपुर का मानसून और उसके बाद का मौसम इसके लिए कुदरती तौर पर एकदम सही है।
  5. फसल और कटाई: करीब 15-20 दिनों में आप देखेंगे कि भूसे में सफेद जाल (माइसेलियम (Mycelium)) फैल गया है और छोटे-छोटे मशरूम (पिनहेड (Pinhead)) दिखने लगे हैं। अगर सही देखभाल की जाए, तो एक बार की तैयारी में आप कई बार फसल तोड़ सकते हैं।

जानकारों का कहना है कि लोग अक्सर 'साफ-सफाई' में लापरवाही कर देते हैं, जिससे फसल खराब हो जाती है। इसलिए जिस कमरे में मशरूम उगाएं, उसे बिल्कुल साफ और हवादार रखें।
मानसून में शाहजहांपुर के खेतों और मैदानों में अक्सर अपने आप कुछ मशरूम उग आते हैं। विज्ञान की भाषा में इनमें से कुछ 'टर्माइटोमाइसेस' (Termitomyces) प्रजाति के होते हैं, जो दीमक की बांबियों के पास उगते हैं और खाने में स्वादिष्ट भी होते हैं। गांव-देहात में लोग इन्हें बड़े चाव से खाते हैं।

लेकिन, यहाँ एक बड़ी चेतावनी भी है! जंगल या खेत में उगने वाले सभी मशरूम खाने लायक नहीं होते। कई जंगली मशरूम बेहद जहरीले होते हैं, लेकिन दिखने में बिल्कुल खाने वाले मशरूम जैसे लगते हैं। बिना सही पहचान के इनका सेवन जानलेवा हो सकता है। इसलिए विशेषज्ञ हमेशा यही सलाह देते हैं कि सुरक्षा के लिहाज से केवल खेती किए गए (Cultivated) मशरूम, जैसे ओएस्टर या बटन मशरूम ही खाएं। ये पूरी तरह सुरक्षित और पौष्टिक होते हैं।

पूर्वी उत्तर प्रदेश और शाहजहांपुर के आसपास 'एग्री-प्रेन्योरशिप' (Agri-preneurship) (कृषि-उद्यमिता) के लिए ओएस्टर मशरूम एक सुनहरा मौका है। यह केवल खेती नहीं, बल्कि एक पूरा बिजनेस है। चूंकि इसमें प्रोटीन (protein), विटामिन (Vitamin) और फाइबर (fiber) भरपूर होता है, इसलिए सेहत के प्रति जागरूक लोगों में इसकी मांग तेजी से बढ़ रही है।
ताजे मशरूम जल्दी खराब हो जाते हैं, इसलिए कोशिश करें कि इन्हें स्थानीय बाजार में ही बेचें। लेकिन अगर उपज ज्यादा हो, तो आप इसे सुखाकर (Dry Mushroom) या इसका पाउडर (powder) बनाकर भी लंबे समय तक रख सकते हैं और अच्छे दाम पर बेच सकते हैं। कम जगह, कम खर्च और बेकार भूसे का इस्तेमाल—ये सारी बातें इसे छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के लिए कमाई का एक पक्का साधन बनाती हैं।

प्रशिक्षण (Training) कहां से लें?
इस धंधे में सफलता के लिए सही जानकारी होना बहुत जरूरी है। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) और सोलन स्थित 'ICAR - मशरूम अनुसंधान निदेशालय' (Directorate of Mushroom Research) इस क्षेत्र में जानकारी के सबसे बड़े केंद्र हैं। शाहजहांपुर के जो भी युवा या किसान भाई इसे शुरू करना चाहते हैं, वे इन सरकारी संस्थानों से संपर्क कर सकते हैं। इनके ट्रेनिंग कोर्स में बीज बनाने से लेकर खाद बनाने तक की पूरी जानकारी दी जाती है। याद रखिए, सही ज्ञान के साथ की गई शुरुआत ही मुनाफे की गारंटी है।
कुल मिलाकर, शाहजहांपुर में मशरूम की खेती सिर्फ एक नया ट्रेंड नहीं है, बल्कि यह खेती के कचरे को निपटाने और कुपोषण से लड़ने का एक 'स्मार्ट (smart) समाधान' है। जिंदपुरा की महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि अगर इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो घर की चारदीवारी के भीतर भी 'सफेद सोना' उगाया जा सकता है। अब बारी आपकी है कि आप भी इस वैज्ञानिक खेती को अपनाएं और मौसम का फायदा उठाकर अपनी आमदनी बढ़ाएं।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2y5ytgjs
https://tinyurl.com/2y69zn28
https://tinyurl.com/2ykedpz8
https://tinyurl.com/2xo2bgdy
https://tinyurl.com/27zzmxx2
https://tinyurl.com/28mx5ad9 

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