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शाहजहांपुरवासियों के लिए गर्रा (देवहा) नदी महज़़ बहता हुआ जल नहीं, बल्कि शहर की जीवनरेखा है। जब हम पुल से गुज़़रते हैं, तो इसकी सतह पर तैरते प्लास्टिक (plastic) को देखकर अक्सर हम मुँह फेर लेते हैं। लेकिन यकीन मानिए, नदी की असली सेहत उसकी सतह पर नहीं, बल्कि पानी के भीतर छिपे संसार से तय होती है।
गर्रा नदी के पानी में बैक्टीरिया (bacteria), प्रोटोजोआ (protozoa) और शैवाल (Algae) की एक जटिल सूक्ष्म दुनिया बसी है। यही सूक्ष्म जीव (Microbes) यह तय करते हैं कि हमारी नदी 'निर्मल' बनी रहेगी या एक 'बदबूदार नाले' में तब्दील हो जाएगी।
आखिर नदी को 'बीमार' कौन कर रहा है?
सरकारी रिपोर्ट और 'राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन' (NMCG) के दस्तावेज़ बताते हैं कि शाहजहांपुर के विस्तार के साथ नदी किनारे बस्तियाँ तो बढ़ती गईं, लेकिन सीवेज प्रबंधन (Sewage Treatment) की रफ़्तार वैसी नहीं रही।
जब शहर के पुराने नालों और घरों का गंदा या अनुपचारित पानी बिना शोधन के नदी में मिलता है, तो वह अपने साथ भारी मात्रा में 'पोषक तत्व' (Nutrients) लेकर आता है। सुनने में 'पोषक तत्व' शब्द भला लगता है, लेकिन नदी के तंत्र के लिए यह किसी 'धीमे ज़हर' से कम नहीं है। यही गंदगी नदी के नाज़़ुक संतुलन को बिगाड़ने की पहली सीढ़ी है।
आपने अक्सर नदी के किनारों पर हरी काई (Algae) जमी देखी होगी। हम इसे सामान्य मानते हैं, लेकिन विज्ञान की नज़र में यह खतरे की घंटी है। जब नालों के ज़रिए नाइट्रोजन (nitrogen) और फास्फोरस (phosphorus) नदी में घुलते हैं, तो यह काई बेकाबू होकर बढ़ने लगती है; इसे वैज्ञानिक भाषा में 'एल्गल ब्लूम' (Algal Bloom) कहा जाता है।
शुरुआत में यह हरियाली ठीक लग सकती है, लेकिन असली समस्या तब आती है जब यह काई मरने लगती है। मृत काई को सड़ाने (Decompose) के लिए बैक्टीरिया पानी की सारी ऑक्सीजन खींच लेते हैं। नतीजा यह होता है कि पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है, जलीय जीव दम तोड़ने लगते हैं और नदी से दुर्गंध आने लगती है। शाहजहांपुर में नदी से आने वाली बदबू का असल कारण यही है।
मगर निराश होने की ज़रूरत नहीं है। प्रकृति ने नदी की सफ़ाई के लिए अपनी एक 'सुरक्षा सेना' भी तैयार की है, जिसके सबसे अहम सिपाही हैं “प्रोटोजोआ (Protozoa)।”![]()
ये नन्हें सूक्ष्म जीव पानी के 'वैक्यूम क्लीनर' (vacuum cleaner) की तरह काम करते हैं। दुनिया भर के बड़े सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट इसी सिद्धांत पर काम करते हैं। प्रोटोजोआ गंदे पानी के हानिकारक बैक्टीरिया को खाकर उसे साफ़ (Polish) करने में मदद करते हैं। अगर गर्रा नदी के पानी में स्वस्थ प्रोटोजोआ मिलते हैं, तो यह एक शुभ संकेत है कि नदी की अपनी शोधन प्रणाली अब भी काम कर रही है।
बैक्टीरिया और प्रोटोजोआ के साथ-साथ एक और खास जीव है 'डायटम' (Diatom)। इन्हें आप नदी का 'नन्हा जासूस' कह सकते हैं। पानी की रासायनिक जाँच तो केवल उसी समय का हाल बताती है जब नमूना लिया गया हो। लेकिन डायटम के बाहरी कवच पर प्रदूषण के पुराने निशान अंकित रह जाते हैं, जो बताते हैं कि पिछले महीनों में नदी ने कितना दबाव झेला है। वैज्ञानिक इनका उपयोग यह जानने के लिए करते हैं कि सीवेज का सबसे बुरा असर नदी के किस हिस्से पर पड़ा है।
नदी की सेहत सिर्फ नालों पर ही नहीं, बल्कि इस पर भी निर्भर है कि हम शहर का ठोस कूड़ा (Solid Waste) कैसे प्रबंधित करते हैं। यदि गीला कचरा सड़ता है, तो उसका रिसाव (Leachate) बारिश के साथ नदी में पहुँचकर हानिकारक बैक्टीरिया को बढ़ा देता है।
साथ ही, जैसा कि हाल ही में देखा गया, बाँध से अचानक पानी छोड़े जाने पर नदी विकराल रूप ले लेती है। यह तेज़ बहाव नदी को धोता तो है, लेकिन किनारों की गंदगी और मिट्टी भी पानी में घोल देता है। इससे प्रोटोजोआ जैसे हमारे 'मित्र सूक्ष्म जीवों' का प्राकृतिक वास उजड़ जाता है और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा जाता है।
शाहजहांपुर की गर्रा नदी को बचाने की जंग केवल 'सफ़ाई अभियानों' से नहीं जीती जा सकती। हमें उस अदृश्य सूक्ष्म दुनिया का ख्याल रखना होगा जो नज़़रों से ओझल है। समाधान स्पष्ट है “हमें नालों के गंदे पानी को सीधे नदी में गिरने से रोकना होगा और कचरे का वैज्ञानिक निस्तारण करना होगा।” जब हम नदी में प्रोटोजोआ और डायटम जैसे 'मित्र जीवों' को पनपने का अवसर देंगे, तभी हमारी नदी वास्तव में सांस ले पाएगी। अब समय है कि हम नदी को मात्र एक जलस्रोत न मानकर उसे एक 'जीवंत इकाई' के रूप में स्वीकारें और उसका सम्मान करें।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2bddh3td
https://tinyurl.com/296vmb5f
https://tinyurl.com/22lbtwkg
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https://tinyurl.com/26baoyye
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