टेसू- कचनार की कहानी: शाहजहांपुर कैसे बन सकता है, फूलों का शहर?

फूलदार पौधे (उद्यान)
10-01-2026 09:12 AM
टेसू- कचनार की कहानी: शाहजहांपुर  कैसे बन सकता है, फूलों का शहर?

शाहजहांपुर का मिज़ाज सिर्फ कैलेंडर की तारीखों से नहीं, बल्कि यहाँ की फिज़ा में घुलते रंगों और हवा में तैरती खुशबुओं से बदलता है। जब हम अपने शहर की आबोहवा को गौर से देखते हैं, तो पाते हैं कि यहाँ के पेड़-पौधे एक अनकही कहानी सुना रहे हैं। चाहे होली से पहले जंगलों को केसरिया रंग में रंगने वाला 'टेसू' (पलाश) हो, या पतझड़ के सूनेपन में भी शान से खिलने वाला 'कचनार'—ये सब मिलकर शाहजहांपुर की रूह को संवारते हैं।

विज्ञान की नजर से देखें तो हमारा जिला कुदरत का लाडला है। शोध बताते हैं कि शाहजहांपुर में फूल देने वाले पौधों (Angiosperms) की करीब 527 प्रजातियां मौजूद हैं। यह महज एक किताबी आंकड़ा नहीं, बल्कि एक जीती-जागती विरासत है। इसमें कोमल शाक-सब्जियों से लेकर झाड़ियाँ और विशालकाय वृक्ष तक शामिल हैं। यह विविधता ही इस बात का सबूत है कि हमारे पास कुदरती खजाने की कोई कमी नहीं है, जो शाहजहांपुर को सही मायनों में "फूलों का शहर" बना सकती है।
अगर हमें शहर का अपना 'नेचर कैलेंडर' बनाना हो, तो उसमें सबसे खास जगह 'कचनार' और 'पलाश' की होगी। कचनार की फितरत ही अलग है। जब सर्दी जा रही होती है और गर्मी की आहट होती है (Late winter to early summer), और बाकी पेड़ अपने पत्ते गिराकर उदास खड़े होते हैं, तब कचनार अपनी भीनी खुशबू और पांच पंखुड़ियों वाले फूलों के साथ महक उठता है। यह हमें सिखाता है कि बिना हरियाली के भी खूबसूरती कैसे बिखेरी जा सकती है।

दूसरी ओर, बसंत का असली तो 'पलाश' (टेसू) के बिना अधूरा है। इसे यूं ही 'जंगल की आग' (Flame of the Forest) नहीं कहते। जब यह खिलता है, तो लगता है मानो पेड़ों पर आग की लपटें नाच रही हों। शाहजहांपुर की संस्कृति में इसका गहरा रंग चढ़ा है। पुराने दौर में होली के रंग इसी पलाश के फूलों को उबालकर बनते थे—जो न सिर्फ त्वचा के लिए सुरक्षित थे, बल्कि हमारी परंपरा का हिस्सा भी। यह फूल हमारी दवाओं, रंगाई और रीति-रिवाजों का गवाह रहा है।
 

File:Butea monosperma - Fruit and Spice Park - Homestead, Florida - DSC09159.jpg

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारे इतिहास और विकास में इन फूलों का बड़ा हाथ है। इन्हीं फूलों ने खेती-किसानी को संभव बनाया। मधुमक्खियाँ और तितलियाँ जब इन पर बैठती हैं, तो परागण (Pollination) होता है, जिससे अनाज पैदा होता है और हमारी थाली तक भोजन पहुँचता है। शाहजहांपुर जैसे कृषि प्रधान जिले के लिए ये फूल सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि जीवन का आधार हैं। 

शाहजहांपुर की पहचान हमारी गर्रा (Deoha) नदी के बिना अधूरी है। नदी सिर्फ पानी का बहना नहीं है; इसके किनारे एक पूरा संसार (Ecosystem) बसता है। नदी के तटबंध और वहाँ की गीली मिट्टी एक विशेष प्रकार के पौधों का घर है। अगर हम शहर को सुंदर बनाना चाहते हैं, तो हमें नदी के साथ मिलकर चलना होगा। 'राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन' (NMCG) भी यही कहता है कि नदी किनारों पर पक्के निर्माण के बजाय हरियाली और फूलों का गलियारा (Riverbank Bloom Trail) होना चाहिए।
लेकिन जब हम नदी के स्वभाव को समझे बिना विकास की जिद करते हैं, तो नतीजे अच्छे नहीं होते। 'न्यू सिटी' में गर्रा किनारे बना ककरा बायोडायवर्सिटी पार्क (Kakara Biodiversity Park) इसका जीता-जागता उदाहरण है। करीब 36 करोड़ रुपये की लागत से बना यह पार्क आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। बाढ़ ने इसे तहस-नहस कर दिया और आज वहां ताला लटका है।

गलती कहां हुई?
हमने नदी के डूब क्षेत्र (Floodplain) में नाजुक और सजावटी (Fancy) पौधे लगाने की कोशिश की, जो बाढ़ को झेल नहीं पाए। यह कुदरत का हमें सिखाया गया एक सख्त पाठ है—नदी किनारे 'फैंसी' नहीं, बल्कि 'देशी' और बाढ़ सहने वाले मज़बूत पौधे चाहिए जो मिट्टी को पकड़ कर रख सकें। उत्तर प्रदेश जैव विविधता बोर्ड भी यही सलाह देता है कि हमें अपनी स्थानीय प्रजातियों को बचाना होगा। हमारे पास 527 प्रकार के पौधों की जो सूची है, वही हमारा असली 'रोडमैप' (roadmap) है। हमें पार्कों और नदी किनारों के लिए ऐसी योजना बनानी होगी जहाँ पेड़ सिर्फ गिनती बढ़ाने के लिए न लगें, बल्कि यह सोचकर लगाए जाएं कि कौन सा पेड़ किस पक्षी या कीट को आसरा देगा। गर्रा नदी के किनारे हम कचनार, पलाश और स्थानीय जड़ी-बूटियों का एक ऐसा संसार बसा सकते हैं, जहाँ लोग टहलें तो उन्हें अपने शहर की मिट्टी की खुशबू आए।

कुल मिलाकर शाहजहांपुर का सौंदर्य और पर्यावरण की सुरक्षा दो अलग चीजें नहीं हैं। ककरा पार्क की विफलता हमें भविष्य के लिए सचेत करती है। हमारे पास विविधता है, संसाधन हैं, बस जरूरत है सही सोच की। यदि हम विदेशी और नाजुक पौधों का मोह छोड़कर अपनी देशी वनस्पति को अपना लें, तो गर्रा का किनारा भी सुरक्षित रहेगा और शाहजहांपुर की 'रंगत' भी आबाद रहेगी।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2xjhejq4
https://tinyurl.com/2xmohwbp
https://tinyurl.com/ydlon755
https://tinyurl.com/ycjv9uc2
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/239sako5 

.