शाहजहांपुर में सिर्फ 'पेड़' लगाना काफी नहीं, झाड़ियों और लताओं की ओर भी ध्यान देना ज़रूरी है!

वृक्ष, झाड़ियाँ और बेलें
10-01-2026 09:12 AM
शाहजहांपुर में सिर्फ 'पेड़' लगाना काफी नहीं, झाड़ियों और लताओं की ओर भी ध्यान देना ज़रूरी है!

जब भी हम पर्यावरण, हरियाली या कुदरत को बचाने की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहली और शायद एकमात्र तस्वीर जो उभरती है, वह एक विशालकाय 'पेड़' होता है। यह स्वाभाविक भी है। बचपन से हमें यही सिखाया गया है कि "पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ"। हाल ही में शाहजहांपुर में वित्त मंत्री श्री सुरेश खन्ना जी की अगुवाई में 'एक पेड़ मां के नाम 2.0' अभियान की शुरुआत हुई। यह पहल न केवल सराहनीय है, बल्कि आज के दौर की सख्त जरूरत भी है। जन-भागीदारी से होने वाले ऐसे काम ही समाज में बड़ा बदलाव लाते हैं।

लेकिन, यहाँ हमें थोड़ा रुककर एक गहरा सवाल पूछने की जरूरत है। क्या शाहजहांपुर की हरियाली का मतलब सिर्फ ऊंचे-ऊंचे पेड़ों की कतारें हैं? क्या केवल छायादार वृक्ष लगा देने से हमारी 'ग्रीन आइडेंटिटी' (हरी पहचान) पूरी हो जाएगी? पर्यावरण विज्ञान और हमारे जिले के आंकड़े कुछ और ही इशारा कर रहे हैं। असली जीत तब होगी जब हम हरियाली की 'त्रिवेणी' यानी (पेड़, झाड़ियां और लताएं) को समझेंगे। जब तक हम इन तीनों को एक साथ लेकर नहीं चलेंगे, हमारा शहर न तो पूरी तरह हरा होगा और न ही सुरक्षित।

अक्सर हम अपने आसपास उगने वाली छोटी-मोटी वनस्पतियों को 'जंगली घास-फूस' मानकर नजरअंदाज कर देते हैं या सफाई के नाम पर उखाड़ फेंकते हैं। लेकिन अगर हम विज्ञान की नजर से देखें, तो शाहजहांपुर की धरती किसी खजाने से कम नहीं है। जिले में हुए वानस्पतिक शोध (Floristic Checklist) के आंकड़े एक चौंकाने वाली लेकिन सुखद तस्वीर पेश करते हैं।

हमारे जिले में फूल देने वाले पौधों (Angiosperms) की कुल 527 प्रजातियां दर्ज की गई हैं। यह आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि हमारी मिट्टी में कितनी विविधता है। लेकिन सबसे दिलचस्प बात इन आंकड़ों का वर्गीकरण है:

  • इनमें 52 तरह के पेड़ हैं।
  • हैरानी की बात है कि पेड़ों से ज्यादा, यानी 55 तरह की झाड़ियां (Shrubs) हैं।
  • और दीवारों या पेड़ों के सहारे चढ़ने वाली 38 तरह की लताएं (Creepers/Climbers) हैं।

ये आंकड़े साबित करते हैं कि कुदरत ने शाहजहांपुर को सिर्फ पेड़ों का शहर नहीं बनाया था, बल्कि इसे झाड़ियों और लताओं से भी सजाया था। जिसे हम सड़क का 'बंजर किनारा' या खेत की 'मामूली मेढ़' समझते हैं, वे असल में जैव-विविधता (Biodiversity) के छोटे-छोटे हॉटस्पॉट (hotspot) हैं। जब हम सिर्फ पेड़ लगाते हैं और झाड़ियों को काट देते हैं, तो हम अनजाने में इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे होते हैं।

शाहजहांपुर की भौगोलिक स्थिति को समझना भी जरूरी है। हम 'उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती' (Tropical Dry Deciduous) क्षेत्र में आते हैं। आसान भाषा में कहें तो, यह वह इलाका है जहाँ भीषण गर्मी पड़ती है और पेड़-पौधे पानी बचाने के लिए एक मौसम में अपने पत्ते गिरा देते हैं। यहाँ की मिट्टी और जलवायु कंटीली झाड़ियों और लताओं के लिए स्वर्ग समान है।

File:A topiary ornamental greenish shrub plant resembling many balls (or spherical balloons) - in Kakching Garden, Kangleipak 03.jpg

हमारे बुजुर्गों के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन उनके पास गजब की समझ थी। वे जानते थे कि खेतों और घरों की सुरक्षा के लिए महंगी कंक्रीट (concrete) की दीवारों की जरूरत नहीं है। इसीलिए, वे 'लिविंग बायो-फेंस' (Living Bio-fences) यानी जीवित बाड़ का इस्तेमाल करते थे। वे खेतों की मेढ़ों पर कंटीली झाड़ियों (जैसे करौंदा, झरबेरी आदि) को एक कतार में उगाते थे और उनके बीच में लताओं को पिरो देते थे। यह व्यवस्था कई मायनों में फायदेमंद थी:

  1. सुरक्षा: यह बाड़ इतनी घनी होती थी कि जानवर इसे पार नहीं कर पाते थे, जिससे इंसान और जानवरों के बीच का संघर्ष कम होता था।
  2. संसाधन: कंक्रीट की दीवार आपको कुछ नहीं देती, लेकिन यह जीवित बाड़ साल भर ईंधन के लिए लकड़ी, जानवरों के लिए चारा, और घर के लिए मौसमी फल व औषधियाँ देती थी।
  3. तापमान नियंत्रण: ईंट-पत्थर की दीवारें धूप में तपकर गर्मी बढ़ाती हैं, जबकि पौधों की दीवारें ठंडक देती हैं।

आज शहरीकरण की दौड़ में हम इस पुराने विज्ञान को भूल गए हैं, जिसे फिर से जिंदा करने की जरूरत है। शाहजहांपुर की जीवनरेखा कही जाने वाली गर्रा नदी आज अस्तित्व के संकट से जूझ रही है। 'नमामि गंगे' और राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) के दस्तावेज भी यह साफ कहते हैं कि नदी के किनारों (Floodplain) को बचाने का तरीका शहर के पार्कों से अलग होता है।

नदी के ठीक किनारे बड़े पेड़ लगाना कई बार नुकसानदेह हो सकता है, क्योंकि बाढ़ के समय बड़े पेड़ उखड़कर मिट्टी को भी साथ ले जाते हैं। नदी के तटबंधों को मजबूती देने के लिए 'रिपेरियन प्लांटिंग' (Riparian Planting) की तकनीक अपनानी होती है। इसमें ऐसी झाड़ियां और विशेष प्रकार की घास लगाई जाती हैं, जिनकी जड़ें मिट्टी को एक जाल की तरह जकड़ कर रखती हैं।

ये झाड़ियां नदी और इंसानी बस्तियों के बीच एक 'बफर जोन' का काम करती हैं। यह न केवल मिट्टी के कटाव (Soil Erosion) को रोकती हैं, बल्कि नदी के पानी को फिल्टर भी करती हैं। इसके अलावा, ये झाड़-झंखाड़ छोटे वन्यजीवों, पक्षियों और जलचरों के लिए सुरक्षित घर और आने-जाने का रास्ता (Wildlife Corridor) बनते हैं। अगर हम गर्रा के तट पर सिर्फ सजावटी पेड़ लगा देंगे, तो नदी का इकोसिस्टम नहीं बच पाएगा।

शाहजहांपुर तेज़ी से विकसित हो रहा है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, कॉलोनियां बन रही हैं। ऐसे में धूल और गर्मी सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। यहाँ हमें "कौन सा पौधा कहाँ लगाएं" (Right Plant, Right Place) वाली प्लानिंग अपनानी होगी।

  1. धूल के खिलाफ युद्ध: जब हम सड़क किनारे चलते हैं, तो गाड़ियों से उड़ने वाली धूल सीधे हमारी नाक और मुंह तक आती है। ऊंचे पेड़ छाया तो देते हैं, लेकिन नीचे उड़ रही धूल को नहीं रोक पाते। यहाँ घनी झाड़ियों (Dense Shrubs) की भूमिका आती है। सड़कों के डिवाइडर और किनारों पर अगर झाड़ियों की पट्टी (Dust Buffer) लगाई जाए, तो वे धूल को हवा में उड़ने से रोक लेती हैं।
  2. वर्टिकल गार्डनिंग: शहर में जगह की कमी है, लेकिन दीवारें बहुत हैं। नालों के किनारे, सरकारी इमारतों की दीवारें या फ्लाईओवरों के पिलर—इन सब जगहों पर लताओं (Creepers) का इस्तेमाल होना चाहिए। ये लताएं न केवल कंक्रीट की बदसूरती को ढकती हैं, बल्कि शहर के तापमान को कम करने में 'नेचुरल एसी' का काम करती हैं। 38 प्रकार की स्थानीय लताएं हमारे पास मौजूद हैं, जिनका उपयोग हम कर सकते हैं।

'एक पेड़ मां के नाम' जैसे अभियान भावनात्मक रूप से हमें जोड़ते हैं और यह बहुत जरूरी है। लेकिन अब समय आ गया है कि इस भावना में थोड़ा 'विज्ञान' और 'विवेक' भी जोड़ा जाए। जब हम अगली बार पौधा लगाने के लिए गड्ढा खोदें, तो सोचें कि हम क्या लगा रहे हैं और कहाँ लगा रहे हैं। हमें 527 प्रजातियों की उस पूरी विरासत को सहेजना है जिसमें बरगद और पीपल के साथ-साथ करौंदा, बेर और गिलोय जैसी झाड़ियां व बेलें भी शामिल हैं। मेढ़ों को फिर से जीवित बाड़ बनाना होगा, नदी के किनारों को झाड़ियों का कवच देना होगा और सड़कों को धूल रोधी बनाना होगा। जब हम पेड़, झाड़ी और लता—तीनों को उनका सही स्थान देंगे, तभी शाहजहांपुर सही मायनों में हरा-भरा बनेगा और भविष्य की चुनौतियों, जैसे बढ़ती गर्मी और प्रदूषण, का सामना कर पाएगा। हरियाली सिर्फ दिखनी नहीं चाहिए, उसे काम भी करना चाहिए।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/27am462g
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/29tlpbgk
https://tinyurl.com/24lthg57
https://tinyurl.com/2dob6oot
https://tinyurl.com/239sako5 

.