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जब भी हम पर्यावरण या कुदरत को बचाने की बात करते हैं, तो हमारे ज़़हन में सबसे पहली तस्वीर एक विशालकाय 'पेड़' की उभरती है। यह स्वाभाविक भी है। बचपन से हमें यही सिखाया गया "पेड़ लगाओ, जीवन बचाओ"। हाल ही में शाहजहाँपुर में वित्त मंत्री श्री सुरेश खन्ना जी के नेतृत्व में 'एक पेड़ माँ के नाम 2.0' अभियान की शुरुआत हुई। यह पहल न केवल सराहनीय है, बल्कि आज के वक़्त की सख़्त ज़़रूरत भी है। जन-भागीदारी से होने वाले ऐसे प्रयास ही समाज में बड़ा बदलाव लाते हैं।
लेकिन, यहाँ हमें थोड़ा रुककर एक गहरा सवाल पूछने की ज़़रूरत है। क्या शाहजहाँपुर की हरियाली का मतलब महज़़ ऊँचे पेड़ों की कतारें हैं? पर्यावरण विज्ञान और हमारे ज़़िले के आँकड़े कुछ और ही इशारा कर रहे हैं। असली जीत तब होगी जब हम हरियाली की 'त्रिवेणी' यानी पेड़, झाड़ियाँ और लताओं के तालमेल को समझेंगे। जब तक हम इन तीनों को एक साथ लेकर नहीं चलेंगे, हमारा शहर न तो पूरी तरह हरा-भरा होगा और न ही सुरक्षित।
अक्सर हम अपने आसपास उगने वाली छोटी वनस्पतियों को 'जंगली घास-फूस' मानकर नज़़रअंदाज़ कर देते हैं या सफ़ाई के नाम पर उखाड़ फेंकते हैं। लेकिन विज्ञान की नज़़र से देखें, तो शाहजहाँपुर की धरती किसी ख़़ज़ाने से कम नहीं है। ज़़िले के वानस्पतिक शोध (Floristic Checklist) के आँकड़े एक सुखद तस्वीर पेश करते हैं। हमारे ज़़िले में फूलों वाले पौधों की कुल 527 प्रजातियाँ दर्ज हैं, जो हमारी मिट्टी की विविधता को दर्शाती हैं।
दिलचस्प बात इन आँकड़ों का वर्गीकरण है:
ये आँकड़े साबित करते हैं कि कुदरत ने शाहजहाँपुर को सिर्फ पेड़ों का शहर नहीं बनाया था, बल्कि इसे झाड़ियों और लताओं से भी सजाया था। जिसे हम सड़क का 'बंजर किनारा' समझते हैं, वे असल में जैव-विविधता के छोटे-छोटे केंद्र हैं। जब हम सिर्फ पेड़ लगाकर झाड़ियों को काट देते हैं, तो हम अनजाने में इस प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ रहे होते हैं।
हमारा ज़़िला 'उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती' क्षेत्र में आता है। आसान भाषा में कहें तो, यहाँ भीषण गर्मी पड़ती है और पौधे पानी बचाने के लिए मौसम के अनुसार पत्ते गिरा देते हैं। यहाँ की जलवायु कंटीली झाड़ियों और लताओं के लिए किसी स्वर्ग जैसी है। हमारे बुज़़ुर्गों के पास कोई डिग्री नहीं थी, लेकिन समझ गज़़ब की थी। वे जानते थे कि खेतों की सुरक्षा के लिए कंक्रीट की दीवारों की ज़़रूरत नहीं है। इसीलिए वे 'लिविंग बायो-फेंस' (जीवित बाड़) का इस्तेमाल करते थे। वे मेढ़ों पर करौंदा और झरबेरी जैसी झाड़ियाँ उगाते थे और उनके बीच लताओं को पिरो देते थे। यह व्यवस्था सुरक्षा भी देती थी और ईंधन, चारा व औषधियाँ भी।![]()
आज हमारी जीवनरेखा गर्रा नदी संकट में है। 'नमामि गंगे' मिशन के दस्तावेज़ भी कहते हैं कि नदी के तटबंधों को मज़़बूती देने के लिए 'रिपेरियन प्लांटिंग' (Riparian Planting) ज़रूरी है। नदी के ठीक किनारे बड़े पेड़ लगाना कई बार नुक़सानदेह हो सकता है, क्योंकि बाढ़ में वे उखड़कर मिट्टी को भी बहा ले जाते हैं। यहाँ ऐसी झाड़ियाँ और घास चाहिए जिनकी जड़ें मिट्टी को जाल की तरह जकड़ लें। ये झाड़ियाँ नदी के पानी को फ़़िल्टर करती हैं और छोटे जीव-जंतुओं के लिए घर का काम करती हैं।
शाहजहाँपुर तेज़़ी से बदल रहा है। धूल और गर्मी बड़ी चुनौतियाँ हैं। यहाँ हमें "सही पौधा, सही जगह" वाली प्लानिंग चाहिए। ऊँचे पेड़ छाया तो देते हैं, लेकिन ज़़मीन के पास उड़ती धूल को नहीं रोक पाते। सड़कों के डिवाइडर पर अगर घनी झाड़ियों की पट्टी (Dust Buffer) लगाई जाए, तो वे धूल को हमारी नाक तक पहुँचने से रोक सकती हैं। वहीं, शहर की तंग गलियों और फ्लाईओवरों के पिलर्स पर लताओं (Creepers) का इस्तेमाल करके हम 'नेचुरल एसी' का लाभ ले सकते हैं।
'एक पेड़ माँ के नाम' जैसे अभियान हमें भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। लेकिन अब समय है कि इस भावना में थोड़ा 'विज्ञान' और 'विवेक' भी पिरोया जाए। अगली बार जब हम पौधा लगाएँ, तो सोचें कि हम क्या और कहाँ लगा रहे हैं। हमें बरगद-पीपल के साथ-साथ करौंदा, बेर और गिलोय जैसी झाड़ियों व बेलों की विरासत को भी सहेजना होगा।
संदर्भ
https://tinyurl.com/27am462g
https://tinyurl.com/2294nofm
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https://tinyurl.com/29tlpbgk
https://tinyurl.com/24lthg57
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