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शाहजहांपुर के आम जीवन में हरियाली का एक अलग ही महत्व है। हम अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सड़क किनारे खड़े नीम के पेड़ों, गर्रा (देवहा) नदी के तट पर फैली झाड़ियों और खेतों की मेड़ों पर लगी बाड़ को देखते हुए बड़े हुए हैं। ये हमारे बचपन की यादों का हिस्सा हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब यही नीम का पेड़ सूखकर लकड़ी बन जाता है, या वही झाड़ियाँ पाउडर का रूप ले लेती हैं, तो उनकी असलियत कैसे पहचानी जाए?
जब कोई वनस्पति "जड़ी-बूटी" बनकर बाजार में बिकने आती है, तो उसकी असली पहचान करना लगभग नामुमकिन हो जाता है। सूखे तने, कटी हुई जड़ें और पिसे हुए पाउडर को देखकर बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी धोखा खा सकते हैं। यहीं से शुरुआत होती है आधुनिक विज्ञान की एक ऐसी जासूसी की, जिसे हम डीएनए बारकोडिंग (DNA Barcoding) कहते हैं। यह तकनीक शाहजहांपुर की वानस्पतिक संपदा को एक नई सुरक्षा देने जा रही है।
बाजार का जाल: असली और नकली का खेल
जैसे-जैसे दुनिया भर में आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा का चलन बढ़ा है, जड़ी-बूटियों का बाजार भी बहुत बड़ा हो गया है। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक गहरा काला सच छिपा है, जिसे कहा जाता है, मिलावट। हर्बल उत्पादों की शुद्धता पूरी तरह से सही पौधे के चुनाव पर टिकी होती है। अगर दवा बनाने में असली औषधि की जगह किसी जहरीली खरपतवार का इस्तेमाल हो गया, तो इलाज तो दूर, यह इंसान की जान पर भारी पड़ सकता है।
बाजार में मिलने वाले कच्चे माल (Raw Drug) अक्सर ऐसे रूप में होते हैं कि उन्हें सूंघकर या चखकर पहचानना संभव नहीं होता। पारंपरिक तरीके यहाँ फेल हो जाते हैं। यहीं पर हमें एक ऐसी वैज्ञानिक मुहर की जरूरत महसूस हुई जो कभी झूठ न बोले, और वह मुहर है पौधे का डीएनए (DNA)।

क्या है डीएनए बारकोडिंग?
इसे समझने के लिए आप किसी सुपरमार्केट के 'बारकोड' की कल्पना कीजिए। जिस तरह एक काली-सफेद लाइनों वाले स्टिकर को स्कैन करते ही सामान की कीमत और कंपनी का नाम पता चल जाता है, ठीक उसी तरह हर जीव और पौधे के भीतर एक अनोखा आनुवंशिक कोड (Genetic Code) होता है।
वैज्ञानिकों ने पौधों के डीएनए के कुछ खास और छोटे हिस्सों की पहचान की है जो हर प्रजाति के लिए अलग होते हैं। इसे ही 'डीएनए बारकोडिंग' कहा जाता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए हमें पूरा पेड़ या उस पर लगा फूल नहीं चाहिए। अगर हमारे पास सूखी जड़ का एक रेशा, तने का बुरादा या किसी पत्ती का छोटा सा टुकड़ा भी है, तो प्रयोगशाला में उसकी सटीक पहचान हो सकती है। यह तकनीक मौसम और मौसम के बदलावों से बेअसर रहती है।
शाहजहांपुर की जीवनरेखा, गर्रा (देवहा) नदी, सिर्फ पानी का जरिया नहीं है। यह हमारे क्षेत्र की जैव-विविधता की रीढ़ है। हाल के शोध कार्यों में गर्रा नदी के गलियारे (River Corridor) को एक 'जीवंत प्रयोगशाला' (Living Field-Lab) माना जा रहा है।
नदी के बेसिन क्षेत्र में उगने वाले सैकड़ों प्रकार के पौधे न केवल मिट्टी को थामे रखते हैं, बल्कि पारिस्थितिकी का संतुलन भी बनाते हैं। बाढ़ के बाद अक्सर नदी किनारे का नज़ारा बदल जाता है। कुछ नए पौधे उग आते हैं, जो कभी-कभी बाहरी या 'आक्रामक' (Invasive) होते हैं। ये बाहरी पौधे हमारे स्थानीय पौधों को खत्म कर सकते हैं। डीएनए बारकोडिंग हमें यह समझने में मदद करती है कि बाढ़ के बाद कौन से हमारे पुराने साथी वापस लौटे हैं और कौन से बाहरी घुसपैठिए हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुँचा रहे हैं।
इस वैज्ञानिक मुहिम का सबसे महत्वपूर्ण कदम है— शाहजहांपुर की अपनी 'रेफरेंस लाइब्रेरी' तैयार करना। इसका मतलब यह है कि हम अपने जिले के सभी 527 प्रकार के पुष्पीय पौधों की एक डिजिटल और जेनेटिक कुंडली तैयार करेंगे।
एक बार जब यह लाइब्रेरी तैयार हो जाएगी, तो शाहजहांपुर के किसी भी आयुर्वेदिक स्टोर या पंसारी की दुकान से लिए गए नमूने का मिलान इस डेटा से किया जा सकेगा। इससे न केवल मिलावट पकड़ी जाएगी, बल्कि असली किसानों और जड़ी-बूटी संग्रहकर्ताओं को उनकी उपज का सही दाम और सम्मान भी मिलेगा। यह आयुर्वेदिक डॉक्टरों के लिए भी एक बड़ा भरोसा होगा कि उनके मरीजों को दी जा रही दवा शत-प्रतिशत शुद्ध है।
अक्सर संरक्षण के फैसले केवल अनुमान पर लिए जाते हैं, लेकिन शाहजहांपुर अब प्रमाण (Evidence) पर टिके फैसलों की ओर बढ़ रहा है। 'एक पेड़ मां के नाम' जैसे अभियान जब इस वैज्ञानिक सोच से जुड़ेंगे, तो परिणाम क्रांतिकारी होंगे। सिर्फ पेड़ों की गिनती बढ़ाना काफी नहीं है; हमें यह जानना होगा कि गर्रा नदी के डूब क्षेत्र (Floodplain) में कौन से पौधे कुदरती रूप से बसते हैं और उन्हें कैसे बचाया जाए। झाड़ियाँ और लताएँ, जो ज़मीन की ऊपरी सतह की रक्षा करती हैं, उनके संरक्षण के लिए भी डीएनए (DNA) तकनीक एक मजबूत आधार प्रदान करेगी।
कुल मिलाकर शाहजहांपुर की असली खूबसूरती उसकी मिट्टी और उस मिट्टी से जुड़े ज्ञान में है। जब हम अपनी प्राचीन औषधीय विरासत को डीएनए बारकोडिंग जैसी आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ते हैं, तो हम केवल एक प्रयोगशाला नहीं बना रहे होते, बल्कि हम आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए एक मजबूत कवच तैयार कर रहे होते हैं। कल्याणकारी भविष्य की कुंजी इसी में है कि हम अपनी 527 प्रजातियों की इस समृद्ध विरासत को समझें, सहेजें और तकनीक की मदद से उसे मिलावट की गंदगी से बचाकर रखें। अगर गर्रा नदी का किनारा सुरक्षित है और हमारी जड़ी-बूटियाँ शुद्ध हैं, तो शाहजहांपुर की ग्रीन आइडेंटिटी (Green Identity) भी हमेशा के लिए सुरक्षित रहेगी।
संदर्भ
https://tinyurl.com/26sv3wn8
https://tinyurl.com/2cxpwe5b
https://tinyurl.com/2brbpmy2
https://tinyurl.com/266v6nfc
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/242vnam7