समय - सीमा 9
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शाहजहांपुर की पहचान हमेशा से चीनी और गन्ने की मिठास से रही है। लेकिन आज यहाँ के खेतों में एक बड़ा बदलाव आ रहा है। अब गन्ने की खेती केवल किसान के पसीने और हल की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रयोगशाला (Lab) की बारीकियों और विज्ञान की समझ से जुड़ गई है। इस बदलाव के पीछे है—गन्ने के पौधे की एक नन्ही सी कोशिका, जिसे वैज्ञानिक 'मेरिस्टम' (Meristem) कहते हैं। शाहजहांपुर का यह मॉडल (model) आज देश के सामने मिसाल बन रहा है कि कैसे विज्ञान के जरिए किसानों की किस्मत बदली जा सकती है।
अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि उनकी गन्ने की फसल में 'लाल सड़न' (Red Rot) या खतरनाक वायरस लग जाते हैं। मुश्किल यह है कि जब किसान पुराने गन्ने को ही बीज के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो ये बीमारियां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंच जाती हैं। इसका समाधान गन्ने के सबसे ऊपरी हिस्से यानी 'शूट टिप' में छिपा है।
इस हिस्से में मौजूद 'मेरिस्टम कोशिकाएं' बहुत ही अनोखी होती हैं। ये इतनी तेजी से बढ़ती और विभाजित होती हैं कि कोई भी वायरस उनकी रफ्तार का मुकाबला नहीं कर पाता। सरल शब्दों में कहें तो, वायरस जब तक इन नई कोशिकाओं को बीमार करने की कोशिश करता है, तब तक ये कोशिकाएं विभाजित होकर आगे निकल चुकी होती हैं। इसी वैज्ञानिक सच्चाई का फायदा उठाकर टिश्यू कल्चर के जरिए ऐसे पौधे तैयार किए जा रहे हैं जो पूरी तरह से रोगमुक्त और सेहतमंद होते हैं।शाहजहांपुर का 'उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद' (UPCSR), को इस वैज्ञानिक क्रांति का केंद्र माना जा रहा है। 1912 में स्थापित इस संस्थान का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। आज यहाँ टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) की मदद से युद्धस्तर पर नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं। इसकी प्रक्रिया किसी नन्हे बच्चे की परवरिश जैसी है:
सालों से किसान गन्ने के पुराने टुकड़ों को ही बीज की तरह बोते आए हैं। विज्ञान की भाषा में इसे 'वेजीटेव सीड केन' कहते हैं। लेकिन वक्त के साथ इस बीज की ताकत कम होने लगती है और बीमारियां इसे घेर लेती हैं। आज के दौर में सिर्फ खाद और पानी डालना काफी नहीं है, बल्कि 'बीज की गुणवत्ता' ही सबसे बड़ा हथियार है। लैब में तैयार किए गए इन बीजों से मोज़ेक वायरस (Mosaic Virus) जैसी बीमारियों का खतरा खत्म हो जाता है, जो पारंपरिक खेती में लगभग असंभव था।
उत्तर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग का विजन अब बिल्कुल साफ है। इस उन्नत तकनीक को सिर्फ लैब तक सीमित नहीं रखना है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 के लिए प्रदेश में करीब 15.90 लाख (15 लाख 90 हजार) रोगमुक्त पौधे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।
यह केवल एक सरकारी आंकड़ा नहीं है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने का एक ठोस रास्ता है। जब बीज रोगमुक्त होगा, तो फसल की पैदावार बढ़ेगी और कीटनाशकों पर होने वाला फालतू खर्च बचेगा। शाहजहांपुर के साथ-साथ राजस्थान के चूरू और अन्य इलाकों के किसान भी, जो खेती में नए प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं, इस मॉडल से काफी कुछ सीख सकते हैं।
जैसे-जैसे हम अगले फसली सीजन की ओर बढ़ रहे हैं, सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को हर छोटे-बड़े किसान तक पहुँचाने की है। लक्ष्य सिर्फ पौधे उगाना नहीं, बल्कि किसानों के बीच वह भरोसा पैदा करना है कि लैब में तैयार यह छोटा सा पौधा उनके खेत की मिट्टी में 'सोना' उगाएगा। शाहजहांपुर का यह सफल प्रयोग बताता है कि जब तकनीक और परंपरा का संगम होता है, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफे की गारंटी बन जाती है।
सारांश
https://tinyurl.com/298n9svn
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https://tinyurl.com/28kqktq2
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