गन्ने की एक कोशिका से कैसे बचेगी, शाहजहांपुर के किसानों की कमाई?

कोशिका प्रकार के अनुसार वर्गीकरण
10-01-2026 09:12 AM
गन्ने की एक कोशिका से कैसे बचेगी, शाहजहांपुर के किसानों की कमाई?

शाहजहाँपुर की पहचान हमेशा से गन्ने की मिठास और चीनी उत्पादन से रही है। लेकिन आज यहाँ के खेतों में एक क्रांतिकारी बदलाव दस्तक दे रहा है। अब गन्ने की खेती महज़ किसान के पसीने और हल की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह प्रयोगशाला (Lab) की बारीकियों और आधुनिक विज्ञान से जुड़ गई है। इस बड़े बदलाव की बुनियाद गन्ने के पौधे की वह नन्हीं सी कोशिका है, जिसे वैज्ञानिक 'मेरिस्टम' (Meristem) कहते हैं। शाहजहाँपुर का यह मॉडल आज पूरे देश के लिए एक मिसाल बन रहा है कि कैसे तकनीक के ज़रि‍ये किसानों की तक़दीर बदली जा सकती है।

अक्सर किसान इस बात से परेशान रहते हैं कि उनकी गन्ने की फ़सल में 'लाल सड़न' (Red Rot) या घातक वाइरस लग जाते हैं। असल समस्या यह है कि जब किसान पुराने गन्ने को ही बीज के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, तो ये बीमारियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँच जाती हैं। इस समस्या का समाधान गन्ने के सबसे ऊपरी हिस्से, यानी 'शूट टिप' (Shoot Tip) में छिपा है।

इस हिस्से में मौजूद 'मेरिस्टम कोशिकाएँ' बेहद अनोखी होती हैं। इनके विभाजित होने और बढ़ने की रफ़्तार इतनी तेज़ होती है कि कोई भी वाइरस उनका मुक़ाबला नहीं कर पाता। सरल शब्दों में कहें तो, वाइरस जब तक इन नई कोशिकाओं को संक्रमित करने की कोशिश करता है, तब तक ये कोशिकाएँ विभाजित होकर सुरक्षित आगे निकल चुकी होती हैं। इसी वैज्ञानिक सच्चाई का फ़ायदा उठाकर 'टिश्यू कल्चर' के माध्यम से ऐसे पौधे तैयार किए जा रहे हैं, जो पूरी तरह रोगमुक्त और सेहतमंद होते हैं।
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शाहजहाँपुर स्थित 'उत्तर प्रदेश गन्ना शोध परिषद' (UPCSR) इस वैज्ञानिक क्रांति का मुख्य केंद्र है। 1912 में स्थापित इस संस्थान का इतिहास 100 साल से भी पुराना है। आज यहाँ टिश्यू कल्चर (Tissue Culture) की मदद से युद्धस्तर पर नए पौधे तैयार किए जा रहे हैं। यह पूरी प्रक्रिया किसी नन्हे बच्चे की परवरिश जैसी संवेदनशील है:

  1. प्रयोगशाला प्रक्रिया (Lab Process): सबसे पहले गन्ने के ऊपरी हिस्से (Shoot tip) को बेहद सावधानी से निकाला जाता है। इसे लैब के भीतर 'एमएस माध्यम' (एक विशेष पोषक जेल) पर रखा जाता है, जहाँ ये कोशिकाएँ तेज़ी से पनपती हैं।
  2. जड़ों का विकास: जब ये कोशिकाएँ गुच्छों का रूप ले लेती हैं, तो इन्हें विशेष रसायनों में रखा जाता है ताकि इनकी जड़ें मज़बूत हो सकें।
  3. हार्डनिंग (Hardening): चूँकि लैब और बाहरी वातावरण के तापमान में बहुत अंतर होता है, इसलिए इन नाज़ुक पौधों को सीधे खेत में नहीं लगाया जाता। पहले इन्हें बाहरी मौसम के अनुकूल ढाला जाता है, जिसे 'हार्डनिंग' कहते हैं।
  4. नर्सरी से खेत तक: अंत में, जब ये पौधे सशक्त हो जाते हैं, तो इन्हें नर्सरी में लगाया जाता है, जहाँ से ये किसानों के खेतों में जाने के लिए तैयार होते हैं।

दशकों से किसान गन्ने के पुराने टुकड़ों को ही बीज के रूप में बोते आए हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'वानस्पतिक बीज' (Vegetative Seed Cane) कहा जाता है। लेकिन समय के साथ ऐसे बीजों की प्रतिरोधक क्षमता कम होने लगती है और बीमारियाँ उन्हें घेर लेती हैं। आज के दौर में महज़ खाद और पानी देना काफ़ी नहीं है, बल्कि 'बीज की गुणवत्ता' ही सबसे बड़ा हथियार है। लैब में तैयार इन बीजों से 'मोज़ेक वाइरस' (Mosaic virus) जैसी बीमारियों का ख़तरा पूरी तरह ख़त्म हो जाता है, जो पारंपरिक खेती में लगभग नामुमकिन था।

उत्तर प्रदेश सरकार और कृषि विभाग का नज़रिया अब पूरी तरह साफ़ है, इस उन्नत तकनीक को सिर्फ़ लैब तक सीमित नहीं रखना है। ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 के लिए प्रदेश में लगभग 15.90 लाख रोगमुक्त पौधे तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है।

यह महज़ एक सरकारी आंकड़ा नहीं, बल्कि किसानों की आय दोगुनी करने का एक ठोस रास्ता है। जब बीज रोगमुक्त होगा, तो पैदावार बढ़ेगी और कीटनाशकों पर होने वाला फ़ालतू खर्च बचेगा।  जैसे-जैसे हम अगले फ़सली सीज़न की ओर बढ़ रहे हैं, सबसे बड़ी चुनौती इस तकनीक को हर छोटे-बड़े किसान तक पहुँचाने की है। हमारा लक्ष्य सिर्फ़ पौधे उगाना नहीं, बल्कि किसानों में यह भरोसा जगाना है कि लैब में तैयार यह नन्हा सा पौधा उनके खेत की मिट्टी में 'सोना' उगाएगा। शाहजहाँपुर का यह सफल प्रयोग साबित करता है कि जब तकनीक और परंपरा का मिलन होता है, तो खेती घाटे का सौदा नहीं, बल्कि मुनाफ़े की गारंटी बन जाती है।

सारांश 
https://tinyurl.com/298n9svn
https://tinyurl.com/2yq37w4q
https://tinyurl.com/28kqktq2
https://tinyurl.com/28fdxu2v
https://tinyurl.com/2yhycoqz
https://tinyurl.com/23uzlzpg 

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