गर्रा नदी का ‘मिट्टी खेल’: जानिए कैसे शाहजहांपुर में बना खादर और बांगर?

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12-01-2026 09:09 AM
गर्रा नदी का ‘मिट्टी खेल’: जानिए कैसे शाहजहांपुर में बना खादर और बांगर?

जब भी उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर का नाम लिया जाता है, तो ज़हन में तुरंत यहाँ का गौरवशाली इतिहास और इसे 'शहीदों की नगरी' बनाने वाले वीरों की याद आती है। लेकिन यदि हम इस सरज़मीं को प्राकृतिक नज़रिए से देखें, तो एक अलग ही अद्भुत तस्वीर उभरती है। आज हम उन उपजाऊ मैदानों, नदियों के किनारे बसी दलदली भूमियों और उन कुदरती गलियारों के बारे में जानेंगे, जो सदियों से यहाँ के जीवन की लय तय करते आए हैं। 

आज शाहजहाँपुर एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक तरफ़ उसकी समृद्ध 'तराई' विरासत है और दूसरी तरफ़ तेज़ी से फैलता कंक्रीट का जाल। शाहजहाँपुर का भूगोल महज़ एक सपाट मैदान नहीं है; इसे यहाँ बहने वाली नदियों ने बड़ी फ़ुर्सत और नज़ाकत से तराशा है। ज़िले की बनावट में नदियों की भूमिका सबसे अहम है, जिनमें 'गर्रा' नदी प्रमुख है। यह नदी पूरे ज़िले को दो मुख्य हिस्सों में बाँट देती है, जिससे यहाँ का परिदृश्य पूरी तरह बदल जाता है। गर्रा के साथ-साथ रामगंगा और गोमती जैसी नदियाँ भी इस ज़िले के स्वरूप को निखारती हैं। इन नदियों ने यहाँ की मिट्टी को दो विशेष श्रेणियों में विभाजित किया है: “पुरानी जलोढ़ मिट्टी (बाँगर) और नई जलोढ़ मिट्टी (खादर)।”

बाँगर उस ऊँची ज़मीन को कहा जाता है जहाँ अब बाढ़ का पानी नहीं पहुँच पाता, जबकि 'खादर' उन निचले इलाक़ों को कहते हैं जो नदियों के नज़दीक हैं। यह खादर मिट्टी बेहद उपजाऊ होती है क्योंकि नदियाँ अपने साथ पहाड़ों और मैदानों से ज़रूरी खनिज और पोषक तत्व बहाकर लाती हैं। तराई और निचला इलाक़ा होने के कारण यहाँ अक्सर पानी जमा हो जाता है, जिसे 'जलभराव' (Waterlogging) कहते हैं। बरसात के दिनों में ये दलदली ज़मीनें पानी से लबालब हो जाती हैं, ये स्थितियाँ इंसानी बस्तियों के लिए भले ही चुनौतीपूर्ण हों, लेकिन विशेष किस्म के पौधों और जीवों के लिए जीवनदायिनी साबित होती हैं।

शाहजहाँपुर की हरियाली को गहराई से समझने के लिए हमें पड़ोसी ज़िले पीलीभीत की ओर भी देखना होगा। मशहूर 'पीलीभीत टाइगर रिज़र्व' (Pilibhit Tiger Reserve) की पारिस्थितिक सीमाएँ शाहजहाँपुर तक फैली हुई हैं। यह पूरा क्षेत्र 'तराई आर्क लैंडस्केप' (TAL) का हिस्सा है, जो केवल पेड़ों का झुंड नहीं, बल्कि साल के वनों, ऊँची घास के मैदानों और दलदली झीलों का एक अनोखा संसार है। शाहजहाँपुर के वन इसी विशाल प्राकृतिक तंत्र का विस्तार हैं, जो बाघों, तेंदुओं और हिरणों जैसे वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित रास्ता या 'कॉरिडोर' (Corridor) मुहैया कराते हैं।

इस पूरे तंत्र में 'साल' (Shorea robusta) के पेड़ का रुतबा किसी राजा जैसा है। शाहजहाँपुर और पीलीभीत के जंगलों में साल के पेड़ बहुतायत में मिलते हैं। इन्हें पनपने के लिए प्रचुर वर्षा और विशेष मिट्टी की ज़रूरत होती है, जो तराई के इन इलाक़ों में भरपूर मिलती है। ये 'नम पर्णपाती वन' (Moist Deciduous Forests) का हिस्सा हैं। साल का पेड़ आग सहने की अद्भुत क्षमता रखता है और एक बार जड़ जमाने के बाद बहुत तेज़ी से बढ़ता है; यही वजह है कि इन जंगलों में इसकी बादशाहत नज़र आती है।

इतिहास गवाह है कि शाहजहाँपुर के ये प्राकृतिक आवास हमेशा से मानव जीवन का आधार रहे हैं। पुराने समय में इन्हीं घने साल के जंगलों ने इंसानों को लकड़ी और अन्य संसाधन दिए, लेकिन बढ़ती आबादी के साथ जंगलों को काटकर बस्तियाँ बसाई गईं। आज यह संघर्ष एक नए और चिंताजनक दौर में पहुँच गया है। अब मुक़ाबला सिर्फ़ खेती की ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि बड़े राजमार्गों और बुनियादी ढाँचे (Infrastructure) के निर्माण के लिए है। हाल ही में आई एक रिपोर्ट ने पर्यावरण प्रेमियों को चौंका दिया है, जिसके मुताबिक हाईवे के विस्तार के लिए 5,746 पेड़ों को काटने की मंज़ूरी दी गई है।

यह क़दम शहर की कनेक्टिविटी सुधारने के लिए भले ही ज़रूरी हो, लेकिन तराई जैसे संवेदनशील इलाक़े में इतनी बड़ी संख्या में पेड़ों का कटना गहरे सवाल खड़े करता है। ये पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं, भूजल स्तर बनाए रखते हैं और ज़हरीली गैसों को सोखते हैं। आज शाहजहाँपुर के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन चौड़ी सड़कों और अपनी कुदरती विरासत के बीच संतुलन बनाने की है। हमें यह तय करना होगा कि हम आने वाली पीढ़ियों को सिर्फ़ कंक्रीट की सड़कें देंगे या वह हरा-भरा तराई का वैभव भी, जो इस ज़िले की असली रूह है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/28m9wggl
https://tinyurl.com/28n9vlu9
https://tinyurl.com/ytb9ehje
https://tinyurl.com/24kqb7q5
https://tinyurl.com/2b6pyg7y
https://shorturl.at/0J4TS 

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