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जब हम उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान इसके गौरवशाली इतिहास पर जाता है। लेकिन आज इस जिले की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदियाँ, विशेषकर गर्रा और खन्नौत, एक अजीब सी समस्या से जूझ रही हैं। हाल ही में गर्रा (देवहा) नदी में आई भीषण बाढ़ ने न केवल 117 गांवों को जलमग्न किया, बल्कि जिला अस्पताल तक को खाली करने की नौबत ला दी । जब बाढ़ का पानी शांत होकर गड्ढों, झीलों और पुराने तालाबों में जमा होता है, तो अक्सर हम पानी की सतह पर एक मोटी, चमकदार हरी चादर बिछी हुई देखते हैं। स्थानीय लोग इसे भली-भांति पहचानते हैं, भले ही वे इसका वैज्ञानिक नाम न जानते हों। यह 'जलकुंभी' (Eichhornia crassipes) है। कभी अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर यह पौधा आज शाहजहांपुर की नदियों और तालाबों के लिए एक 'खामोश आक्रमणकारी' बन गया है।
यह हरी चादर देखने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन यह पानी के भीतर चल रहे जीवन के लिए मौत का पैगाम लेकर आती है। शाहजहांपुर का भूगोल नदियों और आर्द्रभूमियों (Wetlands) से भरा है, जो इस पौधे के फलने-फूलने के लिए सबसे उपजाऊ जमीन मुहैया कराते हैं। जब हम इस समस्या को गहराई से देखते हैं, तो समझ आता है कि यह केवल एक खरपतवार नहीं है, बल्कि एक ऐसा संकट है जो हमारे जल-संसाधनों, मछली पालन और यहाँ तक कि हमारे स्वास्थ्य पर भी सीधा प्रहार कर रहा है। बाढ़ के पानी के साथ इसका अनियंत्रित विस्तार आज प्रशासन और स्थानीय समुदायों के लिए सिरदर्द बन चुका है।
जलकुंभी का व्यवहार किसी शातिर शिकारी जैसा है, जिसे वैज्ञानिक 'मैट-मेकर' (Mat-maker) यानी 'चटाई बनाने वाला' कहते हैं। यह पौधा सिर्फ बीजों से नहीं फैलता, बल्कि इसका सबसे खतरनाक हथियार इसकी 'कायिक वृद्धि' (Vegetative growth) है। इसके तने से छोटी-छोटी शाखाएं या 'स्टोलन' (Stolons) निकलते हैं, जो पानी की सतह पर तैरते हुए बहुत तेजी से आगे बढ़ते हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि अनुकूल परिस्थितियों में एक अकेला पौधा केवल दो सप्ताह के भीतर अपनी संख्या को दोगुना कर सकता है। इसके पत्ते चमकदार और गोलाकार होते हैं, और डंठल स्पंज की तरह फूले हुए होते हैं, जो इसे पानी पर तैरने में मदद करते हैं। वहीं, इसकी जड़ें बैंगनी और रेशेदार होती हैं, जो पानी के भीतर एक ऐसा घना जाल बुन लेती हैं जिसे भेदना लगभग नामुमकिन हो जाता है।
जब ये पौधे आपस में मिलते हैं, तो पानी की सतह पर इतनी मोटी और मजबूत 'चटाई' बना देते हैं कि सूरज की रोशनी पानी के भीतर तक नहीं पहुँच पाती। इसका सीधा परिणाम यह होता है कि पानी के नीचे उगने वाले अन्य छोटे पौधे और शैवाल (Algae) प्रकाश संश्लेषण नहीं कर पाते और मर जाते हैं। इन पौधों के मरने से पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है, जिससे जलीय पर्यावरण का दम घुटने लगता है। ऑक्सीजन की कमी के कारण मछलियां मरने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा जलस्रोत एक बदबूदार गंदे नाले में तब्दील हो जाता है। यही कारण है कि इसे जलीय जीवन का 'खामोश कातिल' कहा जाता है, जो बिना शोर मचाए पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर देता है।

अमेज़न से शाहजहांपुर तक: यह सुंदर विदेशी फूल कैसे हमारे लिए मुसीबत बन गया?
शायद ही कोई विश्वास करे कि हमारे तालाबों में दिखने वाली यह मुसीबत असल में भारत की है ही नहीं। यह मूल रूप से दक्षिण अमेरिका के अमेज़न बेसिन का निवासी है। 19वीं सदी में इसके सुंदर बैंगनी फूलों के कारण इसे एक सजावटी पौधे के रूप में पूरी दुनिया में ले जाया गया था। लेकिन शाहजहांपुर की जलवायु और यहाँ की नदियों का शांत पानी इसके लिए इतना अनुकूल साबित हुआ कि इसने स्थानीय वनस्पतियों को ही बेदखल करना शुरू कर दिया। हमारे जिले में गर्रा और खन्नौत जैसी नदियाँ इसके फैलने के लिए मुख्य मार्ग का काम करती हैं। स्थानीय स्तर पर इसके प्रभाव बहुत गहरे हैं; जलकुंभी के घने जाल सिंचाई नहरों के बहाव को धीमा कर देते हैं और किसानों के पंपों के पाइपों को जाम कर देते हैं।
आर्थिक नुकसान के अलावा, यह हमारे स्वास्थ्य के लिए भी एक बड़ा खतरा है। जलकुंभी की घनी झाड़ियां मच्छरों के पनपने के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह बन जाती हैं, जिससे हमारे गांवों में मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। मछुआरों के लिए तो यह किसी श्राप से कम नहीं है, क्योंकि वे न तो अपना जाल डाल पाते हैं और न ही अपनी नावें चला पाते हैं। जिस खूबसूरती के लिए इसे सात समंदर पार से लाया गया था, आज वही खूबसूरती शाहजहांपुर के जलीय जीवन के लिए गले की फांस बन गई है। यह एक क्लासिक उदाहरण है कि कैसे एक बाहरी प्रजाति हमारे पूरे पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ सकती है।
क्या इस 'हरी मुसीबत' को हम 'हरे सोने' या कमाई के जरिए में बदल सकते हैं?
अब सवाल यह उठता है कि क्या हम केवल इसे नष्ट करने पर अपना सारा जोर लगाएं, या कोई ऐसा तरीका निकालें जिससे यह हमारी कमाई का जरिया बन सके? वैज्ञानिक अब "खरपतवार से धन" (Weed to Wealth) की अवधारणा पर काम कर रहे हैं। शाहजहांपुर के किसानों और उद्यमियों के लिए इसमें छिपे अवसर क्रांतिकारी हो सकते हैं। चूँकि इस पौधे में नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा बहुत अधिक होती है, इसे केंचुओं की मदद से 'वर्मीकम्पोस्ट' (Vermicompost) यानी उच्च गुणवत्ता वाली जैविक खाद में बदला जा सकता है । यह खाद न केवल सस्ती होगी, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी रासायनिक खादों से बेहतर साबित होगी।
इसके अलावा, जलकुंभी के रेशों का उपयोग करके सुंदर चटाई, टोकरियां, कागज और यहाँ तक कि टिकाऊ फर्नीचर (furniture) भी बनाया जा सकता है। कुछ उद्यमी तो अब इससे बायोगैस (bio-gas) बनाने की तकनीक पर भी काम कर रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से, यह पौधा गंदे पानी से आर्सेनिक (Arsenic) और कैडमियम (Cadmium) जैसी जहरीली भारी धातुओं को सोखने की अद्भुत क्षमता रखता है, जिससे इसका उपयोग जल शोधन संयंत्रों में किया जा सकता है । शाहजहांपुर के प्रशासन और स्थानीय समुदायों को मिलकर इस 'हरी मुसीबत' को एक संसाधन के रूप में देखना होगा। गर्रा नदी की बाढ़ ने हमें दिखाया है कि प्रकृति का संतुलन नाजुक है, और अब समय आ गया है कि हम अपनी समस्याओं का समाधान प्रकृति के ही वैज्ञानिक प्रबंधन में खोजें।
शाहजहांपुर को अपनी इस प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए एक साझा प्रयास की जरूरत है। केवल सरकारी मशीनों से नदियों की सफाई करना काफी नहीं है, क्योंकि अगर एक भी छोटा हिस्सा पानी में रह गया, तो यह फिर से पूरे तालाब को भर देगा। इसके बजाय, अगर हम जलकुंभी से उत्पाद बनाने वाले कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दें, तो स्थानीय लोग इसे खुद ही नदियों से निकालना शुरू कर देंगे। यह मॉडल न केवल नदियों को साफ रखेगा, बल्कि हजारों लोगों को रोजगार भी देगा।
हमें यह समझना होगा कि राजमार्गों का चौड़ीकरण और बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है, लेकिन अपनी नदियों और तालाबों की सेहत को नजरअंदाज करके हम एक सुरक्षित भविष्य की कल्पना नहीं कर सकते। गर्रा नदी का प्रवाह और इसकी शुद्धता ही शाहजहांपुर की असली पहचान है। अगर हम इस 'हरी मुसीबत' को सही तरीके से प्रबंधित कर पाते हैं, तो हम न केवल अपनी सिंचाई व्यवस्था और मछली पालन को बचा पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को एक समृद्ध और हरा-भरा शाहजहांपुर सौंप सकेंगे। विकास और पर्यावरण के बीच का यह संतुलन ही हमारे जिले की तकदीर तय करेगा।
संदर्भ
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