क्या शाहजहांपुर की गर्रा नदी का दम घोंट रही है यह 'हरी चादर'?

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10-01-2026 09:12 AM
क्या शाहजहांपुर की गर्रा नदी का दम घोंट रही है यह 'हरी चादर'?

जब हम उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर ज़िले की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान इसके गौरवशाली इतिहास पर जाता है। लेकिन आज इस ज़िले की जीवनरेखा मानी जाने वाली नदियाँ, विशेषकर गर्रा और खन्नौत, एक अजीब सी समस्या से जूझ रही हैं। हाल ही में गर्रा (देवहा) नदी में आई भीषण बाढ़ ने न केवल 117 गाँवों को डुबो दिया, बल्कि ज़िला अस्पताल तक को खाली करने की नौबत ला दी। बाढ़ उतरने के बाद जब पानी गड्ढों, झीलों और पुराने तालाबों में ठहरता है, तो अक्सर हमें पानी की सतह पर एक मोटी, चमकदार हरी चादर बिछी हुई दिखती है। स्थानीय लोग इसे भली-भाँति पहचानते हैं, भले ही वे इसका वैज्ञानिक नाम न जानते हों यह 'जलकुंभी' है। कभी अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर यह पौधा आज शाहजहाँपुर की नदियों और तालाबों के लिए एक 'सिरदर्द' बन गया है।

यह हरी चादर देखने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन यह पानी के भीतर पल रहे जीवन के लिए मौत का पैगाम लेकर आती है। शाहजहाँपुर का भूगोल नदियों और नमी वाली ज़मीनों (Wetlands) से भरा है, जो इस पौधे के फैलने के लिए सबसे उपजाऊ जगह मुहैया कराते हैं। जब हम इस समस्या को गहराई से देखते हैं, तो समझ आता है कि यह महज़ एक घास-फूस नहीं है, बल्कि एक ऐसा संकट है जो हमारे जल-संसाधनों, मछली पालन और यहाँ तक कि हमारे स्वास्थ्य पर भी सीधा प्रहार कर रहा है। बाढ़ के पानी के साथ इसका अनियंत्रित विस्तार आज प्रशासन और स्थानीय लोगों के लिए सिरदर्द बन चुका है।

जलकुंभी का व्यवहार किसी शातिर शिकारी जैसा है। यह पौधा सिर्फ़ बीजों से नहीं फैलता, बल्कि इसकी सबसे बड़ी ताक़त इसके तने से निकलने वाली छोटी-छोटी शाखाएँ हैं, जो पानी की सतह पर तैरते हुए बहुत तेज़ी से आगे बढ़ती हैं। आपको जानकर हैरानी होगी कि अनुकूल माहौल मिलने पर एक अकेला पौधा महज़ दो हफ़्तों के भीतर अपनी संख्या को दोगुना कर सकता है। इसके पत्ते चमकदार और गोलाकार होते हैं, और डंठल स्पंज की तरह फूले हुए होते हैं, जो इसे पानी पर तैरने में मदद करते हैं। वहीं, इसकी जड़ें पानी के भीतर एक ऐसा घना जाल बुन लेती हैं जिसे भेदना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

File:Water hyacinth boat in background.jpg

जब ये पौधे आपस में मिलते हैं, तो पानी की सतह पर इतनी मोटी 'चटाई' बना देते हैं कि सूरज की रोशनी पानी के भीतर तक नहीं पहुँच पाती। इसका सीधा नतीजा यह होता है कि पानी के नीचे उगने वाले अन्य छोटे पौधे और काई (Algae) धूप न मिलने के कारण मर जाते हैं। उनके मरने से पानी में ऑक्सीजन का स्तर गिर जाता है और जलीय जीवों का दम घुटने लगता है। ऑक्सीजन की कमी से मछलियाँ मरने लगती हैं और धीरे-धीरे पूरा जलस्रोत एक बदबूदार गंदे नाले में तब्दील हो जाता है। यही कारण है कि इसे जलीय जीवन का 'खामोश क़ातिल' कहा जाता है।

यह सुंदर फूल मुसीबत कैसे बना? 
शायद ही कोई विश्वास करे कि हमारे तालाबों में दिखने वाली यह मुसीबत असल में भारत की है ही नहीं। यह मूल रूप से दक्षिण अमेरिका के अमेज़न बेसिन का निवासी है। 19वीं सदी में इसके सुंदर बैंगनी फूलों के कारण इसे एक सजावटी पौधे के रूप में पूरी दुनिया में ले जाया गया था। लेकिन शाहजहाँपुर की जलवायु और यहाँ की नदियों का शांत पानी इसके लिए इतना रास आया कि इसने स्थानीय पौधों को ही बेदखल करना शुरू कर दिया। हमारे ज़िले में गर्रा और खन्नौत जैसी नदियाँ इसे फैलाने का मुख्य रास्ता बन गई हैं। जलकुंभी का घना जाल सिंचाई वाली नहरों के रास्ते को रोक देता है और किसानों के पंप सेट को भी जाम कर देता है।

आर्थिक नुकसान के अलावा, यह हमारी सेहत के लिए भी बड़ा ख़तरा साबित हो सकती है। जलकुंभी की घनी झाड़ियाँ मच्छरों के पनपने के लिए सबसे सुरक्षित जगह बन जाती हैं, जिससे हमारे गाँवों में मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का ख़तरा कई गुना बढ़ जाता है। मछुआरों के लिए तो यह किसी श्राप से कम नहीं है, क्योंकि वे न तो अपना जाल डाल पाते हैं और न ही नावें चला पाते हैं। जिस खूबसूरती के लिए इसे सात समंदर पार से लाया गया था, आज वही शाहजहाँपुर के लिए गले की फाँस बन गई है।

क्या इस 'हरी मुसीबत' को 'हरे सोने' में बदला जा सकता है? 
अब सवाल यह उठता है कि क्या हम केवल इसे नष्ट करने पर ज़ोर लगाएँ, या कोई ऐसा तरीक़ा निकालें जिससे यह कमाई का ज़रिया बन सके? वैज्ञानिक अब "कचरे से कमाई" के विचार पर काम कर रहे हैं। शाहजहाँपुर के किसानों और कारोबारियों के लिए इसमें छिपे अवसर क्रांतिकारी हो सकते हैं। चूँकि इस पौधे में नाइट्रोजन और फास्फोरस भरपूर होता है, इसलिए इसे केंचुओं की मदद से 'वर्मीकम्पोस्ट' (बेहतरीन जैविक खाद) में बदला जा सकता है। यह खाद न केवल सस्ती होगी, बल्कि मिट्टी के लिए रासायनिक खादों से बेहतर भी साबित होगी।

इसके अलावा, जलकुंभी के रेशों से सुंदर चटाई, टोकरियाँ, काग़ज़ और टिकाऊ फ़र्नीचर (Furniture) भी बनाया जा सकता है। कुछ लोग तो इससे बायोगैस (Bio-gas) बनाने की तकनीक पर भी काम कर रहे हैं। आश्चर्यजनक रूप से, यह पौधा गंदे पानी से आर्सेनिक और कैडमियम जैसी ज़हरीली धातुओं को सोखने की अद्भुत क्षमता रखता है, जिससे इसका इस्तेमाल जल शोधन के लिए किया जा सकता है। शाहजहाँपुर के प्रशासन और समाज को मिलकर इस 'हरी मुसीबत' को एक संसाधन के रूप में देखना होगा।

शाहजहाँपुर को अपनी इस प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए एक साझा प्रयास की ज़रूरत है। महज़ मशीनों से नदियों की सफ़ाई करना काफ़ी नहीं है, क्योंकि अगर एक भी छोटा हिस्सा पानी में रह गया, तो यह फिर से पूरे तालाब को भर देगा। इसके बजाय, अगर हम जलकुंभी से उत्पाद बनाने वाले छोटे उद्योगों को बढ़ावा दें, तो स्थानीय लोग इसे ख़ुद ही नदियों से निकालना शुरू कर देंगे। यह मॉडल न केवल नदियों को साफ़ रखेगा, बल्कि हज़ारों लोगों को रोज़गार भी देगा। विकास और पर्यावरण के बीच का यही संतुलन हमारे ज़िले की तक़दीर तय करेगा।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/24bp8hw2
https://tinyurl.com/287teznw
https://tinyurl.com/2a8lrzvg
https://tinyurl.com/292eco24
https://tinyurl.com/226lq4pf
https://tinyurl.com/2d7dhxls
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