गर्रा नदी का ‘शीशम कवच’: क्या यह पेड़ बचाएगा शाहजहांपुर को अगली बाढ़ से?

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10-01-2026 09:12 AM
गर्रा नदी का ‘शीशम कवच’: क्या यह पेड़ बचाएगा शाहजहांपुर को अगली बाढ़ से?

जब हम उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान इसके ऐतिहासिक गौरव पर जाता है। 1647 में मुगल सम्राट शाहजहां के नाम पर बसा यह शहर आज अपनी एक नई पहचान की तलाश में है । गर्रा (देवहा) नदी के तट पर स्थित यह जिला केवल इंसानों का घर नहीं है, बल्कि यह शीशम जैसे उन 'जांबाज' पेड़ों की शरणस्थली भी है जो सदियों से यहाँ की मिट्टी और लोगों की रक्षा करते आए हैं। बरेली और लखनऊ के बीच बसा यह क्षेत्र गंगा के जलोढ़ मैदानों का हिस्सा है, जहाँ की मिट्टी शीशम के लिए किसी वरदान से कम नहीं है।​

लेकिन हाल के वर्षों में प्रकृति का मिजाज बदला है। गर्रा नदी की लहरों ने जब अपना रौद्र रूप दिखाया, तो जिले के 117 गांवों में कोहराम मच गया और करीब 8,000 लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा । ऐसे संकट के समय में हमें याद आता है कि कुदरत ने हमें शीशम के रूप में एक ऐसा सुरक्षा कवच दिया है, जो न केवल पानी के तेज बहाव को झेल सकता है, बल्कि हमारी उपजाऊ जमीन को बहने से भी बचा सकता है। यह लेख आपको बताएगा कि कैसे यह एक पेड़ हमारी अर्थव्यवस्था और पर्यावरण की रक्षा की पहली दीवार बन सकता है।​

File:Africa rose wood.jpg

शीशम की बनावट और खूबियां इसे दूसरी वनस्पतियों से अलग कैसे बनाती हैं?

शीशम का पेड़ अपनी शारीरिक मजबूती के लिए मशहूर है। यह 30 मीटर तक ऊँचा हो सकता है और इसका तना 2.4 मीटर तक मोटा हो सकता है! इसकी छाल बहुत मोटी और खुरदरी होती है, जिसमें गहरी दरारें होती हैं। यह छाल सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है; यह पेड़ के लिए एक 'फायरप्रूफ' (fire-proof) और 'वाटरप्रूफ' (water-proof) जैकेट (jacket) की तरह काम करती है, जो इसे चिलचिलाती गर्मी और बाढ़ के पानी से बचाती है। इसकी जड़ें बचपन से ही जमीन में बहुत गहराई तक उतर जाती हैं। इसकी एक लंबी मुख्य जड़ होती है और कई सहायक जड़ें जमीन की सतह के पास फैल जाती हैं, जो मिट्टी को मजबूती से जकड़ लेती हैं।
इसकी पत्तियां संयुक्त होती हैं, जो दिखने में चौड़ी और चमड़े की तरह मजबूत महसूस होती हैं। मार्च से मई के बीच इसमें छोटे और खुशबूदार फूल आते हैं, जो पूरे माहौल को महका देते हैं। इसके फल फलियों के रूप में होते हैं जो सर्दियों तक पकते हैं। इसके बीज किडनी के आकार के होते हैं, जो चपटे और भूरे-काले रंग के होते हैं! शीशम की यही शारीरिक मजबूती उसे शाहजहांपुर के उन इलाकों के लिए आदर्श बनाती है जहाँ नदियाँ अपना रास्ता बदलती रहती हैं और जहाँ हर साल बाढ़ का खतरा मंडराता रहता है।

खेती-किसानी और घरेलू जरूरतों में शीशम का क्या योगदान है?

शाहजहांपुर के किसानों के लिए शीशम किसी 'एटीएम' (ATM) से कम नहीं है। इसकी लकड़ी दुनिया भर में अपने भारीपन और मजबूती के लिए जानी जाती है। यह सड़न प्रतिरोधी होती है, यानी इसमें दीमक या नमी का असर बहुत कम होता है। इसीलिए इसका इस्तेमाल उच्च श्रेणी के फर्नीचर (furniture), कैबिनेट (Cabinet) और यहाँ तक कि समुद्री जहाजों में इस्तेमाल होने वाले प्लाईवुड (plywood) बनाने के लिए किया जाता है! एक किसान के लिए खेत की मेड़ पर लगा शीशम उसकी भविष्य की बचत है, जिसे जरूरत पड़ने पर वह अच्छे दामों में बेच सकता है।

लकड़ी के अलावा, शीशम पशुपालकों के लिए भी बहुत उपयोगी है। इसकी पत्तियों में 24 प्रतिशत तक कच्चा प्रोटीन होता है, जो इसे दुधारू पशुओं के लिए एक बेहतरीन चारा बनाता है शाहजहांपुर के जलोढ़ मैदानों में जहाँ सिंचाई की अच्छी व्यवस्था है, वहाँ शीशम प्राकृतिक रूप से पनपता है। यह पेड़ एक साथ तीन काम करता है—निर्माण के लिए लकड़ी देता है, चूल्हे के लिए ईंधन मुहैया कराता है और जानवरों के लिए पौष्टिक भोजन देता है। यही वजह है कि शाहजहांपुर की घरेलू अर्थव्यवस्था में शीशम का स्थान बहुत ऊँचा है।

मिट्टी की सेहत सुधारने और बाढ़ से लड़ने में शीशम की क्या भूमिका है?
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो शीशम की सबसे बड़ी खूबी 'नाइट्रोजन फिक्सेशन' (Nitrogen Fixation) है। इसे आसान भाषा में कहें तो यह पेड़ हवा में मौजूद नाइट्रोजन (Nitrogen) को सोखकर अपनी जड़ों के जरिए मिट्टी में पहुँचाता है! यह मिट्टी के लिए एक 'कुदरती खाद' की तरह काम करता है। शाहजहांपुर में जहाँ किसान गेहूं, धान और गन्ना उगाते हैं, वहाँ शीशम का होना मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में मदद करता है। एक शोध में यह भी पाया गया है कि अगर खेत की मेड़ पर शीशम लगा हो, तो गेहूं की पैदावार पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरने से लाभ ही होता है!

बाढ़ प्रबंधन में तो इसका कोई मुकाबला ही नहीं है। हाल ही में जब गर्रा नदी ने 515 हेक्टेयर (hectare) जमीन को अपनी चपेट में ले लिया, तब यह महसूस किया गया कि अगर नदी के किनारों पर पेड़ों की घनी पट्टी होती, तो नुकसान कम हो सकता था! शीशम जैसे गहरी जड़ों वाले पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और बाढ़ के पानी के वेग को कम करते हैं। इसकी जड़ें जमीन के नीचे एक मजबूत जाल बुन लेती हैं, जो पानी के तेज थपेड़ों के बावजूद मिट्टी को बहने नहीं देतीं।​

भविष्य की रणनीति: क्या हमें शाहजहांपुर में बड़े पैमाने पर शीशम लगाने की जरूरत है?
बाढ़ के कड़वे अनुभवों के बाद अब समय आ गया है कि शाहजहांपुर का प्रशासन और स्थानीय समुदाय मिलकर एक दूरगामी योजना बनाएं। केवल राहत सामग्री बांटना काफी नहीं है; हमें भविष्य की बाढ़ से लड़ने के लिए 'प्राकृतिक बांध' बनाने होंगे। शीशम का पुनर्रोपण इस रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। नदी के किनारों पर शीशम की पट्टियां विकसित करने से न केवल पर्यावरण सुधरेगा, बल्कि यह किसानों के लिए आय का एक स्थायी जरिया भी बनेगा।

जिला प्रशासन को चाहिए कि वह खाली पड़ी सरकारी जमीनों और नदी के किनारों पर शीशम लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए। यह न केवल 117 गांवों के जीवन को सुरक्षा देगा, बल्कि शाहजहांपुर को फिर से हरा-भरा और सुरक्षित बनाएगा। विकास और प्रकृति के बीच का यह संतुलन ही हमें आने वाली आपदाओं से बचा सकता है। शीशम का हर एक पौधा शाहजहांपुर के सुरक्षित कल की ओर एक मजबूत कदम है, जिसे अपनाना अब हमारी मजबूरी भी है और जिम्मेदारी भी।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2b5sth9x
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/26z5mr3z
https://tinyurl.com/2d2qkowe
https://tinyurl.com/29q9m55n
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/2b5rqym7 

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