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जब हम उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर ज़िले की बात करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान इसके ऐतिहासिक गौरव पर जाता है। 1647 में मुग़ल बादशाह शाहजहां के नाम पर बसा यह शहर आज अपनी एक नई पहचान की तलाश में है। गर्रा (देवहा) नदी के किनारे बसा यह ज़िला केवल इंसानों का बसेरा नहीं है, बल्कि यह शीशम जैसे उन मज़बूत पेड़ों का घर भी है, जो सदियों से यहाँ की मिट्टी और लोगों की हिफ़ाज़त करते आए हैं। बरेली और लखनऊ के बीच बसा यह इलाक़ा गंगा के कछार (मैदानी भाग) में आता है। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी शीशम के लिए किसी वरदान जैसी है।
लेकिन हाल के सालों में क़ुदरत का मिज़ाज बदला है। गर्रा नदी की लहरों ने जब अपना रौद्र रूप दिखाया, तो ज़िले के 117 गांवों में कोहराम मच गया और क़रीब 8,000 लोगों को अपना घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। ऐसे मुश्किल वक़्त में हमें याद आता है कि क़ुदरत ने हमें शीशम के रूप में एक ऐसा सुरक्षा कवच दिया है, जो न केवल पानी के तेज़ बहाव को झेल सकता है, बल्कि हमारी ज़मीन को कटने से भी बचा सकता है। आइए समझते हैं कि कैसे यह पेड़ हमारी आजीविका और पर्यावरण को बचाने वाली 'पहली दीवार' बन सकता है।
शीशम का पेड़ अपनी ज़बरदस्त मज़बूती और सख़्त जान के लिए मशहूर है। यह 30 मीटर तक ऊँचा हो सकता है और इसका तना काफ़ी मोटा और गठीला होता है। इसकी छाल बहुत मोटी और खुरदरी होती है, जिसमें गहरी दरारें होती हैं। यह छाल सिर्फ़ दिखावा नहीं है, बल्कि एक ऐसा क़ुदरती कवच भी है जो पेड़ को झुलसाने वाली गर्मी और बाढ़ के पानी से बचाता है। इसकी जड़ें शुरुआत से ही ज़मीन में काफ़ी गहराई तक उतर जाती हैं। एक लंबी मुख्य जड़ के साथ-साथ कई सहायक जड़ें ज़मीन के ऊपरी हिस्से में फैल जाती हैं, जो मिट्टी को मज़बूती से जकड़ लेती हैं।
इसकी पत्तियाँ चौड़ी और मज़बूत होती हैं। मार्च से मई के बीच इसमें छोटे और ख़ुशबूदार फूल आते हैं, जो पूरे माहौल को महका देते हैं। इसके फल फलियों के रूप में होते हैं और इसके बीज गुर्दे (Kidney) के आकार के, चपटे व भूरे-काले रंग के होते हैं। शीशम की यही मज़बूत बनावट उसे शाहजहांपुर के उन इलाक़ों के लिए सबसे सही बनाती है, जहाँ नदियाँ अपना रास्ता बदलती रहती हैं और बाढ़ का ख़तरा हमेशा बना रहता है।

शाहजहांपुर के किसानों के लिए शीशम किसी 'गुल्लक' से कम नहीं है। इसकी लकड़ी अपने भारीपन और मज़बूती के कारण पूरी दुनिया में जानी जाती है। यह जल्दी ख़राब नहीं होती और इसमें दीमक या नमी का असर बहुत कम होता है। इसीलिए इसका इस्तेमाल महंगे फ़र्नीचर (furniture) और यहाँ तक कि समुद्री जहाज़ों में लगने वाली प्लाईवुड (Plywood) बनाने में भी होता है। खेत की मेड़ पर लगा शीशम किसान की वह जमा-पूंजी है, जो ज़रूरत पड़ने पर या बुरे वक़्त में अच्छे दामों में बिकती है।
लकड़ी के अलावा, शीशम पशुपालकों के लिए भी बहुत काम का है। इसकी पत्तियों में भरपूर प्रोटीन (protein) होता है, जो दुधारू पशुओं के लिए बेहतरीन चारा है। शाहजहांपुर के मैदानी इलाक़ों में, जहाँ पानी की कमी नहीं है, शीशम ख़ूब फलता-फूलता है। यह पेड़ एक साथ तीन काम करता है, घर बनाने के लिए लकड़ी, चूल्हे के लिए ईंधन और जानवरों के लिए पौष्टिक चारा। यही वजह है कि यहाँ के ग्रामीण जीवन और कमाई में शीशम का बहुत बड़ा योगदान है।
शीशम की एक बड़ी ख़ूबी यह है कि यह ज़मीन को उपजाऊ बनाता है। यह हवा से नाइट्रोजन (nitrogen) सोखकर अपनी जड़ों के ज़रिए उसे मिट्टी में पहुँचाता है, जो एक 'क़ुदरती खाद' का काम करती है। शाहजहांपुर में जहाँ किसान गेहूं, धान और गन्ना उगाते हैं, वहाँ शीशम का होना खेत की ताक़त को बनाए रखता है। शोध बताते हैं कि खेत की मेड़ पर शीशम लगाने से फ़सल को नुक़सान नहीं होता, बल्कि मिट्टी की सेहत सुधरती है।
बाढ़ को रोकने में तो इसका कोई जवाब नहीं है। हाल ही में जब गर्रा नदी ने सैकड़ों हेक्टेयर ज़मीन को अपनी चपेट में लिया, तब यह महसूस किया गया कि अगर नदी के किनारों पर पेड़ों की घनी कतारें होतीं, तो नुक़सान कम हो सकता था। शीशम जैसे गहरी जड़ों वाले पेड़ मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और बाढ़ के पानी की रफ़्तार को धीमा कर देते हैं। इसकी जड़ें ज़मीन के नीचे एक मज़बूत जाल बुन लेती हैं, जो तेज़ पानी के थपेड़ों में भी मिट्टी को बहने नहीं देतीं।
भविष्य की राह: हमें क्या करना होगा?
बाढ़ के कड़वे अनुभवों के बाद अब वक़्त आ गया है कि शाहजहांपुर का प्रशासन और स्थानीय लोग मिलकर एक पक्की योजना बनाएं। सिर्फ़ राहत सामग्री बांटने से काम नहीं चलेगा; हमें भविष्य के लिए पेड़ों के रूप में 'क़ुदरती बांध' तैयार करने होंगे। नदी के किनारों पर शीशम के जंगल लगाने से न केवल पर्यावरण सुधरेगा, बल्कि यह किसानों के लिए कमाई का एक स्थायी ज़रिया भी बनेगा।
ज़िला प्रशासन को चाहिए कि वह ख़ाली पड़ी सरकारी ज़मीनों और नदी के किनारों पर शीशम लगाने के लिए विशेष अभियान चलाए। यह क़दम 117 गांवों की सुरक्षा के साथ-साथ शाहजहांपुर को फिर से हरा-भरा बनाएगा। विकास और क़ुदरत के बीच का यह संतुलन ही हमें आने वाली आपदाओं से बचा सकता है। शीशम का हर एक पौधा शाहजहांपुर के सुरक्षित कल की ओर एक मज़बूत क़दम है, जिसे अपनाना अब हमारी ज़रूरत भी है और ज़िम्मेदारी भी।
संदर्भ
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