रोहू-कतला ही नहीं, शाहजहांपुर की नदियों में छिपी हैं 35 अनूठी प्रजातियां!

मछलियाँ और उभयचर
10-01-2026 09:12 AM
रोहू-कतला ही नहीं, शाहजहांपुर की नदियों में छिपी हैं 35 अनूठी प्रजातियां!

जब हम शाहजहांपुर के नक्शे पर नजर डालते हैं, तो गर्रा, गोमती और खन्नौत जैसी नदियाँ केवल नीले रंग की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें नजर आती हैं। लेकिन सच तो यह है कि ये नदियाँ, हमारे जिले के तालाब और छोटी झीलें अपने भीतर एक पूरी कायनात समेटे हुए हैं। यहाँ मछलियों और मेंढकों की एक ऐसी खामोश आबादी रहती है, जो न केवल हमारे खाने की थाली का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि हमारी प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखती है। मानसून के समय जब नहरें उफनती हैं और गन्ने के खेतों के बीच छोटे-छोटे तालाब बन जाते हैं, तब शाहजहांपुर का यह जलीय जीवन अपने अस्तित्व की एक नई कहानी लिखना शुरू करता है।

इन जलस्रोतों में छिपी विविधता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ मछलियों की लगभग 35 प्रजातियाँ पाई जाती हैं । इनमें रोहू, कतला और मृगल जैसी प्रमुख मछलियाँ शामिल हैं, जो सदियों से हमारे स्थानीय भोजन का मुख्य हिस्सा रही हैं। ये मछलियाँ न केवल स्वाद के लिए पहचानी जाती हैं, बल्कि ये हमारे ग्रामीण बाजारों और गरीब मछुआरों की रोजी-रोटी का सबसे बड़ा जरिया भी हैं। जब भी भारी बारिश के बाद नदियाँ और नहरें पानी से लबालब होती हैं, तो ये इलाके मछलियों के लिए एक सुरक्षित बसेरा बन जाते हैं, जहाँ वे अपना वंश बढ़ाती हैं और जिले की आर्थिक स्थिति को मजबूती देती हैं।

क्यों हमारी नदियों का गिरता स्वास्थ्य इन जलीय जीवों के लिए एक खतरे की घंटी है?
गर्रा और गोमती जैसी नदियाँ इस जलीय जैव-विविधता के लिए किसी 'लाइफलाइन' (lifeline) से कम नहीं हैं, लेकिन आज इनका स्वास्थ्य गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। पिछले कुछ वर्षों में गर्रा नदी के पानी की गुणवत्ता में जो बदलाव आए हैं, वे हमें डराने वाले हैं। शोध बताते हैं कि शहरों से निकलता गंदा सीवेज (sewage), फैक्ट्रियों (factory) का जहरीला कचरा और नदियों से होने वाला अवैध रेत खनन इन मछलियों के प्रजनन स्थलों को पूरी तरह तबाह कर रहा है। जब नदियों की तलहटी से रेत निकाली जाती है, तो मछलियों के अंडे देने की जगहें खत्म हो जाती हैं, जिससे उनकी आबादी तेजी से गिरने लगती है।​

प्रदूषण के कारण पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम हो रहा है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में 'हाइपोक्सिया'(Hypoxia) कहा जाता है। जब पानी में ऑक्सीजन (oxygen) की कमी होती है, तो मछलियाँ और अन्य जीव दम तोड़ने लगते हैं। अगर हमने समय रहते प्रदूषण और अवैध गतिविधियों पर लगाम नहीं लगाई, तो वह दिन दूर नहीं जब ये नदियाँ केवल मृत जलस्रोत बनकर रह जाएंगी। गर्रा नदी की हालिया बाढ़ ने हमें याद दिलाया है कि प्रकृति जब अपना संतुलन खोती है, तो उसका असर केवल इंसानों पर नहीं, बल्कि पानी के भीतर रहने वाले उन मूक जीवों पर भी पड़ता है जो अपनी शिकायत किसी से नहीं कर सकते।

खेतों में फुदकते ये मेंढक हमारे किसानों के लिए 'कुदरती रक्षक' कैसे हैं?
नदियों से थोड़ा हटकर अगर हम शाहजहांपुर के धान के खेतों और गन्ने के इलाकों की तरफ देखें, तो वहाँ एक और अनदेखा जलीय जीवन संघर्ष कर रहा है। मानसून के दौरान खेतों में जमा पानी मेंढकों के लिए स्वर्ग जैसा होता है। ये जीव केवल 'टर्र-टर्र' करने वाले शोर मचाने वाले जीव नहीं हैं, बल्कि ये हमारे किसानों के सच्चे और सबसे वफादार मित्र हैं। मेंढक उन कीड़ों को खाकर खत्म कर देते हैं जो फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं, इस तरह वे एक 'प्राकृतिक कीट नियंत्रक' (Natural Pest Controller) की भूमिका निभाते हैं।

शाम के वक्त मेंढकों की आवाजें इस बात का सुबूत होती हैं कि हमारे छोटे जलस्रोत अभी भी जीवित और स्वस्थ हैं। लेकिन जैसे-जैसे हम तेजी से शहरों का विस्तार कर रहे हैं और रसायनों का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं, इनके घर उजाड़ रहे हैं। शाहजहांपुर की स्थिति को अगर हम पूरे उत्तर प्रदेश के संदर्भ में देखें, तो यह जिला गंगा के मैदानी इलाकों का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा है । यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) न केवल पानी को शुद्ध करती हैं, बल्कि लाखों सूक्ष्म जीवों को आश्रय भी देती हैं। इन जीवों का खत्म होना हमारे भविष्य के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा है।​

क्या सरकारी नीतियां और जन-भागीदारी इन मूक जलचरों की किस्मत बदल सकती हैं?
इन लुप्त होते जीवों को बचाना अब केवल सरकारों की नहीं, बल्कि हम सबकी जिम्मेदारी है। 'नमामि गंगे' मिशन के तहत बनाई गई 'जिला गंगा समितियाँ' इस दिशा में एक उम्मीद की किरण बनकर उभरी हैं। शाहजहांपुर के लिए जो नया एक्शन प्लान (action plan) तैयार किया गया है, उसमें जलीय जीवों को बचाने के लिए कड़े प्रावधान किए गए हैं! इसमें नदियों में कचरा फेंकने पर रोक और अवैध रेत खनन के खिलाफ सख्त कार्रवाई की बात कही गई है। लेकिन कानून तभी सफल होते हैं जब आम जनता उनका साथ दे।​

हमें यह समझना होगा कि शाहजहांपुर की ये मछलियाँ और मेंढक हमारे पर्यावरण की चेन का एक बहुत ही कीमती हिस्सा हैं। अगर ये गायब हो गए, तो हमारी पूरी खाद्य श्रृंखला बिगड़ जाएगी और बीमारियों का खतरा बढ़ जाएगा। हमें अपनी नदियों को केवल पानी के पाइप की तरह नहीं देखना चाहिए, बल्कि उन्हें एक जीवित इकाई के रूप में सहेजना चाहिए। यह सुनिश्चित करना हमारा कर्तव्य है कि शाहजहांपुर का यह गौरवशाली जलीय जीवन हमारे लालच की भेंट न चढ़ जाए और आने वाली पीढ़ियां इन्हें केवल किताबों या पुरानी यादों में ही न देखें।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/25uparyy
https://tinyurl.com/2dqbavkk
https://tinyurl.com/263suejv
https://tinyurl.com/2bhe4pvt
https://tinyurl.com/2dboes63 

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