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जब हम शाहजहांपुर के नक़्शे पर नज़र डालते हैं, तो गर्रा, गोमती और खन्नौत जैसी नदियाँ भले ही नीले रंग की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें दिखाई देती हों, लेकिन हक़ीक़त इससे कहीं ज़्यादा गहरी है। सच तो यह है कि ये नदियाँ, हमारे ज़िले के तालाब और छोटी झीलें अपने आप में एक पूरी दुनिया बसाए हुए हैं। यहाँ पानी के भीतर मछलियों और मेंढकों की एक ऐसी खामोश बस्ती आबाद है, जो न सिर्फ़ हमारी थाली का स्वाद बढ़ाती है, बल्कि क़ुदरत के नाज़ुक संतुलन को भी संभाले हुए है। मानसून में जब नहरें उफनती हैं और गन्ने के खेतों के बीच छोटे-छोटे तालाब बन जाते हैं, तो शाहजहांपुर का यह जलीय जीवन फिर से अंगड़ाई लेने लगता है।
इन जलाशयों की रौनक़ और विविधता का सबूत यह है कि यहाँ मछलियों की क़रीब 35 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें रोहू, कतला और मृगल जैसी प्रमुख मछलियाँ शामिल हैं, जो सदियों से हमारे स्थानीय भोजन की जान रही हैं। लेकिन बात सिर्फ़ स्वाद की नहीं है; ये मछलियाँ हमारे ग्रामीण बाज़ारों की रौनक़ हैं और हज़ारों ग़रीब मछुआरों की रोज़ी-रोटी का सबसे बड़ा ज़रिया भी। जब भारी बारिश के बाद नदियाँ और नहरें लबालब भर जाती हैं, तो ये इलाक़े मछलियों के लिए एक सुरक्षित घर बन जाते हैं। यही वह समय होता है जब वे अपनी तादाद बढ़ाती हैं, जिससे ज़िले की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती मिलती है।
गर्रा और गोमती जैसी नदियाँ इस जलीय जीवन के लिए जीवन-रेखा (Lifeline) समान हैं, लेकिन अफ़सोस कि आज इनकी हालत चिंताजनक है। पिछले कुछ सालों में गर्रा नदी का पानी जिस तरह ज़हरीला हुआ है, वह वाक़ई डराने वाला है। शोध बताते हैं कि शहरों का गंदा सीवेज, फ़ैक्ट्रियों का ज़हरीला कचरा और अवैध रेत खनन मछलियों के घर उजाड़ रहा है। जब नदी की तलहटी से बेहिसाब रेत निकाली जाती है, तो मछलियों के अंडे देने की जगहें नष्ट हो जाती हैं, जिससे उनकी आबादी तेज़ी से घटने लगती है।
प्रदूषण के कारण पानी में ऑक्सीजन का दम घुट रहा है, इसे वैज्ञानिक भाषा में 'हाइपोक्सिया' (Hypoxia) कहते हैं। जब पानी में ऑक्सीजन कम होती है, तो मछलियाँ तड़प कर मरने लगती हैं। अगर हमने वक़्त रहते प्रदूषण और अवैध धंधों पर लगाम नहीं लगाई, तो वो दिन दूर नहीं जब ये नदियाँ सिर्फ़ गंदे पानी का नाला बनकर रह जाएंगी। गर्रा नदी की हालिया बाढ़ ने हमें चेतावनी दी है कि जब क़ुदरत अपना संतुलन खोती है, तो उसका ख़ामियाज़ा सिर्फ़ इंसानों को नहीं, बल्कि पानी के भीतर रहने वाले उन बेज़ुबान जीवों को भी भुगतना पड़ता है।
नदियों से निकलकर अगर हम शाहजहांपुर के धान और गन्ने के खेतों की तरफ़ देखें, तो वहाँ भी एक अलग ही दुनिया संघर्ष कर रही है। मानसून में खेतों में जमा पानी मेंढकों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं होता। ये जीव सिर्फ़ 'टर्र-टर्र' का शोर मचाने वाले प्राणी नहीं हैं, बल्कि हमारे किसानों के सच्चे और वफ़ादार दोस्त हैं। मेंढक उन कीड़ों को चट कर जाते हैं जो फ़सलों को नुक़सान पहुँचाते हैं, यानी ये बिना किसी ख़र्च के 'प्राकृतिक कीट नियंत्रक' (Natural Pest Controller) का काम करते हैं।
शाम के वक़्त गूंजती मेंढकों की आवाज़ें इस बात का सबूत हैं कि हमारे ताल-तलैया अभी भी ज़िंदा हैं। लेकिन जैसे-जैसे शहर फैल रहे हैं और खेतों में ज़हरीले रसायनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, इनके घर उजड़ते जा रहे हैं। शाहजहांपुर गंगा के मैदानी इलाक़ों का एक बेहद अहम हिस्सा है। यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) न केवल पानी साफ़ करती हैं, बल्कि लाखों सूक्ष्म जीवों को पनाह भी देती हैं। इनका ख़त्म होना हमारे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।
क्या हम इन बेज़ुबानों की क़िस्मत बदल सकते हैं?
इन लुप्त होते जीवों को बचाना अब सिर्फ़ सरकार का काम नहीं, हम सबकी साझा ज़िम्मेदारी है। 'नमामि गंगे' मिशन के तहत बनी 'ज़िला गंगा समितियाँ' उम्मीद की एक नई किरण लेकर आई हैं। शाहजहांपुर के लिए बने नए एक्शन प्लान (action plan) में इन जीवों को बचाने के लिए सख़्त क़दम उठाए गए हैं। इसमें नदियों में कचरा फेंकने और अवैध रेत खनन के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की बात कही गई है। लेकिन कोई भी क़ानून तब तक सफ़ल नहीं हो सकता, जब तक आम जनता उसका दिल से साथ न दे।
हमें यह समझना होगा कि शाहजहांपुर की ये मछलियाँ और मेंढक हमारे पर्यावरण की जंजीर की मज़बूत कड़ियाँ हैं। अगर ये ग़ायब हुए, तो पूरी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) बिखर जाएगी और बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाएगा। हमें नदियों को सिर्फ़ पानी ढोने वाला पाइप नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें एक जीती-जागती विरासत मानना चाहिए। यह सुनिश्चित करना हमारा फ़र्ज़ है कि शाहजहांपुर का यह शानदार जलीय जीवन हमारे लालच की भेंट न चढ़ जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इन्हें सिर्फ़ क़िस्से-कहानियों में न ढूँढें।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/25uparyy
https://tinyurl.com/2dqbavkk
https://tinyurl.com/263suejv
https://tinyurl.com/2bhe4pvt
https://tinyurl.com/2dboes63