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शाहजहांपुर के सरसों के खेतों में मंडराती एक छोटी सी मधुमक्खी न केवल पर्यावरण का संतुलन बनाए रखती है, बल्कि वह जिले की 'मीठी क्रांति' और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली नायक भी है । यह लेख इस 'छिपी हुई अर्थव्यवस्था' और सरकार द्वारा दी जाने वाली 40% सब्सिडी जैसी योजनाओं का विस्तार से विश्लेषण करता है ताकि किसान तरक्की के नए रास्ते तलाश सकें।
क्या शाहजहांपुर के खेतों में उड़ने वाली मधुमक्खी भी किसी हाईवे जितनी अहम हो सकती है?
हम अक्सर बड़े बदलावों को केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या भारी-भरकम मशीनों के रूप में ही देखते हैं। लेकिन क्या आपने कभी ठहरकर यह सोचा है कि शाहजहांपुर के खेतों में उड़ने वाली एक छोटी सी तितली या फूलों पर मंडराती मधुमक्खी भी हमारे जिले के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) का उतना ही अहम हिस्सा है, जितना कि कोई नेशनल हाईवे (national highway)? मानव इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि इन नन्हें कीड़ों ने हमारी बस्तियों और व्यापार का नक्शा बदला है। जब सदियों पहले इंसानों ने खेती की शुरुआत की थी, तब ये परागण करने वाले जीव ही थे जिन्होंने फसल की पैदावार को भरोसेमंद बनाया था।
पुराने समय में शहद और मोम केवल खाने-पीने की चीजें नहीं थीं, बल्कि ये दवाइयों, चीजों को सुरक्षित रखने (Storage), पूजा-पाठ और यहाँ तक कि बारीक़ शिल्पकारी का आधार भी बने। आज शाहजहांपुर में हम उसी 'छिपी हुई अर्थव्यवस्था' की पड़ताल कर रहे हैं, जो बिना किसी शोर-शराबे के हमारे खेतों की पैदावार और गांव की आमदनी को चुपचाप बढ़ा रही है। यह समझना जरूरी है कि तरक्की सिर्फ कंक्रीट से नहीं, बल्कि इन नन्हें कामगारों की मेहनत से भी आती है।
नदियों के किनारे और सरसों की मेड़ें: ये नन्हें जीव आखिर रहते कहाँ हैं?
शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इन छोटे जीवों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। रामगंगा, गर्रा और गोमती जैसी नदियों के उपजाऊ मैदानी इलाकों में बसा यह जिला अपनी हरियाली और मिट्टी की नमी के लिए जाना जाता है। अगर हम जिले के आंकड़ों पर गौर करें, तो यहाँ फसलों की सघनता बहुत अधिक है, जो इन जीवों को भरपूर भोजन देती है। नदियों के किनारे फैले रेतीले टीले, छोटे-बड़े जलभराव वाले क्षेत्र और खेतों का एक मिला-जुला जाल मधुमक्खियों और तितलियों के लिए 'माइक्रो-हैबिटेट' यानी रहने के लिए सबसे सुरक्षित छोटे घर तैयार करते हैं।
ये खाली पड़ी जमीनें या खरपतवार वाले कोने सिर्फ बेकार जमीन नहीं हैं, बल्कि ये जीवन की असली नर्सरी हैं। शाहजहांपुर में इन 'नन्हें कामगारों' के पते-ठिकाने की तलाश करें, तो ये सबसे ज्यादा नहरों के किनारे उगी झाड़ियों, सरसों के खेतों की मेड़ों, बागों के शांत कोनों और तालाबों के पास पाए जाते हैं। स्थानीय जानकारों का भी मानना है कि खेतों में तितलियों और भौरों की मौजूदगी केवल सुंदरता का विषय नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि हमारा पर्यावरण अभी भी स्वस्थ और सांस लेने लायक बचा हुआ है।
परागण का गणित: कैसे ये छोटे जीव किसान की जेब और जिले की तिजोरी भरते हैं?
अब सबसे जरूरी सवाल यह है कि इन जीवों की सुंदरता हमारी जेब से कैसे जुड़ी है? विज्ञान की भाषा में इसे 'परागण' (Pollination) कहते हैं, जिसका सीधा संबंध फसल के उत्पादन से है। जब एक मधुमक्खी एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती है, तो वह केवल अपना पेट नहीं भर रही होती, बल्कि वह फसल के दाने बनने की गारंटी दे रही होती है। शोध बताते हैं कि इन परागण सेवाओं का आर्थिक मूल्य अरबों रुपयों में है, जिसे अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं ! यह कुदरत की एक ऐसी सेवा है जिसका बिल किसान के पास कभी नहीं आता, लेकिन इसका मोटा मुनाफा उसकी कटी हुई फसल के वजन में साफ दिखाई देता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अध्ययन भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में इन जीवों का बहुत बड़ा योगदान है ! शाहजहांपुर के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यहाँ सरसों जैसी तिलहन और दलहन फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है, जिन्हें पैदावार बढ़ाने के लिए इन मधुमक्खियों की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। अगर ये मधुमक्खियां न हों, तो फसलों की गुणवत्ता और मात्रा दोनों ही गिर जाएंगी, जिससे सीधे तौर पर किसान की आय पर असर पड़ेगा।
सरकारी मदद और 'मीठी क्रांति': कैसे उठाएं 40% सब्सिडी का फायदा?
मधुमक्खी पालन की इसी ताकत को पहचानते हुए अब सरकार इसे केवल शहद निकालने तक सीमित नहीं मान रही है। आज का मुख्य उद्देश्य मधुमक्खी पालन को खेती का एक अनिवार्य हिस्सा बनाना है, ताकि शहद के साथ-साथ फसलों की पैदावार भी बढ़े। शाहजहांपुर में नाबार्ड (NABARD) ने इस दिशा में एक बहुत ही ठोस और व्यावहारिक योजना तैयार की है! जिले के उन खास ब्लॉकों की पहचान की गई है जहाँ फूलों की खेती या सरसों की पैदावार अधिक है और जहाँ मधुमक्खी पालन की अपार संभावनाएं छिपी हुई हैं।
नाबार्ड की रिपोर्ट (report) के अनुसार, इस काम को सफल बनाने के लिए किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और गुणवत्ता का ध्यान रखना होगा। सबसे अच्छी बात यह है कि इस 'मीठी क्रांति' को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से जबरदस्त प्रोत्साहन मिल रहा है। जो किसान मधुमक्खी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाना चाहते हैं, उन्हें सरकार की तरफ से 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जा रही है ! यह सब्सिडी छोटे किसानों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है, जिससे वे बहुत कम लागत में अपनी आय का एक नया और ठोस जरिया शुरू कर सकते हैं।
कुल मिलाकर हमें एक ऐसी दूरगामी सोच की जरूरत है जो इन छोटे कीड़ों को 'मुसीबत' या 'कचरा' न मानकर जिले की बेशकीमती संपत्ति समझे। इसके लिए किसानों को अपने खेतों की सीमाओं पर ऐसे फूलदार पौधे लगाने होंगे जो साल भर इन जीवों को भोजन दे सकें। सबसे महत्वपूर्ण कदम यह है कि जब फसलों पर फूल आ रहे हों, तब कीटनाशकों का छिड़काव कम से कम किया जाए या केवल शाम के समय किया जाए जब मधुमक्खियां सक्रिय नहीं होतीं।
इसके साथ ही, मधुमक्खी पालन को वृक्षारोपण और तालाबों के संरक्षण से जोड़ा जाना चाहिए। जब हम अपने तालाबों और पुराने पेड़ों को बचाएंगे, तभी ये नन्हें जीव हमारे खेतों की रक्षा करेंगे। शाहजहांपुर के लिए विकास का मतलब केवल सड़कें बनाना नहीं, बल्कि अपनी इस 'प्राकृतिक पूंजी' को सहेजना भी है। अगर हम आज इन नन्हें कामगारों का साथ देंगे, तो कल हमारा शाहजहांपुर न केवल शहद की मिठास से भरेगा, बल्कि यहाँ के किसानों की खुशहाली भी पूरी दुनिया के लिए एक मिसाल बनेगी।
संदर्भ
https://tinyurl.com/29wpam8p
https://tinyurl.com/24pamvfo
https://tinyurl.com/25x8dmsn
https://tinyurl.com/29ro5u4w
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