मधुमक्खी पालन पर 40% सब्सिडी: कैसे बदलेगी शाहजहांपुर के किसानों की किस्मत?

तितलियाँ और कीट
10-01-2026 09:12 AM
मधुमक्खी पालन पर 40% सब्सिडी: कैसे बदलेगी शाहजहांपुर के किसानों की किस्मत?

शाहजहांपुर के सरसों के खेतों में मंडराती एक छोटी सी मधुमक्खी केवल पर्यावरण का संतुलन ही नहीं बनाती, बल्कि वह ज़िले की 'मीठी क्रांति' (Sweet Revolution) और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ भी है। इस लेख में हम इस 'अनदेखी अर्थव्यवस्था' और सरकार द्वारा दी जाने वाली 40% सब्सिडी जैसी योजनाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे।

हम अक्सर विकास को केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों या भारी मशीनों के रूप में देखते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि शाहजहांपुर के खेतों में उड़ने वाली नन्ही मधुमक्खी भी हमारे लिए उतनी ही अहम हो सकती है, जितना कि कोई 'नेशनल हाईवे'? मानव इतिहास गवाह है कि खेती की शुरुआत से ही इन जीवों ने फसल की पैदावार को भरोसेमंद बनाया है। पुराने समय में शहद और मोम सिर्फ़ खाने की चीज़ें नहीं थीं, बल्कि ये दवाइयों और रोज़गार का आधार थीं। आज हम उसी 'छुपी हुई ताक़त' की बात कर रहे हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के हमारे गाँवों की आमदनी बढ़ा रही है। तरक्की सिर्फ़ कंक्रीट से नहीं, बल्कि इन नन्हें कामगारों की मेहनत से भी आती है।

शाहजहांपुर की भौगोलिक बनावट इन छोटे जीवों के लिए किसी जन्नत से कम नहीं है। रामगंगा, गर्रा और गोमती जैसी नदियों के उपजाऊ मैदानी इलाक़ों में बसा यह ज़िला अपनी हरियाली के लिए जाना जाता है। नदियों के किनारे फैले रेतीले टीले, झाड़ियाँ और खेतों का मिला-जुला रूप मधुमक्खियों और तितलियों के लिए सबसे सुरक्षित घर तैयार करते हैं। ये ख़ाली पड़ी ज़मीनें या खरपतवार वाले कोने बेकार नहीं, बल्कि जीवन की असली नर्सरी हैं। अगर आप इन 'नन्हें कामगारों' को ढूँढें, तो ये ज़्यादातर नहरों के किनारे, सरसों के खेतों की मेड़ों और बाग़ों के शांत कोनों में मिलेंगे। खेतों में इनका होना सबूत है कि हमारा पर्यावरण अभी भी ज़िंदा है।

विज्ञान की भाषा में इसे 'परागण' (Pollination) कहते हैं। जब एक मधुमक्खी एक फूल से दूसरे फूल पर बैठती है, तो वह सिर्फ़ अपना पेट नहीं भरती, बल्कि फसल में दाने पड़ने की पक्की गारंटी भी देती है। यह कुदरत की ऐसी मुफ़्त सेवा है जिसका कोई बिल किसान के पास नहीं आता, लेकिन इसका मोटा मुनाफ़ा उसकी कटी हुई फसल के वज़न में साफ़ दिखता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अध्ययन भी पुष्टि करते हैं कि भारत की खेती में इन जीवों का बहुत बड़ा योगदान है। शाहजहांपुर में यह और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहाँ सरसों (Mustard) जैसी तिलहन और दलहन फसलों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। अगर मधुमक्खियां न हों, तो इन फसलों की पैदावार और गुणवत्ता दोनों गिर जाएंगी, जिसका सीधा असर किसान की आमदनी पर पड़ेगा।

सरकारी मदद: 40% सब्सिडी का फ़ायदा कैसे उठाएं?
मधुमक्खी पालन की इसी ताक़त को पहचानते हुए सरकार अब इसे सिर्फ़ शहद तक सीमित नहीं मान रही, बल्कि इसे खेती का अनिवार्य हिस्सा बना रही है। शाहजहांपुर में नाबार्ड (NABARD) ने एक ठोस योजना तैयार की है। ज़िले के उन ख़ास ब्लॉकों की पहचान की गई है जहाँ फूलों और सरसों की खेती ज़्यादा होती है, क्योंकि वहाँ इसकी अपार संभावनाएं हैं।

नाबार्ड की रिपोर्ट के अनुसार, किसानों को वैज्ञानिक प्रशिक्षण और गुणवत्ता पर ध्यान देना होगा। सबसे अच्छी ख़बर यह है कि सरकार इस व्यवसाय को अपनाने वाले किसानों को 40 प्रतिशत तक की सब्सिडी दे रही है। यह मदद छोटे किसानों की तक़दीर बदलने में मील का पत्थर साबित हो सकती है, जिससे वे कम लागत में आमदनी का नया ज़रिया शुरू कर सकते हैं।

हमें यह समझना होगा कि ये छोटे जीव मामूली कीड़े नहीं, बल्कि ज़िले की बेशक़ीमती संपत्ति हैं। इसके लिए किसानों को अपने खेतों की मेड़ों पर फूलदार पौधे लगाने होंगे। सबसे ज़रूरी यह है कि जब फसलों पर फूल आ रहे हों, तब कीटनाशकों का छिड़काव कम से कम हो या शाम के वक़्त किया जाए, जब मधुमक्खियां अपने छत्ते में लौट चुकी होती हैं। मधुमक्खी पालन को वृक्षारोपण और तालाबों के संरक्षण से जोड़ना होगा। अगर हम आज इन नन्हें कामगारों का साथ देंगे, तो कल हमारा शाहजहांपुर न केवल शहद की मिठास से भरेगा, बल्कि यहाँ के किसानों की ख़ुशहाली भी एक मिसाल बनेगी।
 

संदर्भ 
https://tinyurl.com/29wpam8p
https://tinyurl.com/24pamvfo
https://tinyurl.com/25x8dmsn
https://tinyurl.com/29ro5u4w
https://tinyurl.com/28h78zgp
https://tinyurl.com/2b6vmm34

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