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शाहजहांपुर के रोजा, नहिल और सिमरा जैसे छोटे तालाब सर्दियों में हजारों किलोमीटर दूर से आने वाले प्रवासी पक्षियों के लिए 'इंटरनेशनल एयरपोर्ट' की तरह काम करते हैं, जो न केवल जैव-विविधता का केंद्र हैं बल्कि जिले की प्राकृतिक पहचान भी हैं। यह विस्तृत लेख इन विदेशी मेहमानों के संघर्ष, उनके पसंदीदा ठिकानों और इन वेटलैंड्स को बचाने की जरूरत पर एक गहराई भरा मानवीय दृष्टिकोण पेश करता है।
जैसे ही शाहजहांपुर की आबोहवा में सर्दियों की गुलाबी ठंड और कोहरे की चादर दस्तक देती है, हमारे आसमान में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती है। यह हलचल उन ‘विदेशी मेहमानों’ की है, जो बिना किसी पासपोर्ट (passport) और वीजा (visa) के सात समंदर पार से हजारों किलोमीटर का सफर तय करके हमारे जिले के ताल-तलैयों को अपना अस्थायी घर बनाने आते हैं। रोजा, नहिल, सिमरा और खेड़ा जैसे इलाकों के छोटे-छोटे तालाब इन दिनों किसी व्यस्त इंटरनेशनल एयरपोर्ट (International Airport) की तरह चहकने लगते हैं। यह केवल एक प्राकृतिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे जिले की उस भौगोलिक और पर्यावरणीय विरासत का सबूत है, जिसे दुनिया भर के पक्षी पहचानते हैं।
ये पक्षी मुख्य रूप से 'सेंट्रल एशियन फ्लाईवे' (Central Asian Flyway) का रास्ता अपनाकर आते हैं, जो उत्तर ध्रुवीय ठंडे इलाकों को भारतीय उपमहाद्वीप से जोड़ता है। शाहजहांपुर की नदियाँ और यहाँ की आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) इन पक्षियों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन चुकी हैं। यह देखना वाकई सुखद है कि कैसे हमारे जिले के साधारण से दिखने वाले जलाशय वैश्विक स्तर पर प्रवासी पक्षियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गए हैं। यह हमारे लिए गर्व की बात है कि प्रकृति ने हमारे शाहजहांपुर को इन खूबसूरत परिंदों के लिए एक पसंदीदा घर के रूप में चुना है।
इन विदेशी मेहमानों में सबसे खास और सुंदर है—‘नॉर्दर्न पिनटेल’ (Northern Pintail), जिसे स्थानीय लोग इसकी लंबी और नुकीली पूंछ के कारण 'सुई-पूंछ' बत्तख भी कहते हैं। प्रवासी पक्षियों की दुनिया में इस पक्षी का एक विशेष स्थान है। जब इनका झुंड आसमान में उड़ता है, तो इनकी सुडौल देह और उड़ने की रफ्तार देखते ही बनती है। ये पक्षी मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के उन बर्फीले इलाकों से आते हैं जहाँ सर्दियों में सब कुछ जम जाता है और भोजन मिलना मुश्किल हो जाता है।
ई-बर्ड (eBird) के आंकड़ों के अनुसार, नॉर्दर्न पिनटेल (Northern pintail) जैसे पक्षियों के लिए शाहजहांपुर के तालाब किसी जन्नत से कम नहीं हैं। इन्हें शांत, उथला पानी और ऐसा इलाका पसंद है जहाँ ये बिना किसी शोर-शराबे के अपना भोजन तलाश सकें। इनके यहाँ आने का मतलब है कि हमारे तालाबों में अभी भी वह पोषण और शांति बची हुई है, जिसकी तलाश में ये हजारों मील का सफर तय करते हैं। इन पक्षियों की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि हमारे जिले का वातावरण अभी भी पूरी तरह से प्रदूषित नहीं हुआ है और यहाँ जीवन का संगीत अब भी गूँज रहा है।
अक्सर हम सोचते हैं कि वन्यजीवों और पक्षियों के लिए केवल बड़े नेशनल पार्क (National Park) या विशाल झीलें ही जरूरी हैं, लेकिन शाहजहांपुर के वेटलैंड्स (wetlands) ने इस धारणा को गलत साबित कर दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जिले के रोजा, नहिल, सिमरा और खेड़ा जैसे इलाकों के तालाब महज तीन-तीन एकड़ के हैं, फिर भी ये पक्षियों के बड़े झुंडों को आश्रय देने में पूरी तरह सक्षम हैं। यहाँ की सबसे बड़ी खूबी इनका उथला पानी और किनारों पर मिलने वाली प्राकृतिक वनस्पति है।
मछलियों और कीड़ों से भरपूर ये तालाब इन बत्तखों के लिए एक 'फ्री कैंटीन' (free-canteen) की तरह काम करते हैं। रिपोर्ट (report) बताती है कि अगर किसी जलाशय के पास मानवीय हस्तक्षेप कम हो और किनारे सुरक्षित हों, तो पक्षी वहां बड़े पैमाने पर इकट्ठा होते हैं। यह जानकारी हमारे लिए एक बड़ा सबक है: हमें पक्षियों को बचाने के लिए बड़े-बड़े जंगलों का इंतजार नहीं करना है, बल्कि अपने गाँव और शहर के छोटे-छोटे तालाबों को ही साफ-सुथरा और अतिक्रमण से मुक्त रखना है। ये नन्हें जलाशय ही असल में शाहजहांपुर की जैव-विविधता के असली हीरो हैं।
नदियाँ और पक्षी: गर्रा और खन्नौत की लहरें इन मेहमानों को रास्ता कैसे दिखाती हैं?
शाहजहांपुर का पक्षी-भूगोल केवल तालाबों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह जिले से होकर गुजरने वाली चार प्रमुख नदियों—गर्रा, खन्नौत, गोमती और रामगंगा—के इर्द-गिर्द बुना गया है। शोध बताते हैं कि ये नदियाँ पक्षियों के लिए एक 'प्राकृतिक गलियारे' या मैप (map) का काम करती हैं। जब प्रवासी पक्षी मध्य एशिया से उड़ान भरते हैं, तो वे अक्सर इन नदियों के बहाव को देखकर अपनी दिशा तय करते हैं। नदियों के किनारे बनी आर्द्रभूमियाँ उनके लिए किसी 'हाईवे रेस्ट-हाउस' की तरह होती हैं।
नदियों के किनारे जमा हुआ पानी और उनके आसपास की गीली मिट्टी इन पक्षियों को सुरक्षा और भोजन दोनों प्रदान करती है। थका देने वाली लंबी यात्रा के दौरान, गर्रा और खन्नौत के शांत किनारे ही इन परिंदों को फिर से उड़ान भरने की ताकत देते हैं। यही कारण है कि अगर हम अपनी नदियों को बचाएंगे, तो ये पक्षी भी सुरक्षित रहेंगे। इन नदियों और तालाबों का एक-दूसरे से जुड़ा होना ही शाहजहांपुर को पक्षियों का पसंदीदा केंद्र बनाता है।
कौन-कौन से दूसरे पक्षी इन तालाबों की महफिल सजाते हैं और उन्हें क्या पसंद है?
सिर्फ नॉर्दर्न पिनटेल ही नहीं, एविबेस (Avibase) की चेकलिस्ट (checklist) के अनुसार शाहजहांपुर के जलाशयों में पक्षियों की एक पूरी फौज उतरती है। यहाँ कॉमन टील (Common Teal), गार्गनी (Garganey) और कॉम्ब डक (Comb Duck) जैसे रंग-बिरंगे पक्षी भी बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं। इनमें से हर पक्षी की अपनी पसंद और आदतें होती हैं। कुछ बत्तखें पानी की सतह पर तैरते हुए छोटे कीड़े खाती हैं, तो कुछ गहरी डुबकी लगाकर अपनी दावत चुनती हैं।
इन मेहमानों के रुकने की अवधि इस बात पर निर्भर करती है कि तालाब के किनारे कितने शांत हैं। एविबेस के आंकड़े बताते हैं कि अगर तालाबों के पास पशुओं की चराई या शोर-शराबा कम हो, तो ये पक्षी वहां अपना डेरा बढ़ा देते हैं। गाँव के तालाबों के किनारे मौजूद घास और छोटे पेड़ इन पक्षियों को शिकारियों से छिपने में भी मदद करते हैं। इन तालाबों का हर कोना एक अलग कहानी कहता है और हर पक्षी का कलरव हमारे जिले की हवाओं में एक अलग मिठास घोलता है।
क्या हम इन तालाबों को सिर्फ "खाली जमीन" मानकर एक बड़ी गलती कर रहे हैं?
रामसर साइट्स और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) को कभी भी 'खाली जमीन' नहीं समझना चाहिए! ये जलाशय असल में 'धरती के गुर्दे' (Kidneys of the Earth) हैं, जो पानी को साफ करते हैं, भूजल स्तर को बढ़ाते हैं और बाढ़ जैसी आपदाओं को नियंत्रित करते हैं। शाहजहांपुर में बढ़ता अतिक्रमण और प्रदूषण इन जलाशयों को तेजी से सिकोड़ रहे हैं। कूड़ा-कचरा और फैक्ट्रियों का गंदा पानी इन मेहमानों के लिए जहर बन रहा है।
अगर हम इसी तरह अपने तालाबों को नजरअंदाज करते रहे, तो नॉर्दर्न पिनटेल जैसी दुर्लभ प्रजातियां यहाँ आना बंद कर देंगी। हमें यह समझना होगा कि ये तालाब सिर्फ पक्षियों का घर नहीं हैं, बल्कि ये हमारी अपनी सिंचाई व्यवस्था और भविष्य की जल सुरक्षा की भी चाबी हैं। इन जलस्रोतों को सहेजना ही वह एकमात्र तरीका है जिससे हम अपनी प्राकृतिक धरोहर को अगली पीढ़ी के लिए बचा सकते हैं।
हम इन विदेशी मेहमानों का स्वागत दानों से नहीं, बल्कि सुरक्षा से कैसे कर सकते हैं?
पक्षियों को बचाने के लिए केवल सरकारी आदेश काफी नहीं हैं, इसके लिए शाहजहांपुर के हर नागरिक को जागरूक होना होगा। लाइव हिंदुस्तान की रिपोर्ट में शाहजहांपुर के युवाओं द्वारा चलाए गए 'सकोरा अभियान' जैसे प्रयासों की तारीफ की गई है, जो पक्षियों के प्रति हमारी संवेदनशीलता को दर्शाता है। सर्दियों के इन मेहमानों के लिए हमें जलाशयों के किनारों पर शांत क्षेत्र (No-hunting Zones) बनाना, शोर-शराबे को कम करना और तालाबों में प्लास्टिक या कचरा न फेंकने जैसे कुछ व्यावहारिक कदम उठाने होंगे।
अगर हम इन वेटलैंड्स को एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करें, तो यह न केवल पक्षियों को सुरक्षा देगा, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते भी खोलेगा। शाहजहांपुर के ताल-तलैया हमारी वो दौलत हैं, जिसे बचाकर हम अपनी पहचान और गौरव दोनों को बढ़ा सकते हैं। अगली बार जब आप रोजा या नहिल के तालाब के पास से गुजरें, तो उन पक्षियों की उड़ान को गौर से देखिएगा—वे आपको सात समंदर पार की वो कहानियां सुनाएंगे, जो केवल शाहजहांपुर की इस पावन मिट्टी पर ही सुनी जा सकती हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2cq5dmrq
https://tinyurl.com/2cu7qpzd
https://tinyurl.com/2c2hzhv2
https://tinyurl.com/yrxpfvcj
https://tinyurl.com/2d7dhxls
https://tinyurl.com/27sofk23
https://tinyurl.com/2xqoj74j