क्या आप जानते हैं, शाहजहांपुर की नदियों में छिपा है बाघों का गुप्त रास्ता?

स्तनधारी
10-01-2026 09:12 AM
क्या आप जानते हैं, शाहजहांपुर की नदियों में छिपा है बाघों का गुप्त रास्ता?

शाहजहांपुर की नदियों और जंगलों का महत्व केवल पानी बहने तक सीमित नहीं है। असल में, ये पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (Pilibhit Tiger Reserve - PTR) के वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित गलियारे (Corridor) का काम करते हैं। आज हम जानेंगे कि कैसे शिकार के उस पुराने दौर से निकलकर हम बाघों और तेंदुओं को बचाने की एक नई राह पर चल रहे हैं, जहाँ इंसान और जानवर दोनों सुरक्षित रह सकें।

जब हम शाहजहांपुर की धरती को देखते हैं, तो हमारी नज़र सबसे पहले यहाँ की जीवनदायिनी नदियों और लहलहाते खेतों पर जाती है। लेकिन, बाहर से शांत दिखने वाले इन खेतों और नदी के किनारों का, जंगल के 'राजाओं' (बाघों) और इंसानों के साथ सदियों पुराना नाता रहा है। गर्रा, रामगंगा और गोमती जैसी नदियाँ न केवल यहाँ के भूगोल को आकार देती हैं, बल्कि ये उस पुराने रास्ते का भी हिस्सा रही हैं जहाँ कभी बाघ और तेंदुए बेख़ौफ़ घूमा करते थे। आज समय बदल चुका है; जिसे कभी 'शाही शिकार' माना जाता था, आज वह हमारी प्रकृति का सबसे नाज़ुक हिस्सा बन गया है। यह कहानी शाहजहांपुर की उसी ज़मीन की है, जो तराई के उन विशाल जीवों की गवाह है, जो आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
File:A male tiger (Panthera tigris tigris) hiding in the tall grass in Pilibhit tiger reserve.jpg

टाइगर रिज़र्व क्यों ख़ास है?
अक्सर जब पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (PTR) की बात होती है, तो लोगों को लगता है कि यह केवल पीलीभीत ज़िले तक ही सीमित है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इस रिज़र्व का एक अहम हिस्सा शाहजहांपुर ज़िले की सीमा में भी आता है। यही जुड़ाव शाहजहांपुर को भारत में बाघों और तेंदुओं (Big Cats) के संरक्षण के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण ज़िला बनाता है। इससे यह भी साबित होता है कि हमारा ज़िला सिर्फ़ खेती-किसानी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस विशाल कुदरती तंत्र का हिस्सा है जो नेपाल सीमा से लेकर भारतीय तराई के घने जंगलों तक फैला हुआ है। पीलीभीत टाइगर रिज़र्व से सटा होने के कारण, शाहजहांपुर का उत्तरी हिस्सा वन्यजीवों के आने-जाने के लिए एक मुख्य रास्ता बन गया है।

क्या नदियाँ कुदरती हाईवे हैं?
शाहजहांपुर की पहचान यहाँ की नदियाँ हैं, जो सदियों से वन्यजीवों के लिए 'कुदरती हाईवे' या गलियारों का काम कर रही हैं। ज़िले का भूगोल बताता है कि गर्रा नदी का बेसिन और यहाँ की उपजाऊ मिट्टी वन्यजीवों के लिए हमेशा से एक सुरक्षित ठिकाना रही है। पुराने समय में यहाँ घने जंगल और झाड़ियाँ थीं, जो बाघ और तेंदुओं को छिपने की जगह देती थीं। भले ही आज जंगलों की जगह खेतों ने ले ली है, लेकिन नदियों के किनारे आज भी वे रास्ते मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल ये जानवर एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए करते हैं। जानवर इंसानों की बनाई सरहदों या ज़िले की सीमाओं को नहीं समझते; वे तो बस भोजन और सुरक्षित ठिकाने की तलाश में चलते रहते हैं।

जैसे-जैसे इंसानी आबादी बढ़ी और जंगलों की जगह खेत बनते गए, जानवरों के लिए जगह कम होती गई। परिणामस्वरूप, अब 'मानव-वन्यजीव संघर्ष' (Conflict) की घटनाएं बढ़ गई हैं, जो यह साबित करती हैं कि जंगल और हमारी बस्तियां कितनी नज़दीक आ चुकी हैं। हाल ही में शाहजहांपुर में डर का माहौल तब बन गया, जब एक तेंदुआ भटककर गाँव के पास आ गया और एक गहरे कुएं में गिर गया। ख़बर फैलते ही ग्रामीणों में हड़कंप मच गया, जिससे बचाव कार्य मुश्किल हो गया था। लेकिन वन विभाग की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद उस तेंदुए को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। यह घटना बताती है कि जंगली जीव अब हमारे खेतों को भी अपना घर मानने लगे हैं।

क्या हम साथ रह सकते हैं?
शाहजहांपुर के गाँवों में तेंदुए या बाघ का दिखना केवल एक ख़बर नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि कुदरत का संतुलन बदल रहा है। पुराने ज़माने में जानवरों का शिकार करना वीरता मानी जाती थी, लेकिन आज असली बहादुरी उन्हें बचाने और सुरक्षित रखने में है। यह राह आसान नहीं है। जब बाघ गन्ने के खेत में छिपता है, तो वही खेत किसान के लिए रोज़ी-रोटी का ज़रिया न रहकर, डर और मौत का कारण बन जाता है। हमें अब साथ जीने के नए तरीक़े सीखने होंगे और यह समझना होगा कि ये जानवर हमारे दुश्मन नहीं, बल्कि इस धरती की अनमोल विरासत हैं। शाहजहांपुर का भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि हम अपनी नदियों और हरियाली को कैसे बचाते हैं, ताकि इंसान और जानवर दोनों सुरक्षित महसूस कर सकें।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/25mr4ucv
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/2ckurfp2
https://tinyurl.com/263suejv
https://tinyurl.com/ytb9ehje
https://tinyurl.com/28n9vlu9 

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