समय - सीमा 9
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शाहजहांपुर की नदियों और जंगलों का रिश्ता केवल पानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पीलीभीत टाइगर रिजर्व (Pilibhit Tiger Reserve) से जुड़े वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित रास्ते की तरह है । यह लेख बताता है कि कैसे शिकार के पुराने दौर से निकलकर आज हम बाघों और तेंदुओं को बचाने की एक नई राह पर चल रहे हैं, जहाँ इंसान और जानवर एक-दूसरे के साथ सुरक्षित रह सकें।
जब हम शाहजहांपुर की धरती को देखते हैं, तो हमारी नजर सबसे पहले यहाँ की जीवनदायिनी नदियों और लहलहाते खेतों पर जाती है। लेकिन, शांत दिखने वाले इन खेतों और नदी के किनारों के पीछे एक पुराना रिश्ता छिपा है—इंसान और जंगल के राजाओं का रिश्ता। गर्रा, रामगंगा और गोमती जैसी नदियाँ न केवल यहाँ के भूगोल को आकार देती हैं, बल्कि ये उस पुराने गलियारे का भी हिस्सा रही हैं जहाँ कभी बाघ और तेंदुए बेखौफ घूमा करते थे । आज समय पूरी तरह बदल चुका है और जिसे कभी 'शाही शिकार' माना जाता था, आज वह हमारी प्रकृति का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन गया है। यह कहानी शाहजहांपुर की उसी जमीन की है, जो तराई के उन बड़े जीवों की गवाह है, जो आज भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।![]()
टाइगर रिजर्व क्यों खास है?
अक्सर जब पीलीभीत टाइगर रिजर्व (PTR) की बात होती है, तो लोगों को लगता है कि यह केवल पीलीभीत जिले तक ही सीमित है। लेकिन हकीकत यह है कि इस महत्वपूर्ण हिस्से का एक छोटा भाग शाहजहांपुर जिले की सीमा में भी आता है । यह जुड़ाव शाहजहांपुर को सीधे तौर पर भारत के 'बिग कैट' (Big Cat) यानी बाघ और तेंदुओं के नक्शे पर मजबूती से स्थापित करता है। यह साबित करता है कि हमारा जिला केवल एक खेती-किसानी वाली जगह नहीं है, बल्कि उस विशाल कुदरती तंत्र का हिस्सा है जो नेपाल की सीमा से लेकर भारतीय तराई के घने जंगलों तक फैला हुआ है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व शाहजहांपुर के उत्तरी हिस्से को वन्यजीवों की आवाजाही के लिए एक बहुत जरूरी इलाका बनाता है।
क्या नदियाँ कुदरती हाईवे हैं?
शाहजहांपुर की असली पहचान यहाँ बहने वाली नदियाँ हैं, जो सदियों से वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक रास्तों या 'गलियारों' का काम करती आई हैं। जिले का भूगोल बताता है कि यहाँ की मिट्टी उपजाऊ है और गर्रा नदी के बेसिन वाला क्षेत्र वन्यजीवों के लिए हमेशा से एक सुरक्षित ठिकाना रहा है। पुराने समय में यहाँ घने वन और झाड़ियाँ हुआ करती थीं, जो बाघ और तेंदुओं जैसे बड़े जानवरों को छिपने की जगह देती थीं। भले ही आज वनों की जगह खेतों ने ले ली है, लेकिन नदियों के किनारे आज भी वे रास्ते बने हुए हैं जिनका इस्तेमाल ये जानवर एक जंगल से दूसरे जंगल जाने के लिए करते हैं। वन्यजीवों के लिए इंसानों द्वारा खींची गई जिले की सीमाएं कोई मतलब नहीं रखतीं, वे केवल अपने घर और भोजन की तलाश को समझते हैं ।
जैसे-जैसे इंसानी आबादी बढ़ी और जंगलों की जगह खेतों ने ली, जानवरों के लिए खाली जगह कम होती गई और टकराव बढ़ने लगा। इसका नतीजा अब 'मानव-वन्यजीव संघर्ष' के रूप में हमारे सामने आता है, जहाँ अक्सर ऐसी घटनाएं होती हैं जो बताती हैं कि हम और ये वन्यजीव कितने करीब रह रहे हैं । हाल ही में एक ऐसी ही घटना ने शाहजहांपुर को झकझोर दिया था, जब एक तेंदुआ भटककर गांव के पास पहुँच गया और एक गहरे कुएं में गिर गया। खबर फैलते ही ग्रामीणों में डर और हड़कंप मच गया, जिससे बचाव कार्य और भी मुश्किल हो गया था। लेकिन वन विभाग की टीम ने कड़ी मशक्कत के बाद उस तेंदुए को सुरक्षित बाहर निकाल लिया, जो यह साबित करता है कि जंगली जीव अब हमारे खेतों को भी अपना घर मानने लगे हैं।
क्या हम साथ रह सकते हैं?
शाहजहांपुर के गांवों में तेंदुए या बाघ का दिखना केवल एक खबर नहीं है, बल्कि यह एक संकेत है कि कुदरत का संतुलन बदल रहा है। पुराने समय में ताकत का प्रदर्शन शिकार के जरिए होता था, जहाँ जानवर को मारकर बहादुरी दिखाई जाती थी, लेकिन आज असली बहादुरी उन्हें बचाने में है । यह रास्ता आसान नहीं है, क्योंकि जब एक बाघ गन्ने के खेत में छिपता है, तो किसान के लिए वह खेत रोजी-रोटी का जरिया नहीं बल्कि मौत का साया बन जाता है। हमें अब साथ जीने के नए तरीके सीखने होंगे और यह समझना होगा कि ये जानवर हमारे दुश्मन नहीं, बल्कि इस धरती की अनमोल विरासत हैं। शाहजहांपुर का भविष्य इसी बात में है कि हम अपनी नदियों और हरियाली को कैसे बचाते हैं, ताकि इंसान और जानवर दोनों सुरक्षित महसूस कर सकें।
संदर्भ
https://tinyurl.com/25mr4ucv
https://tinyurl.com/22vx74ad
https://tinyurl.com/2ckurfp2
https://tinyurl.com/263suejv
https://tinyurl.com/ytb9ehje
https://tinyurl.com/28n9vlu9