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शाहजहांपुर ज़िला आज पारिस्थितिकी (Ecology) के एक ऐसे नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ इंसानी बस्तियां और कुदरत का आंगन एक-दूसरे से बिल्कुल सटे हुए हैं। अक्सर यहाँ ऐसे सवाल उठते हैं "रात को खेत में कौन सा जानवर आया था?" या "क्या पकड़ा गया मांस किसी संरक्षित जानवर का है?" सदियों से इन सवालों के जवाब केवल पंजों के निशानों (Pugmarks) या अंदाज़ पर टिके थे, लेकिन अब डीएनए (DNA) तकनीक ने जाँच का पूरा तरीक़ा ही बदल दिया है।
भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के 'वाइल्डलाइफ फोरेंसिक एंड कंजर्वेशन जेनेटिक्स सेल' के अनुसार, डीएनए अब एक ऐसा अकाट्य वैज्ञानिक सबूत बन गया है, जो जाँच को पूरी तरह निष्पक्ष और सटीक बनाता है। यह अदालतों में भी एक मज़बूत गवाह की तरह मान्य है।
चाहे जानवर का छोटा सा बाल हो, हड्डी का टुकड़ा, उसका मल (Scat) हो या फिर ज़ब्त किया गया पका हुआ मांस, हर चीज़ में उस जीव का 'जेनेटिक सिग्नेचर' (Genetic Signature) मौजूद रहता है। यह तकनीक अवैध शिकार (Poaching), अंगों की तस्करी और झूठे दावों की असलियत सामने लाने में बेहद कारगर है। फोरेंसिक विज्ञान अब वन्यजीव अपराधों की जाँच को एक नई दिशा दे रहा है, जहाँ अपराधी क़ानून की नज़रों से बच नहीं सकते। शाहजहांपुर के लिए यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि यहाँ जंगल और बस्तियों की नज़दीकी अपराध की आशंका को बढ़ा देती है।
शाहजहांपुर के भूगोल को समझना बेहद ज़रूरी है क्योंकि यह ज़िला सीधे तौर पर पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (Pilibhit Tiger Reserve) के पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा है। पीलीभीत टाइगर रिज़र्व केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार शाहजहांपुर के खुटार (Khutar) और अन्य महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों तक है। यह पूरा इलाक़ा 'तराई आर्क लैंडस्केप' (Terai Arc Landscape - TAL) का अहम हिस्सा है, जो नेपाल सीमा से लेकर भारतीय तराई के घने जंगलों तक फैला हुआ है।
यहाँ का नज़ारा अनोखा है “एक तरफ़ साल (Sal) के घने जंगल हैं और उनसे बिल्कुल सटे हुए गन्ने के खेत।” गन्ने के खेत ऊँची घास जैसे ही घने होते हैं, इसलिए बाघ इसे सुरक्षित प्राकृतिक आवरण (Cover) मानकर अक्सर यहीं अपना ठिकाना बना लेते हैं। इस मिले-जुले परिदृश्य में इंसानी आँखें अक्सर धोखा खा जाती हैं और दहशत के माहौल में जानवर की सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है। यहीं पर डीएनए तकनीक सबसे भरोसेमंद साथी बनकर उभरती है।
खुटार की घटना: क्यों ज़रूरी है सटीक पहचान?
डीएनए तकनीक की ज़रूरत हमें शाहजहांपुर की हालिया घटनाओं से और भी ज़्यादा महसूस होती है। उदाहरण के लिए, सितंबर 2025 में शाहजहांपुर के खुटार इलाक़े में बाघ के हमले जैसी घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में दहशत फैला दी थी। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या हमला करने वाला वही जानवर है जो पहले देखा गया था, या कोई नया शिकारी इलाक़े में दाखिल हुआ है?
घटनास्थल से मिले बाल, लार या पंजों के निशानों की डीएनए जाँच से यह पुष्टि हो जाती है कि हमलावर कौन था। यह सटीक पहचान न केवल लोगों का डर कम करती है, बल्कि सरकारी तंत्र के लिए भी मददगार साबित होती है। ख़ासकर मुआवज़े (Compensation) के मामलों में, जहाँ अक्सर यह विवाद होता है कि हमला किस जानवर ने किया। डीएनए रिपोर्ट पूरी पारदर्शिता लाती है, जिससे पीड़ित परिवारों को सही समय पर मुआवज़ा मिल सके। साथ ही, प्रशासन यह तय कर पाता है कि जानवर को 'आदमखोर' घोषित करना है या उसे बेहोश (Tranquilize) करके सुरक्षित रेस्क्यू करना है।
डीएनए बारकोडिंग: एक बाल से सच्चाई का पता कैसे चलता है?
शायद आप सोचें कि वैज्ञानिक यह पहचान कैसे करते हैं? इसका जवाब है—'डीएनए बारकोडिंग' (DNA Barcoding)। जिस तरह सुपरमार्केट (Supermarket) में हर सामान पर एक विशेष बारकोड होता है, ठीक उसी तरह हर जानवर के डीएनए में कुछ ख़ास 'जीन मार्कर्स' (Gene Markers) होते हैं। भारतीय स्तनधारियों की पहचान के लिए यह तकनीक वरदान साबित हुई है।
भले ही नमूना बहुत पुराना हो, सड़ा-गला हो या पकाया गया मांस ही क्यों न हो, डीएनए बारकोडिंग से प्रजाति का पता लगाया जा सकता है। इतना ही नहीं, माइक्रो-सैटेलाइट्स (Microsatellites) जैसी तकनीकों से यह भी पता चल जाता है कि वह व्यक्तिगत रूप से कौन सा जानवर (Individual ID) है। इससे पुलिस और वन विभाग को ठोस सबूत मिलते हैं और शिकारी "अज्ञात जानवर" होने का बहाना बनाकर क़ानून से नहीं बच पाते।
वन्यजीवों की सुरक्षा में 'फोरेंसिक विज्ञान' और 'संरक्षण जेनेटिक्स' (Conservation Genetics) दोनों की भूमिका अहम है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की लैब इन दोनों क्षेत्रों में अग्रणी है।
फोरेंसिक विज्ञान: इसका मुख्य काम अपराधों की जाँच करना और कोर्ट के लिए सबूत जुटाना है।
संरक्षण जेनेटिक्स: इसका काम पूरी आबादी (Population) की निगरानी करना है।
संरक्षण जेनेटिक्स से यह पता चलता है कि पीलीभीत और शाहजहांपुर के बाघों में आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) कितनी है और क्या वे सुरक्षित रूप से एक जंगल से दूसरे जंगल जा पा रहे हैं। यह जानकारी 'मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन' (MEE-TR) जैसे सरकारी आंकलनों के लिए बेहद ज़रूरी है। जब हमें पता होता है कि जानवर किस रास्ते (Corridor) का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो गश्त (Patrolling) को और भी प्रभावी और तेज़ बनाया जा सकता है।
अंत में, डीएनए तकनीक शाहजहांपुर में प्रशासन और आम जनता दोनों की सुरक्षा का एक नया आधार बनकर उभरी है। यह तकनीक बेज़ुबान जानवरों की तरफ़ से अदालतों में एक मज़बूत गवाही का काम करती है और वह सच सामने लाती है जो अक्सर अंधेरे या घने जंगलों में छिप जाता है।
शाहजहांपुर जैसे संवेदनशील ज़िले में, जहाँ खेत और जंगल एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, विज्ञान और तकनीक के सहारे ही सह-अस्तित्व (Coexistence) संभव है। जब हमारे पास सटीक डेटा होगा, तो हम न केवल बाघों को अवैध शिकार से बचा पाएंगे, बल्कि इंसानी जानों की हिफ़ाज़त भी बेहतर तरीक़े से कर सकेंगे। यही वह रास्ता है जिससे शाहजहांपुर की प्राकृतिक विरासत और यहाँ के लोगों का भविष्य, दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2cduusoq
https://tinyurl.com/2b6qdvvd
https://tinyurl.com/28grueaq
https://tinyurl.com/2ykhfqtn
https://tinyurl.com/2cunedep
https://tinyurl.com/2cej9xq7