समय - सीमा 9
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शाहजहांपुर जिला आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जिसे हम 'लिविंग वाइल्डलाइफ एज' (Living Wildlife Edge) कह सकते हैं, जहाँ इंसान की बस्तियां और कुदरत का आंगन आपस में गूंथे हुए हैं। यहाँ अक्सर ऐसे सवाल उठते हैं—"रात को खेत में कौन सा जानवर आया था?", "क्या पकड़ा गया मांस किसी संरक्षित जानवर का है?"। सदियों से इन सवालों के जवाब केवल पैरों के निशानों (Pugmarks) या अंदाजों पर टिके थे, लेकिन अब डीएनए (DNA) तकनीक ने जांच का पूरा तरीका ही बदल दिया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के 'वाइल्डलाइफ फोरेंसिक एंड कंजर्वेशन जेनेटिक्स सेल' (Wildlife Forensic and Conservation Genetics Cell) के अनुसार, डीएनए (DNA) अब एक ऐसा शक्तिशाली गवाह बन गया है जो कभी झूठ नहीं बोलता और अदालतों में ठोस सबूत के तौर पर मान्य है।
चाहे वह जानवर का एक छोटा सा बाल हो, हड्डी का टुकड़ा हो, उसका मल (Scat) हो या फिर जब्त किया गया पका हुआ मांस—हर चीज में एक 'जेनेटिक सिग्नेचर' (genetic signature) छिपा होता है। यह तकनीक अवैध शिकार (Poaching), अंगों के अवैध व्यापार और झूठे दावों का पर्दाफाश करने में पूरी तरह सक्षम है। यह फोरेंसिक विज्ञान (forensic Science) अब वन्यजीव अपराधों की जांच को एक ऐसी नई दिशा दे रहा है, जहाँ अपराधी किसी भी सूरत में कानून की पकड़ से बच नहीं सकते। शाहजहांपुर के परिप्रेक्ष्य में यह इसलिए जरूरी है क्योंकि यहाँ जंगल और इंसानी बस्तियां एक-दूसरे के बेहद करीब हैं, जिससे अपराध की गुंजाइश बढ़ जाती है।
शाहजहांपुर और पीलीभीत टाइगर रिजर्व का भौगोलिक जुड़ाव क्यों अहम है?
शाहजहांपुर के भूगोल को समझना इसकी अहमियत को जानने के लिए बहुत जरूरी है क्योंकि यह जिला सीधे तौर पर पीलीभीत टाइगर रिजर्व (Pilibhit Tiger Reserve) के पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा हुआ है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व का विस्तार केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शाहजहांपुर जिले के खुटार और अन्य महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों तक फैला हुआ है। यह पूरा इलाका 'तराई आर्क लैंडस्केप' (Terai Arc Landscape - TAL) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो नेपाल की सीमा से लेकर भारतीय तराई के घने जंगलों तक फैला है।
यहाँ का दृश्य बड़ा ही अनोखा है—एक तरफ साल के घने जंगल हैं और उनके ठीक किनारे लगे गन्ने के लहलहाते खेत। अक्सर बाघ इन गन्ने के खेतों को ऊँची घास समझकर वहां अपना ठिकाना बना लेते हैं और शिकार की तलाश में बाहर निकलते हैं। इस मिश्रित परिदृश्य (Landscape Mosaic) में आँखों देखी गवाही अक्सर गलत साबित हो सकती है, क्योंकि दहशत में इंसान अक्सर जानवरों की पहचान करने में गलती कर देता है। यहीं पर डीएनए (DNA) की भूमिका सबसे अहम हो जाती है, जो वैज्ञानिक आधार पर यह तय करती है कि उस विशिष्ट क्षेत्र में कौन सा जानवर मौजूद था।
खुटार की हालिया घटनाओं ने डीएनए आधारित पहचान को क्यों जरूरी बना दिया है?
डीएनए तकनीक की जरूरत हमें शाहजहांपुर की हालिया दुखद घटनाओं से और भी ज्यादा महसूस होती है। उदाहरण के तौर पर, सितंबर 2025 में शाहजहांपुर के खुटार इलाके में एक ग्रामीण पर बाघ द्वारा हमले जैसी घटनाओं ने पूरे क्षेत्र में दहशत पैदा कर दी थी। ऐसी स्थिति में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या हमला करने वाला वही जानवर है जो पहले भी देखा गया था, या कोई नया शिकारी इलाके में दाखिल हुआ है? घटनास्थल से मिले बालों, लार या पंजों के निशानों से लिए गए नमूनों की डीएनए जांच से यह पुष्टि हो सकती है कि हमलावर कौन था।
यह सटीक पहचान न केवल लोगों का डर कम करने में मदद करती है, बल्कि सरकारी तंत्र के लिए भी बहुत सहायक होती है। मुआवजे के मामलों में अक्सर यह विवाद होता है कि हमला किस जानवर ने किया था। डीएनए आधारित सबूत इस प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता लाते हैं, जिससे पीड़ित परिवारों को सही और समय पर मुआवजा मिल सके। इसके अलावा, इससे प्रशासन को यह तय करने में मदद मिलती है कि क्या उस जानवर को 'आदमखोर' घोषित करने या उसे ट्रेंकुलाइज (Tranquilize) करके रेस्क्यू (rescue) करने की जरूरत है।
डीएनए 'बारकोडिंग' कैसे एक छोटे से बाल से भी सच उगलवा सकती है?
अब आपके मन में यह सवाल उठ सकता है कि वैज्ञानिक यह कैसे बता देते हैं कि कोई नमूना बाघ का है या तेंदुए का? इसका जवाब है—'डीएनए बारकोडिंग' (DNA Barcoding)। जिस तरह सुपरमार्केट (Supermarket) में हर सामान पर एक विशेष बारकोड होता है, ठीक उसी तरह हर जानवर के डीएनए में कुछ विशेष 'जीन मार्कर्स' (Gene Markers) होते हैं। भारतीय स्तनधारियों की पहचान के लिए यह तकनीक एक वरदान साबित हुई है।
अगर नमूना बहुत छोटा है, सड़ा-गला है या यहाँ तक कि अगर वह पका हुआ मांस है, तब भी डीएनए बारकोडिंग (DNA Barcoding) से उसकी प्रजाति का पता लगाया जा सकता है। माइक्रो-सैटेलाइट्स (Microsatellites) जैसी तकनीकों से न केवल प्रजाति, बल्कि यह भी पता लगाया जा सकता है कि वह व्यक्तिगत रूप से कौन सा जानवर है। यह तकनीक प्रवर्तन एजेंसियों (जैसे पुलिस और वन विभाग) को इतनी मजबूती देती है कि "अज्ञात जानवर" होने का संदेह खत्म हो जाता है, जिसका फायदा अक्सर शिकारी कानून की पकड़ से बचने के लिए उठाते हैं।
फोरेंसिक विज्ञान और संरक्षण जेनेटिक्स में क्या अंतर है और यह क्यों मायने रखता है?
वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए 'फोरेंसिक विज्ञान' और 'संरक्षण जेनेटिक्स' (Conservation Genetics) दोनों का अपना-अपना महत्व है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की लैब इन दोनों ही क्षेत्रों में अग्रणी भूमिका निभा रही है। जहाँ एक तरफ फोरेंसिक विज्ञान का मुख्य काम अपराधों की जांच करना और कोर्ट के लिए सबूत जुटाना है, वहीं संरक्षण जेनेटिक्स का काम पूरी आबादी (Population) की निगरानी करना है।
संरक्षण जेनेटिक्स (Conservation Genetics) की मदद से यह पता लगाया जाता है कि पीलीभीत और शाहजहांपुर के जंगलों में बाघों की आनुवंशिक विविधता कितनी है और क्या वे सुरक्षित तरीके से एक जंगल से दूसरे जंगल जा पा रहे हैं। यह जानकारी 'मैनेजमेंट इफेक्टिवनेस इवैल्यूएशन' ((Management Effectiveness Evaluation (MEE))MEE-TR) जैसे सरकारी आंकलनों के लिए बहुत जरूरी है, जिससे यह तय होता है कि टाइगर रिजर्व का प्रबंधन कितना सफल रहा है। जब हमें पता होता है कि कौन सा जानवर किस रास्ते (Corridor) का इस्तेमाल कर रहा है, तो गश्त (Patrols) को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
क्या डीएनए तकनीक प्रशासन और आम आदमी के लिए सुरक्षा का नया कवच है?
अंत में, डीएनए तकनीक शाहजहांपुर में प्रशासन और आम आदमी दोनों के लिए सुरक्षा का एक नया और आधुनिक कवच बनकर उभरी है। यह मूक जानवरों को एक ऐसी 'आवाज' देती है जिसे अदालतें सुन सकती हैं, और इंसानों को वह सच दिखाती है जो अक्सर घने जंगलों या रात के अंधेरे में छिप जाता है। बेहतर डीएनए आधारित निगरानी न केवल गश्त करने वाली टीमों का मार्गदर्शन करती है, बल्कि यह गलियारों के संरक्षण (Corridor Protection) के लिए भी ठोस डेटा मुहैया कराती है।
शाहजहांपुर जैसे संवेदनशील जिले के लिए, जहाँ खेती और जंगल एक-दूसरे में समाए हुए हैं, वैज्ञानिक सोच और तकनीक का इस्तेमाल ही सह-अस्तित्व (Coexistence) का एकमात्र सुरक्षित रास्ता है। जब हमारे पास सटीक डेटा (data) होगा, तो हम न केवल बाघों को अवैध शिकार से बचा पाएंगे, बल्कि इंसानी जानों की सुरक्षा भी बेहतर तरीके से कर सकेंगे। यही वह तरीका है जिससे शाहजहांपुर की प्राकृतिक विरासत और यहाँ के लोगों का भविष्य, दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2cduusoq
https://tinyurl.com/2b6qdvvd
https://tinyurl.com/28grueaq
https://tinyurl.com/2ykhfqtn
https://tinyurl.com/2cunedep
https://tinyurl.com/2cej9xq7