माइक्रोस्कोप के नीचे शाहजहांपुर: जानिए कैसे कोशिकाओं में कैद है करोड़ों सालों का इतिहास?

कोशिका प्रकार के अनुसार वर्गीकरण
10-01-2026 09:11 AM
माइक्रोस्कोप के नीचे शाहजहांपुर: जानिए कैसे कोशिकाओं में कैद है करोड़ों सालों का इतिहास?

हम अक्सर अपने आसपास के जानवरों को उनके आकार, रंग-रूप या चाल-चलन से पहचानते हैं। हम जानते हैं कि सारस की गर्दन लंबी होती है और बाघ की दहाड़ दूर से सुनी जा सकती है। लेकिन, अगर हम शाहजहांपुर के जंगलों और आर्द्रभूमि को सिर्फ़ सरसरी तौर पर न देखकर, कोशिकाओं के नज़रिए से देखें, तो पूरी तस्वीर बदल जाती है और कहीं ज़्यादा गहरी हो जाती है। 

आधुनिक विज्ञान का स्पष्ट मानना है कि हर जानवर, चाहे वह गन्ने के खेतों के पास घूमता बाघ हो या शाहजहांपुर के तालाबों में तैरता कोई छोटा पक्षी, ख़ास तरह की कोशिकाओं से बना होता है। इन कोशिकाओं के अपने-अपने काम, पहचान और बनावट होती है। वैज्ञानिक अब इन कोशिकाओं को नाम दे रहे हैं, उनकी आपस में तुलना कर रहे हैं और समय के साथ इन्हें ट्रैक भी कर रहे हैं।  

कोशिकाओं की यह ‘डिक्शनरी’ इतनी ज़रूरी क्यों है?
एक समय था जब शरीर के अंगों को केवल मांस और हड्डियों के ढांचे के रूप में देखा जाता था। धीरे-धीरे पता चला कि हर अंग लाखों-करोड़ों कोशिकाओं से मिलकर बना है, और हर कोशिका का अपना अलग काम है। इस दिशा में 'सेल ओन्टोलॉजी' (Cell Ontology) ने एक क्रांतिकारी बदलाव किया है। इसे आप कोशिकाओं की वैज्ञानिक 'डिक्शनरी' (Dictionary) मान सकते हैं, जिसका काम यह तय करना है कि किस तरह की कोशिका को दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में एक ही नाम और एक ही परिभाषा से पुकारा जाए।

पहले अलग-अलग शोधकर्ता एक ही तरह की कोशिका के लिए अलग-अलग नाम इस्तेमाल कर देते थे, जिससे काफ़ी भ्रम पैदा होता था। सेल ओन्टोलॉजी ने इन सभी बिखरे नामों को जोड़कर एक साझा भाषा दी। अब ऊतकों (Tissues) का ऐसा विस्तृत नक्शा तैयार किया जा सकता है जिसे आसानी से पढ़ा और समझा जा सके, उनकी तुलना की जा सकती है और दुनिया के किसी भी कोने से आई स्टडी को दूसरी स्टडी से जोड़ा जा सकता है। शाहजहांपुर के लिए इसका मतलब यह है कि यहाँ के पक्षी, मछलियाँ या बाघ’ जिनकी कोशिकाएँ कहीं दूर किसी अंतरराष्ट्रीय लैब (International Lab) में भी पढ़ी जाएँगी, उन्हें उसी वैज्ञानिक भाषा और मानकों (Standards) के आधार पर परखा जाएगा, जिनका इस्तेमाल दुनिया भर के वैज्ञानिक कर रहे हैं।

सिंगल-सेल विज्ञान ने कौन से नए दरवाज़े खोले हैं?
पिछले कुछ वर्षों में जीव विज्ञान में एक और बड़ी क्रांति आई है, 'सिंगल-सेल ओमिक्स' (Single-cell omics)। पहले किसी जानवर के किसी अंग (जैसे जिगर, फेफड़े या दिमाग) को एक साथ पढ़ा जाता था, और यह मान लिया जाता था कि पूरे अंग की औसत तस्वीर ही काफ़ी है। अब तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि एक-एक कोशिका को अलग करके देखा और समझा जा सकता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे पहले हम पूरे जंगल को सिर्फ़ ऊपर से देखते थे, लेकिन अब हम हर पेड़ की अलग पहचान और उसकी कहानी को नज़दीक से समझ रहे हैं।

इस बदलाव के साथ एक नई चुनौती भी सामने आई 'नामकरण का विवाद' (Nomenclature dispute)। कौन सी कोशिका को क्या कहा जाए? किसे नया प्रकार माना जाए और किसे पुराने प्रकार का ही एक रूप? 'ह्यूमन सेल एटलस' (Human Cell Atlas) जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रयासों ने कोशिका प्रकारों के लिए औपचारिक लेबल (Formal labels) और मानक तैयार किए, ताकि नामों को लेकर होने वाले विवाद कम हों और वैज्ञानिक एक साझा ढांचे के भीतर काम कर सकें।

जब अलग-अलग प्रजातियों जैसे इंसान, चूहा, या कोई जंगली जानवर के 'सेल एटलस' को एक साथ रखा जाता है, तो विकास (Evolution) की कहानी भी साफ़ दिखने लगती है। कुछ 'संरक्षित कोशिका परिवार' (Conserved cell families) ऐसे मिलते हैं जो कई प्रजातियों में लगभग समान रहते हैं। इसका मतलब यह है कि बाघ की कुछ कोशिकाएँ, इंसानों या अन्य जीवों की कोशिकाओं के साथ एक प्राचीन विरासत साझा करती हैं। यह समझ न सिर्फ़ विज्ञान के लिए, बल्कि संरक्षण के लिए भी अहम है, क्योंकि इससे यह पता चल सकता है कि कौन सी कोशिका किस तरह के प्रदूषण, बीमारी या जलवायु परिवर्तन से सबसे ज़्यादा प्रभावित होती है।

शाहजहांपुर के तालाब, खेत और कोशिकाएँ आपस में कैसे जुड़ते हैं?
आइए, अब इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण को शाहजहांपुर के धरातल पर उतारते हैं। ज़िले का परिदृश्य किसी वैज्ञानिक नक़्शे जैसा ही जटिल है; एक तरफ़ आर्द्रभूमियाँ (Wetlands), दूसरी तरफ़ गेंहू, धान और गन्ने के खेत; बीच-बीच में छोटे-छोटे तालाब और नालों का जाल। एक पारिस्थितिकीय मूल्यांकन में यहाँ के वेटलैंड्स और वॉटरबर्ड्स (Waterbirds/जलपक्षियों) की समृद्ध विविधता दर्ज की गई है, साथ ही यह भी बताया गया है कि इन आवासों पर अतिक्रमण, प्रदूषण और मानवीय दबाव कितनी तेज़ी से बढ़ रहा है।

शाहजहांपुर 'रोहिलखंड' के उस बड़े परिदृश्य का हिस्सा है जहाँ बाघों और अन्य बड़े स्तनधारियों का आना-जाना लगा रहता है। पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (Pilibhit Tiger Reserve) से सटा होने की वजह से यह इलाका एक बड़े संरक्षण नेटवर्क से जुड़ जाता है – यानी यहाँ के खेत, जंगल और नदी किनारे बाघों, हिरणों और दूसरे जंगली जानवरों के लिए एक अहम गलियारा (Corridor) बनाते हैं।

यही वह मोड़ है जहाँ 'फील्ड इकोलॉजी' (Field Ecology) और 'सेल बायोलॉजी' (Cell Biology) का संगम ज़रूरी हो जाता है। अब तक हम इन वेटलैंड्स और खेतों को दूर से देखते रहे हैं – कितनी प्रजातियाँ आईं, कितने पक्षी दिखे, कहाँ पर बाघ के पगमार्क मिले। अब समय आ रहा है कि इन्हीं जगहों से कोशिका-स्तर के संकेत भी पढ़े जाएँ।

क्या माइक्रोस्कोप (Microscope) से शाहजहांपुर के जंगलों की नब्ज़ टटोली जा सकती है?
कल्पना कीजिए कि वन विभाग या शोधकर्ता शाहजहांपुर में वन्यजीवों की निगरानी सिर्फ़ दूरबीन या कैमरा ट्रैप (Camera trap) से नहीं, बल्कि माइक्रोस्कोप (Microscope) और सेल (Cell) विश्लेषण से भी कर रहे हैं। नियमित रेस्क्यू (बचाव कार्य), रास्ते में मिले गिरे हुए पंख, जानवरों का मल (Scat), या तालाब और नदी के पानी से लिए गए छोटे-छोटे नमूने – ये सब मिलकर एक बड़े डेटा सेट का हिस्सा बन सकते हैं। आधुनिक विज्ञान इन 'नॉन-इनवेसिव' (Non-invasive - बिना जीव को नुकसान पहुँचाए लिए गए) नमूनों से भी कोशिका से जुड़ी जानकारी निकाल सकता है – कौन सी कोशिकाएँ सक्रिय हैं, कौन सी तनाव में हैं, और किन पर बीमारी या प्रदूषण का असर दिखने लगा है।

अगर शाहजहांपुर के लिए एक 'कोशिका-आधारित डेटाबेस' (Database) तैयार हो सके, तो यह केवल यह नहीं बताएगा कि “यहाँ एक बाघ है” या “यहाँ इतने जलपक्षी हैं”, बल्कि यह भी बता सकेगा कि यह बाघ कितना स्वस्थ है, उसके शरीर में किसी संक्रमण या कुपोषण के संकेत तो नहीं हैं, या कोई पक्षी प्रजाति लगातार प्रदूषण के दबाव में तो नहीं जी रही। यह जानकारी बीमारी के जोखिम (Disease risk) को पहले से भाँपने, प्रदूषण के असर को समझने और मानव–वन्यजीव संघर्ष की जड़ तक जाने में मदद कर सकती है – उदाहरण के लिए, कोई जानवर बार-बार गाँव के पास क्यों दिख रहा है? क्या उसके प्राकृतिक आवास में कोई ऐसी अदृश्य समस्या बढ़ रही है जिसे हम देख नहीं पा रहे?

संदर्भ 
https://tinyurl.com/22wlshm9
https://tinyurl.com/2c2l7bsz
https://tinyurl.com/2c4pvk7w
https://tinyurl.com/22bp6zgl
https://tinyurl.com/2d7dhxls
https://tinyurl.com/ytb9ehje 

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