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हम अक्सर अपने आसपास के जानवरों को उनके आकार, रंग-रूप या चाल-चलन से पहचानते हैं। हम जानते हैं कि सारस की गर्दन लंबी होती है और बाघ की दहाड़ दूर से सुनी जा सकती है। लेकिन अगर शाहजहांपुर के जंगलों और वेटलैंड (wetland) की कहानियों को थोड़ी देर के लिए आंखों से नहीं, बल्कि कोशिकाओं की नज़र से देखें तो तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है और कहीं ज्यादा गहरी हो जाती है। यही नज़रिया है, 'कोशिका के प्रकार' (Cell Type) का, जो बताता है कि हर जीव की असली कहानी उसकी सबसे छोटी इकाई के भीतर लिखी होती है।
क्या हम जानवरों को सिर्फ बाहर से पहचानते हैं?
आज विज्ञान साफ कह रहा है कि हर जानवर, चाहे वह गन्ने के खेतों के पास घूमता बाघ हो या शाहजहांपुर के तालाबों में तैरता कोई छोटा पक्षी खास तरह की कोशिकाओं से बना होता है। इन कोशिकाओं के अपने-अपने काम, पहचान और बनावट होती है। वैज्ञानिक अब इन कोशिकाओं को नाम दे रहे हैं, उनकी आपस में तुलना कर रहे हैं और समय के साथ इन्हें ट्रैक भी कर रहे हैं। इसे एक तरह से 'फौना एनिमल सेल टाइप' (Fauna Animal Cell Type) कहा जा रहा है, यानी जानवरों की दुनिया में किस-किस तरह की कोशिकाएँ पाई जाती हैं, उसकी सूची और समझ।
इस लेख में कोशिश यह है कि शाहजहांपुर के वेटलैंड्स (आर्द्रभूमि) और खेतों को इसी 'कोशिका वाले लेंस' से देखा जाए, जहाँ एक तरफ हमारे जिले की मिट्टी, नदियाँ और पक्षी हैं, और दूसरी तरफ अत्याधुनिक विज्ञान, जो इन्हीं जीवों को सूक्ष्म स्तर पर पढ़ना सीख रहा है।
कोशिकाओं की यह ‘डिक्शनरी’ इतनी जरूरी क्यों है?
एक समय था जब शरीर के अंगों को बस मांस के टुकड़ों की तरह देखा जाता था। धीरे-धीरे पता चला कि हर अंग लाखों-करोड़ों कोशिकाओं से मिलकर बना है, और हर कोशिका का अपना अलग काम है। यहाँ पर 'सेल ओन्टोलॉजी' (Cell Ontology) ने बड़ा बदलाव लाया। इसे आप कोशिकाओं की वैज्ञानिक 'डिक्शनरी' (dictionary) मान सकते हैं, जिसका काम यह तय करना है कि किस तरह की कोशिका को दुनिया भर की प्रयोगशालाओं में एक ही नाम और एक ही परिभाषा से पुकारा जाए।
पहले अलग-अलग शोधकर्ता एक ही तरह की कोशिका के लिए अलग-अलग नाम इस्तेमाल कर देते थे, जिससे काफी भ्रम पैदा होता था। सेल ओन्टोलॉजी ने इन सभी बिखरे नामों को जोड़कर एक साझा भाषा दी। अब ऊतकों (tissues) को पढ़ने लायक नक्शों में बदला जा सकता है, उनकी तुलना की जा सकती है और दुनिया के किसी भी कोने से आई स्टडी को दूसरी स्टडी से जोड़ा जा सकता है। शाहजहांपुर के लिए इसका मतलब यह है कि यहाँ के पक्षी, मछलियाँ या बाघ – जिनकी कोशिकाएँ कहीं दूर किसी अंतरराष्ट्रीय लैब (International Lab) में भी पढ़ी जाएँगी, उन्हें वही भाषा, वही मानक मिलेंगे जो दुनिया भर के वैज्ञानिक इस्तेमाल कर रहे हैं।
सिंगल-सेल विज्ञान से क्या नया खुला?
पिछले कुछ वर्षों में जीव विज्ञान में एक और बड़ी क्रांति आई है, 'सिंगल-सेल ओमिक्स' (Single-cell omics)। पहले किसी जानवर के किसी अंग (जैसे जिगर, फेफड़े या दिमाग) को एक साथ पढ़ा जाता था, और यह मान लिया जाता था कि पूरे अंग की औसत तस्वीर ही काफी है। अब तकनीक इतनी आगे बढ़ गई है कि एक-एक कोशिका को अलग करके देखा और समझा जा सकता है। यह वैसा ही है जैसे पहले हम पूरा जंगल सिर्फ ऊपर से देखते थे, पर अब हर पेड़ की अलग पहचान, अलग कहानी हमारे सामने है।
इसी बदलाव के साथ एक नई समस्या भी खड़ी हुई “नामों का झगड़ा।” कौन सी कोशिका को क्या कहा जाए? किसे नया प्रकार माना जाए और किसे पुराने प्रकार का ही एक रूप? 'ह्यूमन सेल एटलस' (Human Cell Atlas) जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रयासों ने कोशिका प्रकारों के लिए औपचारिक लेबल (Formal labels) और मानक तैयार किए, ताकि नामों को लेकर होने वाले विवाद कम हों और वैज्ञानिक एक साझा ढांचे के भीतर काम कर सकें।
जब अलग-अलग प्रजातियों जैसे इंसान, चूहा, या कोई जंगली जानवर के 'सेल एटलस' को एक साथ रखा जाता है, तो विकास (Evolution) की कहानी भी साफ दिखने लगती है। कुछ 'संरक्षित कोशिका परिवार' (Conserved cell families) ऐसे मिलते हैं जो कई प्रजातियों में लगभग समान रहते हैं। इसका मतलब यह है कि बाघ की कुछ कोशिकाएँ, इंसान या किसी और जीव की कोशिकाओं से पुरानी साझा विरासत बाँटती हैं। यह समझ न सिर्फ विज्ञान के लिए, बल्कि संरक्षण के लिए भी अहम है, क्योंकि इससे यह पता चल सकता है कि कौन सी कोशिका किस तरह के प्रदूषण, बीमारी या जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित होती है।
शाहजहांपुर के तालाब, खेत और कोशिकाएँ आपस में कैसे जुड़ते हैं?
अब ज़ूम आउट कर के फिर शाहजहांपुर पर लौटते हैं। जिले का परिदृश्य किसी वैज्ञानिक नक्शे जैसा ही जटिल एक तरफ आर्द्रभूमियाँ (Wetlands), दूसरी तरफ गेंहू, धान और गन्ने के खेत; बीच-बीच में छोटे-छोटे तालाब और नालों का जाल। एक पारिस्थितिकीय मूल्यांकन में यहाँ के वेटलैंड्स और वॉटरबर्ड्स (waterbodies) (जलपक्षियों) की समृद्ध विविधता दर्ज की गई है, साथ ही यह भी बताया गया है कि इन आवासों पर अतिक्रमण, प्रदूषण और मानवीय दबाव कितनी तेजी से बढ़ रहा है।
शाहजहांपुर 'रोहिलखंड' के उस बड़े परिदृश्य का हिस्सा है जहाँ बाघों और अन्य बड़े स्तनधारियों का आना-जाना लगा रहता है। पीलीभीत टाइगर रिजर्व (Pilibhit Tiger Reserve) से सटा होने की वजह से यह इलाका एक बड़े संरक्षण नेटवर्क से जुड़ जाता है – यानी यहाँ के खेत, जंगल और नदी किनारे बाघों, हिरणों और दूसरे जंगली जानवरों के लिए एक अहम गलियारा (Corridor) बनाते हैं।
यही वह जगह है जहाँ 'फील्ड इकोलॉजी' (field ecology) और 'सेल बायोलॉजी' को जोड़ने की जरूरत महसूस होती है। अब तक हम इन वेटलैंड्स और खेतों को दूर से देखते रहे हैं – कितनी प्रजातियाँ आईं, कितने पक्षी दिखे, कहाँ पर बाघ के पगमार्क मिले। अब समय आ रहा है कि इन्हीं जगहों से कोशिका-स्तर के संकेत भी पढ़े जाएँ।
क्या माइक्रोस्कोप से शाहजहांपुर के जंगल की नब्ज़ समझी जा सकती है?
अब बड़ा सवाल यह है कि शाहजहांपुर के खेतों और वेटलैंड्स का इन सूक्ष्म कोशिकाओं से आखिर क्या लेना-देना है? इसका जवाब है – 'सेल-टू-हैबिटेट' (Cell-to-Habitat) बेसलाइन, यानी कोशिका से लेकर पूरे आवास (Habitat) तक एक जुड़ी हुई तस्वीर तैयार करना।
कल्पना कीजिए कि वन विभाग या शोधकर्ता शाहजहांपुर में वन्यजीवों की निगरानी सिर्फ दूरबीन या कैमरा ट्रैप (camera trap) से नहीं, बल्कि माइक्रोस्कोप (microscope) और सेल (cell) विश्लेषण से भी कर रहे हैं। नियमित रेस्क्यू (बचाव कार्य), रास्ते में मिले गिरे हुए पंख, जानवरों का मल (Scat), या तालाब और नदी के पानी से लिए गए छोटे-छोटे नमूने – ये सब मिलकर एक बड़े डेटा सेट का हिस्सा बन सकते हैं। मौजूदा विज्ञान इन 'गैर-आक्रामक' (Non-invasive) नमूनों से भी कोशिका से जुड़ी जानकारी निकाल सकता है – कौन सी कोशिकाएँ सक्रिय हैं, कौन सी तनाव में हैं, और किन पर बीमारी या प्रदूषण का असर दिखने लगा है।
अगर शाहजहांपुर के लिए एक 'कोशिका-आधारित डेटाबेस' (database) तैयार हो सके, तो यह केवल यह नहीं बताएगा कि “यहाँ एक बाघ है” या “यहाँ इतने जलपक्षी हैं”, बल्कि यह भी बता सकेगा कि यह बाघ कितना स्वस्थ है, उसके शरीर में किसी संक्रमण या कुपोषण के संकेत तो नहीं हैं, या कोई पक्षी प्रजाति लगातार प्रदूषण के दबाव में तो नहीं जी रही। यह जानकारी बीमारी के जोखिम (Disease risk) को पहले से भाँपने, प्रदूषण के असर को समझने और मानव–वन्यजीव संघर्ष की जड़ तक जाने में मदद कर सकती है – जैसे कि कोई जानवर बार-बार गाँव के पास क्यों दिख रहा है, क्या उसके प्राकृतिक आवास में कोई अदृश्य दिक्कत बढ़ रही है, आदि।
आखिर में, शाहजहांपुर के लिए यह नया नजरिया सिर्फ लैब की भाषा नहीं है, बल्कि अपनी मिट्टी और अपने जीवों को और गहराई से समझने का एक तरीका है। जब हम किसी वेटलैंड या खेत की रक्षा करते हैं, तो हम केवल जमीन या पानी नहीं बचा रहे होते, बल्कि उन अनगिनत कोशिकाओं और जीवन की उन इकाइयों को भी बचा रहे होते हैं जो करोड़ों साल के विकास की कहानी अपने भीतर समेटे हुए हैं। यही वह जगह है जहाँ विज्ञान और कुदरत सचमुच हाथ मिला लेते हैं – जहाँ एक छोटी सी कोशिका पूरे जंगल की नब्ज़ हमें सुनाने लगती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/22wlshm9
https://tinyurl.com/2c2l7bsz
https://tinyurl.com/2c4pvk7w
https://tinyurl.com/22bp6zgl
https://tinyurl.com/2d7dhxls
https://tinyurl.com/ytb9ehje