समय - सीमा 9
मानव और उनकी इंद्रियाँ 10
मानव और उनके आविष्कार 10
भूगोल 10
जीव-जंतु 10
शाहजहांपुर और पीलीभीत के बीच फैली यह तराई की पट्टी अब सिर्फ नक्शे पर खिंची सीमाओं से नहीं, बल्कि बाघों के रास्तों और हमारे खेतों की बदलती हकीकत से समझी जा सकती है । यह वही इलाका है जहाँ जंगल, गन्ने के खेत और नहरें मिलकर एक ऐसा साझा “हैबिटेट” बना रहे हैं, जिसमें इंसान और वन्यजीव दोनों मौजूद हैं।
क्या नक्शे से बड़ी होती है जंगल की सरहद?
अगर इतिहास के पन्ने पलटें तो दिखेगा कि हमारे पूर्वज बिना किसी जीपीएस (GPS) या सर्वे मैप (survey map) के भी अपने आसपास के माहौल को पढ़ लेते थे । वे जानते थे कि जहाँ नरकुल या लंबी घास उगती है, वहाँ पानी होगा; जहाँ हिरण चरते दिखें, वहाँ आसपास कोई शिकारी भी जरूर होगा । बस्तियाँ बसाने से लेकर खेतों की जुताई और सुरक्षा के नियम बनाने तक, सब कुछ इसी “कुदरती नक्शे” के भरोसे तय होता था।
आज शाहजहांपुर में हमें फिर से उसी नजरिए की जरूरत है। कागज़ पर यह सिर्फ एक जिला है, लेकिन कुदरत की नज़र में यह पीलीभीत टाइगर रिज़र्व से जुड़ा हुआ वही लंबा तराई वाला इलाका है । आधिकारिक दस्तावेज़ बताते हैं कि पीलीभीत टाइगर रिज़र्व केवल पीलीभीत तक सीमित नहीं, उसका एक हिस्सा शाहजहांपुर की सीमा में भी आता है । भारत–नेपाल सीमा के पास हिमालय की तलहटी में फैला यह पूरा तराई क्षेत्र साल के घने जंगलों, ऊँची घास के मैदानों और दलदली निचली जमीनों से मिलकर बना है, जो वन्यजीवों के लिए आदर्श घर है । शाहजहांपुर इन्हीं जंगलों और खेतों के संगम पर बसा है, जहाँ दोनों एक-दूसरे में घुले-मिले नज़र आते हैं।

पीलीभीत से शाहजहांपुर तक बाघ कौन से रास्तों से आते हैं?
जंगली जानवर किसी एक जगह पर टिककर नहीं रह सकते; उन्हें शिकार, पानी और अपने इलाके की तलाश में लगातार चलना पड़ता है । नक्शे साफ दिखाते हैं कि पीलीभीत और शाहजहांपुर के बीच जंगल के ऐसे “गलियारे” (corridors) हैं, जो एक तरह के पुल की तरह काम करते हैं । इन्हीं रास्तों से बाघ, तेंदुआ और दूसरे जीव सुरक्षित जंगलों से निकलकर दूसरे इलाकों तक पहुँचते हैं।
मुश्किल तब शुरू होती है जब इन प्राकृतिक रास्तों के बीच इंसानी दखल बढ़ने लगता है। आबादी बढ़ने, नई सड़कों के बनने और खेती के तेज़ विस्तार ने पुराने जंगलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँट दिया है । जंगल का यह बिखराव जानवरों को उन जगहों से गुजरने पर मजबूर करता है जो अब खेतों, बस्तियों या औद्योगिक इलाकों में बदल चुके हैं। नतीजतन, जो कॉरिडोर पहले सिर्फ जानवरों के लिए सुरक्षित रास्ते थे, वही अब इंसानों और वन्यजीवों के आमने-सामने आने की पट्टियाँ बनते जा रहे हैं।
गन्ने के खेत और नहरें बाघों के ‘शैडो हैबिटेट’ कैसे बन गए?
शाहजहांपुर के परिदृश्य में एक दिलचस्प और चिंता पैदा करने वाला बदलाव दिख रहा है । यहाँ के गन्ने के ऊँचे-घने खेत और नहरों के किनारे अब “शैडो हैबिटेट” (Shadow Habitat) यानी परछाई जैसे आवास का काम करने लगे हैं । गन्ने की लंबी फसल दूर से जंगल जैसी दिखती है और नहर का शांत पानी जानवरों को वही सुकून देता है जो उन्हें जंगल की छोटी धाराओं से मिलता है।
इसी वजह से बाघ और दूसरे जानवर इन मानव-निर्मित ढाँचों को छिपने और आगे बढ़ने के सुरक्षित रास्ते के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं । वे गन्ने के खेतों की ओट लेकर गांवों के काफ़ी करीब तक आ जाते हैं और नहरों के किनारे-किनारे रास्ता पकड़कर एक जगह से दूसरी जगह चले जाते हैं । हाल के वर्षों में शाहजहांपुर में बाघ और सियार के हमलों की जो खबरें सामने आईं, उन्होंने प्रशासन को यह महसूस कराने पर मजबूर किया कि ये खेत और नहरें अब केवल खेती-बाड़ी के ढाँचे नहीं, बल्कि वन्यजीवों के “गुप्त घर” भी बन चुके हैं।
बाड़ लगाकर कौन-सी नई सुरक्षा सोची जा रही है?
इन घटनाओं के बाद वन विभाग ने अपनी सोच में भी बदलाव शुरू किया है । अब केवल घटना हो जाने पर रिएक्ट करने के बजाय पहले से तैयारी करने पर ज़ोर दिया जा रहा है । विभाग उन जगहों की पहचान कर रहा है जहाँ जानवरों की आवाजाही बार-बार दर्ज हो रही है – यानी व्यावहारिक कॉरिडोर ज़मीन पर कहाँ-कहाँ बन रहे हैं।
शाहजहांपुर के ऐसे संवेदनशील इलाकों में अब “फेंसिंग” (Fencing) यानी बाड़ लगाने की योजना पर काम आगे बढ़ रहा है । बाड़ का मकसद यह नहीं कि जानवरों को हमेशा के लिए रोका जाए, बल्कि यह कि बस्तियों और स्कूलों जैसी जगहों के एकदम नजदीक उनकी सीधी एंट्री न हो । यह कदम इस बात की स्वीकारोक्ति भी है कि ये इलाके अब आधिकारिक रूप से वन्यजीवों के गलियारे माने जा रहे हैं और यहाँ सुरक्षा की प्लानिंग भी उसी नज़र से की जा रही है।
इस बदलते हैबिटेट में हमारी भूमिका क्या होनी चाहिए?
अंत में बात फिर हम पर आ टिकती है। शाहजहांपुर के नागरिक के रूप में हमारी पहचान केवल “किसान”, “मज़दूर” या “शहरवासी” तक सीमित नहीं रह सकती । हम इस पूरे “हैबिटेट” (habitat) के सह-निवासी और संरक्षक भी हैं । तराई की यह ज़मीन, साल के जंगल, गन्ने के खेत और नदियों के किनारे फैली आर्द्रभूमियाँ – ये सब मिलकर एक साझा विरासत बनाते हैं, जो आने वाली पीढ़ियों की भी हक़दार है।
हमें गलियारों के किनारों पर बेवजह अतिक्रमण से बचना होगा, वेटलैंड्स को सूखने से रोकना होगा और यह मानना होगा कि यह इलाका सिर्फ कंक्रीट (concrete) और फसलों का ढेर नहीं, बल्कि “तराई के जीवित तंत्र” का हिस्सा है । जैसे ही हम अपने जिले को इस नज़र से देखना शुरू करेंगे, सुरक्षा के फैसले भी ज़्यादा समझदारी से लिए जा सकेंगे – चाहे बात बाड़ लगाने की हो, फसल पैटर्न बदलने की या रात के समय सावधानी बरतने की। यही नजरिया हमें डर और ग़ुस्से से बाहर निकालकर एक ऐसे दौर में ले जा सकता है जहाँ शाहजहांपुर की पहचान तराई, बाघ और सुरक्षित गाँव – तीनों को साथ लेकर चले।
संदर्भ
https://tinyurl.com/24xr5zmn
https://tinyurl.com/29tlpbgk
https://tinyurl.com/2c9dt9rx
https://tinyurl.com/2ykhfqtn
https://tinyurl.com/28n9vlu9
https://tinyurl.com/2892x42a
https://tinyurl.com/2aptuy4x