गन्ने के खेत में जंगल का एहसास: आखिर क्यों शाहजहांपुर के गांवों की ओर आ रहे हैं हिंसक जानवर?

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10-01-2026 09:11 AM
गन्ने के खेत में जंगल का एहसास: आखिर क्यों शाहजहांपुर के गांवों की ओर आ रहे हैं हिंसक जानवर?

शाहजहांपुर और पीलीभीत के बीच फैला तराई का यह इलाक़ा अब सिर्फ़ नक़्शे पर खिंची सरहदों तक सीमित नहीं रह गया है। इसे सही मायनों में समझने के लिए हमें बाघों की चहलक़दमी और अपने खेतों की बदलती हक़ीक़त को देखना होगा। यह एक ऐसी मिली-जुली दुनिया बन चुकी है, जहाँ जंगल, गन्ने के खेत और नहरें मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जिसमें इंसान और वन्यजीव, दोनों का ही बसेरा है।

क्या जंगल की सरहद नक़्शे से बड़ी होती है?
अगर हम पुराने ज़माने की बात करें, तो हमारे बुज़ुर्गों को किसी जीपीएस (GPS) या सर्वे मैप की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। वे अपने आसपास के माहौल को पढ़ना बख़ूबी जानते थे। उन्हें पता था कि जहाँ नरकुल या लंबी घास है, वहाँ पानी ज़रूर होगा; और जहाँ हिरण चर रहे हैं, वहाँ आसपास कोई शिकारी भी घात लगाए बैठा होगा। बस्तियाँ बसाने से लेकर खेती की सुरक्षा तक, सारे फ़ैसले इसी 'कुदरती समझ' के दम पर होते थे।

आज शाहजहांपुर में हमें उसी नज़रिए की फिर से ज़रूरत है। कागज़ पर भले ही यह एक अलग ज़िला हो, लेकिन कुदरत की नज़र में यह पीलीभीत टाइगर रिज़र्व से जुड़ा हुआ वही पुराना तराई का इलाक़ा है। सरकारी दस्तावेज़ भी यह तस्दीक़ करते हैं कि टाइगर रिज़र्व सिर्फ़ पीलीभीत तक नहीं, बल्कि उसका एक बड़ा हिस्सा शाहजहांपुर की हदों में भी आता है। भारत-नेपाल सीमा के पास हिमालय की तलहटी में फैला यह इलाक़ा ‘साल के घने जंगल, ऊँची घास और दलदली ज़मीन’ वन्यजीवों का आदर्श घर है। शाहजहांपुर इन्हीं जंगलों और खेतों के संगम पर बसा है, जहाँ दोनों एक-दूसरे में घुले-मिले नज़र आते हैं।
File:A Bengal tiger (Panthera tigris tigris) scratching tree with its claws at Pilibhit tiger reserve.jpg

पीलीभीत से शाहजहांपुर: आख़िर बाघ किन रास्तों से आते हैं?
जंगली जानवर एक जगह टिककर नहीं रह सकते, शिकार, पानी और अपने इलाक़े की तलाश उन्हें लगातार चलते रहने पर मजबूर करती है। नक़्शे साफ़ बताते हैं कि पीलीभीत और शाहजहांपुर के बीच जंगलों के कई ऐसे 'गलियारे' (Corridors) हैं, जो जानवरों के लिए एक जंगल से दूसरे जंगल जाने का कुदरती पुल हैं। इन्हीं रास्तों से बाघ, तेंदुए और दूसरे जीव सुरक्षित जंगलों से निकलकर आगे बढ़ते हैं।

मुश्किल तब खड़ी होती है जब इन कुदरती रास्तों में इंसानी दखल बढ़ जाता है। बढ़ती आबादी, नई सड़कें और खेती के तेज़ फैलाव ने पुराने जंगलों को टुकड़ों में बाँट दिया है। जंगल का यह बिखराव जानवरों को उन रास्तों से गुज़रने पर मजबूर करता है, जहाँ अब खेत, बस्तियाँ या फ़ैक्टरियाँ बन चुकी हैं। नतीजा यह है कि जो गलियारे कभी सिर्फ़ जानवरों के लिए सुरक्षित थे, वे अब इंसान और जानवर के बीच 'टकराव के इलाक़े' बनते जा रहे हैं।

शाहजहांपुर के परिदृश्य में एक दिलचस्प लेकिन चिंताजनक बदलाव आया है। यहाँ गन्ने के ऊँचे-घने खेत और नहरों के किनारे अब 'शैडो हैबिटेट' (Shadow Habitat) यानी 'जंगल जैसा ही दूसरा सुरक्षित ठिकाना' बन गए हैं। गन्ने की लंबी फ़सल दूर से जंगल जैसी ही दिखती है और नहरों का शांत पानी जानवरों को वही सुकून और ज़रूरत पूरी करता है जो उन्हें जंगल के नालों से मिलती है।

यही वजह है कि बाघ और दूसरे जानवर इन मानव-निर्मित ढाँचों को छिपने और आगे बढ़ने के सुरक्षित रास्ते के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। वे गन्ने की आड़ लेकर गाँवों के बेहद क़रीब आ जाते हैं और नहरों के किनारे-किनारे लंबा सफ़र तय कर लेते हैं। पिछले कुछ सालों में शाहजहांपुर में हुए बाघ और सियार के हमलों की ख़बरों ने प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि ये खेत और नहरें सिर्फ़ खेती-बाड़ी का ज़रिया नहीं, बल्कि अब वन्यजीवों का 'गुप्त घर' भी बन चुके हैं।

इन घटनाओं के बाद वन विभाग ने अपनी सोच और काम करने के तरीक़े में बदलाव किया है। अब सिर्फ़ घटना होने के बाद कार्रवाई (React) करने के बजाय, पहले से एहतियात बरतने पर ज़ोर दिया जा रहा है। विभाग उन जगहों की पहचान कर रहा है जहाँ जानवरों की आवाजाही अक्सर दर्ज हो रही है, यानी ज़मीन पर 'व्यावहारिक कॉरिडोर' कहाँ बन रहे हैं।

शाहजहांपुर के ऐसे संवेदनशील इलाक़ों में अब 'फेंसिंग' (Fencing) यानी बाड़ लगाने की योजना पर काम आगे बढ़ रहा है। इस बाड़ का मक़सद जानवरों को हमेशा के लिए रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बस्तियों और स्कूलों जैसी जगहों पर उनकी सीधी एंट्री न हो सके। यह क़दम इस बात का सुबूत है कि सरकार ने मान लिया है कि ये इलाक़े अब आधिकारिक रूप से वन्यजीवों के गलियारे हैं और यहाँ सुरक्षा की प्लानिंग भी उसी नज़रिए से की जा रही है।

आख़िर में, बात घूम-फिर कर हम पर ही आती है। शाहजहांपुर के नागरिक के तौर पर हमारी पहचान सिर्फ़ 'किसान', 'मज़दूर' या 'शहरी' तक सीमित नहीं रह सकती। हम इस पूरे माहौल के सह-निवासी भी हैं और इस कुदरती विरासत के रखवाले भी। तराई की यह ज़मीन, साल के जंगल और आर्द्रभूमियाँ (Wetlands), ये सब मिलकर हमारी एक साझा विरासत हैं, जिस पर आने वाली पीढ़ियों का भी हक़ है।

हमें गलियारों के किनारों पर बेवजह क़ब्ज़ा करने से बचना होगा, वेटलैंड्स को सूखने से रोकना होगा और यह समझना होगा कि यह इलाक़ा सिर्फ़ कंक्रीट और फ़सलों का ढेर नहीं, बल्कि 'तराई के ज़िंदा कुदरती तंत्र' का हिस्सा है। जैसे ही हम अपने ज़िले को इस नज़र से देखना शुरू करेंगे, सुरक्षा के फ़ैसले भी ज़्यादा समझदारी से लिए जा सकेंगे चाहे बात बाड़ लगाने की हो, फ़सल चक्र बदलने की या रात के समय सावधानी बरतने की। यही नज़रिया हमें डर और ग़ुस्से से बाहर निकालकर उस दौर में ले जा सकता है, जहाँ शाहजहांपुर की पहचान तराई, बाघ और सुरक्षित गाँव, तीनों को साथ लेकर चलने में होगी।

संदर्भ
https://tinyurl.com/24xr5zmn
https://tinyurl.com/29tlpbgk
https://tinyurl.com/2c9dt9rx
https://tinyurl.com/2ykhfqtn
https://tinyurl.com/28n9vlu9
https://tinyurl.com/2892x42a
https://tinyurl.com/2aptuy4x

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