शाहजहांपुर के खेत क्यों बन गए हैं, बाघों का नया ठिकाना?

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10-01-2026 09:10 AM
शाहजहांपुर के खेत क्यों बन गए हैं, बाघों का नया ठिकाना?

इतिहास गवाह है कि जब विज्ञान की किताबें भी नहीं थीं, तब भी इंसान और जानवर एक‑दूसरे के साथ रहते थे और एक‑दूसरे को समझते थे। हमारे बुजुर्गों ने कभी वन्यजीव विज्ञान की डिग्री नहीं ली, लेकिन वे कुदरत की भाषा पढ़ना बखूबी जानते थे। रात के सन्नाटे में होने वाली आहट, दूर से आती कोई दहाड़, और सुबह गीली मिट्टी पर पड़े पैरों के निशान, यह सब उनकी नज़र से छुपा नहीं रहता था। यही गहरी समझ उनके लिए सुरक्षा की ढाल बनती थी; वे जानवरों के व्यवहार को देखकर ही तय करते थे कि खेत कब जोतने हैं, बच्चों को किस रास्ते से न भेजें, और रात को किस तरफ़ से न निकलें। आज के शाहजहांपुर में भी उसी पुरानी समझ को, नई परिस्थितियों के हिसाब से फिर से अपनाने की ज़रूरत है।​

शाहजहांपुर को हम आम तौर पर सिर्फ़ एक ज़िले के रूप में देखते हैं, लेकिन कुदरत के नक्शे पर इसकी पहचान इससे कहीं बड़ी है। यह जिला प्रसिद्ध पीलीभीत टाइगर रिज़र्व (Pilibhit Tiger Reserve) से सटा हुआ है और विशाल ‘तराई आर्क लैंडस्केप’ (Terai Arc Landscape) का एक अहम हिस्सा है। पीलीभीत टाइगर रिज़र्व उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर खीरी और बहराइच जिलों के तराई क्षेत्रों में फैला है, और शाहजहांपुर उसकी सीमा पर एक तरह के प्रहरी की तरह खड़ा है। यहाँ के जंगल साल (Sal) के पेड़ों, ऊँची घास के मैदानों और दलदली निचली ज़मीनों से मिलकर एक ऐसा इलाक़ा बनाते हैं जो जंगली जानवरों के लिए आदर्श घर है। शाहजहांपुर के जंगल और खेत, असल में पीलीभीत के जंगलों का ही एक नैचुरल विस्तार हैं, जहाँ बाघ और तेंदुए सदियों से आते‑जाते और घूमते रहे हैं।​

पिछले कुछ सालों में तराई के इस इलाके के लिए एक नया शब्द चलन में आया है ‘शुगरकेन टाइगर’ (Sugarcane Tiger)। गन्ने की लम्बी और घनी फसल, ऊपर से देखने पर बिल्कुल जंगल की ऊँची घास जैसी लगती है। यही वजह है कि तराई के कई हिस्सों में गन्ने के खेत बाघों के लिए एक तरह के ‘गुप्त घर’ बन गए हैं। बाघ इन खेतों को केवल रास्ता मानकर नहीं, बल्कि कई बार अपना अस्थायी ठिकाना बनाकर इस्तेमाल करते हैं। गन्ने की कतारों के बीच उन्हें घना अँधेरा और सुरक्षित ओट मिलती है, पास की नहरों से ताज़ा पानी मिलता है, और आसपास जंगली सूअर जैसे शिकार की भी कमी नहीं रहती। यह सब मिलकर गन्ने के खेतों को बाघ के लि/ए एक सुविधाजनक शरणस्थली बना देते हैं। यह कोई ‘अजीब हरकत’ नहीं, बल्कि बाघ का कुदरती अनुकूलन (Adaptation) है – वह अपनी ज़रूरतों के लिए जंगल से बाहर निकलकर हमारे खेतों में पनाह लेने लगा है।​

बाघों के इस बदले हुए व्यवहार को समझना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि वे स्वभाव से बेहद चुपचाप और रहस्यमय होते हैं। जब वे पीलीभीत के घने जंगलों से निकलकर शाहजहांपुर की तरफ़ बढ़ते हैं, तो अक्सर नदी‑नालों, नहरों और घनी फसलों का सहारा लेते हैं। दिन के समय वे गन्ने की ठंडी, घनी छाँव में छिपकर आराम करते हैं और रात के अंधेरे में शिकार या आवाजाही के लिए निकलते हैं। बहुत बार तो गाँव वालों को अंदाज़ा भी नहीं होता कि जिन खेतों में वे दिन में काम कर रहे हैं, वहीं कहीं भीतर एक बाघ चुपचाप पड़ा है। यह व्यवहार हमें डराने के लिए नहीं, बल्कि खुद को इंसानों की नज़र से बचाने के लिए होता है – बाघ इंसानों से जितना बचना चाहता है, शायद हम उससे भी ज़्यादा।​

ऐसी स्थिति में शाहजहांपुर के किसानों और ग्रामीणों को अपनी जीवनशैली में कुछ छोटे लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव करने होंगे, जिन्हें मिलकर ‘सह‑अस्तित्व’ कहा जा सकता है। फसल कटाई के समय बिल्कुल खामोशी में खेत में घुसने के बजाय शोर करते हुए, बात करते हुए काम शुरू किया जाए, ताकि अगर किसी झाड़ी या गन्ने में कोई जानवर छिपा हो तो उसे पहले से भागने का मौका मिल सके। किसी संदिग्ध हरकत पर भीड़ बनाकर खेत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश न करें, क्योंकि घिरा हुआ जंगली जानवर ज़्यादा खतरनाक हो जाता है। रात के वक़्त अकेले खेतों या नहरों की तरफ पैदल न जाएँ, और जाते समय टॉर्च या दूसरी रोशनी ज़रूर साथ रखें। अगर बाघ या बड़ा जंगली जानवर दिख भी जाए, तो उसे देखने के लिए भीड़ इकट्ठी न हो; ऐसे में तुरंत वन विभाग को सूचना देना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है।​

हाल के हमलों और मुठभेड़ों की ख़बरों के बाद वन विभाग ने भी अपनी रणनीति में बदलाव किया है। अब केवल घटना होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय, पहले से संवेदनशील इलाकों की पहचान कर वहां सुरक्षा के इंतज़ाम मज़बूत किए जा रहे हैं। शाहजहांपुर के जिन हिस्सों में बार‑बार बाघ या तेंदुए की हलचल दर्ज हुई है, वहाँ ‘सोलर फेंसिंग’ यानी सौर ऊर्जा से चलने वाली बाड़ लगाने का काम तेज़ किया जा रहा है। बफर ज़ोन और गाँव‑जंगल की सीमा पर निगरानी बढ़ाई जा रही है, ताकि इंसानों और जानवरों के बीच अचानक होने वाली मुलाकातों की संभावना कम हो सके। मक़सद बाघ को खत्म करना नहीं, बल्कि उसके रास्ते और इंसानी आबादी के बीच एक समझदारी भरी दूरी बनाना है।​

आख़िर में, यह समझ लेना ज़रूरी है कि बाघों का गन्ने के खेतों में आना उनकी फितरत और इलाके के बदलते स्वरूप का नतीजा है, और उससे सुरक्षित रहना हमारी समझदारी पर निर्भर करता है। सरकार की लगाई हुई बाड़ और कागज़ी योजनाएँ अपनी जगह ज़रूरी हैं, लेकिन सबसे बड़ा सुरक्षा कवच हमारी जागरूकता, हमारा संयम और हमारा व्यवहार ही है। जब हम बाघ को सिर्फ़ ‘आतंक’ नहीं, बल्कि एक भटके हुए पड़ोसी की तरह देखेंगे – जो असल में हमारे ही फैलते खेतों और सिमटते जंगलों के बीच फँस गया है – तो हमारा अंधा डर कम होगा और सतर्कता बढ़ेगी। 

संदर्भ 
https://tinyurl.com/24xr5zmn
https://tinyurl.com/2aptuy4x
https://tinyurl.com/24l6yats
https://tinyurl.com/29e3eftf
https://tinyurl.com/2ykhfqtn
https://tinyurl.com/2892x42a
https://tinyurl.com/28n9vlu9 

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