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उत्तर प्रदेश का राजकीय पक्षी 'सारस' (Sarus Crane) केवल आसमान में उड़ने वाला एक परिंदा नहीं है, बल्कि यह हमारे जिले की मिट्टी, पानी और खेतों की सेहत बताने वाला सबसे सच्चा साथी है। एक दौर था जब हमारे बुजुर्गों के पास विज्ञान की बड़ी डिग्रियाँ नहीं थीं, लेकिन वे सारस की उड़ान और उसकी आहट पहचानकर बता देते थे कि कुदरत का मिजाज कैसा है। आज शाहजहाँपुर की पहचान केवल एक जिले के रूप में नहीं, बल्कि तालाबों, नहरों और धान-गेहूँ के खेतों के एक ऐसे 'जीवित जाल' के रूप में है, जहाँ इंसान और परिंदे एक साथ बसते हैं।
हाल के आँकड़े बताते हैं कि शाहजहाँपुर की आब-ओ-हवा आज भी इन पक्षियों के लिए महफूज़ है। जून 2024 की गणना (टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार) के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में सारस की संख्या में 396 की बढ़ोतरी हुई है, जिससे इनकी कुल संख्या 19,918 तक पहुँच गई है। यह बढ़ते आँकड़े इस बात का सबूत हैं कि ज़मीनी स्तर पर संरक्षण के प्रयास सफल हो रहे हैं। बरेली मंडल का हिस्सा होने के नाते, शाहजहाँपुर के रोज़ा, नहिल, सिमरा और खेड़ा जैसे दलदली इलाके (वेटलैंड्स) आज भी इन प्रवासी पक्षियों के पसंदीदा ठिकाने बने हुए हैं।
सारस को देखकर ऐसा लगता है जैसे कुदरत ने इसे खास तौर पर हमारे खेतों के लिए ही बनाया है। 'वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड' (WWF) के अनुसार, इसकी 6 फीट की लंबाई इसे दुनिया का सबसे ऊँचा उड़ने वाला पक्षी बनाती है। यह ऊँचाई इसे शाहजहाँपुर के छिछले तालाबों में बिना डूबे आसानी से टहलने और अपनी लंबी चोंच से जमीन की नब्ज़ टटोलने में मदद करती है। जब आप सारस को खेत में चोंच मारते देखते हैं, तो असल में वह संकेत दे रहा होता है कि मिट्टी के भीतर नमी और जीवन (जैसे घोंघे और केंचुए) आज भी मौजूद है।
सारस की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे घने जंगलों के बजाय इंसानों के बीच रहना पसंद है। 'राउंडग्लास सस्टेन' की एक रिपोर्ट बताती है कि हमारे किसान इसे 'फसल का रक्षक' मानते हैं क्योंकि यह फसलों को नुकसान पहुँचाने वाले कीड़ों को खा जाता है।
विशेषज्ञ इस रिश्ते को 'सोशल फेंस' (सामाजिक सुरक्षा घेरा) कहते हैं। इसका मतलब है कि सारस की सुरक्षा किसी सरकारी कानून या कटीले तारों से ज्यादा, गाँव वालों के प्यार पर टिकी है। यहाँ का किसान अपने खेत में सारस का घोंसला देखकर खुश होता है और कई बार तो अंडों को बचाने के लिए उस हिस्से की फसल तक नहीं काटता। यही शाहजहाँपुर की असली खूबसूरती और संस्कृति है।
लेकिन, विकास की दौड़ में कुछ खतरे भी बढ़े हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय की एक रिपोर्ट (2016) आगाह करती है कि तालाबों पर अवैध कब्ज़ा और बढ़ता शहरीकरण सारस से उनका घर छीन रहा है। साथ ही, खेतों में कीटनाशकों (Pesticides) का बढ़ता इस्तेमाल इनके लिए धीमा जहर साबित हो रहा है। बिजली के हाई-वोल्टेज तार और आवारा कुत्तों के हमले भी एक बड़ी चुनौती हैं।
हमें समीर कुमार सिन्हा जैसे पर्यावरण प्रेमियों से प्रेरणा लेनी होगी, जिन्होंने 'सारस मित्र' बनकर समाज को जागरूक किया। वेटलैंड्स को बचाना केवल पक्षियों के लिए नहीं, बल्कि हमारे गाँव के गिरते जलस्तर (Groundwater) को रोकने के लिए भी ज़रूरी है।
हमें बस तीन छोटे कदम उठाने हैं:
कुल मिलाकर सारस को बचना सिर्फ वन विभाग की ज़िम्मेदारी नहीं है। अगर हमारे आसमान में सारस की उड़ान सलामत है, तो इसका सीधा मतलब है कि हमारा पानी, हमारी हवा और हमारी मिट्टी भी सुरक्षित है। सारस को बचाना, असल में अपने आने वाले कल को बचाना है।
संदर्भ
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