यूनेस्को वाली रामलीला: शाहजहाँपुर का मंच दुनिया में क्यों गूंज रहा है?

दृष्टि II - अभिनय कला
11-01-2026 09:03 AM
यूनेस्को वाली रामलीला: शाहजहाँपुर का मंच दुनिया में क्यों गूंज रहा है?

शाहजहाँपुर का रंगमंच केवल मनोरंजन का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह इस शहर की रूह और सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत की एक ज़िंदा मिसाल है। यह लेख हमें राष्ट्रीय स्तर की 'संगीत नाटक अकादमी' से लेकर स्थानीय 'ओसीएफ रामलीला' और अब जापान-फिलीपींस जैसे देशों तक फैले इसके वैश्विक सफ़र से रूबरू कराएगा।

इससे पहले कि हम शाहजहाँपुर की गलियों और ओसीएफ मैदान की रौनक़ को करीब से देखें, यह समझना ज़रूरी है कि हमारे देश में इन कलाओं को संरक्षण कैसे मिलता है। भारत सरकार की 'संगीत नाटक अकादमी' महज़ एक सरकारी दफ़्तर नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति की असली पहरेदार है। जिस तरह एक माली अपने बगीचे के हर फूल को सहेजता है, ठीक उसी तरह यह अकादमी सुनिश्चित करती है कि भारत की विविध कलाएंचाहे वे शास्त्रीय हों या लोक कलाएंवक़्त के साथ कहीं खो न जाएं। यही वह मज़बूत ढांचा है जो शाहजहाँपुर जैसे शहरों के कलाकारों को यह भरोसा दिलाता है कि उनकी कला सुरक्षित है और उसकी कद्र की जाएगी।

अब राष्ट्रीय स्तर से ज़मीनी हकीकत की ओर रुख करते हैं और चलते हैं शाहजहाँपुर के उस मंच की ओर, जिससे यहाँ के लोगों की यादें जुड़ी हैं'ओसीएफ रामलीला'। यह सिर्फ़ एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर का अपना त्यौहार है जिसमें हर नागरिक शामिल होता है। यहाँ के मेलों में जो कड़ी मेहनत, कारीगरी और अभिनय देखने को मिलता है, वह वाकई बेमिसाल है। 'ओसीएफ रामलीला' का नाम सुनते ही शहरवासियों के चेहरे खिल उठते हैं, क्योंकि यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक ऐसा 'सार्वजनिक उत्सव' है जो पूरे शहर को एकता के सूत्र में पिरोता है।

20 सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस बार भी रामलीला का आग़ाज़ पूरे विधि-विधान और गणेश पूजन के साथ हुआ। यह वह लम्हा होता है जब मंच का पर्दा उठता है और शहर की आबो-हवा में एक अलग ही जोश भर जाता है। महीनों की तैयारी के बाद आयोजक और कलाकार इसी घड़ी का इंतज़ार करते हैं।

रामलीला की गूंज केवल शाहजहाँपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि आज पूरी दुनिया इसकी अहमियत को पहचानती है। यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया है। यूनेस्को के अनुसार, रामलीला केवल रामायण का मंचन नहीं है, बल्कि यह गीतों, कहानियों और संवादों के माध्यम से समाज को जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ऐसा उत्सव है, जो जाति और मज़हब की दीवारों को गिरा देता है। शाहजहाँपुर में जब रामलीला होती है, तो वह यूनेस्को की इसी परिभाषा को सच कर दिखाती है।
File:Panoramic view from Ferris Wheel at Ramleela Mela(Fair) Vidisha.jpg

रामलीला का मंचन देखना अपने आप में एक यादगार अनुभव है। ओसीएफ रामलीला में 'सीता हरण' का मंचन इतना सजीव और मर्मस्पर्शी था कि दर्शक दीर्घा में बैठा हर व्यक्ति उस पीड़ा को महसूस कर रहा था। यह अभिनय की ही ताक़त है जो सदियों पुरानी इस गाथा को आज भी हमारे दिलों के करीब बनाए हुए है।

लेकिन चकाचौंध भरे मंच के पीछे भी एक दुनिया है जो अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहती है। एक रामलीला को सफल बनाने में कड़ा अभ्यास, वेशभूषा और पुतले बनाने वालों की गुमनाम मेहनत छिपी होती है। इसके साथ ही मेले से जुड़ा एक पूरा बाज़ार और रोज़गार का पहिया भी घूमता है। जहाँ एक तरफ़ मंच पर राम-रावण का युद्ध चल रहा होता है, वहीं मैदान में कोई पिता अपने बच्चे को खिलौना दिला रहा होता है और कोई चाट-पकौड़े बेचकर अपनी रोज़ी-रोटी कमा रहा होता है। यही शाहजहाँपुर की असली और जीती-जागती तस्वीर है।

अपनी परंपराओं को सहेजने के साथ-साथ शाहजहाँपुर का रंगमंच अब नया मोड़ ले रहा है। शहर के कलाकार अब केवल अपनी कहानियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सात समंदर पार की कलाओं को भी अपना रहे हैं। अब यहाँ के थिएटर कलाकार जापान और फिलीपींस की रंगमंच शैलियों को भी सीखेंगे।

यह बदलाव एक बहुत बड़े सवाल का जवाब है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक कैसे बना जाए? जब शाहजहाँपुर का कोई कलाकार जापानी कला की बारीकियों को अपनी रामलीला में पिरोएगा, तो उससे एक अनोखा संगम पैदा होगा। यह साबित करता है कि हमारा शहर अब दुनिया से सीखने और दुनिया को अपनी कला सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। शाहजहाँपुर का रंगमंच आज एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है जहाँ एक तरफ रामलीला की भव्य विरासत है और दूसरी तरफ भविष्य की नई संभावनाएं।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2beorrvt
https://tinyurl.com/24m9nt75
https://tinyurl.com/289fjd4v
https://tinyurl.com/2cu3f5fj
https://tinyurl.com/ycq3seyr
https://tinyurl.com/2b7r92gf

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