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शाहजहांपुर का रंगमंच केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह शहर की आत्मा और उसकी सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर का जीवित प्रमाण है। यह लेख हमें राष्ट्रीय स्तर पर 'संगीत नाटक अकादमी' से लेकर स्थानीय 'ओसीएफ रामलीला' और अब जापान-फिलीपींस जैसे देशों तक फैले इसके वैश्विक सफर तक ले जाएगा।
इससे पहले कि हम शाहजहांपुर की गलियों और ओसीएफ के मैदानों की धूल फांकें, यह समझना जरूरी है कि हमारे देश में इन कलाओं की सांसें कैसे चलती हैं। भारत सरकार की 'संगीत नाटक अकादमी' (Sangeet Natak Akademi) किसी सरकारी दफ्तर से कहीं ज्यादा, हमारी संस्कृति की 'रक्षक' है । जिस तरह एक माली अपने बगीचे के हर फूल का ध्यान रखता है, ठीक उसी तरह यह अकादमी यह सुनिश्चित करती है कि भारत की रंग-बिरंगी कलाएं "चाहे वो शास्त्रीय हों या लोक" मुरझाने न पाएं। यही राष्ट्रीय ढांचा है जो शाहजहांपुर जैसे शहरों के कलाकारों को यह भरोसा देता है कि उनकी कला सुरक्षित है और उसका सम्मान किया जाएगा।
अब हम राष्ट्रीय स्तर से उतरकर शाहजहांपुर के उस मंच की ओर चलते हैं, जिसकी मिट्टी में यहाँ के लोगों की यादें बसी हैं—'ओसीएफ रामलीला'। यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि शहर का अपना त्यौहार है जहाँ हर कोई भागीदार है। यहाँ के मेलों में जो मेहनत, कारीगरी और अभिनय दिखता है, वह बेमिसाल है। 'ओसीएफ रामलीला' का नाम सुनते ही शहरवासियों के चेहरे खिल उठते हैं, क्योंकि यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक 'सार्वजनिक उत्सव' है जो पूरे शहर को एक सूत्र में पिरोता है।
20 सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस बार भी रामलीला की शुरुआत पूरे विधि-विधान और गणेश पूजन के साथ हुई । यह वह पल होता है जब पर्दा उठता है और शहर की हवा में एक अलग ही जोश भर जाता है। महीनों की मेहनत के बाद आयोजक और कलाकार इसी घड़ी का इंतजार करते हैं।![]()
रामलीला की गूंज केवल शाहजहांपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया ने इसका लोहा माना है। यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' का दर्जा दिया है । यूनेस्को के मुताबिक, रामलीला केवल रामायण का मंचन नहीं है, बल्कि यह गीतों, कहानियों और संवादों के जरिए पूरे समाज को जोड़ने का एक तरीका है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का ऐसा जश्न है, जो जाति और धर्म की दीवारों को गिरा देता है। शाहजहांपुर में जब रामलीला होती है, तो वह यूनेस्को की इसी परिभाषा को हकीकत में बदल देती है।
रामलीला का मंचन देखना अपने आप में एक अनुभव है। 29 सितंबर 2025 की रिपोर्ट बताती है कि ओसीएफ रामलीला में 'सीता हरण' का दृश्य इतना भावुक था कि दर्शक दीर्घा में बैठा हर शख्स उस दर्द को महसूस कर रहा था । यह अभिनय की ताकत ही है जो सदियों पुरानी कहानी को आज भी हमारे दिलों के करीब रखती है।
लेकिन मंच के पीछे भी एक दुनिया है जो अक्सर हमारी नजरों से ओझल रहती है। एक रामलीला को तैयार करने में रिहर्सल, वेशभूषा और पुतले बनाने वालों की मेहनत छिपी होती है। इसके इर्द-गिर्द एक पूरी 'मेला अर्थव्यवस्था' चलती है। जहाँ एक तरफ मंच पर राम-रावण का युद्ध चल रहा होता है, वहीं मैदान में कोई पिता अपने बच्चे को खिलौना दिला रहा होता है और कोई चाट-पकौड़े बेचकर अपनी रोजी-रोटी कमा रहा होता है। यही शाहजहांपुर की असली और जीती-जागती तस्वीर है।
अपनी परंपराओं को संजोने के साथ-साथ शाहजहांपुर का रंगमंच अब नई करवट ले रहा है। शहर के कलाकार अब केवल अपनी कहानियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे सात समंदर पार की कलाओं को भी अपना रहे हैं। 10 दिसंबर 2025 की एक खास खबर के मुताबिक, अब यहाँ के थिएटर कलाकार जापान और फिलीपींस की रंगमंच शैलियों से रूबरू होंगे ।
यह बदलाव एक बहुत बड़े सवाल का जवाब है कि अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी आधुनिक कैसे बना जाए? जब शाहजहांपुर का कोई कलाकार जापानी कला की बारीकियों को अपनी रामलीला में शामिल करेगा, तो उससे एक अनूठा संगम पैदा होगा। यह साबित करता है कि हमारा शहर अब दुनिया से सीखने और दुनिया को अपनी कला सिखाने के लिए पूरी तरह तैयार है। शाहजहांपुर का रंगमंच आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक हाथ में रामलीला की भव्य विरासत है और दूसरे हाथ में भविष्य की नई संभावनाएं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2beorrvt
https://tinyurl.com/24m9nt75
https://tinyurl.com/289fjd4v
https://tinyurl.com/2cu3f5fj
https://tinyurl.com/ycq3seyr
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