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भोजन सिर्फ़ पेट भरने का ज़रिया नहीं है, बल्कि यह किसी भी शहर की तहज़ीब, इतिहास और भूगोल का आइना होता है। एक पुरानी कहावत है कि इंसान वहीं बसता है जहाँ अनाज, पानी और बाज़ार उसका साथ दें। सदियों से रीति-रिवाज़ बदलते रहे, लेकिन रसोई से आने वाली पकवानों की ख़ुशबू यादों के रूप में आज भी ज़िंदा है।
शाहजहाँपुर का भोजन यहाँ की ज़मीन से गहराई से जुड़ा है। ज़िले के आधिकारिक विवरण को देखें तो एक व्यावहारिक सच्चाई सामने आती है, यहाँ का खानपान दिखावे के बजाय यहाँ पैदा होने वाली फ़सलों पर टिका है। शाहजहाँपुर की खेती की मुख्य ताक़त गेहूँ, धान (चावल), दालें और गन्ना हैं। यही वजह है कि यहाँ के आम आदमी के रोज़ाना के खाने में रोटी, चावल और गन्ने से बनी चीज़ों (जैसे गुड़ या चीनी) की अधिकता रहती है। यह एक सीधा सा नियम है: जो खेत में पैदा होता है, वही रसोई में पकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) की रिपोर्ट के मुताबिक, शाहजहाँपुर की मिट्टी और सिंचाई व्यवस्था ही यह तय करती है कि यहाँ के लोगों का 'आम भोजन' क्या होगा। ज़िले में दोमट और जलोढ़ मिट्टी की भरमार और पानी की अच्छी सुविधा ने धान, गेहूँ और गन्ने की खेती को बढ़ावा दिया है। यही कारण है कि स्थानीय बाज़ारों और मिठाई की दुकानों पर आपको इन्हीं अनाजों और गन्ने के रस से बनी मिठाइयाँ सबसे ज़्यादा मिलती हैं। असल में यह यहाँ का भूगोल ही है, जो हमारी थाली का स्वरूप तय करता है।
शाहजहाँपुर, लखनऊ के नज़दीक होने की वजह से अवधी खानपान के असर से बच नहीं सका। जब हम यहाँ के इतिहास को देखते हैं, तो पता चलता है कि कैसे भारतीय पाक कला ने अवधी व्यंजनों को अपनाया और वह शाहजहाँपुर तक पहुँचा। अवधी खाना अपनी 'दम पुख़्त' शैली (धीमी आंच पर पकाना) के लिए मशहूर है। यह सिर्फ़ खाना पकाने का तरीक़ा नहीं बल्कि एक हुनर है, जिसमें भोजन को उसकी अपनी ही भाप में धीरे-धीरे पकाया जाता है ताकि मसालों का स्वाद और ख़ुशबू उसमें पूरी तरह समा जाए।![]()
शाहजहाँपुर के कबाब, कोरमा और बिरयानी में भी लखनऊ जैसी ही नज़ाकत मिलती है। अवधी व्यंजनों की ख़ासियत यह है कि इसमें मसालों का इस्तेमाल बहुत संतुलित होता है। मुग़ल और फ़ारसी प्रभाव ने इस शैली को और बेहतर बनाया, जिसमें सूखे मेवे, केसर और दूध का इस्तेमाल बढ़ गया। शाहजहाँपुर के बावर्चीख़ानों में जब यह अंदाज़ स्थानीय अनाज और मसालों के साथ मिलता है, तो एक ऐसा स्वाद तैयार होता है जो शाही भी है और देसी भी। यहाँ के शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह के खानों में 'दम' शैली का प्रयोग इसे एक ऐतिहासिक पहचान देता है।
स्वाद की यह कहानी उन किसानों के ज़िक्र के बिना अधूरी है जो अनाज उगाते हैं। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) शाहजहाँपुर की रिपोर्ट बताती है कि यहाँ की खेती और स्थानीय हालात किस तरह भोजन की उपलब्धता से जुड़े हैं। धान और गेहूँ के अलावा, अब किसानों को नई तकनीक और बेहतर बीजों के बारे में बताया जा रहा है। केवीके (KVK) का मक़सद सिर्फ़ पैदावार बढ़ाना नहीं है, बल्कि फसलों की गुणवत्ता सुधारना भी है, ताकि हमारी थाली तक पौष्टिक खाना पहुँच सके।
भविष्य की बात करें तो केवीके (KVK) का 2025 का एक्शन प्लान यह बताता है कि शाहजहाँपुर का खानपान किस तरफ़ जा रहा है। अब ज़ोर सिर्फ़ पारंपरिक खेती पर नहीं, बल्कि फसलों में विविधता लाने और किसानों को बेहतर ट्रेनिंग देने पर है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में शाहजहाँपुर की थाली में और भी कई नई चीज़ें देखने को मिल सकती हैं। जब खेत में कुछ नया उगेगा, तो शहर का ज़ायका भी बदलेगा। यह खेत से बाज़ार तक का एक ऐसा सफ़र है जो लगातार बेहतर हो रहा है।
अब हम खेतों से निकलकर शहर के चहल-पहल भरे बाज़ारों की ओर चलते हैं। शाहजहाँपुर का 'स्ट्रीट फ़ूड' और त्योहारों की मिठाइयाँ यहाँ के साझा स्वाद को दर्शाती हैं। चाट के ठेले हों या मिठाई की दुकानें, यही वो जगहें हैं जहाँ लोग आपस में मिलते हैं और स्वाद का आनंद लेते हैं। लेकिन, आज के दौर में अब एक नई चीज़ जुड़ गई है- 'खाद्य सुरक्षा' (फ़ूड सेफ़्टी)।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) की 'क्लीन स्ट्रीट फ़ूड' पहल यह बताती है कि अब सिर्फ़ स्वाद ही काफ़ी नहीं है, बल्कि सफ़ाई भी उतनी ही ज़रूरी है। सरकार की कोशिश है कि मशहूर स्ट्रीट फ़ूड अड्डों पर साफ़-सफ़ाई के कड़े नियम लागू हों। इसमें खाना बनाने वालों के लिए दस्ताने और टोपी पहनने से लेकर साफ़ पानी के इस्तेमाल तक सब शामिल है। यह पहल उन पुराने स्वादों को सुरक्षित रखने की कोशिश है जिन्हें लोग पसंद करते हैं, ताकि वे एक स्वच्छ वातावरण में मिल सकें।
FSSAI द्वारा तय किए गए स्वच्छता के नियम अब सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये हमारी आधुनिक खानपान संस्कृति का हिस्सा बन रहे हैं। खाने को ढंककर रखना, काम की जगह साफ़ रखना और व्यक्तिगत स्वच्छता बरतना, ये सब अब हमारी परंपरा को और बेहतर बना रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब है कि शाहजहाँपुर के ज़ायके को बनाए रखने के लिए अब पुराने तरीक़ों के साथ-साथ नई सावधानियाँ भी बरतनी होंगी।
त्योहारों के समय जब बाज़ार सजते हैं, तब शाहजहाँपुर में प्रशासन की सख़्ती भी बढ़ जाती है। स्थानीय ख़बरों के अनुसार, खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई दिखाती है कि मिलावट के कारण दूध और खोये से बनी मिठाइयों पर भरोसा करना कितना मुश्किल हो गया है। हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई के दौरान प्रशासन ने क़रीब 650 किलोग्राम मिलावटी मावा (खोया) और सरसों का तेल नष्ट करवाया।
शाहजहाँपुर में यह कार्रवाई त्योहारों को देखते हुए की गई थी। जाँच में भारी मात्रा में ऐसा मावा और तेल मिला जो सेहत के लिए बहुत ख़तरनाक हो सकता था। अधिकारियों ने इसे तुरंत नष्ट करा दिया। यह घटना बताती है कि भले ही हमें अपने पारंपरिक स्वाद से प्यार है, लेकिन कुछ लालची लोगों की वजह से उस पर ख़तरा भी रहता है। ख़राब मावे और मिठाइयों को नष्ट करना यह साबित करता है कि अब प्रशासन और जनता दोनों ही क्वालिटी को लेकर जागरूक हो रहे हैं। यह आज के समय की सच्चाई है जहाँ 'स्वाद' और 'सेहत' के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।
शाहजहाँपुर आज एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ एक तरफ़ उसकी समृद्ध खेती की विरासत है, गेहूँ, धान और गन्ने के लहलहाते खेत, और दूसरी तरफ़ अवधी ज़ायके की शानदार ख़ुशबू। लेकिन सवाल यह है कि शाहजहाँपुर भविष्य में किस पहचान के साथ आगे बढ़ेगा? क्या सिर्फ़ ज़्यादा पैदावार के लिए, या फिर सुरक्षित और बेहतरीन स्वाद के लिए?
जैसे-जैसे शहर बदल रहा है, हमारी थाली भी बदल रही है। खेत, बाज़ार और नियम, ये तीनों मिलकर शाहजहाँपुर के ज़ायके का नया भविष्य लिख रहे हैं। ज़रूरत इस बात की है कि हम अपने पारंपरिक व्यंजनों के असली स्वाद को तो बचाए रखें, लेकिन उसमें आज के दौर की सफ़ाई और सुरक्षा को भी शामिल कर लें।
संदर्भ
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