मजबूती और नजाकत का संगम: शाहजहांपुर के टेक्सटाइल सफर की अनकही कहानी!

स्पर्श - बनावट/वस्त्र
11-01-2026 09:06 AM
मजबूती और नजाकत का संगम: शाहजहांपुर के टेक्सटाइल सफर की अनकही कहानी!

अगर हम किसी शहर को छूकर महसूस कर सकें, तो शाहजहांपुर का एहसास कैसा होगा? इतिहास गवाह है कि कपड़ा या टेक्सटाइल इंसान की सबसे पुरानी "तकनीक" है। यह सिर्फ शरीर को ढकने का साधन नहीं है, बल्कि यह हमारी त्वचा की रक्षा करता है, समाज में हमारा रुतबा तय करता है और अपनी बुनावट में यादों को समेटे रहता है। शाहजहांपुर को अगर हम 'स्पर्श' (Touch) के नजरिए से देखें, तो यहाँ दो बिल्कुल अलग तरह की दुनिया एक साथ बसती हैं। एक तरफ मशीनों की खड़खड़ाहट के बीच तैयार होती फौज की सख्त वर्दियां हैं, तो दूसरी तरफ सुई-धागे से उकेरी गई जरदोजी की मखमली चमक। आज हम इसी ताने-बाने के जरिए शाहजहांपुर की नई और पुरानी पहचान को समझने की कोशिश करेंगे।

शाहजहांपुर की औद्योगिक पहचान का सबसे बड़ा स्तंभ यहां स्थित 'ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री' (Ordnance Clothing Factory - OCF) है। जब हम शाहजहांपुर में कपड़े की बात करते हैं, तो शुरुआत इसी फैक्ट्री से होती है। यह कारखाना भारतीय सशस्त्र बलों के लिए वस्त्र तैयार करने के मकसद से स्थापित किया गया था। यहाँ बनने वाले कपड़े महज कपड़े नहीं हैं, बल्कि यह एक तरह का 'इंजीनियर्ड टेक्सटाइल' है, जिसे खास मकसदों के लिए तैयार किया जाता है।

सर्दियों की बर्फीली हवाओं से लेकर रेगिस्तान की तपती धूप तक, हमारे सैनिकों को हर मौसम में डटे रहना होता है। ऐसे में, शाहजहांपुर में सिली गई वर्दियां उनके लिए दूसरी त्वचा का काम करती हैं। यहाँ सिलाई, साइजिंग (Sizing) और कपड़ों की मजबूती पर जो काम होता है, वह मानकीकरण (Standardization) का बेहतरीन उदाहरण है। जब एक ही तरह की वर्दी हजारों सैनिकों के बदन पर सजती है, तो वह अनुशासन और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन जाती है। ओसीएफ (OCF) में मशीनों द्वारा तैयार किए गए ये वस्त्र हमें बताते हैं कि एक 'राष्ट्रीय वर्दी' का स्पर्श शरीर पर कैसा महसूस होता है—मजबूत, टिकाऊ और सुरक्षित।

फैक्ट्री की मशीनी दुनिया से निकलकर जब हम शहर की गलियों का रुख करते हैं, तो हमें एक बिल्कुल अलग 'टेक्सटाइल' का अनुभव होता है। यह है शाहजहांपुर का पारंपरिक हस्तशिल्प—'जरी-जरदोजी'। यह कला शाहजहांपुर की 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना का मुख्य चेहरा है। यहाँ मशीन का शोर नहीं, बल्कि कारीगरों की खामोश मेहनत बोलती है। जरदोजी का काम कपड़े को केवल सजाता नहीं है, बल्कि उसे रोशनी और गर्व की सतह में बदल देता है।
 

हालिया रिपोर्टों के अनुसार, शाहजहांपुर ओडीओपी (ODOP) वित्तपोषण योजना में उत्तर प्रदेश में 10वें स्थान पर रहा है, जो यह साबित करता है कि यहाँ के जरदोजी उद्योग में कितनी संभावनाएं हैं। जरदोजी कढ़ाई में धातु के तारों (गोल्डन या सिल्वर थ्रेड) का इस्तेमाल कर कपड़े पर उभरी हुई आकृतियां बनाई जाती हैं। यह काम बेहद बारीकी और धैर्य की मांग करता है। जब आप इस कढ़ाई को छूते हैं, तो आपको उन हजारों कारीगरों की मेहनत महसूस होती है जो पीढ़ियों से इस हुनर को जिंदा रखे हुए हैं। यह स्पर्श फौज की वर्दी की तरह सख्त नहीं, बल्कि शाही और नफीस है।

जरदोजी कारीगरों की जिंदगी हमेशा आसान नहीं रही है। लेकिन जैसा कि कुछ मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं, यह कला उम्मीद और मजबूती की कहानी भी बुन रही है। रेशम, साटन या मखमल के कपड़े पर जब सुई और धातु के तारों का मिलन होता है, तो एक साधारण कपड़ा भी कीमती परिधान बन जाता है। सामग्री और प्रक्रिया की जटिलता ही इसे खास बनाती है। कारीगरों का कहना है कि यह काम सिर्फ रोजी-रोटी नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। हालाँकि, बाज़ार के उतार-चढ़ाव और कच्चे माल की कीमतें अक्सर उनके माथे पर चिंता की लकीरें ला देती हैं, फिर भी उनकी उंगलियों का जादू कम नहीं होता।

हस्तशिल्प को बचाने और बढ़ाने के लिए सरकार की नीतियां अहम भूमिका निभाती हैं। ओडीओपी (ODOP) योजना का तर्क सीधा है—स्थानीय हुनर को वैश्विक बाजार तक पहुँचाना। नीति आयोग और ओडीओपी की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सरकार का जोर अब कारीगरों को आधुनिक प्रशिक्षण (Training), टूलकिट्स (Toolkits) और बाज़ार तक पहुँच (Market Access) प्रदान करने पर है। इसका मकसद यह है कि शाहजहांपुर का जरदोजी कारीगर बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे बड़ी सप्लाई चेन से जुड़ सके।

नीति आयोग इसे कारीगरों की आजीविका के लिए एक 'बेस्ट प्रैक्टिस' (Best Practice) मानता है। जब एक घर में बैठे कारीगर को सही ट्रेनिंग और बाज़ार मिलता है, तो शिल्प की गुणवत्ता (Craft Quality) से समझौता किए बिना उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। शाहजहांपुर में इस दिशा में हो रहे प्रयास यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि मशीनी युग में भी हाथ का हुनर अपनी कीमत न खोए। सरकारी मदद से अब कारीगर नए डिजाइनों और आधुनिक फैशन की मांग के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं।

कपड़ा उद्योग—चाहे वह फैक्ट्री का हो या हाथ का—अंततः रोजगार से जुड़ा है। शाहजहांपुर में कौशल विकास (Skill Development) कार्यक्रमों के जरिए यह साबित हो रहा है कि 'टच स्किल्स' (Touch Skills) यानी हाथों की कला आज भी नौकरी की गारंटी है। हाल ही में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा साझा की गई जानकारी के अनुसार, जिले में 'स्पेशलाइज्ड सिलाई मशीन ऑपरेटर' (Specialized Sewing Machine Operator) जैसे जॉब रोल के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

ये कार्यक्रम युवाओं, खासकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में मदद कर रहे हैं। सिलाई मशीन चलाना केवल एक यांत्रिक काम नहीं है, बल्कि यह कपड़े की समझ और बारीकी को पकड़ने का कौशल है। जब स्थानीय युवा इन कार्यक्रमों के जरिए प्रशिक्षित होते हैं, तो वे न केवल ओसीएफ जैसी फैक्ट्रियों में काम करने के योग्य बनते हैं, बल्कि अपना खुद का व्यवसाय भी शुरू कर सकते हैं। यह पहल दिखाती है कि शाहजहांपुर का कपड़ा उद्योग केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोगों की आजीविका का मुख्य जरिया भी है।

शाहजहांपुर की इस कहानी को हमें उत्तर प्रदेश के व्यापक परिदृश्य में देखना होगा। राज्य सरकार टेक्सटाइल और परिधान (Apparel) क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठा रही है। खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संत कबीर नगर और अन्य जिलों में टेक्सटाइल पार्क (Textile Parks) स्थापित करने की घोषणा की है। सरकार का उद्देश्य राज्य को एक ग्लोबल टेक्सटाइल हब बनाना है।

इस बड़ी योजना में शाहजहांपुर की स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। जब राज्य भर में निवेश आ रहा है और नए क्लस्टर बन रहे हैं, तो शाहजहांपुर को भी इसका लाभ मिलना तय है। बुनियादी ढांचे के विकास और निवेश से न केवल ओसीएफ जैसी इकाइयों को मजबूती मिलेगी, बल्कि जरदोजी जैसे कुटीर उद्योगों को भी नई उड़ान मिलेगी। यह शहर अब यूपी की टेक्सटाइल क्रांति का एक अहम हिस्सा बनने की ओर अग्रसर है।

अंत में, शाहजहांपुर के सामने एक अहम और जमीनी सवाल खड़ा है। क्या यह शहर एक ऐसा भविष्य बना सकता है जहाँ फैक्ट्री की वर्दियां और विरासत की जरदोजी एक साथ फल-फूल सकें? क्या मशीनीकरण और हस्तशिल्प एक-दूसरे से मुकाबला करने के बजाय एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं?

आज शाहजहांपुर 'स्पर्श' के इन दो छोरों पर खड़ा है। एक तरफ ओसीएफ है जो देश की सुरक्षा के लिए 'मजबूती' बुन रहा है, और दूसरी तरफ जरदोजी कारीगर हैं जो अपनी सुइयों से 'सौंदर्य' रच रहे हैं। सरकारी नीतियां और कौशल विकास कार्यक्रम इन दोनों के बीच एक पुल बनाने का काम कर रहे हैं। अगर यह तालमेल सही बैठा, तो शाहजहांपुर न केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान बचा पाएगा, बल्कि आधुनिक टेक्सटाइल जगत में भी अपनी धाक जमा सकेगा। यहाँ का कपड़ा सिर्फ धागों का जाल नहीं, बल्कि इस शहर की धड़कन है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/229awtkt
https://tinyurl.com/23fbcagx
https://tinyurl.com/2bqbm2qy
https://tinyurl.com/26erl99d
https://tinyurl.com/2dcp4jga
https://tinyurl.com/22mz8u8v

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