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अगर हम किसी शहर को उसके अहसास से पहचानें, तो शाहजहाँपुर का अनुभव कैसा होगा? इतिहास इस बात का गवाह है कि कपड़ा बुनना इंसान के सबसे पुराने हुनर में से एक है। यह सिर्फ़ शरीर ढंकने का साधन नहीं, बल्कि हमारी त्वचा की हिफ़ाज़त करता है, समाज में हमारी प्रतिष्ठा तय करता है और अपनी बुनावट में यादों को समेटे रहता है। शाहजहाँपुर को अगर हम 'स्पर्श' (Touch) के नज़रिए से देखें, तो यहाँ दो बिल्कुल अलग तरह की दुनिया एक साथ बसती हैं। एक तरफ़ मशीनों की गूँज के बीच तैयार होती फ़ौज की सख़्त वर्दियाँ हैं, तो दूसरी तरफ़ सुई-धागे से तराशी गई ज़रदोजी की मखमली चमक। आज हम इसी ताने-बाने के ज़रिए शाहजहाँपुर की नई और पुरानी पहचान को समझने की कोशिश करेंगे।
शाहजहाँपुर की औद्योगिक पहचान का सबसे मज़बूत स्तंभ यहाँ स्थित 'ऑर्डनेंस क्लोदिंग फ़ैक्ट्री' (OCF) है। जब भी शाहजहाँपुर में कपड़े का ज़िक्र होता है, तो शुरुआत इसी फ़ैक्ट्री से होती है। इस कारखाने को भारतीय सशस्त्र बलों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले वस्त्र तैयार करने के मक़सद से बनाया गया था। यहाँ बनने वाले कपड़े आम कपड़ों से अलग हैं; इन्हें खास ज़रूरतों और चुनौतियों के हिसाब से तैयार किया जाता है।
सर्दियों की बर्फीली हवाओं से लेकर रेगिस्तान की तपती धूप तक, हमारे सैनिकों को हर मौसम का सामना करना पड़ता है। ऐसे में, शाहजहाँपुर में सिली गई ये वर्दियाँ उनके लिए एक सुरक्षा कवच का काम करती हैं। यहाँ सिलाई, कपड़ों के नाप (Sizing) और उनकी मज़बूती पर जो बारीकी से काम होता है, वह अनुशासन का बेहतरीन उदाहरण है। जब एक ही तरह की वर्दी हज़ारों सैनिकों के बदन पर सजती है, तो वह राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बन जाती है। ओसीएफ (OCF) की मशीनों से तैयार ये वस्त्र हमें बताते हैं कि एक 'राष्ट्रीय वर्दी' का अहसास कैसा होता है “मज़बूत, टिकाऊ और पूरी तरह सुरक्षित।”
फ़ैक्ट्री की मशीनी दुनिया से निकलकर जब हम शहर की तंग गलियों का रुख करते हैं, तो हमें एक बिल्कुल अलग हुनर का अनुभव होता है। यह है शाहजहाँपुर का पारंपरिक हस्तशिल्प 'ज़री-ज़रदोजी'। यह कला शाहजहाँपुर की 'एक ज़िला एक उत्पाद' (ODOP) योजना का मुख्य चेहरा है। यहाँ मशीनों का शोर नहीं, बल्कि कारीगरों की खामोश मेहनत और उंगलियों का जादू बोलता है। ज़रदोजी का काम कपड़े को सिर्फ़ सजाता नहीं है, बल्कि उसे एक बेशक़ीमती और शाही रूप दे देता है।
ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार, शाहजहाँपुर ओडीओपी (ODOP) योजना के तहत वित्तीय मदद पाने में उत्तर प्रदेश में 10वें स्थान पर रहा है, जो यह साबित करता है कि यहाँ के ज़रदोजी उद्योग में कितनी संभावनाएँ हैं। ज़रदोजी कढ़ाई में सोने या चाँदी के धागों (धातु के तारों) का इस्तेमाल कर कपड़े पर उभरी हुई सुंदर आकृतियाँ बनाई जाती हैं। यह काम बहुत धैर्य और बारीकी का है। जब आप इस कढ़ाई को छूते हैं, तो आपको उन हज़ारों कारीगरों की मेहनत महसूस होती है जो पीढ़ियों से इस कला को ज़िंदा रखे हुए हैं। इसका अहसास फ़ौज की वर्दी जैसा सख़्त नहीं, बल्कि बेहद कोमल और नफ़ीस है।
ज़रदोजी कारीगरों की ज़िंदगी हमेशा आसान नहीं रही, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह कला अब नई उम्मीदें जगा रही है। रेशम, साटन या मखमल के कपड़े पर जब सुई और चमकते तारों का मिलन होता है, तो एक साधारण कपड़ा भी क़ीमती लिबास बन जाता है। इसे बनाने की जटिल प्रक्रिया ही इसे खास बनाती है। कारीगरों का मानना है कि यह काम सिर्फ़ उनकी रोज़ी-रोटी नहीं, बल्कि उनकी पहचान है। हालाँकि, बाज़ार के उतार-चढ़ाव और कच्चे माल की बढ़ती कीमतें कभी-कभी मुश्किलें पैदा करती हैं, फिर भी उनकी कला की चमक कम नहीं होती।
हस्तशिल्प को बचाने के लिए सरकार की नीतियां अहम भूमिका निभा रही हैं। ओडीओपी (ODOP) योजना का मक़सद सीधा है, स्थानीय हुनर को बड़े बाज़ारों तक पहुँचाना। नीति आयोग और ओडीओपी की वेबसाइट के अनुसार, सरकार अब कारीगरों को आधुनिक ट्रेनिंग, नए उपकरण (Toolkits) और बाज़ार तक सीधी पहुँच दिलाने पर ज़ोर दे रही है। इसका लक्ष्य यह है कि शाहजहाँपुर का कारीगर बिचौलियों पर निर्भर रहने के बजाय सीधे बड़ी सप्लाई चेन का हिस्सा बन सके।
नीति आयोग इसे कारीगरों की तरक़्क़ी के लिए एक बेहतरीन मॉडल मानता है। जब घर-घर में काम करने वाले कारीगरों को सही ट्रेनिंग और बाज़ार मिलता है, तो काम की क्वालिटी से समझौता किए बिना उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। शाहजहाँपुर में हो रहे ये प्रयास सुनिश्चित कर रहे हैं कि मशीनी युग में भी हाथ की कारीगरी अपनी चमक न खोए। सरकारी मदद से अब कारीगर नए डिज़ाइनों और आधुनिक फ़ैशन की माँग के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं।
कपड़ा उद्योग “चाहे वह फ़ैक्ट्री का हो या हाथ का” सीधे तौर पर रोज़गार से जुड़ा है। शाहजहाँपुर में कौशल विकास कार्यक्रमों के ज़रिए यह साबित हो रहा है कि हाथों का हुनर आज भी नौकरी की पक्की गारंटी है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की जानकारी के अनुसार, ज़िले में 'स्पेशलाइज्ड सिलाई मशीन ऑपरेटर' जैसे पदों के लिए विशेष ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जा रहे हैं।
ये कार्यक्रम युवाओं, और खासकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में बहुत मददगार साबित हो रहे हैं। सिलाई मशीन चलाना सिर्फ़ एक मैकेनिकल काम नहीं है, बल्कि यह कपड़े की प्रकृति और बारीकी को समझने की कला है। जब स्थानीय युवा इन कार्यक्रमों से जुड़ते हैं, तो वे न केवल ओसीएफ जैसी फ़ैक्ट्रियों में काम करने के योग्य बनते हैं, बल्कि अपना खुद का काम भी शुरू कर सकते हैं। यह पहल दिखाती है कि शाहजहाँपुर का कपड़ा उद्योग सिर्फ़ उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हज़ारों परिवारों के जीवन का आधार भी है।
शाहजहाँपुर की इस कहानी को हमें उत्तर प्रदेश के बड़े कैनवास पर देखना होगा। राज्य सरकार कपड़ा और परिधान (Apparel) क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए बड़े कदम उठा रही है। खबरों के मुताबिक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई ज़िलों में टेक्सटाइल पार्क स्थापित करने की योजना बनाई है। सरकार का उद्देश्य उत्तर प्रदेश को कपड़े के क्षेत्र में एक ग्लोबल हब बनाना है।
इस बड़ी योजना में शाहजहाँपुर की भूमिका बहुत अहम है। जब पूरे राज्य में निवेश आ रहा है, तो शाहजहाँपुर को भी इसका सीधा फ़ायदा मिलना तय है। बेहतर बुनियादी ढाँचे और नए निवेश से न केवल ओसीएफ जैसी इकाइयों को ताक़त मिलेगी, बल्कि ज़रदोजी जैसे छोटे उद्योगों को भी नई उड़ान मिलेगी। यह शहर अब यूपी की औद्योगिक प्रगति का एक ज़रूरी हिस्सा बनता जा रहा है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/229awtkt
https://tinyurl.com/23fbcagx
https://tinyurl.com/2bqbm2qy
https://tinyurl.com/26erl99d
https://tinyurl.com/2dcp4jga
https://tinyurl.com/22mz8u8v