कन्नौज का इत्र GI क्यों है खास, शाहजहांपुर को क्या फायदा?

गंध - सुगंध/परफ्यूम
11-01-2026 09:10 AM
कन्नौज का इत्र GI क्यों है खास, शाहजहांपुर को क्या फायदा?

क्या कभी ऐसा हुआ है कि अचानक किसी खुशबू ने आपको बरसों पुरानी किसी याद के दरवाजे पर ला खड़ा किया हो? शायद मिट्टी की सौंधी महक ने बचपन के किसी सावन की याद दिला दी हो, या इत्र की किसी खास सुगंध ने किसी पुराने अपने का एहसास करा दिया हो। शाहजहांपुर को अक्सर हम उसकी तारीख (इतिहास) या भूगोल से जानते हैं, लेकिन आज हम अपने शहर को उसकी 'महक' के जरिए महसूस करेंगे। विज्ञान और हमारे अनुभव बताते हैं कि खुशबू या गंध (Smell) केवल नाक का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे दिमाग का सबसे तेज 'टाइम मशीन' है।

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की एक रिपोर्ट बताती है कि गंध और हमारी याददाश्त के बीच एक गहरा और सीधा रिश्ता होता है। जब हम किसी चीज को सूंघते हैं, तो वह संकेत सीधे हमारे दिमाग के उन हिस्सों तक पहुंचते हैं जो भावनाओं और यादों को संभालने का काम करते हैं। यही कारण है कि कोई खास गंध हमें तुरंत खुश कर देती है या किसी पुरानी घटना की याद ताजा कर देती है। 

अक्सर हम सोचते हैं कि हम आंखों से जो देखते हैं या कानों से जो सुनते हैं, वही सबसे ज्यादा प्रभावशाली होता है। लेकिन विज्ञान का नजरिया थोड़ा अलग है। शोध बताते हैं कि गंध की जानकारी हमारे दिमाग के 'लिंबिक सिस्टम' (Limbic System) तक पहुंचती है, जिसमें 'एमिग्डाला' (Amygdala - जो भावनाओं को नियंत्रित करता है) और 'हिप्पोकैम्पस' (Hippocampus - जो यादों को जोड़ता है) शामिल हैं।

एनसीबीआई (NCBI) के एक शोध पत्र के अनुसार, गंध से जुड़ी यादें अन्य इंद्रियों की तुलना में ज्यादा भावनात्मक और स्थाई होती हैं। इसे 'इमोशनल लर्निंग' (emotional learning) कहा जाता है। यानी हमारा दिमाग किसी खुशबू को सिर्फ एक गंध के तौर पर नहीं, बल्कि एक भावना के तौर पर याद रखता है। शाहजहांपुर की गलियों में जब हम गुजरते हैं, तो हलवाई की दुकान से आती देसी घी की महक या पुराने बाजार की गंध हमारे दिमाग में एक नक्शा बना देती है। यह नक्शा सिर्फ रास्तों का नहीं, बल्कि अहसासों का होता है। 

शाहजहांपुर में जब चिलचिलाती गर्मी के बाद मानसून की पहली बारिश सूखी धरती पर पड़ती है, तो फिज़ा में एक जादुई खुशबू घुल जाती है। हम आम भाषा में इसे 'मिट्टी की सौंधी खुशबू' कहते हैं, लेकिन विज्ञान की दुनिया में इसका एक खास नाम है—'पेट्रीकोर' (Petrichor)।

इस शब्द का इतिहास बड़ा दिलचस्प है। 'पेट्रीकोर' शब्द का आविष्कार 1964 में ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों, इसाबेल जॉय बियर (Isabel Joy Bear) और रिचर्ड थॉमस (Richard Thomas) ने किया था। सीएसआईआरओ (CSIRO) के मुताबिक, यह शब्द ग्रीक भाषा के 'पेट्रा' (पत्थर) और 'इकोर' (देवताओं की नसों में बहने वाला तरल) से मिलकर बना है। इससे पहले इस खुशबू का कोई वैज्ञानिक नाम नहीं था, लेकिन इसका अहसास सदियों से मानव सभ्यता का हिस्सा रहा है। यह खुशबू हमें प्रकृति के साथ हमारे गहरे रिश्ते की याद दिलाती है।

लेकिन सवाल यह है कि यह खुशबू आखिर आती कहां से है?
अमेरिकन केमिकल सोसाइटी (ACS) के मुताबिक, यह जादू सिर्फ पानी और मिट्टी का नहीं है, बल्कि इसमें रसायन विज्ञान भी शामिल है। जब मिट्टी सूखती है, तो कुछ खास पौधे तेल छोड़ते हैं और मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया बीजाणु (spores) पैदा करते हैं। जब बारिश की बूंदें इस सूखी सतह पर गिरती हैं, तो ये यौगिक हवा में 'एयरोसोल' (aerosol) के रूप में उड़ते हैं और हमारी नाक तक पहुंचते हैं। यही वह प्रक्रिया है जो उस खास 'रैन स्मेल' (बारिश की गंध) को जन्म देती है, जिसका इंतजार शाहजहांपुर का हर किसान और शहरवासी बेसब्री से करता है। 

जब हम खुशबू की बात करते हैं, तो शाहजहांपुर के पड़ोसी जिले कन्नौज का जिक्र किए बिना बात अधूरी है। कन्नौज का इत्र न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरी दुनिया में मशहूर है। यह केवल एक खुशबू नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान है। भारत सरकार के भौगोलिक संकेतक (GI) रजिस्ट्री के तहत 'कन्नौज परफ्यूम' (Kannauj Perfume) को कानूनी संरक्षण प्राप्त है।

जीआई रजिस्ट्री के दस्तावेजों (आवेदन संख्या 157) के मुताबिक, कन्नौज के इत्र को यह दर्जा इसलिए मिला है क्योंकि इसे बनाने की विधि और इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री पूरी तरह से उस क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी से जुड़ी है। फूलों के अर्क को तांबे के बर्तनों (देग) में आसवन विधि (hydro-distillation) से निकाला जाता है। यह एक ऐसी कला है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। शाहजहांपुर, कन्नौज के करीब होने के कारण, इस खुशबूदार अर्थव्यवस्था का एक स्वाभाविक हिस्सेदार बन जाता है।

उत्तर प्रदेश सरकार अब इस पारंपरिक उद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है। 'इन्वेस्ट यूपी' (Invest UP) की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में परफ्यूम पार्क और इत्र उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास किया जा रहा है। इसका मकसद केवल खुशबू फैलाना नहीं, बल्कि रोजगार और व्यापार को बढ़ाना है।

शाहजहांपुर, जो कि एक महत्वपूर्ण व्यापारिक गलियारा है, इस बदलाव का सीधा लाभ उठा सकता है। जब कन्नौज में इत्र का उत्पादन बढ़ता है, तो उसका वितरण और व्यापार आसपास के जिलों से होकर ही गुजरता है। हमारे बाजार, शादी-विवाह के मौसम में उपहारों का आदान-प्रदान और रोजमर्रा के जीवन में इत्र और सुगंधित उत्पादों का उपयोग—यह सब हमें इस 'खुशबू की अर्थव्यवस्था' (Fragrance Economy) का एक सक्रिय उपभोक्ता और भागीदार बनाता है। हम सिर्फ दूर से देखने वाले दर्शक नहीं हैं, बल्कि इस सुगंधित कॉरिडोर का एक अहम हिस्सा हैं। 

खुशबू की यह यात्रा केवल सुखद अहसासों तक ही सीमित नहीं है। कभी-कभी 'बदबू' भी हमें एक जरूरी संदेश देने आती है। शाहजहांपुर में खन्नौत और गर्रा नदियों का बदलता स्वरूप इसका गवाह है। अमर उजाला की एक स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, शहर में नागरिक सुविधाओं की कमी और प्रदूषण के कारण कई इलाकों में हवा की गुणवत्ता और गंध बदली है।

जब हम किसी नदी के पास से गुजरते हैं और वहां से दुर्गंध आती है, तो यह केवल हमारी नाक के लिए परेशानी की बात नहीं है। यह प्रकृति की ओर से दी गई एक 'सार्वजनिक चेतावनी' है। यह बताती है कि हमारे जल स्रोत बीमार हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे कचरे के कुप्रबंधन और नालों के सीधे नदियों में गिरने से आस-पास रहने वाले लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। यह 'बुरी गंध' हमें याद दिलाती है कि अगर हमने अपने पर्यावरण और नागरिक जिम्मेदारियों पर ध्यान नहीं दिया, तो शहर की फिज़ा रहने लायक नहीं बचेगी। यह गंध हमें बताती है कि विकास के साथ-साथ स्वच्छता और रखरखाव कितना जरूरी है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम शाहजहांपुर को सिर्फ आंखों से नहीं, बल्कि अपनी नाक से भी समझें। यह शहर मिट्टी की सोंधी महक, खेतों की ताजगी, अगरबत्ती की धार्मिक सुगंध और बाजारों की रौनक से बना है।

हमें अपने शहर की 'स्मेल आर्काइव' (Smell Archive) तैयार करनी चाहिए। जिस तरह हम पुरानी इमारतों को हेरिटेज मानकर सहेजते हैं, उसी तरह हमें उन प्राकृतिक और सांस्कृतिक गंधों को भी बचाना होगा जो हमारी पहचान हैं। यह तभी संभव है जब हम 'अच्छी खुशबू' (जैसे हरियाली और इत्र) को बढ़ावा दें और 'बुरी गंध' (जैसे प्रदूषण और गंदगी) को खत्म करने के लिए एक जागरूक नागरिक बनें।

अगली बार जब बारिश की पहली बूंद गिरे, या आप बाजार से गुजरें, तो रुकिए और एक गहरी सांस लीजिए। सोचिए कि यह गंध आपको किस याद से जोड़ रही है। क्योंकि अंत में, शाहजहांपुर सिर्फ ईंट-पत्थर का शहर नहीं, बल्कि अनगिनत महकती हुई यादों का एक गुलदस्ता है।

संदर्भ
https://tinyurl.com/28tbrhfo
https://tinyurl.com/233jduvw
https://tinyurl.com/2cg8s8k7
https://tinyurl.com/29g7to77
https://tinyurl.com/yh9ncxmv
https://tinyurl.com/253bx2ng 
https://tinyurl.com/25drrxk7
 

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