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हर शहर की अपनी एक अलग पहचान और धड़कन होती है, जिसे वहां के शोर-शराबे और सन्नाटे में महसूस किया जा सकता है। शाहजहाँपुर की असली जान यहाँ की बोलियों और भाषाओं के उस ताने-बाने में बसती है, जो सदियों से चला आ रहा है। सुबह की अज़ान से लेकर मंदिरों की घंटियों तक, और बाज़ार की रौनक से लेकर बड़ों की संजीदा नसीहतों तक यह सब इस शहर का वह संगीत है जिसे हम 'भाषा' कहते हैं। ये आवाजें सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं हैं, बल्कि एक ऐसी विरासत हैं जो हमारी संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती हैं।
मगर आज भाषा के इस मधुर संगीत पर संकट के बादल छाए हुए हैं। यूनेस्को (UNESCO) ने पूरी दुनिया को आगाह किया है कि भाषाई विविधता बहुत तेजी से खत्म हो रही है। यूनेस्को का स्पष्ट मानना है कि जब कोई भाषा दम तोड़ती है, तो उसके साथ सिर्फ शब्द नहीं मरते, बल्कि एक पूरा समाज अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक पहचान खो देता है। भाषा हमारे सोचने और दुनिया को देखने का नज़रिया होती है, इसका लुप्त होना हमारी सामूहिक चेतना के एक बड़े हिस्से का हमेशा के लिए मिट जाना है।
शाहजहाँपुर के मामले में यह बात और भी गहरी हो जाती है क्योंकि यह शहर उत्तर भारत की उस ऐतिहासिक पट्टी पर स्थित है, जहाँ हिंदी और उर्दू सदियों से कंधे से कंधा मिलाकर चलती आई हैं। ज़िला स्तर के आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि यहाँ हिंदी बोलने वालों का बड़ा बहुमत है, लेकिन इसके साथ ही उर्दू भाषी आबादी भी यहाँ की संस्कृति का अटूट हिस्सा है। इसके अलावा, पंजाबी भाषा का भी यहाँ अपना एक विशेष स्थान है, जो इस शहर को एक बहुरंगी और बहुभाषी समाज की बेहतरीन मिसाल बनाता है।
इतिहास गवाह है कि शाहजहाँपुर की यह भाषाई विविधता रातों-रात नहीं आई। पुराने समय से ही यह शहर शाही प्रशासन, व्यापार और एक मिली-जुली शहरी संस्कृति से आकार लेता रहा है। 'ब्रिटानिका' के अनुसार, शाहजहाँपुर की भौगोलिक स्थिति ने इसे एक ऐसा केंद्र बनाया जहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग आकर बसे। इसी ऐतिहासिक विरासत ने यहाँ हिंदी और उर्दू के सह-अस्तित्व को मज़बूत किया, जिससे यहाँ का सामाजिक ढांचा और भी समृद्ध और गहरा होता चला गया।![]()
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने शाहजहाँपुर में एक बहुत ही व्यावहारिक 'दो भाषाओं की लय' को जन्म दिया। पुराने दौर में जहाँ प्रशासन की ज़रूरतें और अदालती दस्तावेज़ एक लिपि में होते थे, वहीं शायरी और साहित्य की दुनिया दूसरी ज़ुबान में महकती थी। लेकिन जब बात आम आदमी और बाज़ार की होती थी, तो वहां 'हिंदुस्तानी' का ही बोलबाला था। हिंदुस्तानी दरअसल हिंदी और उर्दू का वह सहज मेल है, जिसे कोई भी आसानी से समझ सकता था। चाहे कोर्ट की फाइल हो या महफ़िल की गज़ल, शाहजहाँपुर ने दोनों को बड़े प्यार से अपनी बांहों में समेटे रखा।
अगर हम 1951 की जनगणना के पुराने रिकॉर्ड्स को देखें, तो उस समय की 'मातृभाषा' और द्विभाषावाद पर बड़ी रोचक जानकारी मिलती है। उस दौर में भाषा केवल पहचान का मुद्दा नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल का आधार थी। आंकड़े बताते हैं कि लोग अपनी मातृभाषा के साथ-साथ दूसरी भाषाओं को भी उतने ही सम्मान के साथ अपनाते थे। अतीत के ये तरीके हमें बताते हैं कि शाहजहाँपुर हमेशा से भाषाई उदारता का केंद्र रहा है, जहाँ एक से ज़्यादा भाषाएं जानना किसी भी नागरिक के लिए गौरव की बात होती थी।
लेकिन समय के साथ तस्वीर बदल रही है। आज के डिजिटल दौर में स्कूल, विज्ञापन, मोबाइल टाइपिंग और मीडिया की चकाचौंध धीरे-धीरे हमारी बोलियों का गला घोंट रही है। हर चीज़ को एक मानक रूप (Standardisation) में ढालने की कोशिश की जा रही है। नतीजा यह है कि शाहजहाँपुर की वह खास भाषाई बुनावट अब सपाट होती जा रही है। नई पीढ़ी अब उन मुहावरों और शब्दों से दूर हो रही है, जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करते थे। आज यह स्थानीय प्रश्न बहुत बड़ा हो गया है, क्या हम आधुनिक बनने की दौड़ में अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं?
यह चिंता सिर्फ शाहजहाँपुर की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। भारत में भाषाओं के लुप्त होने का संकट गहराता जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, भारत की कई बोलियाँ आज 'लुप्तप्राय' (Endangered) की श्रेणी में आ चुकी हैं। जब हम अपनी स्थानीय भाषा को छोड़ देते हैं, तो हम उस ज्ञान परंपरा को भी खो देते हैं जो सदियों से हमारे पास थी। शाहजहाँपुर के संदर्भ में, यदि हम हिंदी-उर्दू के उस अनूठे संगम को खो देते हैं, तो हम उस राष्ट्रीय समस्या का शिकार हो रहे हैं जहाँ विविधता को एकता के नाम पर मिटाया जा रहा है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से किसी भाषा की 'जीवन शक्ति' इस बात पर निर्भर करती है कि उसे आने वाली पीढ़ी कितनी सहजता से अपना रही है। यूनेस्को के अनुसार, भाषा के खतरे का स्तर इस बात से मापा जाता है कि क्या बच्चे अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल घर के बाहर भी कर रहे हैं। यदि शाहजहाँपुर के बच्चे अपनी पारंपरिक बोलियों में बात करने में संकोच या हिचक महसूस करते हैं, तो इसका मतलब है कि हमारी भाषाई विरासत 'खतरे' के निशान के काफी करीब पहुँच चुकी है।
हालांकि, उम्मीद की किरण अभी पूरी तरह बुझी नहीं है। 'अमर उजाला' की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, शाहजहाँपुर के छात्रों ने भाषण और कविता पाठ प्रतियोगिताओं में अपनी शानदार प्रतिभा दिखाई है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि यदि बच्चों को सही मंच और प्रोत्साहन दिया जाए, तो वे अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जुड़ने के लिए बेताब हैं। छात्रों द्वारा किया गया यह प्रदर्शन बताता है कि शाहजहाँपुर की नई पौध अपनी भाषाई जड़ों को सींचने की पूरी क्षमता रखती है।
अब समय आ गया है कि हम शाहजहाँपुर की इन आवाजों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं। हमें एक 'शहर का स्वर-संग्रह' (City Archive of Voices) बनाने की ज़रूरत है। इसमें बुजुर्गों की शब्दावली को रिकॉर्ड करना, हिंदी-उर्दू के उन मिश्रित मुहावरों को सहेजना जो अब कम सुनाई देते हैं, और शिक्षा में बहुभाषी सिद्धांतों को लागू करना शामिल होना चाहिए। यूनेस्को का भी यही मानना है कि बहुभाषी शिक्षा न केवल भाषाई विरासत को बचाती है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। हमारी घर की भाषा का सम्मान होना चाहिए और उसे आधुनिक शिक्षा से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए।
शाहजहाँपुर के निवासियों को यह समझना होगा कि उनकी बोली ही उनकी असली शान है। चाहे वह बाज़ार की गहमागहमी हो या घर की शांति, अपनी भाषा में बात करना अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखने जैसा है। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि शाहजहाँपुर की यह शानदार जुगलबंदी कभी खामोश नहीं होगी। अपनी विरासत को सहेजना अब हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/2am2gj8m
https://tinyurl.com/y88qw42g
https://tinyurl.com/yr4kqbrm
https://tinyurl.com/2xu2b9vg
https://tinyurl.com/25uehwgh