समय - सीमा 9
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किसी भी शहर की अपनी एक धड़कन होती है, जो वहां के बाजारों की रौनक और मोहल्लों की खामोशी में महसूस की जा सकती है। लेकिन शाहजहाँपुर की असली धड़कन यहाँ का ‘साउंडस्केप’ यानी आवाजों का वह ताना-बाना है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है। सुबह की अज़ान से लेकर मंदिर की घंटियों तक, और बाज़ार में होने वाली हंसी-ठिठोली से लेकर बुजुर्गों की गंभीर नसीयतों तक—यह सब उस शहर का संगीत है जिसे हम ‘भाषा’ कहते हैं। यह आवाज़ें केवल संवाद का जरिया नहीं हैं, बल्कि यह एक ऐसी विरासत है जो हमारी पहचान को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाती है। अभिवादन के अनूठे तरीके, स्थानीय चुटकुले और प्रार्थनाओं के स्वर—यही वो धागे हैं जिनसे शाहजहाँपुर की पहचान का कपड़ा बुना गया है।
लेकिन आज इस भाषाई संगीत पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को - UNESCO) ने पूरी दुनिया को आगाह किया है कि भाषाई विविधता बहुत तेज़ी से कम हो रही है। यूनेस्को का स्पष्ट मानना है कि जब कोई भाषा दम तोड़ती है, तो उसके साथ केवल शब्द ही नहीं मरते, बल्कि एक पूरा समुदाय अपनी अनूठी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत खो देता है। भाषा हमारे सोचने और दुनिया को देखने का नज़रिया होती है; इसका गायब होना हमारी सामूहिक चेतना के एक हिस्से का मिट जाना है।
शाहजहाँपुर के संदर्भ में यह बात और भी गहरी हो जाती है क्योंकि यह शहर उत्तर भारत की उस ऐतिहासिक पट्टी पर स्थित है, जहाँ हिंदी और उर्दू सदियों से कंधे से कंधा मिलाकर चलती आई हैं। ज़िला स्तरीय आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि यहाँ हिंदी भाषियों का एक बड़ा बहुमत है, लेकिन इसके साथ ही उर्दू बोलने वाली एक बहुत ही प्रभावशाली आबादी भी यहाँ की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। इसके अलावा, यहाँ पंजाबी भाषा का भी अपना एक विशेष स्थान है, जो इस शहर को एक बहुभाषी समाज की मिसाल बनाता है।
इतिहास गवाह है कि शाहजहाँपुर की यह भाषाई विविधता अचानक नहीं आई। ऐतिहासिक रूप से यह शहर शाही दौर के प्रशासन, व्यापार और एक मिली-जुली शहरी संस्कृति से आकार लेता रहा है। ब्रिटानिका के अनुसार, शाहजहाँपुर की भौगोलिक और ऐतिहासिक स्थिति ने इसे एक ऐसा केंद्र बनाया जहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग आकर बसे। इसी ऐतिहासिक विरासत ने यहाँ हिंदी और उर्दू के सह-अस्तित्व को मज़बूत किया, जिससे यहाँ का सामाजिक ढांचा और भी समृद्ध हुआ।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि ने शाहजहाँपुर में एक बहुत ही व्यावहारिक ‘द्विभाषी लय’ को जन्म दिया। पुराने समय में यहाँ प्रशासन की ज़रूरतें और अदालती दस्तावेज़ एक लिपि में होते थे, तो शायरी और साहित्य की दुनिया दूसरी ज़ुबान में सजती थी। लेकिन जब बात आम आदमी की और बाज़ार की होती थी, तो वहां ‘हिंदुस्तानी’ का ही बोलबाला था। यह हिंदुस्तानी भाषा हिंदी और उर्दू का वह सहज मेल थी, जिसे कोई भी आसानी से समझ सकता था। चाहे वह अदालत की फाइल हो या महफ़िल की गज़ल, शाहजहाँपुर ने दोनों को अपनी बांहों में समेटे रखा।![]()
यदि हम 1951 की जनगणना के पुराने दस्तावेज़ों को देखें, तो उस समय की ‘मातृभाषा’ और द्विभाषावाद पर दिलचस्प चर्चा मिलती है। उस दौर में भाषा केवल पहचान का मुद्दा नहीं थी, बल्कि यह सामाजिक मेलजोल का आधार थी। आंकड़ों से पता चलता है कि लोग अपनी मातृभाषा के साथ-साथ दूसरी भाषाओं को भी उतने ही सम्मान के साथ अपनाते थे। अतीत के ये पैटर्न हमें बताते हैं कि शाहजहाँपुर हमेशा से ही भाषाई उदारता का केंद्र रहा है, जहाँ एक से अधिक भाषाओं को जानना किसी भी नागरिक के लिए गौरव की बात होती थी।
परंतु, वक्त के साथ तस्वीर बदल रही है। आज के डिजिटल युग में स्कूल, विज्ञापन, मोबाइल टाइपिंग और मीडिया की चकाचौंध धीरे-धीरे हमारी बोलियों का गला घोंट रही है। हर चीज़ को एक मानक रूप (Standardisation) में ढालने की कोशिश की जा रही है। नतीजा यह है कि शाहजहाँपुर की वह खास भाषाई बुनावट (Texture) अब सपाट होती जा रही है। युवा पीढ़ी अब उन मुहावरों और शब्दों से दूर हो रही है, जो कभी इस शहर की पहचान हुआ करते थे। आज यह स्थानीय प्रश्न बहुत बड़ा हो गया है—क्या हम आधुनिक बनने के चक्कर में अपनी जड़ों को तो नहीं काट रहे?
यह चिंता केवल शाहजहाँपुर की नहीं, बल्कि पूरे देश की है। भारत में भाषाओं के लुप्त होने का संकट गहराता जा रहा है। ‘क्लियर आईएएस’ के आंकड़ों के मुताबिक, भारत की कई बोलियाँ और भाषाएँ आज ‘लुप्तप्राय’ (Endangered) की श्रेणी में आ गई हैं। जब हम अपनी स्थानीय भाषा को छोड़ देते हैं, तो हम उस ज्ञान परंपरा को भी छोड़ देते हैं जो सदियों से हमारे पास थी। शाहजहाँपुर के संदर्भ में, यदि हम हिंदी-उर्दू के उस अनूठे मिश्रण को खो देते हैं, तो हम उस राष्ट्रीय प्रवृत्ति का शिकार हो रहे हैं जहाँ विविधता को एकता के नाम पर मिटाया जा रहा है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से किसी भाषा की ‘जीवन शक्ति’ (Vitality) इस बात पर निर्भर करती है कि उसे आने वाली पीढ़ी कितनी सहजता से अपना रही है। यूनेस्को के अनुसार, भाषाओं के खतरे का स्तर इस बात से मापा जाता है कि क्या बच्चे अपनी मातृभाषा को घर के बाहर भी इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि शाहजहाँपुर के बच्चे अपनी पारंपरिक बोलियों में बात करने में संकोच महसूस करते हैं, तो इसका मतलब है कि हमारी भाषाई विरासत ‘खतरे’ के निशान के करीब है।
हालांकि, उम्मीद की किरण अभी बुझी नहीं है। हाल ही में अमर उजाला की एक रिपोर्ट के अनुसार, शाहजहाँपुर के छात्रों ने भाषण और कविता पाठ प्रतियोगिताओं में अपनी शानदार प्रतिभा दिखाई है। यह आयोजन इस बात का प्रमाण है कि यदि बच्चों को सही मंच दिया जाए, तो वे अपनी भाषा और संस्कृति के साथ जुड़ने के लिए बेताब हैं। छात्रों द्वारा किया गया यह प्रदर्शन बताता है कि शाहजहाँपुर की नई पौध अपनी भाषाई जड़ों को सींचने की क्षमता रखती है।
अब समय आ गया है कि हम शाहजहाँपुर की इन आवाजों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाएं। हमें एक ‘शहर का स्वर-संग्रह’ (City Archive of Voices) बनाने की ज़रूरत है। इसमें बुजुर्गों की शब्दावली को रिकॉर्ड करना, हिंदी-उर्दू के उन मिश्रित मुहावरों का दस्तावेजीकरण करना जो अब कम सुनाई देते हैं, और शिक्षा में बहुभाषी सिद्धांतों को लागू करना शामिल होना चाहिए। यूनेस्को का भी यही मानना है कि बहुभाषी शिक्षा न केवल भाषाई विरासत को बचाती है, बल्कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। हमारी घर की भाषा का सम्मान होना चाहिए, उसे आधुनिक शिक्षा से बाहर नहीं किया जाना चाहिए।
शाहजहाँपुर के निवासियों को यह समझना होगा कि उनकी बोली उनकी शान है। चाहे वह बाज़ार की गहमागहमी हो या घर की शांति, अपनी भाषा में बात करना अपनी संस्कृति को ज़िंदा रखना है। आइए, हम सब मिलकर संकल्प लें कि शाहजहाँपुर की यह जुगलबंदी कभी खामोश नहीं होगी।
संदर्भ
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/2am2gj8m
https://tinyurl.com/y88qw42g
https://tinyurl.com/yr4kqbrm
https://tinyurl.com/2xu2b9vg
https://tinyurl.com/25uehwgh