शहीदों के शहर में सरोद का शोर: क्यों खास है शाहजहांपुर का यह 100 साल पुराना घराना?

ध्वनि I - कंपन से संगीत तक
11-01-2026 09:02 AM
शहीदों के शहर में सरोद का शोर: क्यों खास है शाहजहांपुर का यह 100 साल पुराना घराना?

शाहजहांपुर का नाम लेते ही अक्सर हमारे जेहन में काकोरी के शहीदों और गन्ने के खेतों की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस शहर की एक पहचान ऐसी भी है जो आंखों से नहीं, बल्कि कानों से महसूस की जाती है। यह पहचान है—संगीत। हाल ही में शुरू हुए 'शाहजहांपुर महोत्सव 2025' ने एक बार फिर उस विरासत की याद ताजा कर दी है, जो पीढ़ियों से इस शहर की हवा में घुली हुई है।

आज हम शाहजहांपुर की कहानी को एक अलग नजरिए से देखेंगे—एक कंपन से शुरू होकर एक मुकम्मल संगीत बनने तक का सफर। यह कहानी है कि कैसे एक तार की थरथराहट एक पूरे शहर की सांस्कृतिक पहचान बन जाती है, जो पीढ़ियों तक जिंदा रहती है। संगीत को समझने के लिए हमें सबसे पहले उस विज्ञान को समझना होगा जो इसके पीछे काम करता है। जिसे हम ध्वनि या 'साउंड' कहते हैं, वह असल में 'यांत्रिक कंपन' (Mechanical vibration) है। जब कोई वस्तु थरथराती है, तो वह हवा में लहरें पैदा करती है, जो हमारे कानों तक पहुंचती हैं।

ध्वनिकी (Acoustics) का सिद्धांत बताता है कि हर शोर संगीत नहीं होता। कुछ खास तरह के कंपन, जिन्हें हम 'स्वर' कहते हैं, हमारे कानों को अच्छे लगते हैं। जब एक तार को छेड़ा जाता है, तो उसमें 'अनुनाद' (Resonance) पैदा होता है। यही वह विज्ञान है जो तय करता है कि कौन सा स्वर 'स्थिर' और सुकून देने वाला लगेगा, और कौन सा स्वर तनाव पैदा करेगा। शाहजहांपुर के उस्तादों ने सदियों पहले इस विज्ञान को बिना किसी प्रयोगशाला के समझ लिया था। उन्होंने जाना कि कैसे कंपन को नियंत्रित करके दिलों को जीता जा सकता है।

शाहजहांपुर की संगीत यात्रा का सारथी एक खास वाद्य यंत्र है—सरोद। लेकिन सरोद ही क्यों? सरोद अन्य तार वाद्ययंत्रों से अलग है क्योंकि इसका फिंगरबोर्ड (कीबोर्ड) लकड़ी का नहीं, बल्कि धातु का होता है और इस पर कोई 'फ्रेट्स' या खांचे नहीं होते। सरोद की यही बनावट इसे खास बनाती है। चूंकि इस पर कोई रुकावट नहीं होती, इसलिए कलाकार अपनी उंगलियों को तारों पर फिसला सकता है। इसे 'मींड' कहा जाता है। सरोद का ऐतिहासिक विकास इसे एक ऐसे वाद्य यंत्र के रूप में स्थापित करता है जो गायकी के अंदाज में बज सकता है। जब शाहजहांपुर का कोई कलाकार सरोद के तारों पर उंगलियां फिसलाता है, तो वह ध्वनि विज्ञान के उस नियम का इस्तेमाल कर रहा होता है जो अलग-अलग सुरों को एक अटूट धारा में जोड़ देता है।

संगीत केवल यंत्र में नहीं, बल्कि उसे बजाने के तरीके में होता है। यहीं पर 'घराना' शब्द का महत्व सामने आता है। यह शहर 'सेनिया-शाहजहांपुर घराने' का गढ़ रहा है। एक घराना सिर्फ गानों की सूची नहीं होता। यह 'तकनीक', सुरों को आकार देने का एक अनुशासित तरीका है। सेनिया-शाहजहांपुर घराने की खासियत इसकी स्पष्टता और गहराई है। यहाँ उस्ताद अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि कैसे उस बिना खांचे वाले सरोद पर सुरों को साधना है। यह परंपरा बताती है कि शाहजहांपुर का संगीत कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सैकड़ों सालों की साधना और 'रियाज' का नतीजा है जिसे उस्तादों ने सीने से लगाकर रखा है।

संगीत का असली जादू तब चलता है जब वह बंद कमरे से निकलकर खुली हवा में आता है। शाहजहांपुर में संगीत केवल मंचों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह यहाँ के दैनिक जीवन का हिस्सा रहा है। यह शहर उन छोटे-छोटे कमरों और बैठकों का गवाह है जहाँ संगीत सीखा और सुना जाता है। जब एक शिष्य अपने गुरु के सामने बैठकर घंटों एक ही राग का रियाज करता है, तो वह 'निजी साधना' होती है। लेकिन जब वही संगीत शाहजहांपुर के सांस्कृतिक मंचों पर गूंजता है, तो वह पूरे समाज की 'साझा याद' बन जाता है। शहर का ऐतिहासिक और भौगोलिक परिवेश ने कला और संस्कृति को पनपने के लिए एक स्थिर आधार दिया। यहाँ के लोग सिर्फ श्रोता नहीं, बल्कि इस विरासत के हिस्सेदार हैं।

आज के दौर में जब हर तरफ शोर है और डीजे (DJ) का संगीत हावी है, शाहजहांपुर के इस शास्त्रीय संगीत का क्या भविष्य है? आधुनिकता की आंधी में इस विरासत को बचाना आसान नहीं है। शिक्षण के तरीके बदल रहे हैं और प्रदर्शन की चुनौतियां बढ़ गई हैं। आज के 'शॉर्ट-फॉर्म मीडिया' के युग में, जहाँ लोगों के पास धैर्य कम है, सरोद की धीमी और गंभीर आलाप को सुनने वाले कम हो रहे हैं। फिर भी, यह परंपरा इसलिए जिंदा है क्योंकि कुछ लोग इसे 'बचाने' के लिए नहीं, बल्कि इसे जीने के लिए बजा रहे हैं। वे जानते हैं कि मशीनी शोर कुछ पल का है, लेकिन तार का कंपन रूह तक उतरता है।

इस तमाम जद्दोजहद के बीच, उम्मीद की किरण अभी भी चमक रही है। 'शाहजहांपुर महोत्सव 2025' की शुरुआत एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ हुई है। यह आयोजन सिर्फ मेले और खाने-पीने का नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि शहर अपनी जड़ों को भूला नहीं है। महोत्सव के मंच पर जब स्थानीय कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं, तो वे उस सवाल का जवाब देते हैं कि "एक ध्वनि को जिंदा रखने" का क्या मतलब है। यह मंच नई पीढ़ी को यह बताने का जरिया है कि उनके शहर का नाम दुनिया के संगीत नक्शे पर कितनी मजबूती से दर्ज है। भीड़ की तालियां और सरोद की झनकार यह साबित करती है कि शाहजहांपुर का दिल आज भी अपने पुराने सुरों के साथ धड़क रहा है।

अंत में, शाहजहांपुर की कहानी एक तार के कंपन से शुरू होकर एक अनंत संगीत पर खत्म होती है। यह शहर हमें सिखाता है कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक पहचान है जो पीढ़ियों से पीढ़ियों तक सफर करती है। हर जगह एक ही बात गूंजती है कि इमारतें गिर सकती हैं, रास्ते बदल सकते हैं, लेकिन एक बार हवा में घोला गया वह सुर कभी नहीं मरता।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/25oz3269
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/y232lf3r
https://tinyurl.com/256t28b6
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https://tinyurl.com/279mlqex
https://tinyurl.com/29ap7zq7 

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