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शाहजहाँपुर का नाम आते ही अक्सर हमारे मन में काकोरी के अमर शहीदों और दूर-दूर तक फैले गन्ने के खेतों की तस्वीर उभरती है। लेकिन इस ऐतिहासिक शहर की एक पहचान ऐसी भी है, जिसे आँखों से देखा नहीं, बल्कि सिर्फ कानों से महसूस किया जा सकता है। यह अनूठी पहचान यहाँ का संगीत है। हाल ही में शुरू हुए 'शाहजहाँपुर महोत्सव 2025' ने एक बार फिर उस गौरवशाली विरासत की याद ताज़ा कर दी है, जो पीढ़ियों से इस शहर की आबोहवा में रची-बसी है।
कैसे एक तार की थरथराहट किसी शहर की सांस्कृतिक पहचान बन जाती है और दशकों तक लोगों के दिलों में ज़िंदा रहती है। संगीत की बारीकियों को समझने के लिए सबसे पहले हमें उस विज्ञान को समझना होगा जो इसके पीछे काम करता है। जिसे हम ‘ध्वनि' कहते हैं, वह असल में 'यांत्रिक कंपन' (Vibration) है। जब कोई वस्तु कांपती है, तो वह हवा में लहरें पैदा करती है, जो हमारे कानों तक पहुँचकर सुनाई देती है।
ध्वनि विज्ञान (Acoustics) का सिद्धांत कहता है कि हर ‘शोर’ संगीत नहीं होता। कुछ विशेष प्रकार के कंपन, जिन्हें हम 'स्वर' कहते हैं, हमारे कानों को सुकून देते हैं। जब सरोद के एक तार को छेड़ा जाता है, तो उसमें 'अनुनाद' (Resonance) पैदा होता है। यही वह विज्ञान है जो तय करता है कि कौन सा सुर मन को शांति देगा और कौन सा तनाव पैदा करेगा। शाहजहाँपुर के उस्तादों ने सदियों पहले बिना किसी आधुनिक लैब के इस जटिल विज्ञान को समझ लिया था। उन्होंने बखूबी जाना कि कंपन को नियंत्रित कर कैसे सीधे लोगों के रूह तक पहुँचा जा सकता है। शाहजहाँपुर की इस संगीतमय यात्रा का असली नायक एक खास वाद्य यंत्र है “सरोद।” 
लेकिन सवाल उठता है कि सरोद ही क्यों?
दरअसल, सरोद अन्य तार वाले वाद्यों से बिल्कुल अलग है क्योंकि इसका फिंगरबोर्ड लकड़ी का नहीं, बल्कि चमकदार धातु का होता है और इस पर कोई 'फ्रेट्स' (frets) या खांचे नहीं होते। सरोद की यही बनावट उसे बेमिसाल बनाती है। चूंकि इसमें कोई रुकावट नहीं होती, इसलिए कलाकार अपनी उंगलियों को तारों पर बिना रुके फिसला सकता है, जिसे संगीत की दुनिया में 'मींड' कहा जाता है। सरोद का विकास इसे एक ऐसे वाद्य के रूप में स्थापित करता है जो बिल्कुल गायकी के अंदाज़ में बज सकता है। जब शाहजहाँपुर का कोई मंझा हुआ कलाकार सरोद पर अपनी उंगलियाँ चलाता है, तो वह उसी ध्वनि विज्ञान का उपयोग कर रहा होता है जो अलग-अलग सुरों को एक अटूट धारा में पिरो देता है।
संगीत केवल यंत्र में नहीं, बल्कि उसे बजाने के खास ढंग में छिपा होता है। यहीं पर 'घराना' परंपरा का महत्व समझ आता है। यह शहर 'सेनिया-शाहजहाँपुर घराने' का मज़बूत गढ़ रहा है। सेनिया-शाहजहाँपुर घराने की सबसे बड़ी खूबी इसकी स्पष्टता और सुरों की गहराई है। यहाँ के उस्ताद अपने शिष्यों को सिखाते हैं कि बिना खांचे वाले सरोद पर सुरों को कैसे साधा जाता है। यह परंपरा बताती है कि यहाँ का संगीत कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सैकड़ों वर्षों की कड़ी तपस्या और 'रियाज़' का प्रतिफल है जिसे उस्तादों ने अपनी जान से प्यारा समझकर सहेज रखा है।
संगीत का असली जादू तब नज़र आता है जब वह बंद कमरों की साधना से निकलकर खुली महफ़िलों में आता है। शाहजहाँपुर में संगीत कभी सिर्फ बड़े मंचों की जागीर नहीं रहा, बल्कि यह यहाँ के आम जनजीवन का हिस्सा रहा है। यह शहर उन छोटी-छोटी बैठकों और कमरों का गवाह है जहाँ संगीत सीखा और परखा जाता रहा। जब एक शिष्य अपने गुरु के सामने बैठकर घंटों एक ही राग का अभ्यास करता है, तो वह उसकी 'निजी साधना' होती है। लेकिन जब वही संगीत शाहजहाँपुर के सांस्कृतिक मंचों पर गूँजता है, तो वह पूरे समाज की 'साझी विरासत' बन जाता है। यहाँ के ऐतिहासिक परिवेश ने कला को पनपने के लिए एक मज़बूत आधार दिया है, जहाँ के लोग सिर्फ दर्शक नहीं, बल्कि इस विरासत के सच्चे संरक्षक हैं।
आज के इस दौर में जब हर तरफ शोर-शराबा है और डीजे (DJ) का शोर हावी होता जा रहा है, ऐसे में शाहजहाँपुर के इस शास्त्रीय संगीत के भविष्य पर सवाल उठना लाज़मी है। आधुनिकता की इस आंधी में अपनी पुरानी विरासत को बचाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है। सीखने-सिखाने के तरीके बदल रहे हैं और कलाकारों के सामने प्रदर्शन की नई चुनौतियाँ हैं। आज के 'शॉर्ट-फॉर्म मीडिया' के युग में, जहाँ लोगों के पास धैर्य की कमी है, सरोद की उस धीमी और गंभीर आलाप को सुनने वाले कम हो रहे हैं। फिर भी, यह परंपरा इसलिए जीवित है क्योंकि कुछ फनकार इसे सिर्फ 'बचाने' के लिए नहीं, बल्कि इसे 'जीने' के लिए बजा रहे हैं। वे जानते हैं कि मशीनी शोर क्षणिक है, लेकिन तार की झनकार सीधे रूह में उतरती है।
इस तमाम संघर्ष के बीच, उम्मीद की किरण आज भी उतनी ही चमकदार है। 'शाहजहाँपुर महोत्सव 2025' की भव्य शुरुआत इस बात का जीवंत प्रमाण है कि यह शहर अपनी जड़ों को भूला नहीं है। यह आयोजन सिर्फ एक मेला या खान-पान का ज़रिया नहीं है, बल्कि अपनी संस्कृति को सम्मान देने का एक तरीका है। जब महोत्सव के मंच पर स्थानीय कलाकार अपनी प्रतिभा दिखाते हैं, तो वे दुनिया को बताते हैं कि "एक सुर को ज़िंदा रखने" का असली अर्थ क्या है। यह मंच नई पीढ़ी को यह सिखाने का माध्यम है कि उनके शहर का नाम विश्व संगीत के मानचित्र पर कितनी मज़बूती से अंकित है। दर्शकों की तालियाँ और सरोद की गूँज यह साफ़ करती है कि शाहजहाँपुर का दिल आज भी अपने पुराने सुरों के साथ पूरी शिद्दत से धड़क रहा है।
कुल मिलाकर शाहजहाँपुर की यह कहानी एक तार के कंपन से शुरू होकर एक अनंत संगीत यात्रा पर समाप्त होती है। यह शहर हमें सिखाता है कि संगीत महज़ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि एक पहचान है जो एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक सफर करती है। आज भी यहाँ की हवाओं में एक ही बात गूँजती है कि पुरानी इमारतें ढह सकती हैं, रास्तों के नक्शे बदल सकते हैं, लेकिन एक बार फिज़ाओं में घोला गया वह पवित्र सुर कभी नहीं मरता।
संदर्भ
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