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जब हम शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं, तो हमें केवल एक शहर नहीं, बल्कि लाखों लोग दिखाई देते हैं जो इस देश की धड़कन हैं। लेकिन क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि एक 'भीड़' और एक 'नागरिक' में क्या फर्क होता है? शाहजहांपुर के इतिहास और आज के हालात को अगर हम 'नागरिक की पहचान' के नजरिए से देखें, तो यह एक बहुत लंबी यात्रा दिखाई देती है। यह सफर अंग्रेजों के जमाने की 'प्रजा' से शुरू होकर आधुनिक भारत के उस 'नागरिक' तक जाता है, जिसे अपनी पहचान साबित करनी होती है, जिसकी पंजीकरण होती है, और जो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना जानता है।
आज शाहजहांपुर में एक नागरिक होने का मतलब केवल यहाँ पैदा हो जाना नहीं है। इसका असली मतलब है “कागजों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराना, सरकारी दफ्तरों के नक्शे में अपनी जगह बनाना, और लोकतंत्र में अपनी आवाज बुलंद करना।” यह कहानी उस अधिकार की है जिसे पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने जान दी और जिसे बनाए रखने के लिए आज हम कतारों में खड़े होते हैं।
नागरिकता: क्या यह कोई उपहार है या हमारा बुनियादी हक?
इतिहास गवाह है कि इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका देश होता है। मानवाधिकारों की वैश्विक घोषणा का अनुच्छेद 15 साफ शब्दों में कहता है "हर किसी को राष्ट्रीयता का अधिकार है।" यह पंक्ति मानव इतिहास का एक अहम मोड़ थी। इसका मतलब था कि कोई भी इंसान बेनाम या बेघर नहीं हो सकता; उसे किसी न किसी देश का नागरिक होने का पूरा हक है। शाहजहांपुर का हर निवासी, इसी वैश्विक अधिकार के तहत अपनी पहचान का दावा करता है।
जब भारत आजाद हुआ, तो हमारे संविधान निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि इस नए देश का नागरिक कौन होगा? भारतीय संविधान के भाग 2 के दस्तावेज हमें बताते हैं कि उन्होंने इसे कैसे तय किया। अनुच्छेद 5 से 11 ने ही वह नींव रखी, जिस पर आज पूरे देश की नागरिकता टिकी है। इसके बाद आया 'नागरिकता अधिनियम 1955', जो उस संवैधानिक वादे को एक कानूनी 'प्रक्रिया' में बदलता है। यह कानून बताता है कि आप नागरिकता कैसे पा सकते हैं। शाहजहांपुर के किसी भी व्यक्ति के लिए, भारतीय होने का कानूनी आधार यही दस्तावेज है।
बिस्मिल की विरासत और आज के दफ्तरों की कतारें क्या कहती हैं?
लेकिन नागरिकता केवल कानूनों की मोटी किताब नहीं है, यह एक जज्बा भी है। शाहजहांपुर में इस जज्बे का जन्म आजादी की लड़ाई के दौरान हुआ था। हमारे शहर के महान सपूत, राम प्रसाद बिस्मिल का संघर्ष हमें बताता है कि उस दौर में 'नागरिक' होने का मतलब था—विदेशी सत्ता को ठुकराना और अपनी आजादी को छीनना। बिस्मिल के लिए आजादी कोई भीख नहीं थी, बल्कि एक ऐसा अधिकार था जिसे नागरिकों को खुद हासिल करना था।
बिस्मिल के दौर से आगे बढ़कर, आज के शाहजहांपुर में नागरिकता का मतलब बदल गया है। अब इसका मतलब है—प्रशासन के साथ जुड़ना। सदर, पुवायां, तिलहर और जलालाबाद जैसी तहसीलें और विकास खंड ही आज 'सरकार' का असली चेहरा हैं। जब एक निवासी को जाति प्रमाण पत्र चाहिए होता है, या सरकारी योजनाओं का लाभ लेना होता है, तो वह इन्हीं दफ्तरों का दरवाजा खटखटाता है। यहीं पर एक आम इंसान सरकारी सेवा के नक्शे में दर्ज होता है और संविधान के बड़े-बड़े वादे एक प्रमाण पत्र के रूप में उसके हाथ में आते हैं।
क्या आज हमारी पहचान चेहरे से नहीं, कागजों से होती है?
आज के दौर की कड़वी सच्चाई यह है कि आपकी पहचान आपके चेहरे से ज्यादा आपके दस्तावेजों से होती है। आधार नामांकन की प्रक्रिया पूरी तरह से 'पहचान के प्रमाण' और 'पते के प्रमाण' पर टिकी है। अगर किसी के पास कागज नहीं हैं, तो सिस्टम के लिए वह अदृश्य है। शाहजहांपुर के आधार केंद्रों पर लगी लंबी लाइनें बताती हैं कि आज 'रोजमर्रा की नागरिकता' दस्तावेजों में कैद है।
लेकिन इन सबके बीच, नागरिकता का सबसे बड़ा उत्सव है “भागीदारी।” और इस भागीदारी का सबूत है मतदाता सूची। शाहजहांपुर में जब मतदाता सूची को अपडेट करने का काम चलता है, तो बूथ लेवल ऑफिसर (Bootgh level officerr - BLO) की भागदौड़ यह तय करती है कि लोकतंत्र में किसकी गिनती होगी। जिसका नाम इस सूची में है, वही सरकार चुनने का असली हकदार है। जब BLO घर-घर जाकर सत्यापन करता है, तो वह असल में यह सुनिश्चित कर रहा होता है कि शाहजहांपुर का हर पात्र नागरिक लोकतंत्र की मुख्यधारा में शामिल हो सके।
संदर्भ
https://tinyurl.com/27uvfw6a
https://tinyurl.com/2ckurfp2
https://tinyurl.com/28tptl9a
https://tinyurl.com/2yua4xyl
https://tinyurl.com/ygx7e9kz
https://tinyurl.com/yp2y49ch