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शहरीकरण का नाम जुबान पर आते ही अक्सर हमारी आँखों के सामने गगनचुंबी इमारतें और चकाचौंध से भरे मॉल तैरने लगते हैं। लेकिन अगर आप शाहजहांपुर की नब्ज टटोलें, तो यहाँ कहानी कुछ और ही बयां होती है। यहाँ शहर के विकास की नींव कंक्रीट के जंगलों पर नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' और 'रफ्तार' पर टिकी है।
शाहजहांपुर इस बात का जीता-जागता सबूत है कि एक शहर असल मायनों में तभी फैलता है, जब वह अपने संसाधनों को रोजगार और बिजली में बदलने का हुनर सीख ले। यहाँ गन्ने के खेत सिर्फ चीनी की मिठास नहीं घोल रहे, बल्कि उस ईंधन को पैदा कर रहे हैं जिससे इस शहर की रफ़्तार बनी हुई है।
शाहजहांपुर की इस ऊर्जा को महसूस करने के लिए, यहाँ की मिट्टी की तासीर को समझना जरूरी है। यहाँ की जलवायु और उपजाऊ जमीन गन्ने की खेती के लिए किसी कुदरती वरदान से कम नहीं है। जिस तरह अलास्का में 'फर' को सफेद सोना माना जाता था, उसी तरह यहाँ गन्ना और खेती का तालमेल (Agro-ecology) ही वह धुरी है, जिस पर जिले की पूरी अर्थव्यवस्था घूम रही है। यहाँ का शहरीकरण किसी बाहरी मदद का मोहताज नहीं, बल्कि यह अपनी ही 'फसल-अर्थव्यवस्था' (Crop Economy) को 'ऊर्जा-अर्थव्यवस्था' (Energy Economy) में बदलकर अपनी जड़ें मजबूत कर रहा है।
एक आम इंसान की नजर में गन्ने का रस निकलने के बाद बची हुई 'खोई' महज एक कचरा हो सकती है, लेकिन शाहजहांपुर की चीनी मिलों के लिए यह 'काला सोना' है। यहाँ 'बगास को-जनरेशन' तकनीक ने कचरे को ताकत में बदल दिया है। आसान शब्दों में समझें तो चीनी मिलें इसी खोई को जलाकर भारी मात्रा में भाप और बिजली पैदा कर रही हैं। यह बिजली न सिर्फ मिलों की विशाल टर्बाइन को घुमाती है, बल्कि शहर को रोशन भी करती है। यह कचरे से कंचन (ऊर्जा) बनाने का वो तरीका है, जो शाहजहांपुर के विकास को टिकाऊ (Sustainable) बनाता है।![]()
खुद की बिजली, खुद की ताकत इस तकनीक का असली जादू देखना हो तो शाहजहांपुर के पुवायां स्थित 'बजाज हिंदुस्तान शुगर मिल' (मकसूदापुर यूनिट) पर नजर डालिए। यहाँ 21 मेगावाट का 'कैप्टिव पावर प्लांट' लगा है, जो अपनी बिजली खुद बनाने की नायाब क्षमता रखता है। यही वो ताकत है जो मिलों के चक्कों को बिना रुके घूमने का हौसला देती है। जब मिल की चिमनी से धुआं निकलता है, तो आसपास के कस्बों में रोजगार के दीये जल उठते हैं।
शाहजहांपुर में साल के 12 महीने एक जैसे नहीं होते। यहाँ का शहरी जीवन चीनी मिलों के 'पराई सत्र' (Crushing Season) के साथ सांस लेता है। जैसे ही मिलों का सायरन बजता है, सड़कों पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की कतारें किसी सेना की तरह उमड़ पड़ती हैं। वेल्डिंग की दुकानें, ढाबे और ट्रांसपोर्ट का कारोबार अचानक दौड़ पड़ता है। एक शांत पड़ा ग्रामीण इलाका अचानक एक धड़कते हुए कस्बे में तब्दील हो जाता है। जहाँ कच्चा माल है, वहीं बाजार है और वहीं जिंदगी की हलचल है।
ऊर्जा का मतलब सिर्फ चीनी मिलें ही नहीं, बल्कि रेलवे की बदलती तस्वीर भी है। रोजा जंक्शन से बट वेल्डिंग प्लांट तक रेलवे लाइन के विद्युतीकरण का फैसला एक नए दौर का इशारा है। बिजली के ये नए तार गवाही दे रहे हैं कि अब मालगाड़ियाँ डीजल के धुएं में नहीं, बल्कि बिजली की फर्राटेदार रफ्तार से दौड़ेंगी, जिससे व्यापार और भी तेज और सस्ता होगा।
क्या हम विकास की कीमत 'पानी' से चुका रहे हैं?
लेकिन, विकास की इस चमक-दमक के पीछे एक कड़वा सच भी छिपा है। अलास्का में जिस तरह संसाधनों की लूट ने वहां के जनजीवन को प्रभावित किया था, कुछ वैसी ही चुनौती यहाँ भी मंडरा रही है। चीनी मिलें और उद्योग भारी मात्रा में भूजल का दोहन कर रहे हैं। शाहजहांपुर के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा है, क्या यह तरक्की पर्यावरण की बलि चढ़ाकर हासिल की जाएगी? हमें ऐसी तकनीकें लानी होंगी जो बिजली तो दें, लेकिन हमारी हवा और पानी को जहरीला न होने दें।
अंत में, शाहजहांपुर की कहानी हमें सिखाती है कि बिजली केवल तारों में दौड़ने वाला करंट नहीं है। यह वह अदृश्य ताकत है जो एक किसान के खेत को शहर के बाजार से जोड़ती है। यह कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक ऐसा 'ऊर्जा-चक्र' है जो हर साल गन्ने की नई फसल के साथ फिर से जी उठता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/29kh2tz4
https://tinyurl.com/256w6ywh
https://tinyurl.com/2b5rqym7
https://tinyurl.com/2xnmm4ry
https://tinyurl.com/yqpg5ybl