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जब हम 'शहरीकरण' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारी आँखों के सामने ऊँची इमारतें और चमकते मॉल आ जाते हैं। लेकिन अगर हम शाहजहांपुर को गौर से देखें, तो यहाँ शहर बनने की कहानी ईंट-गारे से नहीं, बल्कि 'ऊर्जा' से लिखी जा रही है। एक कस्बा या शहर तभी फैलता है जब वह अपने स्थानीय संसाधनों को बिजली, काम और रफ़्तार में बदल सके। शाहजहांपुर इसका जीता-जागता उदाहरण है, जहाँ शहर केवल ऊर्जा की खपत नहीं करते, बल्कि बदलाव के इंजन बनते हैं। यहाँ के खेत और कारखाने मिलकर एक ऐसा सिस्टम बनाते हैं जहाँ गन्ने की फसल सिर्फ चीनी नहीं देती, बल्कि वह ईंधन भी देती है जो इस शहर के पहिए को घुमाता है।
शाहजहांपुर की ऊर्जा को समझने के लिए हमें सबसे पहले इसकी जमीन को समझना होगा। यहाँ की उपजाऊ मिट्टी और जलवायु गन्ने की खेती के लिए वरदान है। यह 'एग्रो-इकोलॉजी' (agro - ecology) ही वह बुनियाद है जिस पर जिले की पूरी अर्थव्यवस्था टिकी है। यहाँ का शहरीकरण किसी बाहरी उद्योग के कारण नहीं, बल्कि इसी गन्ने की पट्टी के कारण हुआ है। यह एक ऐसा मॉडल है जो धीरे-धीरे खेती (क्रॉप इकोनॉमी - crop economy) को ऊर्जा (एनर्जी इकोनॉमी - energy economy) में बदल रहा है, बिना अपनी ग्रामीण जड़ों को काटे।
गन्ने की खोई 'काला सोना' और बिजली में कैसे बदल जाती है?
एक आम आदमी के लिए गन्ने का रस निकालने के बाद बचा हुआ अवशेष यानी 'खोई' कचरा हो सकता है, लेकिन शाहजहांपुर की चीनी मिलों के लिए यह 'काला सोना' है। 'बगास को-जनरेशन' एक ऐसी तकनीक है जिसमें चीनी मिलें गन्ने की खोई को जलाकर उच्च दबाव वाली भाप बनाती हैं। इस भाप से न केवल मिल की टर्बाइन (turbine) घूमती है, बल्कि इससे भारी मात्रा में बिजली भी पैदा होती है। यह कचरे से ऊर्जा बनाने का एक शानदार उदाहरण है जो शाहजहांपुर के विकास को 'सस्टेनेबल' यानी टिकाऊ बनाता है।
इस तकनीक को जमीन पर देखना हो तो हमें शाहजहांपुर के पुवायां स्थित बजाज हिंदुस्तान शुगर (sugar) मिल की मकसूदापुर यूनिट को देखना चाहिए। इस इकाई में 21 मेगावाट का को-जनरेशन पावर प्लांट लगा हुआ है। यह 'कैप्टिव पावर' यानी अपनी बिजली खुद बनाने की क्षमता ही है जो इन मिलों को बिना रुके चलने में मदद करती है। जब मिल चलती है, तो आसपास के कस्बों में रोशनी रहती है और रोजगार का पहिया घूमता रहता है।![]()
क्या शहर की धड़कन चीनी मिलों के साथ चलती है?
शाहजहांपुर में साल के 12 महीने एक जैसे नहीं होते; यहाँ का शहरी जीवन चीनी मिलों के 'पराई सत्र' (Crushing Season) के साथ धड़कता है। जैसे ही मिलें चालू होती हैं, सड़कों पर ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की कतारें लग जाती हैं। वेल्डिंग की दुकानें, मरम्मत केंद्र, ढाबे और ट्रांसपोर्ट का कारोबार अचानक तेज हो जाता है। जहाँ बिजली है और जहाँ कच्चा माल है, वहीं मजदूर और व्यापारी इकट्ठा होते हैं। यही वह प्रक्रिया है जो एक शांत ग्रामीण इलाके को एक व्यस्त कस्बे में बदल देती है।
ऊर्जा का मतलब सिर्फ चीनी मिलें नहीं, बल्कि रेलवे और ग्रिड का विस्तार भी है। हाल ही में रोजा जंक्शन से बट वेल्डिंग प्लांट तक रेलवे लाइन के विद्युतीकरण का फैसला लिया गया है। यह नई ओवरहेड इलेक्ट्रिक लाइन बताती है कि शहर का माल ढुलाई सिस्टम अब डीजल से बिजली की ओर शिफ्ट हो रहा है। जब रेलवे लाइन बिजली से लैस होती है, तो उद्योगों के लिए व्यापार सस्ता और तेज हो जाता है।
क्या हम विकास की कीमत अपने पर्यावरण से चुका रहे हैं?
लेकिन विकास की इस दौड़ में हमें उन चुनौतियों को नहीं भूलना चाहिए जो हमारे पर्यावरण पर मंडरा रही हैं। शाहजहांपुर के भूजल की स्थिति अब चिंताजनक होने लगी है क्योंकि चीनी मिलें और उद्योग भारी मात्रा में पानी का इस्तेमाल करते हैं। हमें ऐसी तकनीकें अपनानी होंगी जो बिजली तो दें, लेकिन हवा और पानी को जहरीला न करें। शाहजहांपुर के लिए यह सवाल अहम है कि क्या हम अपनी 'ऊर्जा-समृद्धि' को पर्यावरण की कीमत पर बचा पाएंगे?
अंत में, शाहजहांपुर की कहानी हमें यह सिखाती है कि ऊर्जा कोई अदृश्य चीज नहीं है जो तार में बहती है। यह वह ताकत है जो गन्ने के खेत को चीनी मिल से, और चीनी मिल को शहर के बाजार से जोड़ती है। शाहजहांपुर का शहरीकरण कंक्रीट का जंगल नहीं, बल्कि एक 'ऊर्जा-चक्र' है जो हर साल गन्ने की फसल के साथ नया हो जाता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/29kh2tz4
https://tinyurl.com/256w6ywh
https://tinyurl.com/2b5rqym7
https://tinyurl.com/2xnmm4ry
https://tinyurl.com/yqpg5ybl