समय - सीमा 9
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शाहजहांपुर की अनाज मंडियों और गल्ला बाजारों में दिन की शुरुआत भले ही शोर-शराबे से होती हो, लेकिन इस पूरी अर्थव्यवस्था की असली डोर एक शांत यंत्र के हाथ में होती है और वह है 'तराजू'। यह केवल एक मशीन नहीं, बल्कि भरोसे का वह पैमाना है जहाँ कुछ ग्राम का हेर-फेर भी मुनाफा, सजा या आपसी विश्वास तय कर सकता है। शाहजहांपुर की पूरी अनाज मंडी इसी वजन और माप (weighing scale) पर टिकी है।
पुराने जमाने में, भारत में वजन और लंबाई नापने की कोई एक व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय नियमों का बोलबाला था। इसका सीधा मतलब था कि जो व्यक्ति नाप रहा है, उसी का गणित आखिरी माना जाता था। लेकिन पुरानी और नई व्यवस्था के बीच एक दिलचस्प पुल बना 'मन' (Maund)। यह वजन की एक ऐसी इकाई थी जो भारत के कई हिस्सों में चलती थी। जब आधुनिक मीट्रिक प्रणाली लागू हुई, तो सरकार ने पुरानी आदतों को नए मानकों में ढालने के लिए 'मन' को आधिकारिक तौर पर ठीक 37.3242 किलोग्राम (kg) के बराबर तय किया। यह आंकड़ा बताता है कि कैसे पुराने बाजार की भाषा को आधुनिक सप्लाई चेन का हिस्सा बनाया गया। यह बदलाव सिर्फ गणित का नहीं था, बल्कि परंपरा और आधुनिकता को एक ही तराजू पर तोलने का था।
मीट्रिक प्रणाली और कानून ने बाजार का चेहरा कैसे बदला?
भारत में जब 'मीट्रिकरण' (Metrication) या दशमलव प्रणाली आई, तो बाजार का पूरा चेहरा ही बदल गया। किलोग्राम और मीटर ने रोजमर्रा की खरीद-फरोख्त और सरकारी खरीद में अपनी पक्की जगह बना ली। सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि नाप-तौल अब दुकानदार की 'निजी आदत' नहीं रह गई, बल्कि यह एक 'सार्वजनिक नियम' बन गई। अब शाहजहांपुर हो या देश का कोई और कोना, सबके लिए एक किलो का मतलब एक ही है। इसने बाजारों और सरकारी कामकाज में एकरूपता ला दी।
लेकिन सिर्फ मानक तय कर देना काफी नहीं था, उसे लागू करना भी जरूरी था। यहीं भूमिका आती है 'विधिक माप विज्ञान अधिनियम' (Legal Metrology Act) की। इस कानून ने तय किया कि बाजार में इस्तेमाल होने वाले हर बाट और तराजू का 'सत्यापन और मुहर' (stamping) लगवाना अनिवार्य होगा। इसका सीधा सा मतलब है कि सरकार अब बाजार के भीतर मौजूद है ताकि उपभोक्ता के अधिकारों की रक्षा हो सके। सरकारी विभाग, जिसे हम लीगल मेट्रोलॉजी कहते हैं, का काम ही यह पक्का करना है कि आपको पूरा सामान मिले। यह विभाग नियमित रूप से व्यापारियों के तोलने वाले उपकरणों की जांच करता है, ताकि ग्राहक के साथ धोखा न हो और पारदर्शिता बनी रहे।
शाहजहांपुर में राशन की 'घटतौली' पर लगाम कैसे लगेगी?
अब इस कहानी को शाहजहांपुर के जमीनी हालात से जोड़ते हैं। जिले की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) में एक बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 'अमृत विचार' की रिपोर्ट बताती है कि राशन वितरण में पारदर्शिता लाने के लिए कोटेदारों की दुकानों पर अब ई-वेइंग मशीन (इलेक्ट्रॉनिक तराजू) लगाने की योजना है।
शाहजहांपुर में करीब 1,358 सरकारी राशन की दुकानें हैं। योजना के मुताबिक, इन सभी दुकानों को हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक कांटों से लैस किया जा रहा है, जो सीधे ई-पॉस (e-POS) मशीनों से जुड़े होंगे। इसका मकसद बिल्कुल साफ है 'घटतौली' (कम तोलने की चोरी) को जड़ से खत्म करना। अब तक राशन कम मिलने की शिकायतें आती थीं, लेकिन नई व्यवस्था में राशन का वजन सीधे मशीन रिकॉर्ड करेगी। जब तक मशीन सही वजन नहीं बताएगी, तब तक वितरण की प्रक्रिया पूरी नहीं मानी जाएगी। यह तकनीक कोटेदारों और कार्डधारकों के बीच के विवाद को खत्म करने की दिशा में एक अहम कदम है।
क्या तराजू सिर्फ वजन बताता है या जवाबदेही तय करता है?
एक तराजू का सफर सिर्फ दुकान से खरीदकर लाने तक सीमित नहीं होता। उसका असली सफर तो उसके बाद शुरू होता है “उसका कैलिब्रेशन, उसका रोजमर्रा का इस्तेमाल, कभी-कभी उसका खराब होना, और उस पर उठने वाली शिकायतें।” शाहजहांपुर में हो रहा यह बदलाव हमें बताता है कि एक साधारण सा दिखने वाला माप यंत्र कैसे 'जवाबदेही' (accountability) का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है।
जब 1,358 दुकानों पर एक साथ इलेक्ट्रॉनिक मशीनें काम करेंगी, तो यह केवल अनाज तोलने की प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि यह उस भरोसे को तोलने की कोशिश होगी जो एक आम नागरिक और सरकारी सिस्टम के बीच होना चाहिए। शाहजहांपुर के गल्ला बाजारों से लेकर राशन की कतारों तक, 'वजन' अब सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक बन रहा है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/23hfl9s6
https://tinyurl.com/24p6k4x8
https://tinyurl.com/236htjur
https://tinyurl.com/22zndodq
https://tinyurl.com/2dxozgcg
https://tinyurl.com/yv52zukh