बाट-तराजू से डिजिटल स्क्रीन तक: शाहजहाँपुर की अनाज मंडी में कैसे बदला व्यापार का तरीक़ा?

अवधारणा I - मापन उपकरण (कागज़/घड़ी)
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बाट-तराजू से डिजिटल स्क्रीन तक: शाहजहाँपुर की अनाज मंडी में कैसे बदला व्यापार का तरीक़ा?

शाहजहांपुर की अनाज मंडियों और गल्ला बाजारों में दिन की शुरुआत भले ही शोर-शराबे और ऊंची बोलियों से होती हो, लेकिन इस पूरी अर्थव्यवस्था की असली डोर एक बेजान, मगर सबसे ताकतवर औजार के हाथ में होती है और वह है 'तराजू'। जिस तरह दुनिया की महाशक्तियां खनिजों के लिए जमीनों पर नजर गड़ाए रहती हैं, ठीक उसी तरह मंडी का पूरा व्यापार तराजू के उस कांटे पर टिका होता है, जहां कुछ ग्राम का हेर-फेर भी मुनाफा, सजा या आपसी विश्वास को डगमगा सकता है। शाहजहांपुर का बाजार केवल अनाज नहीं, बल्कि भरोसे का व्यापार करता है और यह भरोसा इसी लोहे या स्टील की मशीन से तौला जाता है। 

इतिहास के पन्नों को पलटें तो पता चलता है कि वजन और माप की दुनिया हमेशा इतनी सुलझी हुई नहीं थी। पुराने दौर में भारत में नाप-तौल की कोई एक तय व्यवस्था नहीं थी। अलग-अलग इलाकों में स्थानीय नियमों का बोलबाला थायानी 'जिसकी लाठी, उसका तराजू'। जो तोल रहा है, उसी का पैमाना अंतिम सत्य माना जाता था।

लेकिन पुरानी और नई व्यवस्था के बीच एक दिलचस्प पुल बना 'मन' (Maund)। मन वजन की एक ऐसी इकाई थी, जिसने लंबे समय तक भारतीय बाजारों पर राज किया। जब देश में आधुनिक 'मीट्रिक प्रणाली' लागू हुई, तो सरकार ने पुराने पैमानों को नए मानकों में ढालने के लिए 'मन' को आधिकारिक तौर पर ठीक 37.3242 किलोग्राम के बराबर तय किया। यह वह आंकड़ा था, जिसने पुराने बाजार की भाषा को आधुनिक सप्लाई चेन का हिस्सा बना दिया।

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मीट्रिकरण से कैसे लगी दुकानदार की 'मनमानी' पर लगाम?
भारत में जब 'मीट्रिकरण' (दशमलव प्रणाली) का दौर आया, तो इसने बाजार का चेहरा ही बदल दिया। किलोग्राम और मीटर ने सरकारी कामकाज और खरीद-फरोख्त में अपनी पक्की जगह बना ली। सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि नाप-तौल अब दुकानदार की 'निजी जागीर' नहीं रहा, बल्कि यह एक 'सार्वजनिक नियम' बन गया। अब शाहजहांपुर हो या देश का कोई और कोना, सबके लिए 'एक किलो' का मतलब एक ही है।

लेकिन सिर्फ मानक तय कर देना काफी नहीं था। यहीं एंट्री होती है 'विधिक माप विज्ञान अधिनियम' (Legal Metrology Act) की। इस कानून ने तय किया कि बाजार में इस्तेमाल होने वाले हर बाट और तराजू की सरकारी जांच और उस पर मुहर (Stamping) लगवाना अनिवार्य होगा। लीगल मेट्रोलॉजी विभाग का काम ही यह पक्का करना है कि ग्राहक को पूरा सामान मिले और तोलने वाले उपकरणों में कोई 'खोट' न हो।

आइए अब इस कहानी का रुख शाहजहांपुर के मौजूदा हालात की तरफ करते हैं, जहां राशन वितरण में एक बड़ा 'सर्जिकल स्ट्राइक' जैसा बदलाव हो रहा है। 'अमृत विचार' की रिपोर्ट बताती है कि राशन की दुकानों पर पारदर्शिता लाने के लिए अब कोटेदारों की पुरानी व्यवस्था को बदलकर वहां ई-वेइंग मशीन (इलेक्ट्रॉनिक तराजू) लगाए जा रहे हैं।

शाहजहांपुर में करीब 1,358 सरकारी राशन की दुकानें हैं। योजना के मुताबिक, इन सभी दुकानों को हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक कांटों से लैस किया जा रहा है। ये साधारण मशीनें नहीं हैं; ये सीधे ई-पॉस (e-POS) मशीनों से जुड़ी होंगी।

इसके पीछे का मकसद साफ है, 'घटतौली' (कम तोलने की चोरी) का अंत करना। अब तक राशन कम मिलने की शिकायतें आम रहती थीं, लेकिन नई व्यवस्था में राशन का वजन सीधे मशीन रिकॉर्ड करेगी। यह तकनीक 'चोरी' को लॉक कर देगी, जब तक कांटा सही वजन नहीं दिखाएगा, मशीन राशन वितरण की प्रक्रिया को आगे ही नहीं बढ़ाएगी। यह कोटेदारों और कार्डधारकों के बीच के विवाद को खत्म करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है।

कुल मिलाकर एक तराजू का सफ़र सिर्फ दुकान से सामान खरीदकर लाने तक सीमित नहीं होता। उसका असली इम्तिहान तो उसके बाद शुरू होता है। शाहजहांपुर में हो रहा यह तकनीकी बदलाव हमें बताता है कि एक साधारण सा दिखने वाला माप यंत्र कैसे 'जवाबदेही' (Accountability) का सबसे बड़ा हथियार बन सकता है। जब जिले की दुकानों पर एक साथ इलेक्ट्रॉनिक मशीनें काम करेंगी, तो यह केवल अनाज तोलने की प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि यह उस भरोसे को तोलने की कोशिश होगी जो एक आम नागरिक और सरकारी सिस्टम के बीच होना चाहिए। शाहजहांपुर के गल्ला बाजारों से लेकर राशन की कतारों तक, 'वज़न' अब सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि न्याय का प्रतीक बन रहा है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/23hfl9s6
https://tinyurl.com/24p6k4x8
https://tinyurl.com/236htjur
https://tinyurl.com/22zndodq
https://tinyurl.com/yv52zukh 

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