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शाहजहाँपुर के घरों की भीतरी सजावट के इतिहास को समझना हो, तो दीवारों या छतों के बजाय अपनी नज़रें फ़र्श की ओर दौड़ाइए। कालीन (Carpet) महज़ ज़मीन ढंकने का कोई टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह वह धरातल है जहाँ रेशों, रंगों और बारीक गाँठों का हुनर हमारे सुख-सुविधा और रसूख की कहानी कहता है। भारत में कालीन महलों की चकाचौंध से निकलकर वैश्विक व्यापार का हिस्सा बने। यह सफ़र मुग़ल बादशाहों की नफ़ासत, कारखानों की व्यवस्था और ऊन, रेशम व पश्मीना जैसी बेशक़ीमती सामग्रियों के ज़रिये तय हुआ। आज हम इसी ताने-बाने को शाहजहाँपुर के संदर्भ में समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ यह कला अपने वजूद की अंतिम लड़ाई लड़ रही है।
भारत में कालीन बुनाई की कला को असली पहचान मुग़ल साम्राज्य के दौर में मिली। 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच मुग़लों ने इस कला को बुलंदियों पर पहुँचाया। उस दौर के कालीनों को देखकर ऐसा लगता था, मानों फ़र्श पर फूलों की कोई जीती-जागती क्यारी बिछी हो। 'मेट्रोपोलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट' के दस्तावेज़ों के अनुसार, मुग़ल काल में कालीनों ने वैश्विक संस्कृति में अहम भूमिका निभाई। उस समय केवल साधारण ऊन ही नहीं, बल्कि बेहतरीन कपास, रेशम और पश्मीना का प्रयोग होता था। मुग़लों के इसी शाही अंदाज़ ने भारतीय कालीनों को दुनिया भर में मशहूर कर दिया।
वक़्त के साथ कालीन निर्माण की तकनीक और इसका कारोबार भी बदलता गया। शुरुआत में यह महज़ दरबारों की शान थी, लेकिन धीरे-धीरे इसने एक संगठित उद्योग का रूप ले लिया। 'मैप एकेडमी' के अनुसार, मुग़ल संरक्षण के बाद यह 'वर्कशॉप मॉडल' तक पहुँचा। इतिहास का एक दिलचस्प और चौंकाने वाला पहलू 'जेल वर्कशॉप्स' भी है। अंग्रेज़ों के शासनकाल में जेलों को उत्पादन केंद्रों में तब्दील कर दिया गया, जहाँ क़ैदियों से कालीन बनवाए जाते थे। विडंबना देखिए कि जेल की कालकोठरियों में चलने वाले इन कारखानों ने इस कला को बाज़ार के अनुरूप ढालने और हुनर को विस्तार देने में बड़ी भूमिका निभाई।
तकनीकी दृष्टि से देखें तो कालीन बुनना सिर्फ़ धागों को जोड़ना नहीं, बल्कि यह 'पाइल' (pile) और बिना पाइल वाले कालीनों के अंतर को समझने का विज्ञान है। शोध बताते हैं कि किसी कालीन की क़ीमत और उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें गाँठ लगाने की कौन सी तकनीक इस्तेमाल हुई है। इतिहास के उतार-चढ़ाव ने ही यह तय किया कि कौन सा कालीन केवल सजावट के लिए होगा और कौन सा रोज़मर्रा के इस्तेमाल के लिए। बारीक गाँठें ही वह जादू हैं, जो साधारण रेशों को एक अनमोल कलाकृति में बदल देती हैं।
शिल्प का गढ़ और ज़मीनी हक़ीक़त जब हम रोहिलखंड, ख़ासकर शाहजहाँपुर पर नज़र डालते हैं, तो पाते हैं कि यह ज़िला इस शिल्प का एक प्रमुख केंद्र रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक ज़िला एक उत्पाद' (ODOP) योजना के तहत आज भी कालीन निर्माण को शाहजहाँपुर के मुख्य शिल्प के रूप में पहचान मिली हुई है। यह सरकारी मुहर तस्दीक करती है कि शाहजहाँपुर की माटी और यहाँ के दस्तकारों के हाथों में वह हुनर है, जो इस ज़िले को विश्व मानचित्र पर एक अलग पहचान दिलाता है।
लेकिन इस चमक के पीछे एक स्याह पहलू भी है। शाहजहाँपुर और इसके आस-पास का इलाका उत्तर-पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस 'कारपेट बेल्ट' का हिस्सा है, जहाँ मज़दूरों की हालत चिंताजनक रही है। 'रूरल इंडिया ऑनलाइन' की रिपोर्ट के मुताबिक, हाथ से कालीन बुनने वाले कारीगरों की स्थिति काफ़ी नाज़ुक है। यह उद्योग अक्सर कम मज़दूरी, मुश्किल हालात और बाल श्रम जैसे संवेदनशील मुद्दों के साये में रहा है। कालीन की सुंदरता अक्सर उन मज़दूरों के हाथों की मेहनत और छालों को छिपा लेती है, जो इसे बनाते वक़्त अनगिनत जोखिम उठाते हैं।
संकट के मुहाने पर शाहजहाँपुर का उद्योग आज शाहजहाँपुर का यह पारंपरिक उद्योग गहरे संकट से गुज़र रहा है। 'इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट यहाँ के कालीन कारोबार की कड़वी सच्चाई बयां करती है। एक दौर था जब यहाँ से भारी मात्रा में कालीनों का निर्यात होता था और ज़िले के घर-घर में करघे चला करते थे। लेकिन आज यह कारोबार दम तोड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल की आसमान छूती क़ीमतें, बाज़ार में मांग की कमी और नई पीढ़ी का इस पेशे से मोहभंग होना इसके प्रमुख कारण हैं। कई पुरानी इकाइयाँ बंद हो चुकी हैं और जो बची हैं, वे संघर्षरत हैं। युवा अब इस पुश्तैनी काम को नहीं अपनाना चाहते, क्योंकि इसमें अब मेहनत के मुकाबले वाजिब मुनाफ़ा नहीं रह गया है। यह सिर्फ़ एक उद्योग का पतन नहीं, बल्कि एक गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत का बिखरना है।
आगे का रास्ता शाहजहाँपुर के कालीन उद्योग को अगर संजीवनी देनी है, तो महज़ काग़ज़ों पर इसका नाम होना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए ठोस धरातल पर काम करने की ज़रूरत है। आज की आवश्यकता है कि कारीगरों को आधुनिक प्रशिक्षण मिले, उन्हें वाजिब दाम पर कच्चा माल उपलब्ध हो और उनके उत्पादों के लिए वैश्विक बाज़ार तलाशे जाएँ। हमें कालीनों के ऐसे नए डिज़ाइन तैयार करने होंगे जो आधुनिक घरों की ज़रूरत भी पूरी करें और बुनकरों के आत्म-सम्मान को भी बरकरार रखें।
शाहजहाँपुर का कालीन उद्योग अभी पूरी तरह ख़त्म नहीं हुआ है, लेकिन यह एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ इसे सरकारी सहयोग और नई सोच की सख़्त ज़रूरत है। यदि समय रहते प्रभावी कदम उठाए गए, तो रोहिलखंड के इस शहर की 'फ़र्श से जुड़ी' यह विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए गर्व का विषय बनी रह सकती है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/223sxnnk
https://tinyurl.com/2b6nrrcp
https://tinyurl.com/2yvuausy
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