पैरों तले बिछा है मुगल इतिहास! जानिए क्यों अपनी पहचान बचाने को जूझ रहा है शाहजहांपुर का कालीन?

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11-01-2026 09:08 AM
पैरों तले बिछा है मुगल इतिहास! जानिए क्यों अपनी पहचान बचाने को जूझ रहा है शाहजहांपुर का कालीन?

अगर आपको शाहजहांपुर के घरों की भीतरी सजावट का इतिहास समझना है, तो दीवारों या छतों को छोड़िए और अपनी नजरें फर्श पर डालिए। कालीन (Carpet) केवल जमीन ढकने का एक कपड़ा भर नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी सतह है जो रेशों, रंगों और गांठ लगाने के हुनर को हमारे रोजमर्रा के आराम और रुतबे में बदल देती है। भारत में कालीन, महलों की सजावट से निकलकर लंबी दूरी के व्यापार का हिस्सा बने। यह सफर मुगल बादशाहों की पसंद, कारखानों की व्यवस्था और ऊन, रेशम व पश्मीना जैसी सामग्रियों के जरिए तय हुआ। आज हम इसी ताने-बाने को शाहजहांपुर के संदर्भ में समझने की कोशिश करेंगे, जहाँ यह कला आज अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है।

भारत में कालीन बुनाई की कला को असली उड़ान मुगल साम्राज्य के संरक्षण में मिली। 16वीं से 18वीं शताब्दी के बीच, मुगलों ने इस कला को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। उस दौर के कालीनों को देखकर ऐसा लगता था मानो सचमुच 'पैरों के नीचे फूल' बिछे हों। मेट्रोपोलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट के दस्तावेज बताते हैं कि मुगल काल में कालीनों ने पूरी दुनिया की संस्कृति में अहम भूमिका निभाई। उस समय केवल साधारण ऊन ही नहीं, बल्कि बेहतरीन कपास, रेशम और यहाँ तक कि पश्मीना का भी इस्तेमाल होता था। मुगलों के इसी शाही स्वाद ने भारतीय कालीनों को दुनिया भर में मशहूर कर दिया।

जैसे-जैसे वक्त बीता, कालीन बनाने का तरीका और इसका व्यापार बदलता गया। शुरुआत में यह सिर्फ राजाओं और दरबारों की शान थी, लेकिन बाद में यह एक व्यवस्थित उद्योग बन गया। मैप एकेडमी के अनुसार, भारत में कालीन बुनाई का इतिहास मुगल संरक्षण से शुरू होकर वर्कशॉप मॉडल तक पहुँचा। लेकिन इतिहास का एक चौंकाने वाला पहलू 'जेल वर्कशॉप्स' भी हैं। अंग्रेजों के जमाने में, जेलों को उत्पादन केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किया गया, जहाँ कैदियों से कालीन बनवाए जाते थे। अजीब बात यह है कि जेल की चारदीवारियों में चलने वाले इन कारखानों ने इस कला को बाजार के लिए तैयार उत्पाद बनाने और इसके हुनर को फैलाने में एक बहुत बड़ी भूमिका निभाई।

क्या है गांठों का विज्ञान और कला?
तकनीकी रूप से देखें तो कालीन बनाना केवल धागों को जोड़ना नहीं है। यह 'पाइल' (pile) और बिना पाइल वाले कालीनों के बीच का फर्क समझने का विज्ञान है। शोध बताते हैं कि कालीन की कीमत और उसका उपयोग इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें किस तरह की तकनीक और सामग्री इस्तेमाल हुई है। ऐतिहासिक बदलावों ने यह तय किया कि कौन सा कालीन सिर्फ सजावट के लिए है और कौन सा रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए। गांठ लगाने की बारीकी ही वह जादू है जो साधारण रेशों को एक कीमती कालीन में बदल देती है।

जब हम इस बड़ी तस्वीर से निकलकर रोहिलखंड और खास तौर पर शाहजहांपुर पर ज़ूम करते हैं, तो पाते हैं कि यह जिला इस शिल्प का एक बहुत बड़ा केंद्र रहा है। उत्तर प्रदेश सरकार की 'एक जिला एक उत्पाद' (ODOP) योजना और अन्य आधिकारिक प्रोफाइलिंग में आज भी कालीन निर्माण को शाहजहांपुर के जिला शिल्प के रूप में दर्ज किया गया है। यह सरकारी मान्यता साबित करती है कि शाहजहांपुर की मिट्टी और यहाँ के कारीगरों के हाथों में वह हुनर है जो इस जिले को कालीन के नक्शे पर एक खास जगह दिलाता है।

लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक अंधेरा पहलू भी है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। शाहजहांपुर और इसके आसपास का इलाका उत्तर-पश्चिमी यूपी की उस 'कालीन बेल्ट' का हिस्सा है, जिसे शोधकर्ता अक्सर मजदूरों की बदहाली से जोड़कर देखते हैं। रूरल इंडिया ऑनलाइन की रिपोर्ट के मुताबिक, हाथ से बने कालीनों के क्षेत्र में मजदूरों की स्थिति काफी नाजुक रही है। यह उद्योग अक्सर कम मजदूरी, कठिन परिस्थितियों और कई बार बाल श्रम जैसे गंभीर मुद्दों के साये में रहा है। कालीन की सुंदरता अक्सर उन हाथों की मेहनत और छालों को छिपा लेती है जो इसे बनाते वक्त कई तरह के जोखिम उठाते हैं।

आज शाहजहांपुर का यह पारंपरिक उद्योग गहरे संकट के दौर से गुजर रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट शाहजहांपुर के कालीन कारोबार की मौजूदा स्थिति का दुखद सच बयां करती है। एक समय था जब यहाँ से बड़े पैमाने पर कालीनों का निर्यात होता था और जिले में कई यूनिट्स और करघे दिन-रात चलते थे। लेकिन आज यह व्यापार भारी दबाव में है।

रिपोर्ट के अनुसार, कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, बाजार में मांग की कमी और कारीगरों का इस पेशे से मोहभंग होना इसके मुख्य कारण हैं। कई पुरानी इकाइयाँ बंद हो चुकी हैं और जो बची हैं, वे संघर्ष कर रही हैं। नई पीढ़ी इस पुश्तैनी काम को अपनाने से कतरा रही है क्योंकि इसमें अब पहले जैसी कमाई नहीं रह गई है। यह केवल एक उद्योग का गिरना नहीं है, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत का कमजोर होना है।

अब आगे की राह क्या है?
शाहजहांपुर की कालीन को अगर फिर से जीवित करना है, तो केवल सरकारी कागजों में इसका नाम होना काफी नहीं है। इसके लिए एक वास्तविक पुनर्जीवन (real revival) की जरूरत है। आज जरूरत इस बात की है कि कारीगरों को आधुनिक प्रशिक्षण दिया जाए, उन्हें कच्चे माल की उचित कीमत मिले और उनके उत्पादों के लिए नए बाजार तलाशे जाएं। हमें कालीनों के उपयोग के ऐसे नए तरीके खोजने होंगे जो आज के आधुनिक घरों के अनुकूल हों, लेकिन साथ ही करघे की गरिमा का भी सम्मान करें।

शाहजहांपुर का कालीन उद्योग अभी खत्म नहीं हुआ है, लेकिन वह एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे मदद और नई दृष्टि की सख्त जरूरत है। अगर समय रहते कदम उठाए गए, तो शायद रोहिलखंड के इस शहर की 'फर्श से जुड़ी' यह कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी गर्व का कारण बन सकती है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/223sxnnk
https://tinyurl.com/2b6nrrcp
https://tinyurl.com/2yvuausy
https://tinyurl.com/24qdn5j9
https://tinyurl.com/23e66dl4
https://tinyurl.com/25haf73j

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