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आज के दौर में मोबाइल फ़ोन, लैपटॉप और एलईडी स्क्रीन जैसे उपकरण अब महज़ बेजान मशीनें नहीं रह गई हैं। ये वो निजी उपकरण हैं जिन्होंने हमारे काम, बैंकिंग और आपसी बातचीत के साथ-साथ हमारी यादों को भी सिमटाकर जेब के आकार में ढाल दिया है। लेकिन इसी तेज़ रफ़्तार तकनीक ने हमारे सामने एक गंभीर चुनौती भी पेश की है। ये उपकरण दरअसल प्लास्टिक और धातु का वह मिश्रण हैं, जिन्हें खराब होने पर हम या तो ठीक कराते हैं, बेच देते हैं या फिर फेंकने पर मज़बूर हो जाते हैं। मानव इतिहास का यह बदलाव काफी अहम है, क्योंकि यह न केवल हमारे डेटा की कीमत तय करता है, बल्कि यह भी बताता है कि हमारे शहरों के सामने 'ई-कचरे' जैसी कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी है।
वर्ष 1813 में ज़िले के रूप में स्थापित हुआ शाहजहांपुर आज अपनी ऐतिहासिक विरासत को सहेजते हुए आधुनिक तकनीक को अपना रहा है। ज़िले की भौगोलिक स्थिति और यहाँ का बुनियादी ढांचा इस तकनीक को आम जन तक पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। एमएसएमई (MSME) की रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ का मज़बूत सड़क और रेल नेटवर्क ही वह आधार है, जो इन गैजेट्स को बड़े बाज़ारों से सीधे स्थानीय दुकानों तक पहुँचाता है। जब कोई ऐतिहासिक शहर डिजिटल दुनिया की मुख्यधारा से जुड़ता है, तो वहाँ बेहतर कनेक्टिविटी और रास्तों की अहमियत और भी बढ़ जाती है।
नया फ़ोन या लैपटॉप खरीदने पर उसकी कहानी खत्म नहीं होती, बल्कि असल सफर तो वारंटी खत्म होने के बाद शुरू होता है। शाहजहांपुर के औद्योगिक प्रोफाइल को देखें तो पता चलता है कि यहाँ मोबाइल रिपेयरिंग और कंप्यूटर हार्डवेयर सुधारने वाली दुकानों का एक बड़ा जाल फैला है। यह मज़बूत आर्थिक ढांचा इस बात का सबूत है कि यहाँ के लोगों की आजीविका इस 'मरम्मत की संस्कृति' पर टिकी है। इसे महज़ 'जुगाड़' कहना गलत होगा; यह एक पूरा सिस्टम है जो बेकार समझे जाने वाले उपकरणों को दोबारा काम के लायक बनाता है।
हर गैजेट की एक निश्चित उम्र होती है। जब फ़ोन, लैपटॉप या प्रिंटर काम करना बंद कर देते हैं, तो वे 'ई-कचरा' (E-waste) बन जाते हैं। सरकारी मानकों के अनुसार, इन्हें आम कूड़े के साथ कचरे के डिब्बे में नहीं डाला जा सकता। इसका कारण यह है कि इनमें कीमती धातुओं के साथ-साथ बेहद ज़हरीले तत्व भी मौजूद होते हैं। इसलिए, इनका वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण और संसाधनों की रिकवरी (Resource Recovery) बहुत ज़रूरी है। यह कचरा सिर्फ गंदगी नहीं, बल्कि फिर से इस्तेमाल किए जा सकने वाले कलपुर्जों का खज़ाना भी है।
क्या हमारा शहर इस चुनौती के लिए तैयार है?
शाहजहांपुर में अब इस इलेक्ट्रॉनिक कचरे को संभालने के लिए विशेष नियम और योजनाएं लागू की जा रही हैं। शाहजहांपुर छावनी बोर्ड (Cantonment Board) ने ठोस कचरा प्रबंधन के तहत ई-कचरे को एक विशिष्ट श्रेणी में रखा है। इससे स्पष्ट है कि नगर निकायों की ज़िम्मेदारी अब सिर्फ सफाई तक सीमित नहीं रही, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक कचरे का तकनीकी प्रबंधन भी उनकी प्राथमिकता बन गया है। इसी कड़ी में, 'राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन' (NMCG) के तहत तैयार एक्शन प्लान में भी कचरा संग्रहण और मटेरियल रिकवरी पर विशेष ज़ोर दिया गया है, ताकि शहर के पर्यावरण को सुरक्षित रखा जा सके।
हाल ही में दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, शाहजहांपुर पुलिस ने सर्विलांस सेल की मदद से 61 गुमशुदा मोबाइल बरामद कर उनके मालिकों को सौंपे। जब लोगों को उनके खोए हुए फ़ोन वापस मिले, तो उनकी खुशी देखने लायक थी। यह घटना साबित करती है कि मोबाइल फ़ोन अब हमारी पहचान का हिस्सा बन चुके हैं। इनमें हमारा डेटा, हमारी यादें और अपनों के संपर्क छिपे होते हैं। खोए हुए फ़ोन का मिलना या खराब उपकरण का दोबारा ठीक होना, आधुनिक शहरी जीवन का एक भावुक पहलू है। यह तय करता है कि तकनीक के इस दौर में हम अपनी चीज़ों और यादों को कितना सहेज पाते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2cqwpvra
https://tinyurl.com/22ezsu6y
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/286n27j2
https://tinyurl.com/25oghpko
https://tinyurl.com/256w6ywh