समय - सीमा 9
मानव और उनकी इंद्रियाँ 10
मानव और उनके आविष्कार 10
भूगोल 10
जीव-जंतु 10
अक्सर हम और आप यही सोचते हैं कि हथियार और खिलौने दो बिल्कुल अलग-अलग दुनिया की चीजें हैं। हम मानते हैं कि एक का काम तबाही मचाना और सुरक्षा देना है, तो दूसरे का काम मासूमियत और खेल है। लेकिन अगर हम इतिहास की परतों को हटाएं और शाहजहांपुर की नब्ज टटोलें, तो एक चौंकाने वाली सच्चाई हमारे सामने आती है। सच तो यह है कि हथियार और खिलौने, दोनों का जन्म इंसान की एक ही आदिम इच्छा से होता है और वह इच्छा है चीजों को अपनी ताकत, सुरक्षा और अभ्यास के लिए इस्तेमाल करना।
शाहजहांपुर में स्थित 'ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री' (Ordnance Clothing Factory) इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। यह कारखाना केवल फौजियों के लिए वर्दी नहीं सिलता, बल्कि यह उस पुराने धागे को भी जोड़ता है जो युद्ध की तैयारियों को हमारे बचपन के खेल और रोजमर्रा की जिंदगी से बांधता है। आज हम इसी सफर पर चलेंगे कांस्य युग के हथियारों से लेकर शाहजहांपुर के बाज़ारों में बिकने वाली सेना जैसी वर्दियों तक। यह पड़ताल हमें बताती है कि जब कोई समाज युद्ध के लिए कुछ बनाता है, तो उसके साथ-साथ अनजाने में और क्या कुछ पैदा हो जाता है।
धातु के आते ही इंसान की ताकत कैसे बदल गई?
इंसानी सभ्यता के इतिहास में एक ऐसा मोड़ आया जब पत्थर के औजार पीछे छूट गए और उनकी जगह धातु ने ले ली। इसे हम 'कांस्य युग' (Bronze Age) कहते हैं। ब्रिटानिका के अनुसार, यह वह दौर था जिसने दुनिया की तस्वीर बदल दी। यह पहली बार था जब इंसान ने धातु का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर शुरू किया। लेकिन यह बदलाव सिर्फ बर्तनों या खेती के औजारों तक सीमित नहीं था।
जब तांबा (Copper) और कांसा (Bronze) हमारे पूर्वजों के हाथों में आए, तो उन्होंने केवल औजारों की धार ही तेज नहीं की, बल्कि पूरे समाज के हुनर और उत्पादन के तरीके को भी बदल डाला। यूनिवर्सिटी ऑफ फ्लोरिडा की एक रिपोर्ट बताती है कि धातु के आने से तकनीक और समाज का ढांचा पूरी तरह बदल गया। धातु का काम मुख्य रूप से हथियारों और धारदार औजारों पर केंद्रित हो गया। तलवारें और भाले सिर्फ सुरक्षा का सामान नहीं रहे, बल्कि वे समाज में 'स्टेटस सिंबल' और ताकत का प्रतीक बन गए। इसने लोगों को सिखाया कि बड़े पैमाने पर उत्पादन कैसे किया जाता है। यहीं से उस इंसानी फितरत की शुरुआत हुई जो हर चीज को शक्ति के रूप में देखना चाहती है।
क्या बच्चे खेल रहे थे या भविष्य की जंग की तैयारी कर रहे थे?
युद्ध की यह तैयारी केवल बड़ों तक सीमित नहीं थी। पुरातत्व विज्ञान (Archaeology) हमें बताता है कि बच्चों ने भी बड़ों की इस दुनिया को अपने तरीके से समझा। इसमें उनकी मदद की 'लघु वस्तुओं' (miniatures) या खिलौनों ने। स्मिथसोनियन मैगजीन की रिपोर्ट के अनुसार, खुदाई में मिले छोटे आकार के औजार और हथियार जैसी चीजें इस बात का सबूत हैं कि प्राचीन काल में बच्चे इन्हें खिलौनों के रूप में इस्तेमाल करते थे।
ये केवल खेलने की चीजें नहीं थीं, बल्कि ये 'सीखने के उपकरण' (learning objects) थे। छोटे भाले, छोटी कुल्हाड़ियाँ या धनुष—इनसे खेलकर बच्चे शिकार और लड़ाई के गुर सीखते थे। यह "खिलौनों के जरिए ट्रेनिंग" का एक जरिया था। जैसे आज बच्चे डॉक्टर सेट या किचन सेट से खेलते हैं, वैसे ही उस दौर में बच्चे इन छोटे हथियारों से अपने हाथ और आदतों को साधते थे, ताकि बड़े होकर वे असली हथियारों को संभाल सकें। यानी, उनका खिलौना असल में भविष्य के हथियार का 'रिहर्सल' था।
शाहजहांपुर का सरहद से क्या गहरा रिश्ता है?
अब हम इतिहास के पन्नों से निकलकर सीधे शाहजहांपुर की धरती पर आते हैं। यहाँ भी निर्माण और सुरक्षा की वही पुरानी कहानी एक आधुनिक रूप में चल रही है। शाहजहांपुर की पहचान यहाँ स्थित 'ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री' (Ordnance Clothing Factory - OCF) से जुड़ी है। यह एक सरकारी इकाई है जो देश की रक्षा सेवाओं के लिए बहुत बड़ी भूमिका निभाती है।
दस्तावेजों के मुताबिक, ऑर्डनेंस क्लोदिंग फैक्ट्री, शाहजहांपुर की पहचान एक ऐसे संस्थान के रूप में है जो रक्षा उत्पादन की रीढ़ है। यहाँ युद्ध के मैदान के लिए सीधे बंदूकें तो नहीं बनतीं, लेकिन उन हथियारों को चलाने वाले सैनिकों के लिए जरूरी साजो-सामान तैयार होता है। यह फैक्ट्री इस शहर के लिए एक 'एंकर' का काम करती है, जहाँ बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। विकिपीडिया और सरकारी ब्यौरे बताते हैं कि यह फैक्ट्री भारतीय सेना के लिए वर्दी, पैराशूट के कपड़े, टेंट और खास तरह के वस्त्र बनाती है। शाहजहांपुर के लिए यह फैक्ट्री केवल रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा में एक जरूरी योगदान है। यहाँ तैयार होने वाला हर धागा अनुशासन और सुरक्षा के मकसद से बुना जाता है।
फौजी वर्दी शहर का फैशन कैसे बन गई?
दिलचस्प बात यह है कि फैक्ट्री की चारदीवारी के भीतर जो "सैन्य सामग्री" तैयार होती है, वह शहर की आम जिंदगी में भी अपनी जगह बना लेती है। पत्रिका न्यूज़ की एक रिपोर्ट बताती है कि कैसे शाहजहांपुर के स्थानीय बाजारों में सेना की वर्दी से जुड़े सामानों की झलक दिखती है। यह सैन्य सामग्री का एक "दूसरा जीवन" (afterlife) है।
बाजार में अक्सर ऐसे कपड़े मिल जाते हैं जो या तो रिजेक्ट किए गए होते हैं या बिल्कुल सेना की वर्दी जैसे दिखते हैं। शहर के दर्जी (tailors) इन कपड़ों को सिलने में उस्ताद हो चुके हैं। वे बखूबी जानते हैं कि एक फौजी वर्दी की सिलाई कैसी होनी चाहिए। धीरे-धीरे, यह खास 'सैन्य पहनावा' आम नागरिकों के बीच भी पहुँचने लगता है। बच्चे हों या बड़े, कई बार लोग शौक में इन 'कैमफ्लाज' (camouflage) प्रिंट्स को पहनते हैं। यहाँ आकर उपकरण, वेशभूषा और बचपन की नकल (childhood imitation) के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। जो कपड़ा सीमा पर सुरक्षा के लिए है, वह शहर की गलियों में एक फैशन या खेल का हिस्सा बन जाता है।
क्या हम अनजाने में एक नई संस्कृति बना रहे हैं?
शाहजहांपुर के इस उदाहरण को देखें तो एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब कोई समाज युद्ध या सुरक्षा के लिए बड़े पैमाने पर निर्माण करता है, तो क्या वह केवल हथियार या वर्दी ही बनाता है? जवाब है “नहीं।” वह साथ ही साथ एक संस्कृति भी तैयार करता है।
कांस्य युग में जब धातु से तलवारें बनीं, तो साथ में बच्चों के लिए छोटे हथियार भी बने। आज जब शाहजहांपुर में सेना के लिए वर्दी बनती है, तो साथ में बाजार के लिए सस्ते 'आर्मी-लुक' वाले कपड़े भी तैयार होते हैं। हथियार और खिलौने, वर्दी और वेशभूषा—ये सब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सुरक्षा की जरूरत हमारे उद्योगों को चलाती है, और वही उद्योग हमारे बच्चों के खेल और हमारे पहनावे को अनजाने में बदल देते हैं। शाहजहांपुर की ऑर्डनेंस फैक्ट्री और यहाँ के बाजार इस बात के गवाह हैं कि युद्ध की तैयारी और जीवन का उत्सव अक्सर साथ-साथ चलते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/26ezyr5s
https://tinyurl.com/234elaxf
https://tinyurl.com/229awtkt
https://tinyurl.com/28ojcfps
https://tinyurl.com/2ch7kb5r
https://tinyurl.com/y6vqy2vm