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रामगंगा और गर्रा जैसी नदियों की गोद में बसा शाहजहाँपुर, महज़ नक़्शे पर खिंची लकीरों का नाम नहीं है। यह तो मिट्टी, रेत और हाड़-तोड़ मेहनत से लिखी गई एक जीती-जागती दास्तान है। यहाँ नदियाँ अपने साथ पहाड़ों की गाद और चिकनी मिट्टी (Clay) बहाकर लाती हैं, और यहाँ की रेत हर मौसम में अपनी जगह बदलती रहती है। यही वह कच्चा माल है जिसे यहाँ के बाज़ारों और हुनरमंद कारीगरों ने उन चीज़ों में ढाल दिया, जो हमारे रसोई घर से लेकर श्रृंगार की मेज़ तक पहुँचती हैं। यह सफ़र एक दिलचस्प जादुई यात्रा जैसा है, जहाँ कच्ची मिट्टी तपकर बर्तन बनती है और रेत का एक मामूली ज़र्रा पिघलकर पारदर्शी काँच बन जाता है। आइए, शाहजहाँपुर की इन परतों को गहराई से समझते हैं।
शाहजहाँपुर ज़िला गंगा के विशाल मैदानी इलाक़ों का एक अहम हिस्सा है। इसकी पूरी पहचान और बनावट यहाँ की नदियों पर टिकी है। रामगंगा यहाँ की मुख्य नदी है, जो पूरे ज़िले के जल-निकासी तंत्र (Drainage System) की धुरी मानी जाती है।
अगर हम ज़मीन के थोड़ा भीतर झाँकें, तो पता चलता है कि यह पूरा इलाक़ा 'क्वाटरनरी एल्युवियम' (Quaternary Alluvium) की परतों से बना है। आसान लफ़्ज़ों में कहें तो, लाखों सालों से नदियों द्वारा जमा की गई मिट्टी, गाद और रेत ने इस ज़मीन को यह शक्ल दी है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड की रिपोर्टें बताती हैं कि यहाँ की गहराई में रेत और चिकनी मिट्टी की अलग-अलग मोटाई की परतें मौजूद हैं। यही भूगर्भीय ढाँचा (Geological Setup) यहाँ के लोगों को वह बेशक़ीमती कच्चा माल देता है, जिससे मिट्टी के बर्तन और दूसरे खनिज-आधारित उद्योग फलते-फूलते हैं।
इस कहानी का पहला पड़ाव मिट्टी है। जब इंसान ने पहली बार गीली मिट्टी को अपने हाथों से कोई रूप देना और फिर उसे आग में पकाकर पत्थर जैसा सख़्त बनाना सीखा, तो 'पॉटरी' (Pottery) यानी मिट्टी के बर्तनों का जन्म हुआ। शाहजहाँपुर में भी कुम्हारों के लिए यहाँ की चिकनी मिट्टी वह ज़रिया है, जिससे वे सुराही, मटके और दीये तैयार करते हैं। यह कला सिर्फ़ सामान बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इंसान की उस जीत का प्रतीक है जहाँ उसने प्रकृति के कच्चे माल को अपनी ज़रूरत के हिसाब से ढालना शुरू किया।
वक़्त के साथ इंसान ने मिट्टी से आगे बढ़कर रेत के भीतर छिपी संभावनाओं को तलाशना शुरू किया। लगभग 4,000 साल पहले, इंसान ने पहली बार काँच (Glass) बनाया। इसके पीछे एक गहरा विज्ञान था रेत (Silica), सोडा और चूने (Lime) के मिश्रण को एक बहुत ऊँचे तापमान पर पिघलाया गया। शाहजहाँपुर के संदर्भ में देखें, तो नदियों के किनारे बिखरी यह रेत महज़ मकान बनाने का मसाला नहीं है, बल्कि यह उस काँच का आधार है जिसने हमारी ज़िंदगी में पारभासी सुंदरता भर दी। काँच का इस्तेमाल पहले बर्तन बनाने में हुआ, लेकिन जल्द ही यह गहनों और जड़ाई के बारीक काम की जान बन गया।
शाहजहाँपुर के उद्योग विभाग के दस्तावेज़ साफ़ करते हैं कि यहाँ खनिजों पर आधारित (Mineral-based) कई छोटी इकाइयाँ और लघु उद्योग सक्रिय हैं। ये उद्योग उस पुल की तरह हैं जो नदियों की रेत और मिट्टी को शहर के बाज़ारों तक पहुँचाते हैं। यहाँ की 'क्राफ्ट-इकॉनमी' (शिल्प अर्थव्यवस्था) इसी बात पर टिकी है कि कैसे स्थानीय संसाधनों को छोटे कारख़ानों या घरों में चलने वाली यूनिट्स के ज़रिए उपयोगी सामान में बदला जाए। चाहे वह मिट्टी की सोंधी महक वाले बर्तन हों या काँच की कारीगरी, ये लघु उद्योग ज़िले की आर्थिक रीढ़ हैं।
काँच का यह सफ़र बर्तनों से आगे बढ़कर 'मनकों' (Beads) और चूड़ियों की शक्ल में और भी निखरा। इतिहास गवाह है कि काँच के मनकों ने पुराने ज़माने में व्यापार की दुनिया ही बदल दी थी। ये छोटे थे, टिकाऊ थे और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में आसान थे। इसी वजह से इनका इस्तेमाल लेन-देन की मुद्रा (Barter) के रूप में होने लगा। जब मामूली रेत का कण आग में तपकर एक चमकता मनका या चूड़ी बनता है, तो वह महज़ एक चीज़ नहीं रह जाता, बल्कि वह सुंदरता और ख़ुशहाली का प्रतीक बन जाता है।
लेकिन इस चमकते हुए सफ़र का एक स्याह (Dark) पहलू भी है। जिस रेत ने हमें काँच और मज़बूत घर दिए, आज वही रेत विवादों की भेंट चढ़ रही है। शाहजहाँपुर की जीवनरेखा कही जाने वाली गर्रा नदी आज अवैध खनन का मुख्य केंद्र बन गई है। हालिया ख़बरों के मुताबिक, नदी का सीना चीरकर निकाली जा रही यह रेत अब मुनाफ़े का एक बड़ा खेल बन चुकी है। प्रशासन की तमाम छापेमारी और सख़्ती के बावजूद, रेत का यह अवैध कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा। यह स्थिति बताती है कि रेत अब महज़ एक प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि एक 'विवादित संसाधन' (Contested Resource) बन चुकी है।
क्या हम संतुलन बना पाएंगे?
मिट्टी की गाद से शुरू होकर कुम्हार के चाक और फिर काँच की भट्टियों से होते हुए चूड़ियों तक का यह सफ़र बेहद गौरवशाली है। हर बार जब हम किसी स्थानीय चीज़ को नया रूप देते हैं, तो वह और भी कीमती हो जाती है। लेकिन शाहजहाँपुर के मैदानी इलाक़े और यहाँ की नदियाँ हमसे एक सवाल पूछ रही हैं, क्या विकास की इस दौड़ में हम कुदरत के साथ अपना संतुलन बचा पाएंगे?
आज जब हम मिट्टी के मटके से ठंडा पानी पीते हैं या काँच की चूड़ियों की खनक सुनते हैं, तो हमें याद रखना चाहिए कि यह सब उसी 'जलोढ़ मिट्टी' की देन है जो हमारे पाँवों के नीचे है। यह दास्तान महज़ चीज़ों की नहीं, बल्कि उस ज़मीन की है जो हमें गढ़ती है और जिसे बचाने की ज़िम्मेदारी अब हमारी है।
संदर्भ
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https://tinyurl.com/2294nofm
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