जब गर्रा नदी लांघती है मर्यादा: शाहजहाँपुर के इन मोहल्लों पर मंडराता है सबसे बड़ा ख़तरा।

जलवायु और मौसम
10-01-2026 09:08 AM
जब गर्रा नदी लांघती है मर्यादा: शाहजहाँपुर के इन मोहल्लों पर मंडराता है सबसे बड़ा ख़तरा।

इतिहास के पन्ने पलटें तो पाएंगे कि इंसान और मौसम के बीच सदियों से एक अघोषित समझौता रहा है। हमारे पूर्वजों ने अपने आशियाने वहीं बनाए जहाँ कुदरत मेहरबान थी। कब बादल बरसेंगे और कब धूप खिलेगी, इन्हीं सवालों के आधार पर तय होता था कि खेत में हल कब चलेगा और सफ़र पर कब निकलना है। आज सदियां बीत चुकी हैं, लेकिन हालात नहीं बदले हैं। फर्क बस इतना है कि आज मौसम का पूर्वानुमान (Weather Forecast) महज आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हमारी और आपकी सुरक्षा का सबसे बड़ा हथियार बन चुका है।

अगर शाहजहांपुर की बात करें, तो यह शहर कुदरत की एक अजीब पहेली में फंसा हुआ रहता है। यहाँ मौसम की दोहरी मार पड़ती है, मानसून से पहले जानलेवा गर्मी (Heat Stress) शरीर झुलसाती है, तो उसके तुरंत बाद बाढ़ का खौफ दरवाजे पर दस्तक देता है। सच तो यह है कि यहाँ जलवायु किसी 'अदृश्य संचालक' (Silent Planner) की तरह काम कर रही है, जो चुपचाप इस शहर की रफ्तार और दिशा तय करने में लगी है।

जब आप सुबह अखबार में पढ़ते हैं कि आज शाहजहांपुर का तापमान 'सामान्य' से ऊपर है, तो क्या आप इसका असली मतलब समझते हैं?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के दस्तावेज इस गणित को बखूबी समझाते हैं। शाहजहांपुर की वेधशाला (Observatory) हर दिन के तापमान और बारिश का हिसाब-किताब वैसे ही रखती है, जैसे कोई मुनीम बही-खाता रखता है। लेकिन असली खेल 'डिपार्चर' (Departure from Normal) यानी 'सामान्य से अंतर' को समझने में है। मान लीजिए आज पारा 40 डिग्री है, जबकि पिछले कई सालों का औसत 38 डिग्री रहा है, तो इसका सीधा मतलब है कि तापमान सामान्य से 2 डिग्री ज्यादा है। यही वो तुलना है जो चेतावनी देती है कि आज की गर्मी आपके शरीर के लिए कितनी घातक साबित हो सकती है।

इस 'लक्ष्मण रेखा' (बेसलाइन) को तय करने की जिम्मेदारी पुणे स्थित आईएमडी (IMD) के पास है, जो पिछले कई दशकों के डेटा को खंगालकर यह मानक तय करता है। यह डेटा सिर्फ खबरों की सुर्खियां नहीं बनता, बल्कि इसी के आधार पर तय होता है कि शहर की नालियां कब साफ होंगी और किसान खेत में क्या बोएगा।

गर्मी से जंग की तैयारी शाहजहांपुर में अब गर्मियों का मतलब सिर्फ माथे से पसीना पोंछना नहीं रह गया है। यह अब सीधे तौर पर जानलेवा बन चुका है। राष्ट्रीय रिपोर्ट्स इस बात की गवाही दे रही हैं कि तापमान में गड़बड़ी (Temperature Anomalies) खतरनाक स्तर पर है। मौसम विभाग का 'वार्षिक जलवायु सारांश' इशारा कर रहा है कि पारा लगातार ऊपर चढ़ रहा है। दिन की चुभती जलन और रात की उमस ने शाहजहांपुर के लोगों की कार्यक्षमता पर प्रहार किया है।


इस अदृश्य दुश्मन से निपटने के लिए 'उत्तर प्रदेश हीट वेव एक्शन प्लान' एक ढाल की तरह सामने आया है। यह महज सरकारी कागज नहीं, बल्कि लू (Heatwave) से जान बचाने का एक पक्का रोडमैप है। इसमें सबसे ज्यादा जोर 'अर्ली वार्निंग सिस्टम' पर दिया गया है। यानी खतरा आने से पहले ही शहर को आगाह कर देना—ताकि अस्पताल तैयार रहें और मजदूरों के काम के घंटे समय रहते बदल दिए जाएं।

गर्रा और खन्नौत: जीवनदायिनी या मुसीबत? 
जैसे ही गर्मी का सितम कुछ कम होता है, शाहजहांपुर के सामने एक और बड़ी मुसीबत अपना मुंह खोल देती है, उस मुसीबत का नाम "बाढ़" है। जिले का भूगोल ही कुछ ऐसा है कि यहाँ बहने वाली गर्रा और खन्नौत नदियाँ, मानसून की दस्तक के साथ ही अपना रौद्र रूप दिखा देती हैं।

ताजा रिपोर्ट्स बताती हैं कि इन नदियों का जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ता है कि तटीय और निचले इलाकों में रहने वालों की सांसें अटक जाती हैं। पहाड़ों पर होने वाली बारिश का पानी जब नीचे उतरता है, तो वह सीधा शहर के निचले हिस्सों में घुसपैठ कर देता है। बाढ़ का यह पानी रिहाइशी कॉलोनियों और हाईवे तक को अपनी चपेट में ले लेता है, जिससे शहर के कई हिस्से टापू बन जाते हैं। नदियों के इस बागी तेवर ने प्रशासन को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि शहर की प्लानिंग में नदियों के रास्ते (Floodplain) का सम्मान करना अब मजबूरी नहीं, बल्कि जरूरी है।

 जब लाल रंग का मतलब 'खतरा' हो इन तमाम खतरों के बीच सही जानकारी ही सबसे बड़ा बचाव है। मौसम विभाग रंगों के जरिए खतरे की भाषा बोलता है। 'येलो अलर्ट' कहता है सचेत रहें, 'ऑरेंज' कहता है तैयार रहें, और 'रेड अलर्ट' का मतलब है:- "अब तुरंत कार्रवाई का वक्त है।" जब भारी बारिश का अलर्ट आता है, तो वह भविष्यवाणी नहीं, बल्कि एक सिग्नल होता है।

क्या हमारा शहर इस बदलाव के लिए तैयार है?
शाहजहांपुर इस लड़ाई में अकेला नहीं है। 'उत्तर प्रदेश स्टेट एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज' (UP SAPCC) की रिपोर्ट बताती है कि राज्य के कई जिले जलवायु जोखिम (Climate Risk) के साये में हैं। अब बात सिर्फ बाढ़ या सूखे से निपटने की नहीं है, बल्कि खुद को 'अनुकूल' (Adaptation) बनाने की है।

राज्य सरकार अब इस बात पर जोर दे रही है कि हमें मौसम से लड़ना नहीं, बल्कि उसके हिसाब से खुद को बदलना होगा। लू से बचने के तरीके, बाढ़ की सटीक जानकारी और पानी का सही मैनेजमेंट यही शाहजहांपुर का भविष्य तय करेंगे। हमें अपने इंफ्रास्ट्रक्चर को ऐसा बनाना होगा जो मौसम की इस मार को झेल सके।

अंत में, शाहजहांपुर के मौसम को केवल कुदरत का खेल मानकर हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठा जा सकता। गर्रा और खन्नौत का चढ़ता पानी और सूरज की तपिश हमें बार-बार यह याद दिला रही है कि 'डिपार्चर फ्रॉम नॉर्मल' को समझना और प्रकृति के संकेतों को पढ़ना अब हमारी सबसे बड़ी जरूरत है।
 

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2ar6ka5l
https://tinyurl.com/22rsr7dr
https://tinyurl.com/22bql8m9
https://tinyurl.com/2clp6ucp
https://tinyurl.com/2xqj2jmb
https://tinyurl.com/24zq5jwr

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