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जब हम 'खनन' या 'माइंस' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे दिमाग में कोयले की काली खदानों या गहरी सुरंगों की तस्वीर उभरती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के मामले में, खनन का मतलब बिल्कुल अलग है। यहाँ खनन का सीधा अर्थ है—जिले की तेजी से बढ़ती इमारतों और सड़कों की प्यास बुझाने के लिए नदी के तल (Riverbed) से रेत और मिट्टी निकालना। यह काम सिर्फ पैसे कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि इसका सीधा रिश्ता जिले के भूगोल और प्रशासन से है।
शाहजहांपुर में खनन को समझने के लिए सबसे जरूरी दस्तावेज 'जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट' (DSR) है। यह रिपोर्ट जिले में खनन के लिए एक 'मास्टर प्लान' की तरह काम करती है। यही तय करती है कि हम कहाँ खुदाई कर सकते हैं और कहाँ नहीं। शाहजहांपुर में खनन का काम ज्यादातर मौसमी (Seasonal) होता है। यहाँ नदियों के किनारों और बाढ़ वाले इलाकों से रेत हटाई जाती है। देखने में यह काम छोटा लग सकता है, लेकिन इसका असर बहुत गहरा है। यह न केवल स्थानीय निर्माण कार्यों के लिए कच्चा माल देता है, बल्कि राज्य के खजाने को भरने का भी एक बड़ा जरिया भी है।
खनन का इतिहास इंसान की तरक्की की कहानी के साथ चलता है। इतिहास गवाह है कि जब इंसान ने धरती से सामग्री निकालना सीखा, तभी से पक्के मकान, सड़कें और सुरक्षित शहर बनने शुरू हुए। इसी जरूरत ने सरकारों को इन संसाधनों पर कब्जा करने और उन पर टैक्स लगाने के लिए मजबूर किया। कानून की नजर में 'खान' क्या है, इसे समझने के लिए हमें 'माइंस एक्ट 1952' (Mines Act 1952) को देखना होगा।
यह कानून कहता है कि खनन सिर्फ जमीन खोदना नहीं है, बल्कि यह नियमों से बंधा एक काम है। इसमें मजदूरों की सुरक्षा, काम के घंटे और खुदाई के तरीके साफ-साफ लिखे गए हैं। इतिहास से लेकर आज तक, सरकार खनन को नियमों से इसलिए जोड़ती है ताकि कुदरती खजाने का इस्तेमाल सही तरीके से हो और उससे होने वाली कमाई जनता के काम आए। शाहजहांपुर में जो खनन हो रहा है, वह इसी कानूनी परंपरा का हिस्सा है, जहाँ सरकार यह पक्का करती है कि प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल नियमों के दायरे में ही हो।
जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट (DSR) खनन को कैसे तय करती है?
शाहजहांपुर में खनन को 'वैध' या लीगल बनाने के लिए प्रशासन एक लंबी प्रक्रिया अपनाता है। इस प्रक्रिया की रीढ़ है—'जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट' (DSR)। इस रिपोर्ट के जरिए प्रशासन यह पता लगाता है कि जिले की किस नदी में कितनी रेत जमा हुई है और उसमें से कितनी रेत हम बिना नुकसान पहुँचाए निकाल सकते हैं। इसे 'रिप्लेनिशमेंट स्टडी' (Replenishment Study) कहते हैं, जिसका मतलब है यह अंदाजा लगाना कि अगला मानसून नदी में कितनी रेत दोबारा भर देगा।
डीएसआर (DSR) ही यह तय करता है कि किस इलाके में खनन का पट्टा (Lease) दिया जाएगा। यह रिपोर्ट केवल रेत की मात्रा नहीं बताती, बल्कि यह भी ध्यान रखती है कि खनन से नदी के बहाव या पर्यावरण को कोई चोट न पहुँचे। इसी रिपोर्ट के आधार पर सरकारी नोटिस निकलते हैं। यानी, शाहजहांपुर में खनन कोई मनमाना काम नहीं, बल्कि कागजों पर एक पूरी तरह से वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसका मकसद निर्माण सामग्री की जरूरत और पर्यावरण की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना है।![]()
शाहजहांपुर की अर्थव्यवस्था में खनन का सीधा कनेक्शन यहाँ के स्थानीय उद्योगों और निर्माण क्षेत्र से है। अगर हम जिले की 'औद्योगिक प्रोफाइल' देखें, तो पाते हैं कि यहाँ छोटे और मध्यम उद्योग (MSME) तेजी से बढ़ रहे हैं। इन उद्योगों को खड़ा करने और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए रेत और मिट्टी की भारी मांग है।
चाहे नई सड़कें बन रही हों, सरकारी दफ्तर हों या किसी का निजी मकान, हर जगह रेत चाहिए। स्थानीय उद्योगों के लिए खनन से मिलने वाली यह सामग्री शाहजहांपुर की आर्थिक गाड़ी को रफ्तार देती है। यह सेक्टर सिर्फ सामग्री नहीं देता, बल्कि ट्रांसपोर्ट और मजदूरी के जरिए हजारों लोगों को रोजगार भी देता है। इसलिए, प्रशासन की मजबूरी और जिम्मेदारी दोनों है कि वह खनन को सुचारू रूप से चलने दे, ताकि जिले की विकास दर (Growth rate) पर ब्रेक न लगे।
क्या पर्यावरण की सुरक्षा के लिए कड़े नियम मौजूद हैं?
खनन शुरू करने से पहले हर प्रोजेक्ट को पर्यावरण की एक कड़ी परीक्षा से गुजरना पड़ता है। शाहजहांपुर की खदानों के लिए 'प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट' और 'पर्यावरण मंजूरी' (Environmental Clearance) जैसे दस्तावेज तैयार होते हैं, जो बताते हैं कि एक आदर्श प्रोजेक्ट कैसा होना चाहिए। इन कागजों में साफ लिखा होता है कि खदान कहाँ होगी, धूल-मिट्टी उड़ने से रोकने के लिए क्या किया जाएगा और काम खत्म होने के बाद उस गड्ढे को कैसे भरा जाएगा।
उदाहरण के लिए, नियम कहते हैं कि नदी के किनारों को कटने से बचाने के लिए सुरक्षा के इंतजाम करना जरूरी है। इसके अलावा, खनन वाले इलाके में हवा को साफ रखने के लिए पानी का छिड़काव करना और रेत ले जाने वाले ट्रकों को तिरपाल से ढकना अनिवार्य है। यह दस्तावेज यह भी पक्का करते हैं कि खनन से पास के गाँवों और खेतों को नुकसान न हो। कागजों पर यह पूरी प्रक्रिया पर्यावरण की दोस्त नजर आती है।
सरकार खनन पर निगरानी कैसे रखती है?
उत्तर प्रदेश भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग (DGM UP) ने खनन को पारदर्शी बनाने के लिए अब सब कुछ ऑनलाइन कर दिया है। ई-टेंडरिंग के जरिए पट्टे दिए जाते हैं और खनिजों को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ऑनलाइन पास (ई-प्रपत्र सी / MM-11) जरूरी कर दिया गया है। शाहजहांपुर में भी इसी 'डिजिटल सिस्टम' का पालन होता है।
इस सिस्टम का मकसद यह है कि सरकार के पास रेत के हर एक ट्रक का हिसाब रहे। कोई भी व्यक्ति बिना परमिट के न तो खनन कर सकता है और न ही परिवहन। विभाग का पोर्टल नागरिकों और पट्टा धारकों को सेवाएं देता है, ताकि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता रहे। यह डिजिटल पहरेदारी इसलिए है ताकि अवैध खनन रुके और सरकार के राजस्व की चोरी न हो।
गर्रा नदी और जमीनी हकीकत क्या कहानी बयां करती हैं?
तमाम नियमों और डिजिटल निगरानी के बावजूद, जमीनी सच अक्सर कागजी दावों से अलग निकलता है। शाहजहांपुर की जीवनरेखा मानी जाने वाली 'गर्रा नदी' आज अवैध खनन की वजह से अपने वजूद की लड़ाई लड़ रही है। स्थानीय रिपोर्ट्स बताती हैं कि नदी का हुलिया बिगड़ चुका है। जहाँ नियम कहते हैं कि नदी की बीच धारा से खनन नहीं होना चाहिए, वहाँ बड़ी-बड़ी मशीनें (JCB/Pokland) नदी का सीना चीर रही हैं।
हालात ये हैं कि रात के अंधेरे में धड़ल्ले से रेत उठाई जाती है। जब भारी-भरकम डंपर और ट्रैक्टर-ट्रॉलियां गाँवों की सड़कों से गुजरते हैं, तो वे सड़कें टूट जाती हैं जो ग्रामीणों के लिए बनी थीं। इससे न केवल धूल और प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि गाँव वालों में गुस्सा भी है। कई बार प्रशासन छापेमारी (Raids) करता है, गाड़ियाँ भी जब्त होती हैं, लेकिन यह लुका-छिपी का खेल बदस्तूर जारी रहता है। नदी अब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं रही, बल्कि एक 'विवादित आर्थिक अखाड़ा' बन गई है, जहाँ माफिया, प्रशासन और आम जनता आमने-सामने हैं।
हम जवाबदेही और आगे की राह कैसे तय करें?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल जवाबदेही का है। शाहजहांपुर में खनन से जुड़ी शिकायतें अक्सर 'जनसुनवाई पोर्टल' पर देखने को मिलती हैं। यहाँ आम नागरिक अवैध खनन, टूटी सड़कों या अफसरों की लापरवाही की शिकायत करते हैं। इसके अलावा, खनन से होने वाली कमाई का एक हिस्सा 'जिला खनिज फाउंडेशन' (DMF) में जमा होता है, जिसका मकसद खनन प्रभावित इलाकों का विकास करना है।
भविष्य में हमें यह पूछना होगा कि आखिर DMF का पैसा खर्च कहाँ हो रहा है? क्या ऑडिट रिपोर्ट्स सही तस्वीर दिखा रही हैं? ट्रैक्टर ड्राइवर, मजदूर और छोटे खरीदार भी इस अर्थव्यवस्था की एक अहम कड़ी हैं। प्रशासन के रिकॉर्ड और जनसुनवाई के आंकड़े ही बता सकते हैं कि असल में पैसा कहाँ जा रहा है और किसकी जिम्मेदारी तय हो रही है। अब जरूरत सिर्फ छापेमारी की खबरें पढ़ने की नहीं, बल्कि सिस्टम की कमियों को सुधारने की है।
संदर्भ
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https://tinyurl.com/26f73ewm
https://tinyurl.com/2bp9ckwm
https://tinyurl.com/23cpztdv
https://tinyurl.com/256w6ywh
https://tinyurl.com/24ozuq9k
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