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जब हम 'खनिज' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे ज़ेहन में चमकते हुए सोने या गहरे काले कोयले की तस्वीर उभरती है। लेकिन उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर की असली दौलत पाताल की गहराइयों में नहीं, बल्कि हमारी नदियों की सतह और खेतों की ऊपरी परत पर बिखरी हुई है। गर्रा नदी की रेत, साधारण चिकनी मिट्टी और ईंट बनाने वाली 'ब्रिक-अर्थ' (Brick-earth) ही वे रोज़मर्रा की चीज़ें हैं, जिन्होंने खामोशी से इस पूरे ज़िले की बुनियाद रखी है।
शाहजहाँपुर की भौगोलिक बनावट प्रकृति की एक अद्भुत कलाकारी है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, यहाँ के 'लघु खनिजों' (Minor Minerals) का मुख्य स्रोत गर्रा (देवहा) नदी और उसके आसपास के मैदानी इलाके हैं। यहाँ की ज़मीन लाखों सालों से नदियों द्वारा लाई गई परतों (Quaternary Alluvial Deposits) का परिणाम है।

दिलचस्प बात यह है कि यह कुदरती ख़ज़ाना हर साल खुद को दोबारा भर लेता है। मानसून के दौरान जब रामगंगा और गर्रा नदियाँ उफान पर होती हैं, तो वे हिमालय और तराई के क्षेत्रों से अपने साथ भारी मात्रा में उपजाऊ गाद और रेत बहाकर लाती हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद जो 'जलोढ़' (Alluvium) पीछे छूट जाता है, वही अगले सीज़न के लिए रेत और मिट्टी के भंडार भर देता है। यह कुदरत का एक ऐसा चक्र है जो शाहजहाँपुर को निर्माण सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर बनाता है।

शाहजहाँपुर के संदर्भ में इंसान और मिट्टी का रिश्ता बहुत पुराना है। भारत के मैदानी इलाकों (Indo-Gangetic Plain) में पत्थर मिलना मुश्किल था, इसलिए यहाँ की सभ्यता ने मिट्टी के दम पर तरक्की की। हमारे पूर्वजों ने गीली मिट्टी की क्षमता को पहचाना और उसे ईंटों, खपरैलों और अनाज रखने वाले कोठारों में बदल दिया। यही वह बदलाव था जिसने घुमंतू जीवन को 'स्थायी बस्तियों' में तब्दील किया। आज शाहजहाँपुर की गलियों में जो पुरानी इमारतें दिखती हैं, वे दरअसल उसी स्थानीय मिट्टी और रेत का पका हुआ रूप हैं, जिसने कच्चे कीचड़ को एक स्थायी सांस्कृतिक पहचान दी है।
विकास के लिए रेत-मिट्टी ज़रूरी है, लेकिन इनका दोहन अनियंत्रित नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश सरकार की नियमावली के तहत, इन खनिजों को एक सख़्त क़ानूनी दायरे में रखा गया है। नियम यह कहते हैं कि भले ही ये 'लघु खनिज' कहलाते हों, लेकिन इन्हें निकालने के लिए उचित परमिट, निरंतर निगरानी और रिकॉर्ड रखना अनिवार्य है।
शाहजहाँपुर में प्रशासन ई-टेंडरिंग के ज़रिए खनन क्षेत्रों का आवंटन करता है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि:
आज रियल एस्टेट और बुनियादी ढाँचे की बढ़ती माँग ने नदियों की तलहटी पर भारी दबाव डाल दिया है। जब माँग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है, तो 'अवैध खनन' का जन्म होता है। बिना सोचे-समझे की गई खुदाई से गर्रा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) को गंभीर ख़तरा पैदा हो गया है, नदी का रास्ता बदलना और जलस्तर का नीचे जाना इसके सीधे परिणाम हैं।
हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि शाहजहाँपुर पुलिस ने अवैध खनन के ख़िलाफ़ बड़े पैमाने पर 'क्रैकडाउन' (सख़्त कार्रवाई) किया है। रात के अंधेरे में भारी मशीनों से रेत निकालना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह प्रशासन की जवाबदेही पर भी सवालिया निशान लगाता है। ऑडिट रिपोर्ट भी अक्सर इस 'गवर्नेंस गैप' की ओर इशारा करती हैं, जहाँ काग़ज़ों और ज़मीनी हक़ीक़त में अंतर देखने को मिलता है।
शाहजहाँपुर में खनन को अभिशाप नहीं, बल्कि एक वरदान बनाए रखने के लिए हमें एक पारदर्शी प्रबंधन ढाँचे की ज़रूरत है। इसके लिए कुछ ठोस क़दम उठाने होंगे:
संक्षेप में कहें तो गर्रा नदी की रेत और शाहजहाँपुर की मिट्टी हमारे विकास की कच्ची सामग्री है। अगर हम इस कुदरती ख़ज़ाने का सम्मान करेंगे और इसे वैज्ञानिक तरीक़े से इस्तेमाल करेंगे, तो यह शहर आने वाली सदियों तक फलता-फूलता रहेगा। लेकिन अगर लालच में आकर हमने नियमों की अनदेखी की, तो कुदरत का यही चक्र हमारे लिए विनाश का कारण भी बन सकता है।
संदर्भ
https://tinyurl.com/24z3n9rf
https://tinyurl.com/2ab6oxtj
https://tinyurl.com/24lx6hro
https://tinyurl.com/2c69m8km
https://tinyurl.com/256w6ywh
https://tinyurl.com/26ojzqt9