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जब हम 'खनिज' शब्द सुनते हैं, तो अक्सर हमारे मन में चमकते हुए सोने या गहरे काले कोयले की तस्वीर उभरती है। लेकिन शाहजहाँपुर की असली दौलत पाताल की गहराइयों में नहीं, बल्कि हमारी नदियों की सतह और खेतों की ऊपरी परत पर बिखरी हुई है। गर्रा नदी की रेत, साधारण चिकनी मिट्टी और ईंट बनाने वाली 'ब्रिक-अर्थ' ही वे रोजमर्रा की सामग्रियां हैं, जिन्होंने खामोशी से इस पूरे जिले का निर्माण किया है।
शाहजहाँपुर का भूगोल कुदरत की एक अद्भुत इंजीनियरिंग है। विश्वसनीय रिपोर्टों के आंकड़ों के अनुसार, यहाँ के 'लघु खनिजों' का मुख्य स्रोत गर्रा (देवहा) नदी और उसके आसपास के मैदानी इलाके हैं। यहाँ की जमीन 'क्वाटरनरी एल्यूवियल डिपॉजिट्स' से बनी है, जिसका मतलब है कि यह लाखों सालों से नदियों द्वारा लाई गई परतों का परिणाम है। दिलचस्प बात यह है कि यह खजाना हर साल खुद को नया कर लेता है। जब मानसून के दौरान रामगंगा और गर्रा नदियां उफान पर होती हैं, तो वे ऊपरी हिमालयी और तराई क्षेत्रों से भारी मात्रा में गाद और रेत बहाकर लाती हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद जो 'जलोढ़' पीछे छूट जाता है, वही अगले सीजन के लिए रेत और मिट्टी के भंडार भर देता है। यह प्रकृति का एक ऐसा चक्र है जो शाहजहाँपुर को निर्माण सामग्री के मामले में आत्मनिर्भर बनाता है।
इंसान और मिट्टी का रिश्ता शाहजहाँपुर के संदर्भ में बहुत पुराना है। इंडो-गैंजेटिक प्लेन में पत्थर दुर्लभ थे, इसलिए यहाँ की सभ्यता ने मिट्टी के दम पर तरक्की की। हमारे पूर्वजों ने गीली मिट्टी की क्षमता को पहचाना और उसे ईंटों, खपरैलों, भट्ठियों और अनाज संचय करने वाले बड़े कोठारों में बदल दिया। यही वह बदलाव था जिसने खानाबदोश जीवन को 'स्थायी बस्तियों' में तब्दील किया। ईंटों ने घरों को मजबूती दी, जिससे व्यापारिक रास्ते और पक्के शहर विकसित हुए। आज शाहजहाँपुर की गलियों में जो पुरानी इमारतें दिखती हैं, वे दरअसल उसी स्थानीय मिट्टी और रेत का पका हुआ रूप हैं, जिसने गीले कीचड़ को एक स्थायी सांस्कृतिक पहचान में बदल दिया।
विकास के लिए मिट्टी और रेत जरूरी है, लेकिन इसका दोहन अनियंत्रित नहीं हो सकता। उत्तर प्रदेश सरकार के नियमावली के तहत, रेत और मिट्टी को एक कानूनी ढांचे के भीतर रखा गया है। कानून कहता है कि भले ही ये खनिज 'लघु' कहलाते हों, लेकिन इनका निष्कर्षण केवल परमिट, निरंतर निगरानी और उचित रिकॉर्ड के साथ ही किया जा सकता है। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुल खनिज उत्पादन में इन छोटे खनिजों का हिस्सा राज्य के राजस्व के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। शाहजहाँपुर में प्रशासन ई-टेंडरिंग के माध्यम से खनन क्षेत्रों का आवंटन करता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खनन वैज्ञानिक तरीके से हो, पर्यावरण की क्षति कम से कम हो और सरकार को उचित रॉयल्टी प्राप्त हो।
आज के दौर में रियल एस्टेट और बुनियादी ढांचे की बढ़ती मांग ने नदियों के बिस्तरों पर भारी दबाव डाल दिया है। जब मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ता है, तो 'अवैध खनन' का जन्म होता है। अंधाधुंध खुदाई से गर्रा नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरा पैदा हो गया है—नदी का रास्ता बदलना, तटों का कटान और जलस्तर का नीचे जाना इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। हालिया विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, शाहजहाँपुर पुलिस ने गर्रा नदी के किनारे अवैध बालू खनन के खिलाफ बड़े पैमाने पर 'क्रैकडाउन' किया है। अवैध खनन केवल पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुँचाता, बल्कि यह स्थानीय स्तर पर संघर्ष और हिंसा को भी जन्म देता है। माफियाओं द्वारा रात के अंधेरे में भारी मशीनों से रेत निकालना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह जिला प्रशासन की जवाबदेही पर भी एक बड़ा सवालिया निशान है।
ऑडिट रिपोर्ट खनन क्षेत्र में 'गवर्नेंस गैप' की ओर इशारा करती है। अक्सर देखा गया है कि जितना खनन कागजों पर दिखाया जाता है, जमीन पर उससे कहीं अधिक खुदाई होती है। निगरानी तंत्र में कमी और पारदर्शिता के अभाव के कारण राज्य को राजस्व की हानि होती है और नदियों का स्वरूप बिगड़ जाता है। शाहजहाँपुर के मामले में, यह जरूरी है कि 'डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन' के तहत आने वाले फंड का इस्तेमाल उन इलाकों के पुनर्वास के लिए किया जाए जहाँ से खनिज निकाले गए हैं।
शाहजहाँपुर में खनन को अभिशाप नहीं, बल्कि एक वरदान बनाए रखने के लिए हमें एक स्पष्ट रिपोर्टिंग और प्रबंधन ढांचे की आवश्यकता है। जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट को समय-समय पर अपडेट किया जाए ताकि यह पता चल सके कि किस क्षेत्र में कितना भंडार बचा है। साथ ही, ईंट-भट्टों और छोटे ट्रांसपोर्टरों को नियमों के भीतर रहते हुए सरल लाइसेंसिंग प्रक्रिया दी जाए। ईंट-भट्टे ग्रामीण रोजगार की रीढ़ हैं; उन्हें डराने के बजाय जिम्मेदार बनाने की जरूरत है। अवैध खनन रोकने के लिए 'डिजिटल मॉनिटरिंग' और 'ड्रोन सर्विलांस' का सहारा लिया जाए। खनन से मिलने वाली रॉयल्टी का सीधा निवेश स्थानीय बुनियादी ढांचे और नदी संरक्षण में होना चाहिए।
गर्रा नदी की रेत और शाहजहाँपुर की मिट्टी हमारे विकास की कच्ची सामग्री है। अगर हम इस खजाने का सम्मान करेंगे और इसे वैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल करेंगे, तो यह शहर आने वाली कई सदियों तक फलता-फूलता रहेगा। लेकिन अगर हम लालच में नदी की छाती को नियमों से ज्यादा गहरा चीरेंगे, तो कुदरत का वही चक्र जो हमें जीवन देता है, विनाश का कारण भी बन सकता है।
संदर्भ
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https://tinyurl.com/24lx6hro
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