विकास के लिए 5,746 पेड़ों की बलि: क्या शाहजहाँपुर की हरियाली फिर लौट पाएगी?

वन
10-01-2026 09:06 AM
विकास के लिए 5,746 पेड़ों की बलि: क्या शाहजहाँपुर की हरियाली फिर लौट पाएगी?

जब हम उत्तर प्रदेश के नक्शे पर घने जंगलों की तलाश करते हैं, तो हमारी उंगली लखीमपुर खीरी या पीलीभीत पर जाकर रुकती है। शाहजहाँपुर को हम आमतौर पर गन्ने के खेतों और समतल मैदानों के लिए जानते हैं। यहाँ कोई विशाल जंगल नहीं है, लेकिन अगर आप गहराई से देखें, तो इस जिले की कहानी एक 'फॉरेस्ट एज' (Forest Edge) यानी जंगल के किनारे से तय होती है। यह किनारा है—खुटार (Khutar) का इलाका, जो पीलीभीत और दुधवा के जंगलों से सटा हुआ है। यहाँ गन्ने के खेत और झाड़ियां आपस में मिलती हैं, और यहीं से वन्यजीवों का आना-जाना लगा रहता है। शाहजहाँपुर भले ही बड़े वनों के लिए प्रसिद्ध न हो, लेकिन इसका भूगोल इस बात का गवाह है कि जंगल सिर्फ पेड़ नहीं होते, वे एक सीमा रेखा होते हैं जहाँ इंसान और कुदरत का आमना-सामना होता है।

इतिहास हमें बताता है कि इंसानी बस्तियां जंगलों के आसपास ही क्यों फली-फूलीं। विश्वसनीय शोधों के अनुसार, जंगल सिर्फ लकड़ी का डिपो नहीं थे, बल्कि वे गांव की जिंदगी की धुरी थे। ईंधन के लिए लकड़ी, मकान बनाने के लिए इमारती लकड़ी, और मवेशियों के लिए चारा—ये सब जंगल से ही मिलता था। आज भी शाहजहाँपुर के ग्रामीण इलाकों में यह पुरानी सोच खत्म नहीं हुई है। भले ही घने जंगल कम हो गए हों, लेकिन आज भी लोग अपनी दैनिक जरूरतों और आजीविका के लिए इन्हीं हरे-भरे टुकड़ों पर निर्भर हैं। चाहे वह जलावन की लकड़ी हो या खेतों के किनारे लगे पेड़, ये आज भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं।

चूंकि शाहजहाँपुर मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान मैदानी जिला है, इसलिए यहाँ वन विभाग का काम पहाड़ी जिलों से थोड़ा अलग है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यहाँ 'जंगल' का मतलब सिर्फ आरक्षित वन नहीं है। यहाँ असली खेल 'सामाजिक वानिकी' (Social Forestry) का है। शाहजहाँपुर में एक समर्पित 'सामाजिक वानिकी प्रभाग' काम करता है, जिसके तहत कई रेंज आती हैं। यह विभाग उन जमीनों पर जंगल उगाता है जो पारंपरिक जंगल नहीं हैं—जैसे सड़कों के किनारे, नहर की पटरियां और ग्राम समाज की खाली जमीन। इसे हम जिले का "वर्किंग फॉरेस्ट" कह सकते हैं। यह वो जंगल है जो खेतों के बीच पट्टियों के रूप में फैला है और हरियाली को जिंदा रखे हुए है।

लेकिन हरियाली की इस कोशिश के बीच विकास का पहिया भी घूम रहा है, जो अक्सर पेड़ों की बलि मांगता है। विश्वसनीय रिपोर्टों ने शाहजहाँपुर में विकास और पर्यावरण के बीच चल रही इस रस्साकसी को उजागर किया है। जिले में एक हाईवे के चौड़ीकरण के लिए वन विभाग ने 5,746 पेड़ों को काटने की अनुमति दी है। यह आंकड़ा छोटा नहीं है। जब इतनी बड़ी संख्या में सड़क किनारे खड़े पुराने पेड़ कटते हैं, तो स्थानीय लोगों में नाराजगी होना स्वाभाविक है। हालांकि, इसके बदले में भारी-भरकम मुआवजा राशि तय की गई है और नए पेड़ लगाने का वादा किया गया है। लेकिन सवाल वही रहता है—क्या नए पौधे उन पुराने विशाल वृक्षों की जगह ले पाएंगे?

सरकार और विभाग का तर्क है कि विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं। इसलिए 'प्रतिपूरक वनीकरण' (Compensatory Afforestation) का नियम लाया गया है। अनुपालन रिपोर्टों के अनुसार, शाहजहाँपुर सामाजिक वानिकी प्रभाग को काटे गए पेड़ों के बदले नई जगह पर वृक्षारोपण करना होता है। इसके लिए बाकायदा जमीन चिन्हित की जाती है और यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जाती है कि जिले का 'ग्रीन कवर' बना रहे।

खुटार का इलाका वन विभाग की नजर में बेहद संवेदनशील है। आधिकारिक रिपोर्टों में यहाँ की संवेदनशीलता और वन कानूनों के सख्ती से पालन की बात कही गई है। यह संवेदनशीलता बेवजह नहीं है। यह इलाका जंगल का वह 'बफर' है जो पीलीभीत और लखीमपुर के जंगलों को शाहजहाँपुर के मैदानी इलाकों से जोड़ता है। यहाँ जंगल की सीमा और इंसानी आबादी के बीच का फासला बहुत कम है। यह 'फॉरेस्ट एज' सिर्फ नक्शे की लकीर नहीं है, बल्कि एक ऐसी जगह है जहाँ हर दिन निगरानी की जरूरत होती है।

इस 'पतले बफर' का सबसे खतरनाक परिणाम मानव-वन्यजीव संघर्ष के रूप में सामने आ रहा है। हाल ही में खुटार रेंज और पीलीभीत की सीमा पर बाघ के हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं। क्षेत्रीय रिपोर्टों के अनुसार, खेतों में काम कर रहे किसानों पर बाघ ने हमला किया है। पीलीभीत के जंगल से निकलकर बाघ अक्सर शाहजहाँपुर की सीमा में दाखिल हो जाते हैं। यहाँ गन्ने के खेत बाघों को जंगल जैसा ही अहसास देते हैं, और यही भ्रम इंसान और जानवर को आमने-सामने ला खड़ा करता है। यह अब केवल संरक्षण का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक 'पब्लिक सेफ्टी' यानी जन-सुरक्षा का गंभीर मुद्दा बन चुका है।

शाहजहाँपुर की कहानी हमें यह सिखाती है कि जंगल का मतलब सिर्फ पेड़ों का झुरमुट नहीं है। आज जिले के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ विकास के लिए सड़कों को चौड़ा करना और काटे गए पेड़ों की भरपाई करना, और दूसरी तरफ वन्यजीवों को उनके इलाके में सुरक्षित रखते हुए किसानों की जान बचाना। अंततः, यह समझना जरूरी है कि हम जंगल के चाहे कितने भी किनारे पर क्यों न हों, कुदरत के नियमों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2dd8jw86
https://tinyurl.com/24pj3tc7
https://tinyurl.com/27uorkmy
https://tinyurl.com/2yt6djkb
https://tinyurl.com/2a2ld2c7 

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