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जब भी जल-संपदा या जलीय संसाधनों की बात होती है, तो अक्सर हमारा ध्यान विशाल महासागरों, तटीय इलाकों और बड़ी-बड़ी नावों की तरफ चला जाता है। लेकिन शाहजहाँपुर, जो समंदर से सैकड़ों किलोमीटर दूर बसा एक मैदानी ज़िला है, वहाँ इन बातों का क्या अर्थ है? क्या एक ज़मीन से घिरा (Landlocked) ज़िला भी जल-संपदा के मामले में समृद्ध हो सकता है? जवाब है, “हाँ।” शाहजहाँपुर के लिए गर्रा और खन्नौत जैसी नदियाँ ही उसकी असली 'नीली दौलत' हैं।
केंद्रीय भूमि जल बोर्ड के दस्तावेज़ स्पष्ट करते हैं कि शाहजहाँपुर की पूरी भौगोलिक बनावट गर्रा और खन्नौत जैसी नदियों के प्रवाह से तय होती है। ये नदियाँ महज़ बहता हुआ पानी नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) हैं। जिस तरह समुद्र तटीय लोगों को भोजन और रोज़गार देता है, ठीक उसी तरह हमारे ज़िले की ये नदियाँ स्थानीय निषाद समुदाय और मछुआरा परिवारों के लिए ज़िंदगी की आधाररेखा हैं। आज यह समझना ज़रूरी है कि कैसे नदियों के मीठे पानी में मछली पालन और उनका संरक्षण शाहजहाँपुर की अर्थव्यवस्था और सेहत के लिए एक नई क्रांति बन रहा है।
इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम पाते हैं कि मानव सभ्यताएँ हमेशा नदियों के किनारे ही क्यों फली-फूलीं। इसका कारण सिर्फ प्यास बुझाना नहीं था, बल्कि 'जलीय भोजन' की आसान उपलब्धता भी थी। नदियाँ प्रोटीन का सबसे सुलभ और सस्ता ज़रिया रही हैं। मछली पकड़ना, उन्हें सुखाना और उनका व्यापार करना,यह सदियों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार रहा है। शाहजहाँपुर में भी यह तर्क आज उतना ही प्रासंगिक है। यहाँ के स्थानीय हाट-बाज़ारों में जो मछली बिकती है, वह किसी फ़ैक्ट्री में तैयार नहीं होती, बल्कि इन्हीं प्राकृतिक जलस्रोतों की देन है। यह एक ऐसा रोज़गार है जो पीढ़ियों से चला आ रहा है और समाज के एक बड़े तबके को आत्मनिर्भर बनाता है।
लेकिन आज हमारी ये जीवनदायिनी नदियाँ संकट में हैं। शोध पत्र बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में मीठे पानी की मछलियों के अस्तित्व पर प्रदूषण और अंधाधुंध शिकार के कारण ख़तरा मँडरा रहा है। जब नदियों में गंदगी बढ़ती है, तो पानी में ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाता है, जिससे जलीय जीवों का दम घुटने लगता है। 'नमामि गंगे' का डिस्ट्रिक्ट गंगा प्लान एक कड़वी सच्चाई बयां करता है,शहर के कई बड़े नाले बिना ट्रीटमेंट के सीधे गर्रा और खन्नौत में गिर रहे हैं। यह गंदगी न केवल पानी को ज़हरीला बनाती है, बल्कि मछलियों के प्रजनन स्थलों (Breeding grounds) को भी तबाह कर देती है।
इस संकट से निपटने के लिए अब एक वैज्ञानिक पहल शुरू की गई है, जिसे 'रिवर रैंचिंग' (River Ranching) कहा जाता है। जिस तरह हम खेतों में बीज बोते हैं, उसी तरह 'रिवर रैंचिंग' के तहत नदियों में मछलियों की विशेष प्रजातियों के बच्चे (बीज) छोड़े जाते हैं। केंद्र सरकार का 'रिवर रैंचिंग प्रोग्राम' प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना का एक अहम हिस्सा है। इसका मक़सद उन नदियों में मछलियों की आबादी को फिर से बहाल करना है जहाँ वे लुप्त होने की कगार पर हैं। यह केवल पर्यावरण बचाने की कोशिश नहीं है, बल्कि मछुआरों की आमदनी बढ़ाने का एक सीधा रास्ता है।
हालांकि, यह प्रक्रिया सिर्फ मछली छोड़ देने भर से पूरी नहीं होती; इसके लिए वैज्ञानिक सूझबूझ की ज़रूरत होती है। 'केंद्रीय अंतर्देशीय मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान' (ICAR-CIFRI) के दिशा-निर्देश बताते हैं कि रिवर रैंचिंग में स्थानीय प्रजातियों का चुनाव और सही समय का चयन बहुत महत्वपूर्ण है। शाहजहाँपुर में इस बदलाव को ज़मीन पर उतारने में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) अहम भूमिका निभा रहा है। यहाँ युवाओं को 'एकीकृत मछली पालन' (Integrated Fish Farming) की ट्रेनिंग दी जा रही है। इसका अर्थ है कि किसान अब सिर्फ गेहूँ-धान पर निर्भर नहीं हैं; वे अपने तालाबों में मछली पालन के साथ-साथ बत्तख पालन या सब्ज़ी की खेती भी कर सकते हैं।
हाल ही में शाहजहाँपुर में गर्रा नदी के तट पर एक भव्य 'रिवर रैंचिंग' कार्यक्रम आयोजित किया गया, जहाँ प्रशासनिक अधिकारियों की मौजूदगी में बड़ी तादाद में मछलियों के बच्चे नदी में प्रवाहित किए गए। यह दृश्य केवल एक सरकारी औपचारिकता नहीं, बल्कि भविष्य के प्रति एक संकल्प था। जब ये मछलियाँ बड़ी होंगी, तो वे न केवल नदी की शुद्धि में सहायक होंगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मज़बूती देंगी। शाहजहाँपुर की यह कहानी हमें सिखाती है कि संसाधन हमारे पास ही हैं, बस उन्हें सहेजने की ज़रूरत है। हमारी नदियाँ ही हमारा असली 'समंदर' हैं।
संदर्भ
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https://tinyurl.com/2753g66o
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