शाहजहाँपुर का 'समंदर' से क्या है नाता? गर्रा नदी की एक बूँद का हैरान करने वाला सफर!

महासागर
10-01-2026 09:04 AM
शाहजहाँपुर का 'समंदर' से क्या है नाता? गर्रा नदी की एक बूँद का हैरान करने वाला सफर!

जब हम शाहजहांपुर के नक्शे को देखते हैं, तो हमें चारों तरफ सिर्फ जमीन ही जमीन नजर आती है। यहाँ कोई समुद्र तट नहीं है, न ही हमें लहरों की आवाज सुनाई देती है। हम एक 'लैंडलॉक्ड' (landlocked) यानी चारों ओर जमीन से घिरे जिले में रहते हैं। लेकिन अगर आप विज्ञान और भूगोल की नजर से देखें, तो हकीकत कुछ और ही है। हमारा शाहजहांपुर, जिसे हम मैदानी इलाका मानते हैं, असल में समुद्र के साथ एक गहरी सांस ले रहा है। हमारे यहां का पानी, हमारी हवा और हमारे खेतों की नमी—सब कुछ उस विशाल महासागर से जुड़ा है जो यहाँ से हजारों किलोमीटर दूर है।

यह कहानी सिर्फ भूगोल की नहीं है, यह कहानी है पानी की एक बूंद के सफर की। कल्पना कीजिए कि गर्रा नदी में बह रही पानी की एक बूंद, जो आज शाहजहांपुर के किसी घाट से गुजर रही है, वह यहाँ रुकने वाली नहीं है। उसका मंजिल तो बंगाल की खाड़ी है। यह लेख उसी अदृश्य धागे को खोजने की कोशिश है जो हमारे इस छोटे से जिले को दुनिया के सबसे बड़े जल-तंत्र का हिस्सा बनाता है।

शाहजहांपुर का भूगोल समझने के लिए हमें अपनी नदियों को समझना होगा। भरोसेमंद रिपोर्टों के मुताबिक हमारे जिले की नदियां अकेली नहीं हैं, बल्कि वे एक बड़े परिवार का हिस्सा हैं। गर्रा नदी, जिसे हम देवहा भी कहते हैं, वह रामगंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है। जब गर्रा का पानी रामगंगा में मिलता है, तो वह वहां थमता नहीं है। रामगंगा आगे जाकर कन्नौज के पास गंगा नदी में मिल जाती है। और गंगा, जैसा कि हम सब जानते हैं, भारत के आधे हिस्से को पार करती हुई अंततः बंगाल की खाड़ी में समा जाती है। ताज़ा दस्तावेज़ पुष्टि करते हैं कि शाहजहांपुर का ड्रेनेज सिस्टम यानी जल निकासी तंत्र सीधे तौर पर गंगा बेसिन से जुड़ा हुआ है। यानी, आज जो पानी हमारे पुलों के नीचे से बह रहा है, वह कुछ हफ्तों बाद समुद्र की लहरों का हिस्सा बन जाएगा।

नदियां और महासागर का रिश्ता इतिहास हमें बताता है कि पुराने जमाने में नदियां और समुद्र इंसानी बस्तियों के लिए क्यों मायने रखते थे। नदियां सिर्फ पानी नहीं देती थीं, वे रास्ता भी देती थीं। शाहजहांपुर जैसे नदी किनारे बसे शहर इसलिए ताकतवर बने क्योंकि वे अपनी उपजाऊ जमीन से अनाज पैदा कर सकते थे और नदियों के जरिए उसे तटीय व्यापार के लिए समुद्र तक भेज सकते थे। समुद्र का यह कनेक्शन सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं था। हमारा पूरा का पूरा कृषि कैलेंडर—कब बुवाई करनी है, कब कटाई करनी है—यह सब समुद्र द्वारा तय की गई हवाओं पर निर्भर था। जिसे हम मानसून कहते हैं, वह असल में समुद्र का ही भेजा हुआ तोहफा है।

शाहजहांपुर के किसान आसमान की ओर देखकर जिस बारिश का इंतजार करते हैं, वह पानी स्थानीय नहीं है। सरकारी जानकारी के अनुसार यह नमी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से उठती है। गर्मियों में जब जमीन तपती है और समुद्र का पानी भाप बनकर उठता है, तो हवाएं उस नमी को लेकर हमारे मैदानी इलाकों की तरफ दौड़ती हैं। यही वह प्रक्रिया है जो शाहजहांपुर में धान की रोपाई और गन्ने की फसल को जीवन देती है। यानी, हमारे खेतों में जो बारिश की बूंद गिर रही है, वह कुछ दिन पहले तक समंदर का खारा पानी थी। कुदरत ने उसे भाप बनाकर मीठा किया और हवाओं के रथ पर बैठाकर हमारे पास भेज दिया। मौसम विभाग के नोट्स समझाते हैं कि कैसे दक्षिण-पश्चिम मानसून की यह पूरी प्रणाली समुद्र और जमीन के तापमान के अंतर से चलती है।

हमारा कचरा, समंदर की मुसीबत लेकिन इस रिश्ते का एक काला पहलू भी है। जिस रास्ते से पानी समुद्र तक जाता है, उसी रास्ते से हमारा कचरा भी वहां पहुंचता है। एक कड़वी सच्चाई यह है कि हम अक्सर सोचते हैं कि सड़क पर फेंका गया प्लास्टिक का एक wrapper या बोतल यहीं कहीं मिट्टी में दब जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं है। जब बारिश होती है, तो यह प्लास्टिक बहकर नालों में जाता है। शाहजहांपुर के 'जल जीवन मिशन' के तहत बने डिस्ट्रिक्ट गंगा प्लान में शहर के नालों और ड्रेनेज का विस्तार से जिक्र है। ये नाले अंततः गर्रा या खन्नौत नदी में गिरते हैं। वहां से यह प्लास्टिक रामगंगा, फिर गंगा और आखिर में समुद्र तक पहुंचता है। विश्वसनीय शोध बताते हैं कि समुद्र में मिलने वाला ज्यादातर प्लास्टिक कचरा तटीय शहरों का नहीं, बल्कि हम जैसे 'इनलैंड' शहरों का होता है।

हालांकि, नदियों का यह सफर सिर्फ कचरा ही नहीं ढोता, बल्कि जीवन भी बांटता चलता है। वैज्ञानिकों के अनुसार गंगा-ब्रह्मपुत्र का डेल्टा इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी (sediment) से बना है और टिका हुआ है। शाहजहांपुर की नदियों में बहने वाली गाद या सिल्ट बेकार नहीं है। जब यह मिट्टी बहकर बंगाल तक पहुंचती है, तो यह वहां की जमीन को डूबने से बचाती है। समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है, और ऐसे में नदियों द्वारा लाई गई यह मिट्टी डेल्टा की ऊंचाई बनाए रखने में मदद करती है।

अंत में, यह समझना जरूरी है कि समुद्र से हमारा रिश्ता सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है। यह रिश्ता हर साल हमारे दरवाजे पर दस्तक देता है। हालिया ख़बरों ने हमें फिर याद दिलाया कि यह कनेक्शन कितना सीधा और असरदार है। जब पहाड़ों और मैदानी इलाकों में भारी बारिश हुई, तो रामगंगा का जलस्तर तेजी से बढ़ गया। इसका असर यह हुआ कि बांधों से पानी छोड़ना पड़ा, जिससे गर्रा नदी उफान पर आ गई और शाहजहांपुर के निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा मंडराने लगा। हम शाहजहांपुर के लोग भले ही समुद्र को रोज न देख पाएं, लेकिन हमारी हर सुबह और शाम उस महासागर से जुड़ी है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/25tx8qla
https://tinyurl.com/23yb4u6c
https://tinyurl.com/29x5ruud
https://tinyurl.com/24k3d4pu
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https://tinyurl.com/2b5rqym7
https://tinyurl.com/2dmncflp 

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