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जब हम उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर के नक़्शे पर नज़र डालते हैं, तो हमें चारों ओर केवल मैदानी ज़मीन का विस्तार दिखाई देता है। यहाँ कोई समुद्र तट नहीं है और न ही हमें लहरों का शोर सुनाई देता है। भौगोलिक रूप से हम एक 'लैंडलॉक्ड' (landlocked) ज़िले में रहते हैं, जो चारों ओर से अन्य ज़िलों की सीमाओं से घिरा है। लेकिन यदि हम विज्ञान और भूगोल की गहराई में जाकर देखें, तो हक़ीक़त कुछ और ही बयां करती है। हमारा शाहजहाँपुर, जिसे हम एक ठेठ मैदानी इलाका मानते हैं, असल में समुद्र के साथ एक निरंतर संवाद में है। हमारे यहाँ का पानी, हवा और खेतों की नमी,सब कुछ उस विशाल महासागर से गहराई से जुड़ा है जो यहाँ से हज़ारों किलोमीटर दूर है।
यह वृत्तांत केवल भूगोल का नहीं है, बल्कि यह पानी की एक नन्हीं सी बूंद के विस्मयकारी सफ़र का है। कल्पना कीजिए कि गर्रा नदी के किसी घाट से गुज़र रही पानी की एक बूंद यहाँ रुकने के लिए नहीं आई है। उसका अंतिम पड़ाव तो बंगाल की खाड़ी है। यह लेख उसी अदृश्य जुड़ाव को खोजने की कोशिश है जो हमारे इस छोटे से ज़िले को दुनिया के सबसे विशाल जल-तंत्र का हिस्सा बनाता है।
शाहजहाँपुर के भूगोल को समझने के लिए हमें अपनी नदियों के परिवार को समझना होगा। विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, हमारे ज़िले की नदियाँ स्वतंत्र नहीं हैं। गर्रा नदी, जिसे स्थानीय स्तर पर 'देवहा' भी कहा जाता है, वह रामगंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है। जब गर्रा का जल रामगंगा में मिलता है, तो वह वहाँ थमता नहीं है। रामगंगा आगे जाकर कन्नौज के समीप गंगा नदी में विलीन हो जाती है। और गंगा, जैसा कि हम जानते हैं, भारत के एक विशाल भू-भाग को सींचती हुई अंततः बंगाल की खाड़ी के अगाध जल में समा जाती है। ताज़ा दस्तावेज़ पुष्टि करते हैं कि शाहजहाँपुर का ड्रेनेज सिस्टम (जल निकासी तंत्र) सीधे तौर पर गंगा बेसिन से जुड़ा है। यानी, आज जो पानी हमारे पुलों के नीचे से बह रहा है, वह कुछ ही हफ्तों में समंदर की लहरों का हिस्सा बन जाएगा।
नदियों और महासागर का ऐतिहासिक संबंध इतिहास गवाह है कि प्राचीन काल में बस्तियाँ हमेशा नदियों के किनारे ही क्यों बसीं। नदियाँ केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं थीं, बल्कि वे संचार और व्यापार के द्वार भी खोलती थीं। शाहजहाँपुर जैसे नदियों के किनारे बसे शहर इसलिए समृद्ध हुए क्योंकि यहाँ की उपजाऊ ज़मीन अनाज पैदा करती थी और नदियाँ उस उपज को तटीय व्यापार के लिए समुद्र तक पहुँचाने का ज़रिया बनती थीं। समुद्र का यह कनेक्शन केवल व्यापार तक सीमित नहीं था। हमारा पूरा कृषि कैलेंडर,कब बुवाई करनी है और कब कटाई,यह सब समुद्र से उठने वाली हवाओं पर निर्भर करता है। जिसे हम 'मानसून' कहते हैं, वह असल में समुद्र द्वारा भेजा गया एक अनमोल उपहार ही तो है।
शाहजहाँपुर के किसान आसमान की ओर निहारते हुए जिस बारिश की प्रतीक्षा करते हैं, वह पानी स्थानीय नहीं है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, यह नमी हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी से उठती है। गर्मियों में जब तपती धूप से समुद्र का पानी वाष्पित होकर भाप बनता है, तो मानसूनी हवाएँ उस नमी को लेकर हमारे मैदानी इलाकों की ओर दौड़ती हैं। यही वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जो शाहजहाँपुर में धान की रोपाई और गन्ने की लहलहाती फ़सल को जीवन देती है। यानी, हमारे खेतों में गिरने वाली बारिश की हर बूंद कुछ समय पहले तक समंदर का खारा पानी थी, जिसे कुदरत ने भाप बनाकर मीठा किया और हवाओं के माध्यम से हमारे पास भेज दिया। मौसम विभाग के वैज्ञानिक बताते हैं कि दक्षिण-पश्चिम मानसून की यह पूरी प्रणाली समुद्र और ज़मीन के तापमान के अंतर से संचालित होती है।
समंदर के लिए एक गंभीर ख़तरा इस गहरे रिश्ते का एक चिंताजनक पहलू भी है। जिस मार्ग से पानी समुद्र तक जाता है, उसी मार्ग से हमारा फैलाया हुआ कचरा भी वहाँ पहुँचता है। यह एक कड़वी हक़ीक़त है कि हम अक्सर यह सोचकर सड़क पर प्लास्टिक का रैपर या बोतल फेंक देते हैं कि यह यहीं मिट्टी में मिल जाएगा, पर ऐसा नहीं होता। बारिश के साथ यह प्लास्टिक बहकर नालों में पहुँचता है। शाहजहाँपुर के 'जल जीवन मिशन' के तहत बने डिस्ट्रिक्ट गंगा प्लान में शहर के नालों का विस्तार से ज़िक्र है। ये नाले अंततः गर्रा या खन्नौत नदी में मिलते हैं, जहाँ से यह प्लास्टिक रामगंगा और फिर गंगा के रास्ते समुद्र तक जा पहुँचता है। शोध बताते हैं कि समुद्र में मिलने वाला अधिकांश कचरा तटीय शहरों का नहीं, बल्कि हमारे जैसे 'इनलैंड' शहरों की देन होता है।
हालाँकि, नदियों का यह सफ़र केवल कचरा ही नहीं ढोता, बल्कि जीवन का आधार भी बाँटता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, गंगा-ब्रह्मपुत्र का विशाल डेल्टा इन्हीं नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी (sediment) के कारण ही टिका हुआ है। शाहजहाँपुर की नदियों में बहने वाली गाद या सिल्ट बेकार नहीं है। जब यह उपजाऊ मिट्टी बहकर बंगाल तक पहुँचती है, तो यह वहाँ की ज़मीन को समुद्र में डूबने से बचाती है। बढ़ते समुद्री जलस्तर के बीच, नदियों द्वारा लाई गई यह मिट्टी डेल्टा की ऊँचाई बनाए रखने में मदद करती है।
अंत में, यह समझना ज़रूरी है कि समुद्र से हमारा रिश्ता केवल किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं है। यह रिश्ता हर साल हमारे दरवाज़े पर दस्तक देता है। हालिया ख़बरों ने हमें फिर याद दिलाया कि यह संबंध कितना सीधा है। जब पहाड़ों और मैदानी क्षेत्रों में भारी वर्षा हुई, तो रामगंगा का जलस्तर तेज़ी से बढ़ गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बाँधों से पानी छोड़ना पड़ा, जिससे गर्रा नदी उफ़ान पर आ गई और शाहजहाँपुर के निचले इलाकों में बाढ़ का संकट मँडराने लगा। हम शाहजहाँपुर के लोग भले ही अपनी आँखों से रोज़ समंदर न देख पाएँ, लेकिन हमारी हर सुबह और शाम उस महासागर की लय से जुड़ी हुई है।
संदर्भ
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