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शाहजहाँपुर को अगर आप सिर्फ नक्शे पर एक शहर के रूप में देखते हैं, तो शायद आप इसकी असली रूह को नहीं पहचान पाएंगे। यह शहर ईंट और गारे से ज्यादा, नदियों और पानी से बना है। भरोसेमंद रिपोर्टों और ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि शाहजहाँपुर की नींव ही 'गर्रा' (देवहा) और 'खन्नौत' नदियों के किनारे रखी गई थी। यहाँ की सुबह और शाम, यहाँ का व्यापार और यहाँ का जीवन—सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि मानसून का पानी शिवालिक की पहाड़ियों से कितनी तेजी से नीचे उतरता है और कितनी सुरक्षित तरीके से हमारे मैदानों से गुजरता है। यह शहर वास्तव में "नदियों द्वारा बनाया गया" (river-made) एक ऐसा ठिकाना है, जहाँ इतिहास और भूगोल एक साथ बहते हैं। यहाँ नदियां सिर्फ पानी का जरिया नहीं हैं, बल्कि वे यह तय करती हैं कि कौन सा इलाका आबाद रहेगा और कौन सा पानी में डूबेगा।
क्या आप जानते हैं कि जिस 'गर्रा' नदी को हम रोज देखते हैं, उसका सफर हमारे जिले से बहुत दूर शुरू होता है?
यह नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं, बल्कि दो राज्यों, पहाड़ों, जंगलों और खेतों को जोड़ने वाली एक डोर है। भौगोलिक स्रोतों के अनुसार, गर्रा नदी का जन्म उत्तराखंड की शिवालिक पहाड़ियों में होता है। वहां इसे 'नंधौर' के नाम से जाना जाता है। जैसे-जैसे यह नदी नीचे उतरती है और मैदानी इलाकों में प्रवेश करती है, इसका नाम बदलकर 'देवहा' हो जाता है। और जब यह उत्तर प्रदेश में हमारे शाहजहाँपुर के पास पहुंचती है, तो हम इसे 'गर्रा' के नाम से पुकारते हैं। यह नाम बदलने की कहानी असल में उस यात्रा की कहानी है जो यह नदी तय करती है—पहाड़ी जंगलों से निकलकर, पीलीभीत और शाहजहाँपुर के खेतों को सींचते हुए, यह अंततः रामगंगा में मिल जाती है।
इतिहास के पन्नों में नदियों का महत्व हमेशा से रहा है। पुराने जमाने के दस्तावेज बताते हैं कि गर्रा और खन्नौत नदियां हमेशा से शाहजहाँपुर के लिए सामरिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण रही हैं। इतिहास गवाह है कि नदियां और नहरें मानव सभ्यता की धुरी रही हैं। इन्होंने न केवल खेती के लिए पानी देकर भोजन का सरप्लस पैदा किया, बल्कि व्यापार के रास्ते भी खोले। लेकिन नदियों के साथ रहने का मतलब सिर्फ फायदा उठाना नहीं था, बल्कि उन्हें 'संभालना' भी था। यही कारण है कि इतिहास में हमें पुलों, तटबंधों और जल निकासी के कड़े नियमों का जिक्र मिलता है।
अगर हम शाहजहाँपुर के जल-तंत्र (water network) को देखें, तो यह किसी शरीर की नसों जैसा है। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार हमारा जिला सिर्फ गर्रा और खन्नौत तक सीमित नहीं है। यहाँ 'बहगुल' और 'कठना' जैसी नदियां भी बहती हैं जो इस इलाके के भूजल (groundwater) को रिचार्ज करती हैं। लेकिन सिर्फ प्राकृतिक नदियां ही नहीं, शहर के अंदर मौजूद 'छिपी हुई नहरें'—यानी हमारे बरसाती नाले, सिंचाई की गूलें और ड्रेनेज चैनल—भी उतनी ही अहम हैं। ये वो रास्ते हैं जो तय करते हैं कि भारी बारिश में कौन सी कॉलोनी सूखी रहेगी और कहाँ पानी भरेगा। जब ऊपर बैराज से पानी छोड़ा जाता है, तो यही नेटवर्क शहर की सुरक्षा पंक्ति बनता है।
आज के दौर में नदियों का एक दूसरा पहलू भी हमारे सामने आता है—'रिस्क' यानी खतरा। जब पहाड़ों पर बारिश होती है और गर्रा व खन्नौत का जलस्तर बढ़ता है, तो शाहजहाँपुर के निचले इलाकों में अलर्ट जारी कर दिया जाता है। ताज़ा रिपोर्टों के अनुसार जलस्तर खतरे के निशान के करीब पहुंचते ही अजीजगंज, काकोरी और नदी किनारे बसी अन्य कॉलोनियों में धड़कनें बढ़ जाती हैं। यह 'हाइपर-लोकल' स्थिति हमें याद दिलाती है कि हम नदियों को सिर्फ दृश्य मानकर नहीं रह सकते। यह एक चेतावनी है कि नदी का अपना एक अधिकार क्षेत्र (floodplain) होता है।
इन तमाम चुनौतियों के बीच, शाहजहाँपुर ने अपनी नदियों को एक नई पहचान देने की कोशिश भी शुरू की है। खन्नौत नदी के किनारे 'रिवरफ्रंट डेवलपमेंट' की योजना शहर के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। इस योजना का मकसद न केवल पर्यटन को बढ़ावा देना है, बल्कि नदी के किनारों को पक्का करके पर्यावरण को भी सुरक्षित करना है। यह प्रस्ताव बताता है कि हम अपनी नदियों को अब सिर्फ 'बाढ़ का कारण' नहीं, बल्कि अपनी 'विरासत' मान रहे हैं। पुराने मोहल्लों के लिए जो नदियां कभी ड्रेनेज का जरिया थीं, अब वे ही नए शहर की खूबसूरती और सुकून का केंद्र बन सकती हैं।
कुल मिलाकर, शाहजहाँपुर की कहानी को उसकी नदियों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। चाहे वह शिवालिक से आती गर्रा की धारा हो, या शहर के बीच से गुजरती खन्नौत—ये नदियां हमारे अतीत, वर्तमान और भविष्य की साक्षी हैं। शाहजहाँपुर के हर नागरिक, हर नए घर और हर पुरानी बस्ती का भविष्य इस बात पर टिका है कि हम अपनी इन जल-धाराओं को कितना समझते और सहेजते हैं।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2brhzdzr
https://tinyurl.com/24o8zdgg
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/2b5rqym7
https://tinyurl.com/2dao8fq3
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