'सोना उगलने वाली' शाहजहाँपुर की धरती क्यों हो रही है बंजर?

मरुस्थल
10-01-2026 09:02 AM
'सोना उगलने वाली' शाहजहाँपुर की धरती क्यों हो रही है बंजर?

जब हम 'रेगिस्तान' शब्द सुनते हैं, तो हमारी आँखों के सामने राजस्थान के दूर-दूर तक फैले रेत के टीले, चिलचिलाती धूप और पानी की कमी की तस्वीर उभर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हरे-भरे गंगा के मैदान में बसे हमारे शाहजहांपुर जिले के भीतर भी कई 'छोटे रेगिस्तान' छिपे हुए हैं? ये रेगिस्तान रेत के नहीं हैं, बल्कि यह खेतों पर बिछी उस सफेद, नमकीन परत के हैं जिसे हम स्थानीय भाषा में 'ऊसर' या 'रेह' कहते हैं। नक्शे पर शाहजहांपुर कोई रेगिस्तान नहीं है, लेकिन जमीन की हकीकत कुछ और ही बयां करती है। यहाँ कई इलाकों में खेतों के बीचों-बीच बंजर जमीन के ऐसे टुकड़े मिलते हैं जहाँ सफेद पपड़ी, सख्त मिट्टी और कमजोर फसलें दिखाई देती हैं, मानो खेत वीरान छोड़ दिए गए हों।

यह समस्या केवल शाहजहांपुर की नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों की एक बड़ी चुनौती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, यह जमीन का वह हिस्सा है जो खराब जल निकासी और मिट्टी में सोडियम लवणों के जमाव के कारण बीमार हो गया है। इसे 'सोडिक लैंड' या ऊसर भूमि कहा जाता है। यह जमीन बिल्कुल किसी रेगिस्तान की तरह व्यवहार करती है। जिस तरह रेगिस्तान में जीवन पनपना मुश्किल होता है, वैसे ही इन खेतों में भी सोडियम की अधिकता के कारण पौधों की जड़ें सांस नहीं ले पातीं और फसलें दम तोड़ देती हैं। यह गंगा के मैदानी इलाके के भीतर पनप रहा एक 'इनलैंड डेजर्ट' यानी अंतर्देशीय रेगिस्तान है।

मानव इतिहास बताता है कि जब-जब इंसान के सामने रेगिस्तान या बंजर जमीन जैसी चुनौतियां आईं, उसने नए रास्ते खोज निकाले। रेगिस्तानों में पानी की कमी ने ही इंसान को जल संरक्षण और मिट्टी के उपचार की नई तकनीकें खोजने के लिए मजबूर किया। ठीक यही तर्क आज शाहजहांपुर के उन किसानों के काम आ रहा है जो अपनी बंजर होती जमीन को दोबारा उपजाऊ बनाने की जद्दोजहद में लगे हैं। आज हमारे किसान आधुनिक विज्ञान की मदद से जिप्सम, लीचिंग और नमक-सहिष्णु फसलों का उपयोग कर इस 'सफेद रेगिस्तान' को हरा-भरा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इस 'सफेद रेगिस्तान' से निपटने का तरीका जादुई नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक है। विशेषज्ञों ने इसके लिए एक सीधा और सरल तरीका सुझाया है। सबसे पहले खेत को समतल किया जाता है और उसके चारों ओर मेड़बंदी की जाती है। इसके बाद मिट्टी की जांच के आधार पर उसमें 'जिप्सम' (Gypsum) मिलाया जाता है। जिप्सम एक ऐसा खनिज है जो मिट्टी के कणों से चिपके हुए जहरीले सोडियम को हटा देता है। इसके बाद की प्रक्रिया को 'लीचिंग' कहते हैं। खेत में पानी भरकर खड़ा कर दिया जाता है। जिप्सम की वजह से मिट्टी का सोडियम पानी में घुल जाता है और फिर वह पानी जमीन के नीचे चला जाता है या नालियों के जरिए खेत से बाहर निकाल दिया जाता है। वैज्ञानिकों का सुझाव है कि सुधार के शुरुआती दौर में ऐसी फसलें लगानी चाहिए जो नमक को सह सकें, जैसे कि धान या ढैंचा।

शाहजहांपुर में चल रही यह कवायद असल में उत्तर प्रदेश के एक बड़े मिशन का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश में ऊसर भूमि सुधार एक बड़ा मुद्दा रहा है, जिसमें विश्व बैंक ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भरोसेमंद रिपोर्टों के मुताबिक यूपी में सोडिक भूमि की समस्या ने लाखों छोटे और सीमांत किसानों की रोजी-रोटी को प्रभावित किया था। विश्व बैंक द्वारा समर्थित परियोजनाओं ने न केवल बंजर जमीन को सुधारा, बल्कि वहां जल निकासी की व्यवस्था को भी दुरुस्त किया। इन परियोजनाओं के परिणाम बेहद उत्साहजनक रहे हैं। जो जमीनें पहले वीरान पड़ी थीं, वहां सुधार के बाद फसलों की पैदावार में भारी बढ़ोतरी देखी गई है। विश्वसनीय शोध भी पुष्टि करते हैं कि बड़े पैमाने पर चलाए गए इन सुधार कार्यक्रमों ने उत्पादकता बढ़ाने में सफलता हासिल की है।

अब जरा अपने जिले, शाहजहांपुर की स्थिति पर गौर करें। आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि जिले में मिट्टी और खेती का स्वरूप कैसा है। यहाँ की प्रमुख फसलें गन्ना, धान और गेहूं हैं, लेकिन ऊसर या लवणीय मिट्टी की मौजूदगी किसानों के फैसलों को प्रभावित करती है। जिले का भूजल स्तर और मिट्टी की बनावट यह साबित करती है कि यहाँ 'रेगिस्तान' बनने का मतलब रेत के टीले नहीं हैं। यहाँ रेगिस्तान बनने का मतलब है—मिट्टी की संरचना का टूटना और उसके अंदर मौजूद कार्बनिक तत्वों का धीरे-धीरे खत्म होना। जब मिट्टी कार्बन खो देती है, तो वह बेजान हो जाती है। यही वह प्रक्रिया है जिसे वैज्ञानिक 'मरुस्थलीकरण' कहते हैं।

हाल ही में आई मृदा परीक्षण की एक रिपोर्ट ने शाहजहांपुर के किसानों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। शाहजहांपुर की जिस धरती को 'सोना उगलने वाली' कहा जाता था, वह अब बंजर होने की कगार पर है। विशेषज्ञों की जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। यह रिपोर्ट एक चेतावनी है कि अगर हम नहीं संभले, तो हमारे खेत सचमुच के रेगिस्तान बन सकते हैं। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी और खारेपन का बढ़ना यह संकेत दे रहा है कि जमीन अब थक चुकी है। हालांकि, सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सही समय पर उठाए गए कदम इस 'सफेद रेगिस्तान' को वापस हरियाली में बदल सकते हैं। जरूरत है कि किसान अपनी मिट्टी की नियमित जांच करवाएं और जिप्सम का प्रयोग, हरी खाद की बुवाई और सही जल निकासी पर ध्यान दें।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/29yktuhp
https://tinyurl.com/25lvk9uf
https://tinyurl.com/2cgt2ljw
https://tinyurl.com/2ae6xry9
https://tinyurl.com/2d5s3ovr
https://tinyurl.com/2ynfkjot

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