शाहजहाँपुर का 'पहाड़ी' कनेक्शन: क्या आपके खेतों की मिट्टी हिमालय से चलकर आई है?

पर्वत, पहाड़ियाँ और पठार
10-01-2026 09:01 AM
शाहजहाँपुर का 'पहाड़ी' कनेक्शन: क्या आपके खेतों की मिट्टी हिमालय से चलकर आई है?

जब हम शाहजहांपुर की समतल जमीन पर खड़े होकर चारों ओर देखते हैं, तो हमें दूर-दूर तक सिर्फ सपाट खेत और आबादी नजर आती है। यहाँ कोई पहाड़ नहीं हैं, कोई ऊँची चट्टानें नहीं हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे पैरों के नीचे की यह जमीन, हमारे खेतों की यह उपजाऊ मिट्टी, और हमारे शहर के बीच से बहती नदियाँ—ये सब एक ऐसी कहानी का हिस्सा हैं जो यहाँ से सैकड़ों किलोमीटर दूर ऊंचे पहाड़ों में लिखी गई है?

शाहजहांपुर भले ही भूगोल की किताबों में एक मैदानी जिला हो, लेकिन इसका अस्तित्व, इसका स्वभाव और इसका भविष्य उन पहाड़ों से तय होता है, जो हमें यहाँ से दिखाई भी नहीं देते। यह कहानी सिर्फ भूगोल की नहीं है, यह कहानी है उस मिट्टी के सफर की, जो पहाड़ों से टूटकर यहाँ बिछी और हमारे जीवन का आधार बनी। आज हम 'गर्रा' नदी के नजरिए से समझेंगे कि कैसे हमारा यह शहर असल में "गाद (silt) का एक पठार" है, जिसे नदियों ने परत-दर-परत बनाया है।

विज्ञान हमें बहुत ही सरल शब्दों में बताता है कि पहाड़ कैसे बनते हैं। जब धरती की बड़ी-बड़ी परतें आपस में टकराती हैं, तो जमीन ऊपर उठती है और पहाड़ों का निर्माण होता है। लेकिन पहाड़ बनकर खड़े ही नहीं रहते। जैसे ही पहाड़ ऊपर उठते हैं, हवा, पानी और बर्फ उन पर अपना काम शुरू कर देते हैं। ये ताकतें पहाड़ों को धीरे-धीरे घिसती हैं, काटती हैं और चट्टानों को छोटे-छोटे टुकड़ों, रेत और मिट्टी में बदल देती हैं। यही वह मलबा या अवसाद है, जो नदियों के साथ नीचे की ओर बहता है। हमारा शाहजहांपुर और पूरा गंगा का मैदान इसी प्रक्रिया का नतीजा है। यह समतल जमीन पहले से ऐसी नहीं थी, बल्कि इसे लाखों सालों में हिमालय से आने वाली नदियों ने मिट्टी की परतें बिछाकर बनाया है। जिसे हम आज 'समतल' कहते हैं, वह असल में पहाड़ों की घिसी हुई चट्टानों का ही बदला हुआ रूप है।
File:Plowed field drying after rain.jpg

शाहजहांपुर जिला पूरी तरह से गंगा और उसकी सहायक नदियों के सिस्टम का हिस्सा है। यहाँ की मुख्य नदियाँ—रामगंगा, गर्रा, गोमती और खन्नौत—सिर्फ पानी बहने के रास्ते नहीं हैं, बल्कि ये इस जिले की निर्माता हैं। शाहजहांपुर की मिट्टी 'एल्यूवियल' यानी जलोढ़ मिट्टी है। यह वह मिट्टी है जिसे नदियाँ अपने साथ बहाकर लाती हैं। गर्रा नदी, जो इस जिले को बांटती हुई बहती है, इस प्रक्रिया की सबसे बड़ी गवाह है। यह साबित करता है कि हमारा 'मैदानी भूगोल' पूरी तरह से पहाड़ी सिद्धांतों पर काम करता है।

शाहजहांपुर के लोगों के लिए गर्रा नदी सिर्फ एक जलधारा नहीं है। यह वह डोर है जो हमें पहाड़ों से जोड़ती है। हाल ही की घटनाओं ने हमें फिर याद दिलाया है कि हम पहाड़ों से कितने गहरे जुड़े हैं। जब पहाड़ों पर मूसलाधार बारिश हुई और बांधों से पानी छोड़ा गया, तो उसका नतीजा यहाँ गर्रा नदी के जलस्तर में 1 मीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी के रूप में सामने आया। प्रशासनिक रिपोर्टों के अनुसार नदी का बढ़ा हुआ पानी न सिर्फ किनारों को काटता है, बल्कि आसपास के इलाकों में खतरा भी पैदा करता है। यह घटना हमें बताती है कि 'पहाड़ी बारिश' और 'मैदानी बाढ़' का रिश्ता कितना सीधा है। पुलों के नीचे से बहता हुआ वह मटमैला पानी अपने साथ वही पहाड़ी मिट्टी ला रहा होता है, जो बाढ़ उतरने के बाद हमारे खेतों को नई जान देती है।

जब नदियाँ बहती हैं, तो वे अपने किनारों पर मिट्टी जमा करके प्राकृतिक तटबंध बनाती हैं। इतिहास गवाह है कि समझदार बसावटें हमेशा इन्हीं थोड़ी ऊँची जगहों पर होती आई हैं ताकि बाढ़ से बचा जा सके। शाहजहांपुर का भूगोल भी इसी नियम का पालन करता है। ताज़ा दस्तावेज़ों में जिले की मिट्टी और भूजल का जो जिक्र है, वह साफ करता है कि यहाँ जमीन के नीचे पानी का जो भंडार है, वह भी इन्हीं रेतीली परतों में जमा है जो कभी नदियों ने बिछाई थीं। यानी, हमारे हैंडपंप से निकलने वाला पानी भी इन्हीं प्राचीन नदी-प्रणालियों का तोहफा है।

हमारे किसान भाई अक्सर कहते हैं कि बाढ़ का पानी तबाही लाता है, लेकिन साथ ही 'सोना' भी छोड़ जाता है। यह सोना और कुछ नहीं, बल्कि वह नई गाद है जो नदियाँ अपने साथ लाती हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गंगा का यह मैदानी इलाका दुनिया की सबसे उपजाऊ जमीनों में से एक इसलिए है क्योंकि यहाँ की मिट्टी लगातार 'रिन्यू' होती रहती है। शाहजहांपुर की लहलहाती फसलें इस बात का सबूत हैं कि पहाड़ों की जो चट्टानें वहां टूट रही हैं, वे यहाँ आकर हमारी रोटी का जरिया बन रही हैं। यह एक कुदरती चक्र है—पहाड़ का नुकसान, मैदान का फायदा बन जाता है।

आज के दौर में जब हम शाहजहांपुर में नए पुल, रिवरफ्रंट या विकास की योजना बनाते हैं, तो हमें यह याद रखना पड़ता है कि हम एक 'जीवंत' भूगोल में रह रहे हैं। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा के तहत जो एक्शन प्लान बनाए गए हैं, उनमें सीवेज प्रबंधन और विकास की बातें शामिल हैं। लेकिन ये तमाम आधुनिक निर्माण तभी सफल हो सकते हैं जब हम नदी के स्वभाव को समझें। जब हम नदी के रास्ते में कंक्रीट की दीवारें खड़ी करते हैं, तो हम असल में उस प्राचीन सिस्टम से लड़ने की कोशिश कर रहे होते हैं जिसने इस शहर को बनाया है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2bnvg7ya
https://tinyurl.com/2294nofm
https://tinyurl.com/2b5rqym7
https://tinyurl.com/2ckurfp2
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/22qdkze6
https://tinyurl.com/2dxgrq82 

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