मुगल सेनापतियों ने घने जंगलों को कैसे बनाया ‘शाहजहाँपुर’? जानिए 52 कबीलों के बसने का राज!

मध्यकाल : 1450 ई. से 1780 ई.
12-01-2026 09:06 AM
मुगल सेनापतियों ने घने जंगलों को कैसे बनाया ‘शाहजहाँपुर’? जानिए 52 कबीलों के बसने का राज!

इतिहास के पन्नों को पलटें तो हम पाते हैं कि 1450 से 1780 ईस्वी के बीच का समय उत्तर भारत के लिए उथल-पुथल और नवनिर्माण का दौर था। यह वह कालखंड था जब दिल्ली के तख़्त पर बैठी महाशक्तियों और उभरते क्षेत्रीय राज्यों के बीच उपजाऊ नदी घाटियों और व्यापारिक रास्तों पर क़ब्ज़ा करने की होड़ मची थी। दरअसल, यह संघर्ष केवल सत्ता का नहीं, बल्कि संसाधनों पर नियंत्रण का था। जैसे-जैसे केंद्रीय सत्ता और क्षेत्रीय क्षत्रप अपनी ताक़त बढ़ा रहे थे, गंगा-यमुना के इस दोआब का सामरिक महत्व बढ़ता जा रहा था। इसी रस्साकशी के बीच, घने जंगलों और नदियों के किनारे एक नया शहर आकार ले रहा था, जिसे आज हम 'शाहजहाँपुर' के नाम से जानते हैं। इस लेख में हम मुग़ल बादशाह शाहजहाँ के दौर में शहर की नींव पड़ने से लेकर 1774 में मीरानपुर कटरा के ऐतिहासिक युद्ध तक का सफ़र तय करेंगे।

शाहजहाँपुर की स्थापना की कहानी किसी दिलचस्प दास्तान से कम नहीं है। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुसार बात सन् 1647 की है, जब मुग़ल बादशाह शाहजहाँ का शासन अपने उरूज़ (चरम) पर था। उस समय बादशाह के दो वफ़ादार सिपहसालार, दिलेर ख़ान और बहादुर ख़ान, अपनी सेना के साथ इस इलाके से गुज़र रहे थे। इतिहासकार बताते हैं कि मुग़ल साम्राज्य के लिए यह क्षेत्र केवल एक जंगल नहीं, बल्कि एक सुरक्षा चुनौती बन चुका था, क्योंकि यहाँ कानून का नहीं, बल्कि बागी ज़मींदारों का ज़ोर चलता था।

इन दोनों भाइयों ने महसूस किया कि यहाँ के विद्रोही मुग़लों के लिए सिरदर्द बने हुए हैं। उन्होंने फ़ैसला किया कि वे इस बगावत को कुचलेंगे। दिलेर ख़ान और बहादुर ख़ान ने बागी ताक़तों पर हमला किया और उन्हें शिकस्त दी। अपनी जीत से उत्साहित होकर, उन्होंने बादशाह शाहजहाँ से इस जगह पर एक मज़बूत किला बनाने और शहर बसाने की इजाज़त मांगी। उनका मक़सद यहाँ एक ऐसा सामरिक केंद्र स्थापित करना था, जहाँ से पूरे इलाके की निगहबानी की जा सके। बादशाह ने न केवल मंज़ूरी दी, बल्कि उन्हें यह जागीर भी सौंप दी। अपने बादशाह के प्रति वफ़ादारी का सुबूत देते हुए, इन दोनों भाइयों ने इस नए शहर का नाम 'शाहजहाँपुर' रखा।

क्या भूगोल ने तय की थी शहर की तक़दीर?
किसी भी शहर के फलने-फूलने में वहाँ के भूगोल की सबसे बड़ी भूमिका होती है। यह शहर 'गर्रा' (जिसे देवहा भी कहा जाता है) नदी के किनारे बसाया गया। 17वीं और 18वीं सदी में नदियाँ ही यातायात और व्यापार का मुख्य ज़रिया हुआ करती थीं। गर्रा नदी की मौजूदगी ने शाहजहाँपुर को खेती और तिजारत (व्यापार) के लिए एक आदर्श जगह बना दिया।

भौगोलिक दृष्टि से देखें तो शाहजहाँपुर की स्थिति बेहद अहम थी। यह बरेली जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों के बीच स्थित था, जिससे यह माल की आवाजाही और बाज़ार के विकास के लिए एक प्राकृतिक केंद्र बन गया। नदी के कारण यहाँ की ज़मीन बेहद उपजाऊ थी। दिलेर ख़ान द्वारा बसाए गए 52 कबीलों ने इस भौगोलिक लाभ का पूरा फ़ायदा उठाया और धीरे-धीरे यह सैन्य छावनी एक खुशहाल शहर में तब्दील हो गई।

18वीं सदी की शुरुआत के साथ ही उत्तर भारत की सियासी फ़िज़ा बदलने लगी थी। जैसे-जैसे मुग़ल दरबार की पकड़ ढीली हुई, एक नई क्षेत्रीय ताक़त का उदय हुआ 'रूह़ेलखंड'। बरेली इस नए रूह़ेला राज्य का केंद्र बनकर उभरा और शाहजहाँपुर भी इस नए शक्ति-तंत्र का एक अटूट हिस्सा बन गया। अब यह शहर केवल मुग़लों की जागीर नहीं, बल्कि रूह़ेला सरदारों की रणनीतिक योजनाओं का केंद्र था। रूह़ेलखंड का यह दौर संघर्ष और स्वायत्तता का प्रतीक है, जहाँ स्थानीय नवाबों ने अपनी आज़ादी के लिए कड़ा संघर्ष किया।

इतिहास में कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो पूरी बिसात पलट देती हैं। शाहजहाँपुर के लिए वह तारीख थी “23 अप्रैल 1774।” शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित 'मीरानपुर कटरा' के मैदान में एक ऐसा युद्ध लड़ा गया जिसने रूह़ेलखंड के इतिहास पर हमेशा के लिए पूर्णविराम लगा दिया। इसे 'प्रथम रूह़ेला युद्ध' के नाम से जाना जाता है। इस जंग में एक तरफ रूह़ेला सरदार हाफ़िज़ रहमत ख़ान थे, और दूसरी तरफ अवध के नवाब शुजा-उद-दौला, जिन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का समर्थन हासिल था।

यह युद्ध केवल दो सेनाओं की टक्कर नहीं थी, बल्कि भारत में अंग्रेज़ों की कूटनीति का एक बड़ा उदाहरण था। ऐतिहासिक प्रमाणों के अनुसार इस भीषण युद्ध में रूह़ेलों की हार हुई और उनके महान नेता हाफ़िज़ रहमत ख़ान वीरगति को प्राप्त हुए। इस हार ने शाहजहाँपुर और पूरे रूह़ेलखंड का मुक़द्दर बदल दिया। रूह़ेलों का स्वतंत्र शासन समाप्त हो गया और यह पूरा क्षेत्र अवध के नवाब के अधीन चला गया।

आज जब हम शाहजहाँपुर की पुरानी गलियों से गुज़रते हैं, तो हमें उस गौरवशाली अतीत की झलक साफ़ मिलती है। दिलेर ख़ान और बहादुर ख़ान द्वारा बनाए गए किले के अवशेष और पुराने मोहल्लों की रवायतें आज भी उस दौर को ज़िंदा रखे हुए हैं। इतिहास केवल किताबों की धूल नहीं, बल्कि हमारी पहचान का हिस्सा है। शाहजहाँपुर की हर ईंट और हर सड़क अपनी स्थापना से लेकर मीरानपुर कटरा के युद्ध तक की दास्तान आज भी सुनाती है।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/2dm5qatq
https://tinyurl.com/2dhuljfg
https://tinyurl.com/28lha93v
https://tinyurl.com/2am2gj8m
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/2ckurfp2

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