बिस्मिल और अशफाक की 'क्रांतिकारी भूमि': शाहजहाँपुर ने कैसे हिलाई अंग्रेजी राज की नींव?

औपनिवेशिक काल और विश्व युद्ध : 1780 ई. से 1947 ई.
11-01-2026 09:08 AM
बिस्मिल और अशफाक की 'क्रांतिकारी भूमि': शाहजहाँपुर ने कैसे हिलाई अंग्रेजी राज की नींव?

इतिहास के पन्नों में 1780 से 1947 तक का समय केवल तारीखों का लेखा-जोखा नहीं है; यह वह दौर था जिसने आधुनिक भारत की दिशा और दशा को हमेशा के लिए बदल दिया। यह कहानी है औपनिवेशिक शासन यानी अंग्रेज़ी हुक़ूमत के उस कड़े शिकंजे की, जिसने हमारी स्थानीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी थी। साथ ही, यह दास्तां है उन दो भयानक विश्व युद्धों की, जिनके दबाव ने भारत में राजनीतिक रोष को हवा दी और बड़े जन-आंदोलनों की नींव रखी। इस पूरी गाथा को समझने के लिए आज हम उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर शाहजहाँपुर का रुख़ करेंगे। गर्रा नदी के किनारे बसा यह शहर केवल नक़्शे पर एक बिंदु नहीं, बल्कि उस दौर के हर बड़े बदलाव का जीता-जागता गवाह है।

किसी भी साम्राज्य को चलाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ होती है “संपर्क मार्ग।’ शाहजहाँपुर की भौगोलिक स्थिति इस मामले में अंग्रेज़ों के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थी। यह शहर गर्रा नदी के तट पर आबाद है। उस दौर में जब आज जैसी पक्की सड़कें नहीं थीं, तब नदियाँ और पुराने व्यापारिक रास्ते ही किसी शहर की तक़दीर तय करते थे। ऐतिहासिक साक्ष्यों से पता चलता है कि शाहजहाँपुर शुरू से ही एक बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है। यहाँ अनाज और चीनी का जो समृद्ध व्यापार होता था, अंग्रेज़ों ने उसे अपनी व्यवस्था का हिस्सा बनाना शुरू कर दिया ताकि वे अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमा सकें।

रेलवे: विस्तार या सैन्य चाल? 
असली बदलाव तब आया जब अंग्रेज़ों ने भारत में रेलवे का जाल बिछाना शुरू किया। उत्तर भारत में गंगा के तराई क्षेत्रों को जोड़ने के लिए उन्होंने 'अवध और रोहिलखंड रेलवे' का विस्तार किया। दस्तावेज़ बताते हैं कि यह रेल सिर्फ़ मुसाफ़िरों को लाने-ले जाने के लिए नहीं थी, बल्कि यह अंग्रेज़ी फ़ौज और उनके माल को तेज़ी से पहुँचाने का एक रणनीतिक ज़रिया थी। रेलवे लाइनों के बिछते ही शाहजहाँपुर जैसे शहर अब महज़ कस्बे नहीं रहे, बल्कि बड़े 'जंक्शन' और सैन्य महत्व के केंद्र बन गए।

जब हम आज़ादी की लड़ाई की बात करते हैं, तो ज़हन में सबसे पहले 1857 के विद्रोह का नाम आता है। शाहजहाँपुर और उसके आसपास का बरेली-लखनऊ इलाक़ा इस बग़ावत का एक मज़बूत गढ़ बनकर उभरा। शाहजहाँपुर के लोग आज भी उस दौर को मौलवी अहमदुल्लाह शाह की शहादत के रूप में याद करते हैं। ऐतिहासिक स्मारकों में आज भी उन दीवानों की यादें महफ़ूज़ हैं। अक्सर स्थानीय चर्चाओं और साक्ष्यों में उन हथियारों और संघर्षों का ज़िक्र मिलता है, जो इस बात की गवाही देते हैं कि यहाँ के लोगों ने फिरंगी हुक़ूमत के ख़िलाफ़ कितनी ख़ूनी लड़ाई लड़ी थी।
File:Coat of arms of Prasadapur Estate Shahjahanpur.png

1857 के बाद अंग्रेज़ों ने अपनी पकड़ मज़बूत कर ली थी, लेकिन 20वीं सदी की शुरुआत में हुए पहले विश्व युद्ध ने भारत के हर शहर की बुनियाद हिला दी। युद्ध के भारी ख़र्चों को पूरा करने के लिए अंग्रेज़ों ने भारतीयों पर टैक्स का भारी बोझ लाद दिया। शाहजहाँपुर जैसे व्यापारिक केंद्रों पर इसका गहरा असर पड़ा। आर्थिक शोध बताते हैं कि 1913 से 1918 के बीच यहाँ आम ज़रूरतों की चीज़ों के दाम दोगुने हो गए थे। इसी महँगाई और तंगी ने लोगों के दिलों में ग़ुस्सा भर दिया, जिसने गांधीजी के जन-आंदोलनों के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार की।

1920 का दशक आते-आते आज़ादी की लड़ाई का मिज़ाज बदलने लगा था। शाहजहाँपुर के लिए यह फ़ख़्र की बात है कि भारतीय इतिहास के महानतम क्रांतिकारी नायकों ने इसी मिट्टी में जन्म लिया। राम प्रसाद 'बिस्मिल', अश्फ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और ठाकुर रोशन सिंह—ये वो नाम हैं जिन्होंने शाहजहाँपुर को क्रांतिकारियों के सबसे अभेद्य अड्डे के रूप में पहचान दिलाई।

काकोरी कांड, जिसने अंग्रेज़ी हुक़ूमत की नींद उड़ा दी थी, उसकी पूरी रणनीति इसी शहर में तैयार की गई थी। इतिहासकार बताते हैं कि बिस्मिल और अश्फ़ाक़ ने संगठित होकर लड़ने का रास्ता चुना और वतन के लिए फाँसी के फंदे को हँसते-हँसते चूम लिया। काकोरी की घटना केवल एक ट्रेन की लूट नहीं थी, बल्कि यह फिरंगी सल्तनत के ग़ुरूर पर एक सीधा और करारा प्रहार था।

1939 में शुरू हुए दूसरे विश्व युद्ध ने एक बार फिर भारतीय राजनीति में हलचल पैदा कर दी। युद्ध की वजह से पैदा हुई किल्लत ने 1940 के दशक के आंदोलनों को और अधिक उग्र बना दिया। 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान शाहजहाँपुर की जनता भी सड़कों पर उतर आई। युद्ध के बाद के उपजे हालातों ने भारतीयों के हौसलों को तोड़ने के बजाय और भी फौलादी बना दिया था।

1780 से 1947 तक का यह सफ़र शाहजहाँपुर के लिए एक अग्नि-परीक्षा की तरह था। 15 अगस्त 1947 को जब आज़ादी का सूरज उगा, तो उसकी स्वर्णिम आभा में शाहजहाँपुर के अनगिनत गुमनाम सेनानियों का ख़ून-पसीना भी शामिल था। आज भी शहर की गलियाँ और पुराना रेलवे स्टेशन उस दौर की दास्तां सुनाते हैं, जब इस छोटे से शहर ने दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त से लोहा लिया था।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/28umpy58
https://tinyurl.com/2cw34574
https://tinyurl.com/2yekm3cr
https://tinyurl.com/25rdomon
https://tinyurl.com/242vnam7
https://tinyurl.com/2cu3f5fj
https://tinyurl.com/2cezskta 

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