तख़्त पलटा और इतिहास बदला: शाहजहाँपुर में गहड़वालों के पतन और तुर्कों के उदय की अनसुनी कहानी

प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
31-01-2026 11:00 AM
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तख़्त पलटा और इतिहास बदला: शाहजहाँपुर में गहड़वालों के पतन और तुर्कों के उदय की अनसुनी कहानी

इतिहास केवल राजा-महाराजाओं और उनके युद्धों का ब्यौरा भर नहीं है, बल्कि यह उस ज़मीन की दास्तां है जिस पर आज हम और आप खड़े हैं। जब हम उत्तर भारत के 1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी के दौर को देखते हैं, तो पाते हैं कि यह भारी बदलाव का समय था। यह वह वक़्त था जब उत्तर भारत में सत्ता की बागडोर छोटे क्षेत्रीय राजाओं के हाथों से निकलकर 'दिल्ली सल्तनत' के हाथों में जा रही थी।

इस बदलाव ने न केवल युद्ध लड़ने के तरीक़ों को बदल डाला, बल्कि प्रशासन, शहरों और गाँवों के आपसी रिश्तों को भी एक नई शक्ल दी। इस लेख में हम आज के शाहजहांपुर और रोहिलखंड क्षेत्र को केंद्र में रखकर उस दौर की हलचल को समझेंगे, जब गंगा के मैदानों में गहड़वालों का सूरज डूब रहा था और दिल्ली सल्तनत का उदय हो रहा था।

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दिल्ली सल्तनत के पूरी तरह जमने से पहले, 11वीं और 12वीं सदी में मध्य गंगा के मैदानों पर गहड़वाल राजवंश का राज चलता था। यह वह दौर था जब कन्नौज सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। भौगोलिक रूप से कन्नौज और दिल्ली के बीच स्थित आज का शाहजहांपुर क्षेत्र इस राजनीतिक उथल-पुथल से अछूता नहीं रह सकता था। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि गहड़वालों की शासन व्यवस्था मज़बूत थी, लेकिन 12वीं सदी के अंत तक बाहरी आक्रमणों ने उत्तर भारत का पूरा नक़्शा बदल दिया। गहड़वालों के कमज़ोर पड़ते ही तुर्क शासकों और बाद में दिल्ली सल्तनत के लिए इन उपजाऊ मैदानों में अपने पैर पसारने का रास्ता साफ़ हो गया।

File:Late Medieval Indian Art- Sculpture of Vajra Tara, Gahadavala Dynasty, Sarnath, Uttar Pradesh, 11th C. AD.jpg
उत्तर मध्यकालीन भारतीय कला- वज्र तारा की मूर्ति, गहड़वाला राजवंश, सारनाथ, उत्तर प्रदेश, 11वीं शताब्दी ई



दिल्ली सल्तनत ने यहाँ अपनी पकड़ कैसे मज़बूत की?
साल 1206 के बाद का इतिहास भारत के लिए एक नए युग की शुरुआत लेकर आया। कुतुबुद्दीन ऐबक (Qutbuddin Aibak) के साथ शुरू हुआ 'गुलाम वंश' दिल्ली सल्तनत की नींव बना। अगले लगभग 300 सालों तक, पाँच अलग-अलग राजवंशों ने उत्तर भारत पर राज किया। सुल्तानों ने सत्ता की बागडोर दिल्ली से संभालनी शुरू की और कर (Tax) वसूली की नई व्यवस्थाएँ लागू कीं। शोध बताते हैं कि सल्तनत का मुख्य मक़सद अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखना और राजस्व (Revenue) बढ़ाना था। इसके लिए उन्होंने उन दूर-दराज़ के इलाक़ों तक भी अपनी पहुँच बढ़ाई जो अब तक घने जंगलों में छिपे थे या जहाँ स्थानीय सरदारों का हुक्म चलता था।

शाहजहांपुर और उसके आसपास का इलाक़ा 'रामगंगा बेसिन' का हिस्सा है। रामगंगा नदी हमेशा से इस क्षेत्र की जीवनरेखा रही है। मध्यकाल में, नदियाँ सिर्फ़ प्यास बुझाने का ज़रिया नहीं थीं, बल्कि वे आज के हाईवे की तरह यातायात का मुख्य मार्ग भी हुआ करती थीं और सरहदों को तय करती थीं।

रामगंगा के किनारे का यह पूरा इलाक़ा, जो उस समय 'कटेहर' (Katehar) कहलाता था, यहाँ के घने जंगलों की वजह से विद्रोहियों के लिए सबसे सुरक्षित पनाहगाह था। उस दौर के ऐतिहासिक वर्णन बताते हैं कि यहाँ के घने जंगलों ने बाहरी सेनाओं के लिए घुसना मुश्किल कर दिया था, जिससे यहाँ के स्थानीय सरदारों (कटेहरिया राजपूतों) को अपनी आज़ादी बनाए रखने में काफ़ी मदद मिली।

दिल्ली सल्तनत के लिए आज का रोहिलखंड (तब का कटेहर) हमेशा से एक सिरदर्द बना रहा। 13वीं सदी में, विशेष रूप से गुलाम वंश के शासक बलबन के समय में, इस इलाक़े में क़ानून का राज क़ायम करने के लिए बहुत सख़्त क़दम उठाए गए। इतिहास गवाह है कि सुल्तानों ने यहाँ 'रक्त और लौह' (Blood and Iron) की नीति अपनाई। उन्होंने कटेहर के जंगलों को साफ़ करने के बड़े अभियान चलाए ताकि विद्रोहियों को छिपने की जगह न मिले। उनका दूसरा मक़सद इस जंगली इलाक़े को खेती लायक़ बनाकर राजस्व के दायरे में लाना भी था। आज का शाहजहांपुर क्षेत्र उस समय एक 'सीमांत' (Frontier) जैसा था, जिसे सुल्तान अपने सीधे नियंत्रण में लाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे।

साल 1398-99 में तैमूर लंग (Tamerlane) के आक्रमण ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। तैमूर के हमले ने उत्तर भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। इतिहासकारों के मुताबिक़, इस अराजकता का सीधा असर हमारे  शाहजहांपुर जैसे प्रांतीय इलाक़ों पर पड़ा। जब दिल्ली कमज़ोर हुई, तो इस क्षेत्र के स्थानीय सरदारों का रुतबा अचानक बढ़ गया। तैमूर के जाने के बाद जो अफ़रातफ़री मची, उसमें यहाँ के स्थानीय शासकों ने अपनी ताक़त बढ़ाई और अपने छोटे-छोटे क़िलों और गढ़ों को फिर से आबाद कर लिया।

हाल ही में शाहजहांपुर के आसपास हुई पुरातात्विक खोजों ने एक नई उम्मीद जगा दी है। यहाँ मिले प्राचीन अवशेष यह साबित करते हैं कि यह धरती हज़ारों सालों से आबाद है। यह खोज हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर यहाँ इतना पुराना इतिहास दबा है, तो 1000 से 1450 ईस्वी का मध्यकालीन इतिहास भी कहीं न कहीं बिखरा पड़ा होगा। हमें उन पुराने रास्तों और नक़्शों को फिर से खोजना होगा जो उस दौर में कन्नौज और दिल्ली की ओर जाते थे।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/28g4c5j3
https://tinyurl.com/2dmncflp
https://tinyurl.com/28foz2r5
https://tinyurl.com/2y5nd7wz
https://tinyurl.com/y3tmm562
https://tinyurl.com/2dzrs3gp 

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