कन्नौज के गहड़वालों का पतन और तुर्कों का उदय: शाहजहाँपुर की मिट्टी की अनसुनी दास्तां।

प्रारंभिक मध्यकाल : 1000 ई. से 1450 ई.
10-01-2026 09:08 AM
कन्नौज के गहड़वालों का पतन और तुर्कों का उदय: शाहजहाँपुर की मिट्टी की अनसुनी दास्तां।

इतिहास केवल राजा-महाराजाओं और उनके युद्धों का ब्यौरा नहीं है, बल्कि यह उस जमीन की दास्तां है जिस पर आज हम और आप खड़े हैं। जब हम उत्तर भारत के 1000 ईस्वी से 1450 ईस्वी के दौर को देखते हैं, तो पाते हैं कि यह भारी बदलाव का समय था। यह वह वक्त था जब उत्तर भारत में सत्ता की बागडोर छोटे क्षेत्रीय राजाओं के हाथों से निकलकर 'दिल्ली सल्तनत' के हाथों में जा रही थी। इस बदलाव ने न केवल युद्ध लड़ने के तरीकों को बदल डाला, बल्कि प्रशासन, शहरों और गांवों के आपसी रिश्तों को भी एक नई शक्ल दी। इस लेख में हम शाहजहांपुर और उसके आसपास के रोहिलखंड क्षेत्र को केंद्र में रखकर, उस दौर की गतिशीलता को समझेंगे जब गंगा के मैदानों में गहड़वालों का सूरज डूब रहा था और दिल्ली सल्तनत का उदय हो रहा था।

कन्नौज और गहड़वालों से हमारा क्या रिश्ता था?
दिल्ली सल्तनत के पूरी तरह जमने से पहले, 11वीं और 12वीं सदी में मध्य गंगा के मैदानों पर गहड़वाल राजवंश का राज चलता था। यह वह दौर था जब कन्नौज सत्ता का सबसे बड़ा केंद्र हुआ करता था। शाहजहांपुर, जो नक्शे पर कन्नौज और दिल्ली के गलियारों के बिल्कुल करीब है, इस राजनीतिक हलचल से अछूता नहीं रह सकता था। रिपोर्ट्स साफ बताती हैं कि गहड़वालों ने एक बहुत ही व्यवस्थित शासन प्रणाली तैयार की थी, लेकिन 12वीं सदी के अंत तक बाहरी आक्रमणों ने उत्तर भारत का पूरा नक्शा बदल दिया। गहड़वालों के कमजोर पड़ते ही तुर्क शासकों और बाद में दिल्ली सल्तनत के लिए इन उपजाऊ मैदानों में अपने पैर पसारने का रास्ता साफ हो गया।
 

File:Late Medieval Indian Art- Sculpture of Vajra Tara, Gahadavala Dynasty, Sarnath, Uttar Pradesh, 11th C. AD.jpg
उत्तर मध्यकालीन भारतीय कला- वज्र तारा की मूर्ति, गहड़वाला राजवंश, सारनाथ, उत्तर प्रदेश, 11वीं शताब्दी ई

दिल्ली सल्तनत ने यहाँ अपनी पकड़ कैसे मजबूत की?
साल 1206 के बाद का इतिहास भारत के लिए एक नए युग की शुरुआत लेकर आया। कुतुबुद्दीन ऐबक (Qutbuddin Aibak) के साथ शुरू हुआ 'गुलाम वंश' दिल्ली सल्तनत की नींव बना। अगले लगभग 300 सालों तक, पाँच अलग-अलग राजवंशों ने उत्तर भारत पर राज किया। सुल्तानों ने प्रशासन को दिल्ली से केंद्रीकृत करना शुरू किया और टैक्स (tax) वसूलने के नए तरीके लागू किए। शोध बताते हैं कि सल्तनत का मुख्य मकसद अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखना और खजाना (राजस्व) बढ़ाना था। इसके लिए उन्होंने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी अपनी पहुँच बढ़ाई जो अब तक घने जंगलों में छिपे थे या जहाँ स्थानीय सरदारों का हुक्म चलता था।

रामगंगा नदी और यहाँ के जंगल क्यों इतने अहम थे?
शाहजहांपुर और उसका आसपास का इलाका 'रामगंगा बेसिन' का हिस्सा है। रामगंगा नदी हमेशा से इस क्षेत्र की जीवनरेखा रही है। मध्यकाल में, नदियाँ सिर्फ प्यास बुझाने का जरिया नहीं थीं, बल्कि वे आज के हाइवे की तरह यातायात का मुख्य मार्ग थीं और सरहदों को तय करती थीं। रामगंगा के किनारे के जंगल, जिन्हें उस समय 'कटेहर' (Katehar) के नाम से जाना जाता था, विद्रोहियों के लिए छिपने की सबसे सुरक्षित पनाहगाह थे। पुराने भौगोलिक दस्तावेज बताते हैं कि यहाँ के घने जंगलों ने बाहरी सेनाओं के लिए घुसना मुश्किल कर दिया था, जिससे यहाँ के स्थानीय सरदारों को अपनी आजादी और स्वायत्तता बनाए रखने में काफी मदद मिली।

सुल्तानों और 'कटेहर' के जंगलों के बीच जंग क्यों छिड़ी?
दिल्ली सल्तनत के लिए आज का रोहिलखंड हमेशा से एक सिरदर्द बना रहा। 13वीं सदी में, विशेष रूप से गुलाम वंश के शासक बलबन के समय में, इस इलाके में कानून का राज कायम करने के लिए बहुत सख्त कदम उठाए गए। इतिहास गवाह है कि सुल्तानों ने यहाँ 'लौह और रक्त' (Iron and Blood) की नीति अपनाई। उन्होंने कटेहर के जंगलों को साफ करने के बड़े अभियान चलाए ताकि विद्रोहियों को छिपने की जगह न मिले। उनका दूसरा मकसद इस जंगली इलाके को खेती लायक बनाकर टैक्स के दायरे में लाना भी था। शाहजहांपुर का यह क्षेत्र उस समय एक 'बॉर्डर' (border) जैसा था, जिसे सुल्तान अपने सीधे कंट्रोल में लाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे।

जब दिल्ली की नींव हिली तो यहाँ क्या हुआ?
साल 1398-99 में तैमूर लंग (Tamerlane) के आक्रमण ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। तैमूर के हमले ने उत्तर भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया। प्रशासनिक दस्तावेज बताते हैं कि इस अराजकता का सीधा असर हमारे जैसे प्रांतीय इलाकों पर पड़ा। जब दिल्ली कमजोर हुई, तो शाहजहांपुर और रोहिलखंड जैसे इलाकों में स्थानीय सरदारों का रुतबा अचानक बढ़ गया। तैमूर के जाने के बाद जो अफरातफरी मची, उसमें इस क्षेत्र के स्थानीय शासकों ने अपनी ताकत बढ़ाई और अपने छोटे-छोटे किलों और गढ़ों को फिर से आबाद कर लिया।

आज हम इस इतिहास को कहाँ खोज सकते हैं?
हाल ही में शाहजहांपुर के आसपास हुई पुरातात्विक खोजों ने एक नई उम्मीद जगा दी है। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहाँ करीब 2400 ईसा पूर्व के अवशेष मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह धरती हजारों सालों से आबाद है। यह खोज हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि अगर यहाँ इतना पुराना इतिहास दबा है, तो 1000 से 1450 ईस्वी का मध्यकालीन इतिहास भी कहीं न कहीं बिखरा पड़ा होगा। अब इतिहासकारों के लिए काम साफ है—हमें उन पुराने रास्तों और नक्शों को फिर से खोजना होगा जो उस दौर में कन्नौज और दिल्ली की ओर जाते थे।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/28g4c5j3
https://tinyurl.com/2dmncflp
https://tinyurl.com/28foz2r5
https://tinyurl.com/2y5nd7wz
https://tinyurl.com/y3tmm562
https://tinyurl.com/2dzrs3gp 

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