शाहजहाँपुर में दबा है 4000 साल पुराना राज? खुदाई में मिलीं मूर्तियों ने दुनिया को चौंकाया!

छोटे राज्य : 300 ई. से 1000 ई.
10-01-2026 09:00 AM
शाहजहाँपुर में दबा है 4000 साल पुराना राज? खुदाई में मिलीं मूर्तियों ने दुनिया को चौंकाया!

अक्सर जब हम अपने शहर या ज़िले की पुरानी इमारतों और मिट्टी के ऊंचे टीलों को देखते हैं, तो मन में यह सवाल ज़रूर कौंधता है कि आख़िर इन खंडहरों के नीचे इतिहास का कौन-सा राज़ दफ़न है? हाल ही में शाहजहाँपुर के आसपास हुई पुरातात्विक खोजों ने हमारी इस जिज्ञासा को और गहरा कर दिया है। यहाँ लगभग 2400 ईसा पूर्व के अवशेष मिलने से यह तो साफ़ हो गया है कि शाहजहाँपुर की कहानी हज़ारों साल पुरानी है। लेकिन, 300 ईस्वी से 1000 ईस्वी के बीच का समय इतिहास का एक दौर ऐसा है जिसकी चर्चा अक्सर हाशिए पर रहती है। इतिहासकार इसे 'लघु राज्यों का युग' (Age of Small Kingdoms) कहते हैं। यह वह वक़्त था जब भारत की राजनीतिक और सांस्कृतिक तस्वीर पूरी तरह बदल रही थी। आज हम शाहजहाँपुर और रोहिलखंड के उसी सुनहरे अतीत को खँगालेंगे, जब कन्नौज और अहिच्छत्र जैसी बड़ी ताक़तें हमारे इलाक़े की तक़दीर लिख रही थीं।

आख़िर क्या था 'लघु राज्यों का युग' और अहिच्छत्र का प्रभाव? 
भारतीय इतिहास में 300 से 1000 ईस्वी के बीच का समय बहुत बड़े बदलावों का गवाह रहा है। इससे पहले का ज़माना विशाल साम्राज्यों का था, लेकिन इस दौर में ताक़त किसी एक केंद्र में न रहकर कई क्षेत्रीय दरबारों में बँट गई थी। हम इसे 'लघु राज्यों का युग' इसीलिए कहते हैं क्योंकि तब कोई एक चक्रवर्ती सम्राट नहीं था, बल्कि अलग-अलग अंचलों में दमदार राजा उभर रहे थे। उत्तर भारत में सत्ता का मिज़ाज बदल चुका था। राजाओं के लिए अब सिर्फ़ विशाल सेना रखना ही काफ़ी नहीं था, बल्कि विशिष्ट व्यापारिक मार्गों और रणनीतिक शहरों पर नियंत्रण रखना ही उनकी असली ताक़त की पहचान बन गया था। जो शासक व्यापार के रास्तों को अपने क़ाबू में कर लेता, उसी का डंका बजता था। शाहजहाँपुर और उसके आसपास का इलाक़ा भी इसी राजनीतिक बदलाव के केंद्र में था, जहाँ स्थानीय केंद्रों की अहमियत बढ़ गई थी।

शाहजहाँपुर के इतिहास को बारीकी से समझने के लिए हमें इसके पड़ोसी और प्राचीन पांचाल देश की राजधानी 'अहिच्छत्र' (वर्तमान बरेली ज़िला) को देखना होगा। अहिच्छत्र इस बात का जीता-जागता सबूत है कि 300 ईस्वी के बाद भी स्थानीय शहर कितने महत्वपूर्ण थे। पुरातत्व विभाग ने यहाँ कुषाण और गुप्त काल के अवशेष खोज निकाले हैं। यह स्पष्ट करता है कि चाहे शासक बदलते रहे हों- कभी कुषाण, कभी गुप्त तो कभी स्थानीय सामंत, लेकिन अहिच्छत्र की रौनक़ हमेशा बनी रही। यहाँ से प्राप्त पुरावशेष साबित करते हैं कि शाहजहाँपुर, जो भौगोलिक रूप से इससे सटा हुआ है, राजनीतिक उथल-पुथल के बावजूद संस्कृति और वाणिज्य का मज़बूत गढ़ बना रहा। पांचाल की राजधानी होने के नाते, अहिच्छत्र का सांस्कृतिक प्रभाव शाहजहाँपुर के गाँवों तक निश्चित रूप से पहुँचा होगा।

इस 'लघु राज्यों के युग' की सबसे बड़ी विशिष्टता थी ‘मंदिर निर्माण।’ उस दौर के राजा और सामंत सिर्फ़ धार्मिक आस्था के लिए मंदिर नहीं बनवाते थे, बल्कि वे इनके ज़रिए अपनी राजनीतिक शक्ति और वैभव का प्रदर्शन करते थे। अहिच्छत्र में मिला 'सीढ़ीदार ईंटों का मंदिर' (Terraced Brick Temple) इसका सबसे अनूठा उदाहरण है। यह विशाल मंदिर बताता है कि उस ज़माने में पत्थर के अभाव में भी ईंटों से कितनी भव्य इमारतें खड़ी की जा सकती थीं।

उत्तर भारत में, ख़ासकर गुप्त काल के बाद, ईंटों के मंदिरों का प्रचलन तेज़ी से बढ़ा। चूँकि हमारे मैदानी क्षेत्रों में पहाड़ी पत्थर आसानी से उपलब्ध नहीं थे, इसलिए शिल्पकारों ने पकी हुई ईंटों और टेराकोटा (पकी मिट्टी) का इस्तेमाल करके कमाल की कृतियाँ रचीं। इसका सबसे गौरवशाली उदाहरण कानपुर देहात का 'भीतरगाँव मंदिर' है। यह गुप्तकालीन वास्तुकला का बेजोड़ नमूना है। कारीगरों ने इसकी बाहरी दीवारों पर देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं को टेराकोटा की पट्टिकाओं पर बड़ी नज़ाक़त से उकेरा है। चूँकि शाहजहाँपुर और रोहिलखंड भी गंगा-यमुना के इसी मैदानी भूभाग में आते हैं जहाँ मिट्टी की कोई कमी नहीं है, इसलिए पूरी संभावना है कि शाहजहाँपुर के प्राचीन टीलों में दबी संरचनाएं भी भीतरगाँव शैली से प्रेरित रही होंगी।

मंदिर निर्माण की इस विधा को और गहराई से समझने के लिए हमें ललितपुर के देवगढ़ स्थित 'दशावतार मंदिर' का संदर्भ लेना चाहिए। भले ही वह मंदिर पत्थर का है, लेकिन उसकी मूर्तिकला उस दौर की धार्मिक सोच और बारीकियों को उजागर करती है। शाहजहाँपुर के शोधकर्ताओं के लिए भीतरगाँव और देवगढ़ के मंदिर एक 'तुलनात्मक मानक' (Reference Point) की तरह हैं। जब हम शाहजहाँपुर में मिले खंडित अवशेषों या प्राचीन ईंटों की जाँच करते हैं, तो उनकी तुलना इन्हीं ऐतिहासिक मंदिरों की शैली से की जाती है।

300 से 1000 ईस्वी के बीच का एक बड़ा कालखंड 'गुर्जर-प्रतिहार' राजवंश के नाम रहा। इस दौरान कन्नौज (जो शाहजहाँपुर के बेहद करीब है) उत्तर भारत की राजनीतिक सत्ता का धुरी बन गया था। गुर्जर-प्रतिहार राजाओं ने ऊपरी गंगा घाटी को अपना अभेद्य क़िला बनाया। उनकी दृष्टि में कन्नौज पर शासन करने का अर्थ था “समग्र उत्तर भारत पर आधिपत्य।” चूँकि शाहजहाँपुर, कन्नौज और अहिच्छत्र के मध्य स्थित है, इसलिए यह निश्चित है कि यह क्षेत्र उनकी रणनीतिक योजनाओं का अटूट हिस्सा रहा होगा। उनकी सेनाओं के आवागमन और शाही खज़ाने की आपूर्ति के लिए यह मार्ग अनिवार्य था। 'ब्रिटैनिका' जैसे विश्वकोशों के अनुसार, प्रतिहारों ने पश्चिमी सीमाओं से होने वाले आक्रमणों को रोककर उत्तर भारत की रक्षा की। शाहजहाँपुर का उपजाऊ क्षेत्र उनकी सेना के लिए रसद और राजस्व का मुख्य स्रोत रहा होगा। इससे यह सिद्ध होता है कि उस 'लघु राज्यों के दौर' में भी हमारा यह क्षेत्र एक बड़े राजनीतिक मंच के रूप में सक्रिय था।

इतिहास की बिखरी कड़ियों को कैसे जोड़ें? 
आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि हम शाहजहाँपुर के इस बिखरे हुए इतिहास को एक सूत्र में कैसे पिरोएं? इसका समाधान 'स्थानीय संकेतों' में छिपा है। हमें शाहजहाँपुर को सिर्फ़ आधुनिक नक़्शे पर नहीं, बल्कि उस दौर के सांस्कृतिक परिदृश्य के नज़रिए से देखना होगा। नदियाँ, पुराने टीले और गाँवों के अंचलों में दबे ईंटों के ढेर आज भी अपनी कहानी सुनाने को आतुर हैं। जैसा कि हमने अहिच्छत्र में देखा कि ईंटों के मंदिर समाज की पहचान थे, वैसा ही गौरव शाहजहाँपुर के पुराने गाँवों में भी दबा हो सकता है। हालिया शोध और स्थानीय स्तर पर प्राप्त प्राचीन कलाकृतियों की ख़बरें एक नई उम्मीद जगाती हैं। ये खोजें इशारा करती हैं कि अभी बहुत कुछ ज़मीन के नीचे महफ़ूज़ है, जिसे दुनिया के सामने लाना शेष है।

300 ईस्वी से 1000 ईस्वी का समय, जिसे अक्सर हम भ्रमवश छोटा समझ लेते हैं, असल में भारतीय संस्कृति के चरम उत्कर्ष का दौर था। अहिच्छत्र की भव्यता से लेकर कन्नौज के वैभव तक, और भीतरगाँव की ईंटों से लेकर देवगढ़ की मूर्तियों तक ‘यह पूरा कालखंड उपलब्धियों से भरा पड़ा है।’ शाहजहाँपुर, जो इन सभी ऐतिहासिक केंद्रों के मध्य एक सेतु की तरह खड़ा है, अपने भीतर अनगिनत गाथाएं समेटे हुए है। आज ज़रूरत है कि हम अपने आसपास बिखरे इन ऐतिहासिक प्रतीकों को पहचानें; क्योंकि शाहजहाँपुर की इस मिट्टी का गहन अध्ययन ही इस 'अज्ञात इतिहास' को भविष्य की पीढ़ियों के सामने ला सकेगा।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/2y9yzlpo
https://tinyurl.com/26e2ym8r
https://tinyurl.com/2dn6n4ak
https://tinyurl.com/282q45ou
https://tinyurl.com/2ydld7ch 

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