गंगा-रामगंगा के दोआब में छिपी है 'आस्था की क्रांति', जानिए कैसे कबीले बन गए महाजनपद?

धर्म का युग : 600 ई.पू. से 300 ई.
10-01-2026 09:09 AM
गंगा-रामगंगा के दोआब में छिपी है 'आस्था की क्रांति', जानिए कैसे कबीले बन गए महाजनपद?

जब हम इतिहास के पन्नों को पलटते हैं, तो अक्सर हमें राजाओं के युद्ध और साम्राज्यों के उत्थान-पतन की कहानियां ही सुनाई देती हैं। लेकिन, भारत के इतिहास में एक दौर ऐसा भी था, जिसे सही मायनों में 'धर्म का युग' कहा जा सकता है। यह कालखंड 600 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी के बीच का है। हाल ही में शाहजहांपुर और उसके आसपास के क्षेत्रों में मिली पुरातात्विक खोजों ने निश्चित रूप से हमें उस दौर की याद दिला दी है, जब यह पूरा रोहिलखंड क्षेत्र आध्यात्मिक चेतना और शहरी सभ्यता का केंद्र हुआ करता था। शाहजहांपुर में हाल ही में मिले प्राचीन पुरावशेष इस बात की गवाही देते हैं कि यह क्षेत्र केवल एक गुजरने वाला रास्ता नहीं था, बल्कि एक समृद्ध ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा था।

600 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का समय भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह वह समय था जब छोटे-छोटे कबीले और जनपदों ने मिलकर विशाल 'महाजनपदों' का रूप ले लिया था। गंगा के मैदानी इलाकों (plains) में लोहे के उपयोग और कृषि के विस्तार ने बड़े राज्यों के गठन का मार्ग प्रशस्त किया। महाजनपदों के उदय के साथ ही भारत में 'दूसरे शहरीकरण' की शुरुआत हुई। जब शहर बसे, तो वहां व्यापार बढ़ा, और व्यापार के साथ-साथ विचारों का आदान-प्रदान भी बढ़ा। राजाओं और धनी व्यापारियों द्वारा दिए गए संरक्षण ने बौद्ध, जैन और अन्य धार्मिक मतों को फैलने में मदद की।

जब हम शाहजहांपुर और रोहिलखंड के इतिहास की बात करते हैं, तो हमें 'पांचाल' महाजनपद को समझना होगा। प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक, पांचाल का विस्तार गंगा के ऊपरी मैदानों में था। भौगोलिक रूप से, आधुनिक बुदाऊं, फर्रुखाबाद और रोहिलखंड के आस-पास के जिले इसी महान पांचाल क्षेत्र का हिस्सा थे। उत्तरी पांचाल की राजधानी 'अहिच्छत्र' थी, जो वर्तमान में बरेली जिले के आंवला तहसील के पास रामनगर गांव में स्थित है। शाहजहांपुर की भौगोलिक स्थिति इसे सीधे तौर पर इस ऐतिहासिक क्षेत्र से जोड़ती है।

क्या अहिच्छत्र ही उस दौर की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र था?
अहिच्छत्र के खंडहर आज भी उस दौर की भव्यता की कहानी कहते हैं। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि 600 ईसा पूर्व से लेकर 300 ईस्वी तक, विशेष रूप से कुषाण काल के दौरान, यहां धार्मिक गतिविधियों में भारी उछाल आया था। खुदाई में मिली संरचनाएं और मूर्तियां यह साबित करती हैं कि अहिच्छत्र में संगठित पूजा-पाठ और धार्मिक संस्थानों का प्रचलन था। यहां मिले अवशेषों में ईंटों से बने मंदिर और अन्य धार्मिक इमारतें शामिल हैं। कुषाण काल के दौरान, जिसे भारतीय कला और संस्कृति का एक स्वर्णिम अध्याय माना जाता है, अहिच्छत्र में भी व्यापक निर्माण कार्य हुए।
File:Bacchanalian scene, Kushan period.jpg

इस कालखंड में धर्म केवल मंदिरों तक सीमित नहीं था, बल्कि यह यात्राओं और तीर्थों के माध्यम से पूरे देश को जोड़ रहा रहा था। अहिच्छत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में बौद्ध स्तूपों और स्मारकों के प्रमाण मिले हैं। अहिच्छत्र प्राचीन 'उत्तरापथ' (Northern Trade Route) के नजदीक स्थित था, जो तक्षशिला से होकर गंगा के मैदानों तक आता था। चीनी यात्री ह्वेनसांग (Hiuen Tsang) ने भी अपनी यात्रा वृतांत में अहिच्छत्र में कई बौद्ध मठों और स्तूपों का उल्लेख किया है। शाहजहांपुर और आसपास के ग्रामीण इलाकों से गुजरने वाले ये रास्ते, तीर्थयात्रियों की आवाजाही से गुलजार रहते थे।

300 ईस्वी तक आते-आते, धर्म को व्यक्त करने का तरीका बदल गया था, और इसमें सबसे बड़ा योगदान 'कुषाण कला' का था। कुषाण शासकों के दौर में मथुरा और गांधार कला शैलियों का विकास हुआ, जिसने देवी-देवताओं की मूर्तियों को एक मानक रूप प्रदान किया। अहिच्छत्र और आसपास के क्षेत्रों में मिली मूर्तियां इसी शैली से प्रभावित हैं। इन मूर्तियों में भगवान बुद्ध, बोधिसत्व और हिंदू देवी-देवताओं का अंकन मिलता है। कुषाण कला की विशेषता यह थी कि इसने धर्म को दृश्यमान बना दिया, जिससे आम लोगों के लिए अपने आराध्य से जुड़ना आसान हो गया।

क्यों प्रसिद्ध थी पांचाल की टेराकोटा कला?
पांचाल क्षेत्र, विशेष रूप से अहिच्छत्र, अपनी विशिष्ट 'टेराकोटा' (terracotta - पकी हुई मिट्टी) कला के लिए प्रसिद्ध था। यहां के कुम्हारों ने मिट्टी से ऐसी कलाकृतियां बनाईं जो आज भी अद्भुत लगती हैं। पांचाल शैली की टेराकोटा मूर्तियां केवल सजावट का सामान नहीं थीं, बल्कि ये रोजमर्रा के अनुष्ठानों का हिस्सा थीं। इन मिट्टी की मूर्तियों में मातृदेवी और अन्य स्थानीय देवताओं का चित्रण मिलता है। मिट्टी की ये मूर्तियां बनाना एक बड़ा 'शिल्प अर्थशास्त्र' था। शाहजहांपुर और उसके आसपास के गांवों में आज भी मिट्टी के बर्तन और खिलौने बनाने की परंपरा देखी जा सकती है, जो शायद उसी प्राचीन विरासत की एक कड़ी है।

शाहजहांपुर, जो खन्नौत और गर्रा जैसी नदियों के किनारे बसा है, प्राचीन काल में भी बस्तियों और आवागमन का केंद्र रहा होगा। जैसा कि हमने अहिच्छत्र और पांचाल के संदर्भ में देखा, नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं थीं, बल्कि वे पवित्रता और तीर्थयात्रा का मार्ग भी थीं। हाल ही में शाहजहांपुर के पुवायां और अन्य क्षेत्रों में मिलीं प्राचीन कलाकृतियाँ यह संकेत देती हैं कि यहाँ का ग्रामीण इलाका वीरान नहीं था। यहाँ के किसान, शिल्पकार और छोटे व्यापारी उन मेलों और उत्सवों में भाग लेते होंगे जो बड़े धार्मिक केंद्रों पर आयोजित होते थे।

600 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का यह कालखंड हमें बताता है कि हमारा इतिहास कितना गहरा और विविधतापूर्ण है। महाजनपदों की राजनीति से लेकर कुषाण काल की कला तक, हर चीज में एक कहानी छिपी है। शाहजहांपुर और रोहिलखंड की धरती के नीचे दबे ये अवशेष हमें पुकार रहे हैं। आज जरूरत है कि हम अपनी इस 'पवित्र विरासत' को पहचानें और इसे संरक्षित करें, ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि वे जिस मिट्टी पर चल रही हैं, उसका इतिहास कितना गौरवशाली है।

संदर्भ 
https://tinyurl.com/2axvf5da
https://tinyurl.com/2yj4h25j
https://tinyurl.com/236ntdj6
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