हड़प्पा के दौर में कैसा था आपका शाहजहाँपुर? गर्रा और गोमती के तटों का अनसुना सच!

निवास : 2000 ई.पू. से 600 ई.पू.
10-01-2026 09:07 AM
हड़प्पा के दौर में कैसा था आपका शाहजहाँपुर? गर्रा और गोमती के तटों का अनसुना सच!

जब हम आज के शाहजहांपुर को देखते हैं, तो हमारी नजर अक्सर इसकी आधुनिक इमारतों और वर्तमान भूगोल पर टिक जाती है। लेकिन, यदि हम समय के पहिये को थोड़ा पीछे घुमाएं, तो हमें एक अलग ही दुनिया नजर आती है। यह वह दौर था जब आज का शाहजहांपुर शहर अस्तित्व में नहीं था, लेकिन यहाँ की नदियाँ (गर्रा, गोमती और रामगंगा) तब भी बहती थीं। प्राचीन साक्ष्यों और भू-गर्भीय अध्ययनों से यह स्पष्ट होता है कि इन नदियों द्वारा बनाई गई उपजाऊ मिट्टी की पट्टी ने ईसा पूर्व 2000 से 600 ईसा पूर्व के बीच मानव बस्तियों को बसाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह वह समय था जब घुमंतू जीवन छोड़कर लोग स्थायी बस्तियों की ओर बढ़ रहे थे। इस विशेष रिपोर्ट में, हम शाहजहांपुर के निगोही क्षेत्र से मिले ताम्र-निधियों और मिट्टी के बर्तनों की प्राचीन परंपराओं के माध्यम से उस अनकहे इतिहास को खंगालने का प्रयास करेंगे।

कैसे बना नदियों का जाल और बसने की कहानी?
किसी भी सभ्यता की शुरुआत पानी के किनारे से होती है। शाहजहांपुर का भौगोलिक ढांचा इस बात का गवाह है। विश्वसनीय रिपोर्टों के अनुसार, यह क्षेत्र मुख्य रूप से गंगा के मैदानी भाग का हिस्सा है। यहाँ की मिट्टी नदियों द्वारा लाई गई गाद से बनी है, जो खेती और जीवन यापन के लिए अत्यंत उपजाऊ है। यहाँ का नदी तंत्र—विशेषकर गर्रा, खन्नौत, गोमती और रामगंगा—एक ऐसा प्राकृतिक वातावरण तैयार करता है जो प्राचीन काल में भी बस्तियों के लिए आदर्श रहा होगा। 2000 ईसा पूर्व के आसपास, जब तकनीक बहुत विकसित नहीं थी, तब लोग इन्हीं नदियों के ऊंचे किनारों पर अपनी छोटी-छोटी बस्तियां बसाते थे ताकि बाढ़ से बचाव हो सके। यह भौगोलिक स्थिति ही शाहजहांपुर को उत्तर भारत के प्राचीन इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है।

निगोही की खोज: क्या है 2400 ईसा पूर्व का रहस्य?
शाहजहांपुर के इतिहास में एक नया मोड़ तब आया जब निगोही क्षेत्र से पुरातात्विक महत्व की वस्तुएं प्राप्त हुईं। नवीनतम शोध से पता चला है कि निगोही क्षेत्र में पाए गए 'कॉपर होर्ड' (copper hoard - तांबे के औजारों का जखीरा) के नमूने लगभग 2400 ईसा पूर्व तक पुराने हो सकते हैं। यह खोज इसलिए क्रांतिकारी है क्योंकि यह शाहजहांपुर को सीधे तौर पर 'गेरूए रंग के मृदभांड' (Ochre Coloured Pottery - OCP) संस्कृति और ताम्र-पाषाण युग से जोड़ती है। निगोही से मिले ये तांबे के हथियार यह बताते हैं कि उस समय यहाँ रहने वाले लोग केवल किसान नहीं थे, बल्कि उन्हें धातुओं को पिघलाने और उनसे उपकरण बनाने की कला का भी ज्ञान था। यह एक विकसित होती सभ्यता का प्रमाण है जो 2000 ईसा पूर्व से बहुत पहले अपनी जड़ें जमा रही थी।
File:Cut brick, Indus Valley Tradition, Harappan Phase, Chanhu Daro, Pakistan, c. 2500-1900 BC - Royal Ontario Museum - DSC09716.JPG

निगोही के साक्ष्यों को समझने के लिए हमें ओसीपी यानी 'गेरूए रंग के मृदभांड' संस्कृति को समझना होगा। यह वह दौर था जब हड़प्पा सभ्यता अपने अंतिम चरण में थी, और गंगा के मैदानों में नई बस्तियां उभर रही थीं। ओसीपी मृदभांडों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि समाज अब केवल शिकार पर निर्भर नहीं था। इसके बजाय, लोग अब स्थायी और व्यवस्थित दिनचर्या अपना रहे थे। इसका अर्थ है कि वे स्थाई घर बना रहे थे और अनाज का भंडारण कर रहे थे। शाहजहांपुर के संदर्भ में, निगोही की खोज यह स्थापित करती है कि यहाँ के लोग भी इसी संस्कृति का हिस्सा थे।

समय के साथ, 2000 ईसा पूर्व का यह समाज बदला और 1200-600 ईसा पूर्व के  आसपास एक नए चरण में प्रवेश कर गया। इसे 'चित्रित धूसर मृदभांड' (Painted Grey Ware - PGW) संस्कृति कहा जाता है। यह वह समय था जब गंगा के मैदानों में लोहे का प्रयोग शुरू हो रहा था। शाहजहांपुर और इसके आसपास के क्षेत्रों में बस्तियों का विस्तार इसी दौर में तेजी से हुआ। यह बदलाव केवल बर्तनों के रंग का नहीं, बल्कि तकनीक और जीवनशैली में आए क्रांतिकारी बदलाव का प्रतीक है।

हस्तिनापुर और हुलास से क्या है शाहजहांपुर का कनेक्शन?
पुरातत्वविद इन बस्तियों के कालक्रम को समझने के लिए हस्तिनापुर जैसे प्रमुख स्थलों की खुदाई को एक पैमाने की तरह इस्तेमाल करते हैं। हस्तिनापुर में मिली मिट्टी की परतें इतिहास के पन्नों की तरह एक के ऊपर एक जमी हुई हैं। जब शाहजहांपुर जैसे क्षेत्रों में पुराने बर्तन मिलते हैं, तो उनकी तुलना हस्तिनापुर के इसी क्रम से की जाती है। यदि निगोही या गर्रा नदी के किनारे वैसे ही बर्तन मिलते हैं जो हस्तिनापुर के पीजीडब्ल्यू (PGW) स्तर पर मिले थे, तो यह माना जाता है कि यहाँ भी उसी समय बस्ती रही होगी।

सहारनपुर के हुलास जैसे स्थलों पर हुई खुदाई हमें यह समझने का नजरिया देती है कि शाहजहांपुर के प्राचीन निवासी कैसे रहते होंगे। वहां मिलीं मिट्टी की ईंटें और अनाज के दाने यह बताते हैं कि उस दौर में जीवन कैसा था। हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि शाहजहांपुर के प्राचीन निवासी भी बांस-बल्ली और मिट्टी से बने घरों में रहते होंगे। वे खेती करते थे, पशुपालन करते थे और अपने अनाज को सुरक्षित रखते थे। यह जानकारी हमें बताती है कि शाहजहांपुर का ग्रामीण जीवन आज से हजारों साल पहले भी एक व्यवस्थित ढर्रे पर चल रहा था।

अंत में, यह समझना आवश्यक है कि नदियाँ अपना रास्ता बदलती रहती हैं। नदियों के इस बदलाव और बार-बार आने वाली बाढ़ ने प्राचीन बस्तियों के कई टीलों को गाद की परतों के नीचे दबा दिया है। निगोही की खोज यह इशारा करती है कि शाहजहांपुर के नदी तटों पर अभी भी व्यवस्थित सर्वेक्षण की आवश्यकता है। यहाँ की जमीन के नीचे दबे अवशेष हमें हमारे पूर्वजों के संघर्ष और जिजीविषा की कहानी सुना सकते हैं जो आज भी हमारी नदियों के किनारे दबी पड़ी है।


संदर्भ
https://tinyurl.com/2ckurfp2
https://tinyurl.com/2cmpvfqx
https://tinyurl.com/25lvk9uf
https://tinyurl.com/23z6hvqu
https://tinyurl.com/25ofzkmn
https://tinyurl.com/2co2zcg4
https://tinyurl.com/27rvpmb8 

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