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जब भी हम और आप शाहजहांपुर के इतिहास की बात करते हैं, तो जुबां पर सबसे पहले 1857 की क्रांति और काकोरी कांड के अमर शहीदों का ही नाम आता है। लेकिन, क्या आपने कभी रुककर सोचा है कि जिस 'गर्रा नदी' को हम आज सिर्फ पानी की एक धारा समझते हैं, वह अपनी रेत में इंसानी सभ्यता के हजारों साल पुराने राज दफ्न किए हुए है? विश्वसनीय रिपोर्ट्स और जिला गजेटियर्स (District Gazetteers) साफ बताते हैं कि शाहजहांपुर का इतिहास केवल कुछ सौ साल पुराना नहीं है। यह कहानी हमें 40,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व (पाषाण युग) के उस दौर में ले जाती है, जब आदिमानव (Hunter-gatherers) यहाँ के जंगलों और नदी के किनारों को अपना घर बनाते थे।
गर्रा नदी आदिमानवों की जीवन-रेखा क्यों थी?
शाहजहांपुर के इस भौगोलिक इतिहास को गहराई से समझने के लिए हमें सबसे पहले यहाँ की जीवनदायिनी 'गर्रा' नदी को जानना होगा। दस्तावेज़ बताते हैं कि कुमाऊं की पहाड़ियों से निकलकर गंगा के मैदानों में आने वाली गर्रा इस जिले की मुख्य नदी है। आप उस दौर की कल्पना करें (प्रागैतिहासिक काल), जब नदियाँ सिर्फ प्यास बुझाने का जरिया नहीं थीं, बल्कि आज के 'हाईवे' (highway) की तरह काम करती थीं। 40,000 से 10,000 ईसा पूर्व के बीच, (जिसे हम पुरापाषाण से मध्यपाषाण काल कहते हैं!) यह इलाका आज जैसा बिल्कुल नहीं था। उस समय गर्रा नदी का यह रास्ता घुमंतू शिकारी मानवों के लिए सबसे सुरक्षित गलियारा था। शोध से पता चलता है कि वे लोग एक जगह घर बनाकर नहीं रहते थे, बल्कि गर्रा नदी के ऊंचे रेतीले टीले (Sand bars) उनके लिए 'नैचुरल कैंपसाइट' बन जाते थे, जहाँ वे बाढ़ से बचकर सुरक्षित रातें गुजारते थे।

उस दौर के जंगलों में वे शिकार कैसे करते थे?
उस जमाने का मौसम और माहौल आज के शाहजहांपुर से एकदम अलग था। वैज्ञानिक बताते हैं कि तब यहाँ बड़े-बड़े घास के मैदान और घने जंगल हुआ करते थे। यह माहौल हिरण, नीलगाय और दूसरे जंगली जानवरों के लिए स्वर्ग जैसा था, और इन्हीं का शिकार करके आदिमानव अपना पेट भरते थे। लेकिन शिकार के लिए हथियारों का होना जरूरी था। चूँकि गंगा के मैदानी इलाकों में बड़े पत्थर आसानी से नहीं मिलते, इसलिए नदी के बहाव के साथ आए कंकड़-पत्थर ही उनके लिए सबसे कीमती खजाना थे। पुरातत्व के जानकार बताते हैं कि गंगा के मैदानों में मिली 'माइक्रोलिथ' (microlith - सूक्ष्म पाषाण) परंपरा इसी बात का सबूत है कि उन्होंने इन छोटे पत्थरों को ही अपना हथियार बनाया।
आप इन प्राचीन औजारों और 'सिग्नेचर साइट' की पहचान कैसे कर सकते हैं?
एक आम आदमी के लिए नदी किनारे पड़ा पत्थर सिर्फ एक पत्थर हो सकता है, लेकिन एक पुरातत्वविद् के लिए वह एक 'सिग्नेचर साइट' (signature site) यानी किसी पुरानी सभ्यता का हस्ताक्षर है। इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि उस दौर के इंसान बेहद छोटे और तेज धार वाले औजार बनाने में माहिर थे। वे ब्लेड (blade), स्क्रेपर्स (scrapers) और कोर जैसे औजार बनाते थे। ये औजार आकार में बहुत छोटे होते थे, जिन्हें वे लकड़ी या हड्डी के हत्थों में फंसाकर भाले या तीर की तरह इस्तेमाल करते थे। हजारों सालों में गर्रा नदी की धारा बदली और कई बार बाढ़ आई, जिसने इन सबूतों को कभी मिट्टी की परतों के नीचे दबाया तो कभी बाहर निकाल दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज हम इन सबूतों को कहाँ खोजें?
पुरातत्व विज्ञान हमें एक खास 'फील्ड लॉजिक' (field logic) देता है। अगर हमें इन रहस्यों को खोजना है, तो हमें गर्रा नदी के पुराने घुमावों, कट-बैंक्स (cut-banks) और उन इलाकों को देखना होगा जहाँ रेत का खनन होता है। नदी किनारे की वे ऊँची जगहें, जो बाढ़ के पानी में नहीं डूबती थीं, आदिमानवों का पसंदीदा ठिकाना होती थीं। आज भी जब नदी अपनी धारा बदलती है या किनारों को काटती है, तो अक्सर वे दबी हुई पुरानी परतें बाहर झांकने लगती हैं। बस जरूरत है तो एक वैज्ञानिक नजरिए के साथ उन्हें देखने और पहचानने की।
निगोही क्षेत्र अपने भीतर कौन-से गहरे राज छिपाए हुए हैं?
हाल के दिनों में शाहजहांपुर का 'निगोही' (Nigohi) इलाका पुरातत्व की दुनिया में चर्चा का विषय बना हुआ है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि जैसे बागपत में मिली 4500 साल पुरानी तलवारों और रथों ने साबित कर दिया कि उत्तर भारत का मैदानी इलाका प्राचीन सभ्यताओं का केंद्र था, वैसे ही निगोही से भी प्रागैतिहासिक काल के बाद के अवशेष मिलने के संकेत मिले हैं। यह इस बात का पुख्ता इशारा है कि अगर हम यहाँ सही तरीके से व्यवस्थित सर्वेक्षण (Systematic survey) करें, तो हमें निगोही और गर्रा नदी के आसपास 40,000 साल पुरानी ऐतिहासिक परतें भी मिल सकती हैं।
कुल मिलाकर शाहजहांपुर का इतिहास सिर्फ ईंट-पत्थर की पुरानी इमारतों तक सीमित नहीं है। गर्रा नदी के कंकड़-पत्थरों में हमारे पूर्वजों की कहानी दर्ज है। बागपत की खोज ने उत्तर प्रदेश के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा है, और अब बारी शाहजहांपुर की है कि वह अपनी मिट्टी में छिपे इस 'डीप टाइम' (Deep time) के इतिहास को पूरी दुनिया के सामने लाए।
संदर्भ
https://tinyurl.com/2ab696ur
https://tinyurl.com/2cd4jysm
https://tinyurl.com/2dbea5c2
https://tinyurl.com/2yyhpxnx
https://tinyurl.com/2bydsml3
https://tinyurl.com/2dao8fq3