क्या आपके पैरों के नीचे दबी है आदिमानव की दुनिया? जानिए शाहजहांपुर का अनसुना 'पाषाण इतिहास'

मानव : 40000 ई.पू. से 10000 ई.पू.
10-01-2026 09:01 AM
क्या आपके पैरों के नीचे दबी है आदिमानव की दुनिया? जानिए शाहजहांपुर का अनसुना 'पाषाण इतिहास'

जब भी हम और आप शाहजहाँपुर के गौरवशाली अतीत की चर्चा करते हैं, तो अक्सर हमारा ध्यान 1857 की पहली आज़ादी की लड़ाई या काकोरी कांड के उन जांबाज शहीदों पर जाकर रुक जाता है, जिन्होंने वतन के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। लेकिन क्या हमने कभी ठहरकर यह सोचने की कोशिश की है कि जिस 'गर्रा नदी' को हम आज महज़ जल की एक शांत धारा मानते हैं, वह अपने भीतर कितनी पुरानी दास्तानें समेटे हुए है?

विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ और जिला गजेटियर (District Gazetteers) इस बात की तस्दीक करते हैं कि शाहजहाँपुर का वजूद कुछ सौ या हज़ार साल पुराना नहीं है। यह कहानी हमें हज़ारों साल पीछे उस 'डीप टाइम' (Deep Time) में ले जाती है, जब इंसान ने अभी सभ्यताओं का निर्माण शुरू ही किया था। शोध बताते हैं कि 40,000 ईसा पूर्व से 10,000 ईसा पूर्व के बीच, जिसे हम पुरापाषाण से मध्यपाषाण काल का संधिकाल कहते हैं, यहाँ का भूगोल आदिमानवों (Hunter-gatherers) का पसंदीदा ठिकाना था।

शाहजहाँपुर के इस भौगोलिक रहस्य को समझने के लिए हमें सबसे पहले यहाँ की जीवन-दायिनी 'गर्रा' नदी के चरित्र को समझना होगा। कुमाऊँ की पहाड़ियों से निकलकर गंगा के विशाल मैदानों तक का सफ़र तय करने वाली यह नदी इस क्षेत्र की मुख्य शिरा रही है। प्रागैतिहासिक काल में नदियाँ सिर्फ़ पानी का स्रोत नहीं थीं, बल्कि वे उस दौर के प्राकृतिक रास्तों (Natural Corridors) के रूप में काम करती थीं।

उस प्राचीन युग में यह पूरा इलाका आज जैसा कतई नहीं था। तब गर्रा नदी का बहाव और उसके किनारे घुमंतू शिकारियों के लिए एक सुरक्षित गलियारा प्रदान करते थे। पुरातत्वविदों का मानना है कि ये आदिमानव स्थायी घरों में नहीं रहते थे। गर्रा नदी के बीच या किनारों पर बनने वाले ऊंचे रेतीले टीले (Sand bars) उनके लिए 'प्राकृतिक कैंपसाइट' हुआ करते थे। ये टीले उन्हें दो तरह से सुरक्षा देते थे: पहला, जंगली जानवरों से बचाव और दूसरा, नदी की अचानक आने वाली बाढ़ से सुरक्षा। रात के अंधेरे में ये ऊंचे स्थान उनके लिए महफ़ूज़ ठिकाने बन जाते थे।

उस दौर के शाहजहाँपुर का वातावरण आज की तुलना में कहीं अधिक सघन और वन्य जीवन से भरपूर था। वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों के अनुसार, तब यहाँ ऊँची घास के मैदान और बेहद घने जंगल थे। यह पारिस्थितिकी (Ecology) हिरणों, नीलगायों और अन्य शाकाहारी जीवों के लिए अनुकूल थी, जो बदले में आदिमानवों के भोजन का मुख्य स्रोत बने।

परंतु, शिकार के लिए हथियारों की ज़रूरत थी। गंगा के इन मैदानी इलाकों में बड़े पत्थर मिलना मुश्किल था, इसलिए प्रकृति ने उन्हें एक और तोहफ़ा दिया। गर्रा नदी अपने साथ पहाड़ों से जो कंकड़ और पत्थर बहाकर लाती थी, वही उन आदिमानवों के लिए हथियार बनाने का कच्चा माल बन गए। पुरातत्व की भाषा में इसे 'माइक्रोलिथ' (Microlith) या सूक्ष्म पाषाण परंपरा कहा जाता है। छोटे, नुकीले और धारदार पत्थरों को हड्डी या लकड़ी के हत्थों में फँसाकर वे ऐसे औजार तैयार करते थे, जो चीते की रफ़्तार से भागने वाले जानवरों का शिकार करने में सक्षम थे।

कैसे पहचानें इन 'सिग्नेचर साइट्स' को?
एक आम इंसान के लिए नदी के किनारे पड़ा पत्थर बेमतलब हो सकता है, लेकिन एक पारखी नज़र के लिए वह एक 'सिग्नेचर साइट' (Signature Site) यानी प्राचीन सभ्यता का हस्ताक्षर हो सकता है। उस दौर का मानव ब्लेड (blade), स्क्रेपर्स (scrapers) और कोर जैसे छोटे लेकिन सटीक औजार बनाने में निपुण हो चुका था।

हज़ारों सालों के दौरान गर्रा नदी ने अपनी धारा कई बार बदली है। कई बार विनाशकारी बाढ़ आई होगी, जिसने इन पुरातात्विक सबूतों को मिट्टी की मोटी परतों के नीचे दफ़्न कर दिया। आज जब हम इन रहस्यों को खोजना चाहते हैं, तो हमें 'फील्ड लॉजिक' (Field Logic) का सहारा लेना पड़ता है। इसका अर्थ है नदी के उन पुराने घुमावों (Meanders) और कट-बैंक्स (Cut-banks) का अध्ययन करना, जहाँ अक्सर मिट्टी कटने पर हज़ारों साल पुरानी परतें बाहर आ जाती हैं। विशेषकर जहाँ रेत का खनन होता है, वहाँ अक्सर प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष दबे मिलते हैं।

हाल के वर्षों में शाहजहाँपुर का 'निगोही' क्षेत्र इतिहासकारों के बीच कौतूहल का विषय बना है। जिस तरह बागपत के सिनौली में मिली 4,500 साल पुरानी तलवारों और रथों ने भारतीय इतिहास की धारणा को बदल दिया, वैसे ही निगोही और गर्रा के आसपास के सर्वेक्षणों से प्रागैतिहासिक काल के संकेत मिल रहे हैं। यह इस बात का मज़बूत प्रमाण है कि यदि यहाँ एक व्यवस्थित और वैज्ञानिक सर्वेक्षण (Systematic Survey) किया जाए, तो शाहजहाँपुर का नाम भी दुनिया के प्राचीनतम मानव बस्तियों के नक्शे पर उभर सकता है।

शाहजहाँपुर का इतिहास सिर्फ़ मुगलकालीन इमारतों या औपनिवेशिक दौर के किस्सों तक सीमित नहीं है। इसकी असली जड़ें तो गर्रा नदी के उन कंकड़-पत्थरों में छिपी हैं, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। हमारे पूर्वजों ने इन जंगलों में संघर्ष किया, इस नदी के किनारे ज़िंदगी का सलीका सीखा और अपने निशान छोड़े। अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी मिट्टी में दबे इस 'डीप टाइम' के गौरवशाली इतिहास को पहचानें और उसे दुनिया के सामने लाएं।


संदर्भ 
https://tinyurl.com/2ab696ur
https://tinyurl.com/2cd4jysm
https://tinyurl.com/2dbea5c2
https://tinyurl.com/2yyhpxnx
https://tinyurl.com/2bydsml3
https://tinyurl.com/2dao8fq3 

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