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जब आप शाहजहांपुर की गलियों से गुजरते हैं या यहाँ के खेतों को देखते हैं, तो अक्सर एक आधुनिक या मध्यकालीन शहर की छवि दिखाई देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस जमीन पर यह जिला बसा है, उसकी कहानी इंसान के जन्म से भी अरबों साल पुरानी है? शाहजहांपुर की असली उत्पत्ति की दास्तां 4 अरब साल पहले शुरू होती है, जब पृथ्वी की परत ठंडी हो रही थी और महाद्वीप अपना आकार ले रहे थे। यह कहानी पत्थरों, नदियों और आदिम इंसानों के संघर्ष की है। आज हम विज्ञान और शोध के आइने में शाहजहांपुर के उस अतीत को टटोलेंगे जो इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि यहाँ की मिट्टी और नदियों के बहाव में दर्ज है।
शाहजहांपुर आज जिस स्थान पर स्थित है, वह भूवैज्ञानिक रूप से 'इंडो-गंगेटिक बेसिन' (सिंधु-गंगा का मैदान - Indo-Gangetic Basin) का हिस्सा है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि इस मैदान का निर्माण एक अचानक घटित हुई भौगोलिक घटना का परिणाम है। करोड़ों साल पहले, जब भारतीय प्लेट यूरेशियन प्लेट (Eurasian Plate) से टकराई, तो हिमालय पर्वत का निर्माण शुरू हुआ। इस टक्कर के कारण हिमालय के दक्षिण में और प्रायद्वीपीय भारत के उत्तर में एक विशाल गड्ढा या 'गर्त' बन गया। यह गर्त शुरुआत में एक खाली बेसिन था। समय के साथ, हिमालय से निकलने वाली नदियों ने अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी, रेत और गाद (sediments) लाकर इस गड्ढे को भरना शुरू किया। शाहजहांपुर की जमीन इसी भरावन का नतीजा है। यह प्रक्रिया रातों-रात नहीं हुई, बल्कि इसमें लाखों साल लगे। जैसे-जैसे प्लेटें मुड़ती गईं और पहाड़ ऊंचे होते गए, नदियों ने तलछट जमा कर-करके इस उपजाऊ मैदान को जन्म दिया, जहाँ आज हम खेती करते हैं और बस्तियां बसाते हैं।
हम जिस सतह पर चलते हैं, उसके नीचे क्या है?
भूवैज्ञानिकों के अनुसार, शाहजहांपुर और इसके आसपास के गंगा के मैदानी इलाकों (plains) के नीचे भूगर्भीय परतों का एक जटिल जाल है। यह केवल मिट्टी का ढेर नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित संरचना है जो पृथ्वी के गर्भ में होने वाले परिवर्तनों को दर्शाती है। जिसे हम आज 'मैदान' कहते हैं, वह वास्तव में लंबे समय तक चलने वाले भूवैज्ञानिक परिवर्तनों का उत्पाद है। विशेषज्ञों का मानना है कि शाहजहांपुर के नीचे की ये अदृश्य परतें हमें बताती हैं कि कैसे लाखों वर्षों में जलवायु और नदी प्रणालियों ने इस क्षेत्र को आकार दिया। सतह के नीचे रेत, मिट्टी और कंकड़ की ये परतें न केवल जमीन को मजबूती देती हैं, बल्कि भूजल के संचयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह 'सब-सर्फेस जियोलॉजी' (सतह के नीचे का विज्ञान - Surface Geology) ही तय करती है कि किसी क्षेत्र में पानी कहां मिलेगा और इमारतें कितनी मजबूत होंगी।
शाहजहांपुर के भूगोल को समझने के लिए यहाँ की नदियों, विशेषकर 'गर्रा' नदी को समझना सबसे जरूरी है। केंद्रीय भूमि जल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार, शाहजहांपुर गंगा के मध्य मैदानी क्षेत्र में स्थित है। यहाँ की मिट्टी मुख्य रूप से जलोढ़ (Alluvial) है, जो नदियों द्वारा लाई गई है। लेकिन इस जिले की सबसे खास भौगोलिक विशेषता गर्रा नदी है। गर्रा नदी केवल पानी की एक धारा नहीं है, बल्कि यह शाहजहांपुर को भौगोलिक रूप से लगभग दो बराबर हिस्सों में बांटती है। यह नदी जिले के ‘लैंडस्केप’ (landscape) को तय करती है। सदियों से, गर्रा और उसकी सहायक नदियां अपने किनारों को काटती और नए किनारों को बनाती रही हैं। यह प्रक्रिया, जिसे 'फ्लडप्लेन बिल्डिंग' (Floodplain Building - बाढ़ के मैदान का निर्माण) कहा जाता है, निरंतर चलती रहती है। इसके अलावा, यहाँ की रेतीली और दोमट मिट्टी बारिश के पानी को सोखने और भूजल (Groundwater) को पुनर्भरण करने का काम करती है। यह प्राकृतिक प्रणाली ही है जो सदियों से यहाँ जीवन को संभव बनाए हुए है।
सिर्फ शाहजहांपुर ही नहीं, बल्कि पूरा गंगा का मैदान एक लंबे विकास क्रम का नतीजा है। पैलियोन्टोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया (Palaeontological Society of India) के शोध पत्र बताते हैं कि आज जो समतल मैदान हमें दिखाई देते हैं, वे अचानक नहीं बने। यह एक धीमी और सतत प्रक्रिया थी। जैसे-जैसे हिमालय से नदियां नीचे उतरीं, उन्होंने अपने साथ लाए मलबे को जमा किया। इस जमाव ने न केवल जमीन बनाई, बल्कि यहाँ की वनस्पति और जीवों के लिए भी आधार तैयार किया। शाहजहांपुर का अस्तित्व इसी 'मेगा-जियोलॉजिकल' (Mega-geological) घटना का हिस्सा है। गहरे समय (Deep Time) के पैमाने पर देखें, तो यह जिला प्रकृति की उस विशाल मशीन का एक छोटा सा पुर्जा है जो महाद्वीपों को खिसकाती है और नए भू-भाग बनाती है। इसलिए, जब हम यहाँ की मिट्टी को देखते हैं, तो हम वास्तव में करोड़ों साल पुराने पहाड़ों के अंश को देख रहे होते हैं जो पानी के साथ बहकर यहाँ आए और जम गए। 
इतिहास केवल राजाओं और नवाबों का नहीं होता। शाहजहांपुर के इतिहास की सुई को अगर हम 2,00,000 साल पीछे (मध्य पुरापाषाण काल/Middle Palaeolithic) ले जाएं, तो हमें एक अलग ही तस्वीर मिलती है। उस समय न तो शहर थे, न खेती और न ही आज जैसा समाज। लेकिन यह क्षेत्र वीरान नहीं था। शोध बताते हैं कि आदिम मनुष्य हमेशा नदी घाटियों (River Corridors) को ही अपना ठिकाना बनाते थे। क्यों? क्योंकि नदियां जीवन की गारंटी थीं। यहाँ पीने के लिए पानी था, शिकार के लिए जानवर नदी किनारे आते थे, और सबसे ज़रूरी बात—नदी के तल में पत्थर और कंकड़ मिलते थे। इन पत्थरों से वे अपने औजार बनाते थे। मध्य पुरापाषाण काल की संस्कृति और औजार बनाने की परंपरा (Tool Traditions) यह इशारा करती है कि गंगा का मैदान, जिसमें शाहजहांपुर भी शामिल है, आदिम मानव की गतिविधियों के लिए एक प्राकृतिक रंगमंच था। यहाँ के जंगल और नदी किनारे उनके लिए भोजन और सुरक्षा का एकमात्र जरिया थे।
अब हम गहरे अतीत से सीधे आज के समय में आते हैं। जिस गर्रा नदी ने लाखों सालों से इस जिले को संवारा, आज वही नदी संकट में है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (NMCG) की रिपोर्टें बताती हैं कि शाहजहांपुर में गर्रा नदी पर औद्योगिक दबाव बढ़ गया है। शहर के नाले और उद्योगों का अपशिष्ट सीधे नदी में गिर रहा है। नदी की सफाई और प्रबंधन के लिए जो योजनाएं (Action Plans) बनाई गई हैं, वे इस बात की तस्दीक करती हैं कि नदी का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हो रहा है। जो नदी कभी जीवन देती थी, आज उसे ही 'प्रबंधन' की जरूरत पड़ गई है। विभिन्न ड्रेंस (Drains) के माध्यम से आने वाला कचरा नदी की सेहत बिगाड़ रहा है। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि अगर हमने अपने प्राकृतिक संसाधनों का सम्मान नहीं किया, तो जो भूवैज्ञानिक शक्तियां हमें बना सकती हैं, वे विनाश का कारण भी बन सकती हैं।
भूवैज्ञानिक इतिहास और वर्तमान की लापरवाही का संगम हमें अक्सर बरसात के मौसम में देखने को मिलता है। हाल ही में आई बाढ़ की खबरें इस बात का सबूत हैं कि शाहजहांपुर की नदियां, विशेषकर गर्रा, अभी भी एक शक्तिशाली प्राकृतिक बल हैं। जब जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर बहता है, तो दर्जनों गांव बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं और जिला अस्पताल तक को खाली कराना पड़ता है। यह मौसमी उथल-पुथल हमें यह याद दिलाने के लिए काफी है कि शाहजहांपुर की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। जिन ताकतों ने “पानी, मिट्टी और गुरुत्वाकर्षण” लाखों साल पहले इस मैदान को बनाया था, वे आज भी सक्रिय हैं। बाढ़ का पानी जब बस्तियों में घुसता है, तो वह बस यह बताता है कि हम जिस जमीन पर कब्जा जमाए बैठे हैं, वह असल में नदी का ही घर है। इंसान ने भले ही तकनीक विकसित कर ली हो, लेकिन प्रकृति के इन आदिम नियमों के आगे हम आज भी बौने हैं।
शाहजहांपुर को केवल एक प्रशासनिक जिले के रूप में देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी। यह जिला 4 अरब साल पुरानी पृथ्वी की हलचल, हिमालय के उठने और नदियों के धैर्य का परिणाम है। 2,00,000 साल पहले यहाँ विचरण करने वाले आदिमानव से लेकर आज के आधुनिक नागरिक तक, हम सब इसी मिट्टी और पानी के ऋणी हैं। गर्रा नदी, जो आज प्रदूषण और बाढ़ के बीच संघर्ष कर रही है, वही हमारी असली विरासत है। इतिहास के पन्नों में दर्ज तारीखें बदल सकती हैं, लेकिन जमीन के नीचे और नदी की लहरों में छिपी यह दास्तां हमेशा अमर रहेगी।
संदर्भ
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