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क्या आपको मालूम है कि मुर्गी के अंडे के आकार जितना छोटा यूरेनियम (Uranium) ईंधन उतनी ही बिजली पैदा कर सकता है, जितनी 88 टन कोयला जलाने से पैदा होती है? आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकट से जूझ रही है और साफ़ ऊर्जा की तलाश तेज़ हो गई है, तो परमाणु ऊर्जा एक बड़े विकल्प के रूप में सामने आई है। शाहजहांपुर और इसके आस-पास के क्षेत्रों में रहने वाले बिजली उपभोक्ताओं और विज्ञान में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए यह जानना बेहद दिलचस्प होगा कि आख़िर यूरेनियम जैसे छोटे से तत्व से इतनी भारी मात्रा में ऊर्जा कैसे पैदा होती है। इसके साथ ही भारत के लिए यह समझना ज़रूरी है कि 1969 में तारापुर से शुरू हुआ हमारा परमाणु सफ़र आज कहाँ पहुँच चुका है और क्या सच में परमाणु ऊर्जा कोयले का एक सुरक्षित विकल्प बन सकती है।

परमाणु ऊर्जा की खोज कैसे हुई और इसका विज्ञान क्या है?
परमाणु ऊर्जा वह ऊर्जा है जो परमाणु प्रतिक्रियाओं से प्राप्त होती है और इसका इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जाता है। परमाणु विखंडन की प्रक्रिया की खोज साल 1938 में रेडियोधर्मिता (radioactivity) के विज्ञान पर चार दशकों के काम के बाद हुई थी। इस खोज के तुरंत बाद वैज्ञानिकों ने यह महसूस किया कि विखंडन करने वाले नाभिक (nucleus) द्वारा छोड़े गए न्यूट्रॉन (Neutron) सही परिस्थितियों में पास के नाभिक में विखंडन पैदा कर सकते हैं, जिससे एक आत्मनिर्भर श्रृंखला प्रतिक्रिया शुरू हो सकती है। जब साल 1939 में प्रायोगिक रूप से इसकी पुष्टि हो गई, तो कई देशों के वैज्ञानिकों ने परमाणु हथियार (nuclear weapons) विकसित करने के लिए अपनी सरकारों से शोध के लिए समर्थन मांगा। अमेरिका में इन्हीं शोध प्रयासों के कारण दुनिया का पहला मानव निर्मित परमाणु रिएक्टर शिकागो पाइल-1 (Chicago Pile-1) बना, जिसने 2 दिसंबर 1942 को क्रिटिकैलिटी (Criticality) हासिल की। शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए बिजली का उत्पादन पहली बार 20 दिसंबर 1951 को इडाहो के पास ईबीआर-1 (EBR-1) प्रायोगिक स्टेशन पर एक परमाणु रिएक्टर द्वारा किया गया था, जिसने शुरुआत में लगभग 100 किलोवाट बिजली पैदा की थी।
परमाणु ऊर्जा संयंत्र असल में बिजली का उत्पादन कैसे करते हैं?
परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में बिजली पैदा करने की प्रक्रिया काफी हद तक कोयले और गैस से चलने वाले संयंत्रों के समान ही होती है, जहाँ गर्मी का इस्तेमाल पानी को भाप में बदलने और टरबाइन (turbine) चलाने के लिए किया जाता है। लेकिन मुख्य अंतर यह है कि यहाँ गर्मी जीवाश्म ईंधन जलाने से नहीं, बल्कि परमाणु के नाभिक के टूटने से पैदा होती है। रिएक्टर के अंदर आमतौर पर यूरेनियम-235 का इस्तेमाल होता है। जब एक भारी और अस्थिर यूरेनियम-235 परमाणु टूटता है, तो भारी मात्रा में गर्मी ऊर्जा निकलती है। रिएक्टर के अंदर पानी ठंडा करने वाले तरल की तरह घूमता है और गर्मी को अपने अंदर ले लेता है। यह अत्यधिक गर्म शीतलक एक और पानी के स्रोत को उबालने के लिए इस्तेमाल होता है, जिससे उच्च दबाव वाली भाप बनती है। यह भाप टरबाइन के ब्लेड पर निर्देशित की जाती है, जिससे टरबाइन तेज़ी से घूमने लगता है। टरबाइन एक जनरेटर (Generator) से जुड़ा होता है, जो इस घूर्णन की यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदल देता है। इस पूरी श्रृंखला प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने और विस्फोट को रोकने के लिए कैडमियम (Cadmium) या बोरॉन (Boron) से बनी नियंत्रण छड़ों का इस्तेमाल किया जाता है, जो अतिरिक्त न्यूट्रॉन को सोख लेती हैं।
भारत में परमाणु ऊर्जा की शुरुआत और तारापुर संयंत्र का क्या महत्व है?
भारत ने 4 अगस्त 1956 को परमाणु युग में प्रवेश किया था, जब भारत का पहला परमाणु रिएक्टर अप्सरा (APSARA) चालू हुआ था। इस रिएक्टर को भारत ने डिज़ाइन और बनाया था, जबकि परमाणु ईंधन यूनाइटेड किंगडम (United Kingdom) द्वारा आपूर्ति किया गया था। भारत में परमाणु ऊर्जा का उपयोग कर बिजली उत्पादन अक्टूबर 1969 में शुरू हुआ, जब तारापुर में दो रिएक्टरों को सेवा में रखा गया था। तारापुर परमाणु ऊर्जा स्टेशन का निर्माण अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक द्वारा किया गया था। तारापुर आज भी देश में सबसे कम लागत वाली गैर-जलविद्युत शक्ति की आपूर्ति करता है। भारत का दूसरा परमाणु ऊर्जा स्टेशन राजस्थान के कोटा के पास बना था, जिसकी पहली इकाई अगस्त 1972 में चालू हुई थी और इसे कनाडा के सहयोग से बनाया गया था। इसके बाद भारत ने चेन्नई के पास कलपक्कम (Kalpakkam) में अपना तीसरा परमाणु ऊर्जा स्टेशन बनाया, जिसे पूरी तरह से भारत द्वारा ही डिज़ाइन और निर्मित किया गया था।

यूरेनियम क्या है और इसे रिएक्टरों के लिए ईंधन के रूप में क्यों चुना जाता है?
यूरेनियम एक प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला रेडियोधर्मी तत्व है, जिसका परमाणु क्रमांक 92 है और यह एक्टिनाइड्स (Actinides) नामक तत्वों के एक विशेष समूह से संबंधित है। यह पृथ्वी की पपड़ी में मौजूद सामान्य तत्वों में से एक है और सोने से लगभग 500 गुना अधिक पाया जाता है। पृथ्वी पर पाए जाने वाले प्राकृतिक यूरेनियम में मुख्य रूप से तीन आइसोटोप (isotopes) होते हैं, जिनमें से यूरेनियम-238 की मात्रा 99 प्रतिशत से अधिक होती है। लेकिन रिएक्टरों में विखंडन के लिए यूरेनियम-235 की आवश्यकता होती है, जो प्राकृतिक यूरेनियम में केवल 0.72 प्रतिशत ही होता है। इसलिए इसे ईंधन के रूप में उपयोग करने के लिए संवर्धन नामक प्रक्रिया के माध्यम से यूरेनियम-235 के अनुपात को 4 से 5 प्रतिशत तक बढ़ाया जाता है। खनन के बाद यूरेनियम को एसिड (acid) के साथ मिलाकर एक पीला पाउडर निकाला जाता है जिसे येलोकेक (Yellowcake) कहते हैं। इसे गैस में बदलकर सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) में घुमाया जाता है और अंत में इसे छर्रों में ढालकर रिएक्टर कोर में ईंधन के रूप में डाल दिया जाता है।
परमाणु ऊर्जा के मुख्य फ़ायदे और इससे जुड़े बड़े ख़तरे क्या हैं?
परमाणु ऊर्जा का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि यह साफ़ ऊर्जा का एक बहुत बड़ा स्रोत है। अमेरिका जैसे देशों में यह हर साल 471 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक कार्बन उत्सर्जन से बचाता है, जो 100 मिलियन कारों को सड़क से हटाने के बराबर है। यह उद्योग लाखों लोगों को रोज़गार भी देता है। लेकिन इन फ़ायदों के साथ कई बड़ी चुनौतियाँ भी हैं। दुनिया भर में हुए तीन बड़े परमाणु हादसों और परमाणु हथियारों के साथ इसके झूठे जुड़ाव के कारण आम जनता अक्सर इसे ख़तरनाक मानती है। इसके अलावा रिएक्टरों में इस्तेमाल के बाद बचने वाला ईंधन अत्यधिक रेडियोधर्मी होता है और इसे सुरक्षित रूप से हज़ारों सालों तक संभाल कर रखना एक बड़ी समस्या है। परमाणु ऊर्जा संयंत्र के निर्माण में भारी पूंजी की आवश्यकता होती है और नियमन व लाइसेंस मिलने में होने वाली देरी के कारण इसकी लागत अक्सर बहुत बढ़ जाती है।

भारत के ऊर्जा भविष्य में परमाणु तकनीक का क्या स्थान है?
भारत ने साल 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा क्षमता हासिल करने का एक बहुत ही महात्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। केंद्रीय बजट 2025-26 में भारत सरकार ने परमाणु ऊर्जा के लिए एक बड़े क़दम के रूप में 20,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया है ताकि साल 2033 तक कम से कम पाँच स्वदेशी रूप से डिज़ाइन किए गए स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (Small Modular Reactors) विकसित किए जा सकें। सरकार भारत स्मॉल रिएक्टर्स को भी बढ़ावा दे रही है जो 220 मेगावाट क्षमता वाले होंगे और स्टील (steel) तथा एल्युमीनियम (aluminum) जैसे बड़े उद्योगों को डीकार्बोनाइज़ (Decarbonize) करने में मदद करेंगे। इसके लिए परमाणु ऊर्जा अधिनियम में संशोधन किए जाएंगे ताकि निजी क्षेत्र भी इसमें निवेश कर सके। हाल ही में भारत की सबसे पुरानी यूरेनियम खदान, जादुगोड़ा खदान में एक नई जमा राशि की खोज हुई है जिससे इस खदान का जीवन पचास वर्षों से अधिक बढ़ जाएगा। इन प्रयासों के ज़रिए भारत साफ़ ऊर्जा और भविष्य की बढ़ती बिजली माँगों को पूरा करने के लिए मज़बूती से क़दम बढ़ा रहा है।
संदर्भ
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